अपने वितान में पाँच दशकों से भी अधिक समय को समेटे हुए मौजूदा हिन्दी कविता आधुनिक काल के सबसे लंबे कालखंड की यात्रा है। यह न केवल साढ़े पाँच दशकों की उतार-चढ़ाव भरी आकर्षक, अनाकर्षक, रोचक और उबाऊ कथा है, बल्कि पाँच पीढ़ियों के उठने, गिरने, चमकने, बुझने, महत्वपूर्ण और गैर-कीमती होने की भी गाथा है। विश्वम्भरनाथ उपाध्याय जैसे समकालीन कविता के अधिकारी आलोचकों ने इस दौर की शुरुआत धूमिल के धूमकेतु-सी उभार से माना है, और अपने निष्कर्ष को, प्रवृत्तियों में आए निर्णायक मोड़ के आधार पर सिद्ध भी किया है। राजनीतिक चेतना, प्रतिरोध, जनपक्षधरता और सामयिकता 1970 के दशक की हिन्दी कविता के निर्णायक स्वर हैं, जिसके बगैर आगे कविताएँ लिखना असंभव-सा हो गया। धूमिल के अतिरिक्त कुमार विकल इन विशेषताओं को प्रखर आवाज़ देने वाले दूसरे धारदार हस्ताक्षर हैं। यद्यपि दशक के बदलने मात्र से सृजन और साहित्य की प्रवृत्तियाँ अचानक नहीं बदल जातीं, न ही पिछले दशक के सृजन-रंग अचानक गायब हो जाते हैं, बल्कि कभी तेज, कभी मद्धिम, कभी प्रखर तो कभी आभासी गूँज-प्रतिगूँज सदा कायम ही रहती है। एक बार सृजन के आयतन में जिस प्रवृत्ति ने जन्म ले लिया, वह दृष्टि, आदत, प्रेरणा या परम्परा का रूप ले लेती है। कई बार वह ऊर्जा के रूप में तब्दील होकर सदियों तक स्थायी रहती है। जैसे ऊर्जा रूपांतरित तो सकती है, परन्तु उसे नष्ट करना असंभव है, वैसे ही सृजनात्मक प्रवृत्तियों को भी।
कवि का राजनीतिक चेतना-संपन्न होना एक बात है, और राजनीतिक चरित्र का हो जाना बिल्कुल दूसरी बात। चेतना-संपन्नता जहाँ हमें सजग, जवाबदेह और प्रतिबद्ध बनाती है, वहीं राजनीति करने की आदत दोहरे चरित्र का, खोखला और घोर अविश्वसनीय बना देती है। ऐसा कवि लिखता नहीं, खेलता है। कुछ देता नहीं, बहुत कुछ ले लेता है। वह साहित्य का विस्तार नहीं करता, बल्कि सृजन के शिखर को संकट में ला खड़ा करता है। समकालीन कविता की यात्रा प्रगतिशील दृष्टिकोण की सत्ता स्थापित होने की भी कहानी है। जिसके प्रथम मशालची धूमिल तो हैं ही, आगे चलकर वेणुगोपाल, कुमारेन्द्र पारसनाथ, चंद्रकांत देवताले, गोरख पांडे, आलोक धन्वा जैसे प्रतिबद्धता के मानक स्वर प्रकट होते हैं। कहना जरूरी है कि यह वही दौर है, जब हिन्दी कविता में कवियों के भीतर कैरियर की होशियारी जन्म लेती है। जहाँ कविताई उनके लिए एक तड़प, एक असंतोष, मोर्चा या योगदान नहीं, बल्कि लोकप्रियता, अमरत्व, महानता और हैसियत को साधने का रंगमंच बनने लगता है। स्वाभाविक है, जब सीढ़ियों से ज्यादा मंजिल पर, राह से ज्यादा मुकाम पर, तीर से ज्यादा निशाने पर नजर होगी, तो घातक भटकाव आना ही है। जब-जब लक्ष्य-आसक्ति बनकर छाता है, तो हमें विवेकहीन भटकाव की ओर बहा ले चलता है।
1980 का दशक हिन्दी कविता का वह दौर है, जब विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, लीलाधर जगूड़ी, ज्ञानेन्द्र पति, भगवत रावत, असद जैदी, अरुण कमल, अनामिका, नरेश सक्सेना जैसे कुशल कवियों का उद्भव होता है। कहना जरूरी है कि इस दशक के कवियों ने धूमिल, मुक्तिबोध या नागार्जुन के समानांतर अपना कद सुनिश्चित तो नहीं किया, किन्तु अपने जमीनी सृजन की निरंतरता, कहन की मौलिकता और शैली की सहजता के बूते अपनी जरूरी महत्ता स्थापित की।
इन्हीं समकालीन कवियों के बीच अग्रिम पंक्ति के कवि हैं—राजेश जोशी, जिनकी एक कविता निराला की स्मृति को समर्पित है :
कितना मुश्किल था अनदेखे को
बार-बार देखने की लालसा का खेल
उस अनदेखे को देखने के लिए
मैं कभी शमशेर की कविता में घुसता चला जाता
और कभी रामविलास शर्मा की साहित्य साधना में।
(प्रसंग : समकालीन कविता विशेषांक-2024)
कांग्रेस के शासनकाल की जैसे तार-तार आलोचना धूमिल, नागार्जुन और रघुवीर सहाय करते हैं, वह समकालीन हिन्दी कविता में बेलीक मानक की तरह है। आजादी के बाद नेहरू सरकार ने साहित्य, कला और भाषा को नयी ऊँचाई देने के लिए साहित्य अकादमी की स्थापना 12 मार्च 1954 को की। तब अकादमी का उद्देश्य भारत की प्रमुख प्रांतीय भाषाओं और उसके सृजन को राष्ट्रीय पहचान देना था। साहित्य अकादमी पुरस्कार भी आरंभ हुए। “हिम तरंगिणी” के लिए पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार माखनलाल चतुर्वेदी को मिला। यह वर्ष 1955 का है। ठीक अगले वर्ष—1956 में “पद्मावत संजीवनी” पर वासुदेव शरण अग्रवाल को पुरस्कार हासिल हुआ। आज राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार की सर्वोच्च प्रतिष्ठा है। नब्बे के दशक में उभरने वाले नवभाषा-अन्वेषक कवियों में एक नाम लीलाधर मंडलोई का है। वे स्थायी भावबोध की छोटी कविताएँ लिखने में कुशल सिद्ध हुए। उनकी कविता क्राफ्ट से मुक्त जीवन-संघर्ष की उपज है, जिसमें कवि का जमीनी विवेक स्पष्ट और उच्च स्वर में बोलता है :
मैं पंखों के उगने के बारे में सोचता
सचमुच मैं किसी सूक्ष्म काया में
कोयल के घोंसले में
बची-खुची उम्र को
सुरीला बिताते, बीत जाना चाहता हूँ।
(प्रसंग : उपरोक्त विशेषांक—पृ. सं. 165)
21वीं सदी का शुरुआती दौर 20वीं की बहुदिशात्मक प्रवृत्तियों का उत्तर-विकास था। कारण-कार्य का नियम एक यथार्थपरक सिद्धांत है, जो कि कमोबेश हर अस्तित्व पर लागू होता है। मौजूदा सदी में थोड़ा-थोड़ा सभी सदियों का रंग, गंध, स्वाद नमक की तरह शामिल है। जिसे 21वीं सदी कहते हैं, वह 19-20वीं सदी की ऋणी है। जिसे समकालीन कविता कहते हैं, वह अकविता की ऋणी है। जैसे धूमिल की कविता ऋणी है, सत्तर के दशक की विद्रोही चेतना की। मुक्तिबोध लाख आलोचना किए हों, छायावाद की, किन्तु जयशंकर प्रसाद की गरिमा की अंतर्ध्वनि उनकी चेतना में निनाद तो भरती ही थी। समकालीन हिन्दी कविता भी दो आयामों में विभाजित है—पूर्व और उत्तर समकालीन कविता में। 1970 से सन् 2000 ई. की कविता पूर्वार्द्ध की कविता और सन् 2000 से अब तक की कविता उत्तरार्द्ध की कविता कही जा सकती है। इस विभाजन का कारण हैं—कवियों की पाँच पीढ़ियों में आए हुए भाषागत, शिल्पगत, वैचारिक और विषयगत बदलाव। पूर्वार्द्ध के ही एक स्मरणीय कवि हैं—अष्टभुजा शुक्ल, जिनकी एक कविता “बकरी बंधी ओसारी में” कहन की नयी तासीर लिए-दिए है—
धनिया, लहसुन क्यारी में
महक समाई प्यारी में
छुटी खराई सुबह-सुबह
मलकिन की मुखतारी में
मिठऊ लौकी खूब फली
चाऊर की धोवनारी में।
(प्रसंग : उपरोक्त अंक—पृ. सं. 169)
समकालीन हिन्दी कविता का उत्तरकाल अनिवार्यतः हाशिए के समाज और उनके कठिन यथार्थ के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का समय है। इस पक्षधरता को जनचेतना, लोकोन्मुखता, प्रगतिशीलता भी कहा गया, किन्तु यह है—कवि के मौलिक दायित्व के अंतर्गत ही। यह समयमुखी प्रवृत्ति है, जहाँ कोई कवि अपने वक्त के उपेक्षित, अनाम और दमित सवालों के प्रति जवाबदेह बनता है, धैर्यपूर्वक जटिलता की तहों में उतरता है, नीचे दबे कारणों की पहचान करता है और अपनी सधी हुई राजनीतिक चेतना के बल पर जनप्रश्नों का उद्घाटन करता है। आज करीब हर समकालीन कवि कहीं न कहीं समयमुखी है, जनचिंतक है, लोक-प्रतिबद्ध है। बस फर्क यह है कि हमारे समकालीन कवि जनचिंता को खालिस कविताओं में जीते हैं या अपनी साँसों की आदत बना लेते हैं। बाबा नागार्जुन ताउम्र जनगायक बने रहने के कारण जनवादी कवि के तौर पर समादृत हुए। वे भाव, मन, भाषा, व्यवहार, तेवर, तल्खी सभी स्तरों पर ढले हुए थे, जनता के बीच। यहाँ तक कि पहनावा, ढब, ढाँचा के स्तर पर भी। उनके बाद वैसे ठेठ जमीनी अंदाज़ का दूसरा हिन्दी कवि प्रकट न हुआ। दो राय नहीं, जनता को कलम में कालजयी बनाने के पहले अपने हृदय में उनकी अमरता को जीना पड़ता है। उन्हीं के समकक्ष त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल भी हुए, परन्तु नागार्जुन जैसी सर्वकंठी स्वीकार्यता उन्हें न मिल सकी। मदन कश्यप उत्तरकालीन दौर के महत्वपूर्ण कवि, जनवादी, लोकोन्मुखी और प्रगतिशील भी। लीजिए पेश है—उनकी समय-सजग कविताई का एक उदाहरण :
पत्थर एक यथार्थ है
और ईश्वर एक कल्पना
जीवन इसी यथार्थ और कल्पना के बीच में है
कहीं शांत कहीं बेचैन
कहीं अन्याय को सहता हुआ
कहीं अन्याय से लड़ता हुआ।
(प्रसंग : उपरोक्त अंक : पृ. सं. 172)
विष्णु नागर सजग वैचारिक व्यंग्य और राजनीतिक प्रतिरोध के सिद्धहस्त कवि हैं। मायने की बात है, उनके कहन की साहसिकता, जो ठीक अभी और आज की पतित, शातिर और शतरंजी राजनीति को तीक्ष्ण कलम के सीधे निशाने पर लेते हैं। नागार्जुन, रघुवीर सहाय, धूमिल के बाद जिन कवियों ने प्रतिरोध की प्रामाणिकता को कविता में बरकरार रखा, उनमें सबसे पहला नाम विष्णु नागर का है। देखिए उनकी कविता “फर्क” में कहने के साहस का फर्क—
वे चाहते थे कि
मैं बोलूँ ही नहीं
मैं चाहता था कि
सिर्फ बोलूँ ही नहीं
यूँ तो उनमें और मुझमें
सिर्फ एक शब्द का फर्क था
नहीं, एक शब्द का क्यों ?
फर्क ही फर्क था।
(प्रसंग—उपरोक्त विशेषांक—178)
प्रश्न जब पक्षधरता का हो, वह भी जन पक्षधरता का, तो पूर्वांचल के लोकशिल्पी स्वप्निल श्रीवास्तव का नाम कैसे पीछे रह सकता है? वे मुकम्मल जनवादी व्यक्तित्व हैं। सिर्फ सोच से नहीं, कलम से नहीं, कविता लिखकर नहीं। बल्कि स्वभाव से, वाणी से, कल्पना से, आकांक्षा से, उद्देश्य और जिद से भी जनपक्षधर कवि। समकालीन वक्त में यह निरंतर मुश्किल, बल्कि असंभव होता जा रहा है, कि जिसके हर रूप से एक भी भाव की आवाज़ निकले। जिसके सृजन और व्यक्तित्व को एकाकार देखना कठिन न लगे, जिसको पढ़ने का अर्थ स्वयं को मिट्टी की मनुष्यता में संस्कारित करना हो। स्वप्निल श्रीवास्तव ने जनपद, अंचल, पुरवा, पट्टी, गाँव की अनगढ़ता, गमक, गंध और खटास-तितास के बीच अपने व्यक्तित्व को निर्मित किया, विकसित किया। कवि का गद्य उनके कविमन का पूरक है और कविता, कवि के विचारजीवी स्वभाव की गूँज-प्रतिगूँज। पेश है—”सभ्यता” कविता की कुछ पंक्तियाँ—
उन्होंने हमें पीना सिखाया
स्त्रियों में जगायी दिलचस्पी
उसे आनंद की वस्तु बनाया
उन्होंने हमें झुकने के तरीके बताए
और कहा—सफल होने के लिए
झुकना अच्छा व्यायाम है।
(प्रसंग : उपरोक्त अंक : 185)
सन् 2004 में कथादेश पत्रिका का नवलेखन विशेषांक प्रकाशित हुआ। जिसमें कविता खंड के सम्पादक थे—अरुण कमल। अपनी संक्षिप्त भूमिका में अरुण कमल उम्मीद जाहिर करते हैं—”अधिकांश लोग अन्याय और असमानता का विरोध कर रहे हैं। खुलकर ऊँची आवाज में सत्ता को चुनौती दे रहे हैं। कहीं भी लाचारी या हताशा का भाव नहीं है। यानी कविता, युवा कविता आज भी वैसी ही तीक्ष्ण और प्रखर है, जैसी पहले थी। यानी सचमुच ये नये कवि संघर्षशील मनुष्य के प्रतिनिधि हैं और श्रेष्ठ मानव-मूल्यों के सजग प्रहरी।”【कथादेश : जुलाई-2004, पृष्ठ-09】
युवा कवियों की यह पक्षधरता क्या उसी तेवर, अंदाज़ और गहराई की है, जैसे प्रगतिवादी कवियों—नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और शील की रही। वैचारिक प्रतिबद्धता की नींव उस काव्यधारा के सिपाहियों की इतनी गहरी है, कि उनका सारा जीवन ही जनप्रतिबद्धता के नाम अर्पित है, जिसमें कोई बनाव नहीं, तराश नहीं, नफासत, कृत्रिमता या अतिरिक्त कला नहीं। दो मत नहीं कि सदी की शुरुआत के साथ उभरते कवियों की छटा ने लोक सम्पृक्ति का अभिनव राग छेड़ा है। जिसमें आम चेहरों का मूल्य स्थापित करने की ललक है, मिट्टी के अलक्षित रंग-कुरूंग को कीमती सिद्ध करने का साहस है, और कविता के फलक पर देशज महक को स्थायी बनाने का कौशल भी। वर्ष-2017 में “नया ज्ञानोदय” का अंक मजदूर वर्ग पर केन्द्रित हुआ। “साहित्य में मजदूर” शीर्षक से। प्रतिष्ठित कथाकार संजीव आह्वान के अंदाज़ में याद दिलाते हुए लिखते हैं—”कहाँ मर-खप गये वे क्रांतिचेता जो दुनिया के सारे मनुष्यों को एक साथ वैज्ञानिक चेतना में गूंथते हुए देश की ही नहीं, वैश्विक अन्याय मुक्त जीवन की बातें करते हुए दुनिया के मजदूरों एक हो, का नारा देते और “हम होंगे कामयाब एक दिन” गाया करते थे। काफी हद तक वे सफल भी हुए। फिर अचानक कुंद होती गयी उस चेतना की धार और साहित्य पीछे छूटता चला गया।” 【नया ज्ञानोदय : मई-2017, पृष्ठ-35】
आज जबकि देश के किसानों, मजदूरों, दिहाड़ी श्रमिकों, कारीगरों के जीवन, अस्तित्व और मूल्य पर अप्रत्याशित संकट है, हमारे साहित्य में मोर्चावादी विचारकों, लेखकों, कवियों का वीरान दृश्य नजर आता है। कहने को तो समूचा समकालीन साहित्य लबरेज़ है—जनचिंता को स्वर देने वाले कवियों से। मगर हमारी सदी के गोरख पांडे, धूमिल कहाँ हैं? क्या हमारे युवा कवियों में मुक्तिबोध जैसी मशालवाहक जिद नजर आती है। क्या हमारी सदी का युवा कवि अपनी प्रसिद्धि, स्थापना, सम्मान और लोकप्रियता की चिंता किए बगैर नागार्जुन की तरह जनपद का ठेठ राग छेड़ता हो, खाँटी गद्य में बही जा रही हिन्दी कविता में लय की राह बनाने का साहस करता हो? हमारे दौर का कवि सचमुच अपने चरित्रों से आत्माकार है या नहीं, उनके दर्द, पराजय, सपनों, आशाओं, अपमान और अदृश्य घावों को शरीर के किसी कोने में यकीनन जीता है नहीं यह अधिक जरूरी सवाल है। केदारनाथ अग्रवाल की कविता—जो शिलाएँ तोड़ते हैं, की कुछ पंक्तियाँ उठाते हैं—
जिंदगी को
वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं
जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं
यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम मैं मानता हूँ!!
【नया ज्ञानोदय : मई-2017, पृष्ठ-55】
इसी अंक में नयी सदी के कवि संजय कुंदन की कविता—शिलान्यास का पत्थर, की चंद पंक्तियाँ—
जनता के साथ मजाक/ कोई अपराध नहीं है हमारी व्यवस्था में/ फिर भी अगर दायर हो, इसके लिए मुकदमा/ तो मेरी गवाही जरूर ली जाय
【पृष्ठ संख्या-96】
उपस्थित सदी के कवि, चाहे वे वरिष्ठ हों, युवा हों या अभिनव—यह रहस्य पाना है कि किस तरह विषय की प्रकृति, संरचना, मूल्य और रंग के अनुसार अपनी सृजनभाषा में तब्दीली पैदा की जाय। कौन-सा विषय सीधे-सीधे अभिव्यक्त होना चाहता है, और कौन-सा विषय कलात्मक भंगिमा की मांग करता है। किस विषय को आक्रोश की भाषा चाहिए और किस घटना को आपके अश्रुपूरित शब्दों की दरकार है। “पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश” की तरह कवि को क्षण-क्षण परिवर्तनशील अभिव्यक्ति कौशल से लबालब होना चाहिए। यदि वह ऐसा गुण हासिल न कर सका, तो समझिए उसने रोज-रोज लौटती सुबह की ताजगी से कुछ सीखा ही नहीं। एक राह पर निकलते हैं, तो मिट्टी, पत्थर, कंकड़, घास, पेड़, झाड़ी, गड्ढे और भी न जाने कितनी अद्भुत सत्ताओं का साक्षात्कार होता है, जिसे हम अपने संकीर्ण और स्वार्थग्रस्त आँखों से या तो वजन देते हैं, या उपेक्षित करते हैं। जबकि हैं सभी अपने आप में एक से बढ़कर एक कीमती। यदि यही अनंत वैविध्य न रहता तो प्रकृति का तो पता नहीं, हमारा अपना अस्तित्व दो कौड़ी का होता। छाया रहे और धूप गायब हो जाय, तो शरीर को परिपक्वता कैसे मिलेगी? जीवन में सब कुछ अच्छा हो, बुरा कुछ भी न हो, तो मनुष्यता का पाठ कैसे सीखा जा सकेगा? प्रतिदिन यह प्रकृति, सन्ध्या और प्रभात, शांति और हलचल, हासिल और पराजय, अपने और अजनबी मित्र और विरोधी हमारे इंसानी कद को समृद्ध, परिपक्व और मुकम्मल बनाते हैं। कविता जिसे अधिकांश कवियों ने यशःप्राप्ति की जादुई छड़ी मान रखा है, दरअसल शीश उतारने का सिद्धपीठ है। जो स्वयं के लिए कुछ बचाता ही नहीं, जो अपने आपको चतुर्दिक फैली सृष्टि में, समाज की तहों में, अनगिनत चेहरों के बीच, धूल, मिट्टी, हवा, पानी, बारिश और श्यामल, नरम छायाओं में खुद को विलीन करता है, अपने वजूद को तिल-तिल, रेशा-रेशा बिखेर देता है, वही समय की धमनियों और शिराओं में सदियों तक बहने वाला रचनाकार सिद्ध हो पाता है। नयी सदी के कवि जड़ों के बजाय शिखर को सींच रहे हैं, क्योंकि उनकी निगाहें सिर्फ ऊँचाई निहारने की बीमार हो चुकी हैं। सवाल उठता है कि कविता की जड़ें कहाँ हैं? वह है—अंधकार में खोई हुई सदियों की संस्कृति, वह है—आपके चेहरे पर स्थायी चमक लाने वाले लाखों गुमनाम मनुष्य, वह है—श्रम की जमीन में धंसी हुई सदियों पुरानी धूसर इंसानियत। सृजन की जड़ों की खोज पुरस्कारों की दौड़ लगाते रहने से न होगी, अपनी कीर्ति का निर्लज्ज भजन गाने से न होगी। और सुनियोजित प्रचार के बूते हवा में नाम उछाल लेने से न होगी। जमीन में धंसकर जिन्दा रहने का मुहावरा मुक्तिबोध ने अकारण नहीं दिया। उसका गहरा प्रतीकार्थ है। घंसना एक नायाब कला है। हम हवा के हृदय में, चट्टान के भीतर, जानवर के चित्त में, दरख्त की काया में, आँसुओं के अतल में, कल्पना की सूक्ष्मता में और अजनबी के मोह में घंस सकते हैं। “व्यक्तित्वांतरण की क्षमता सामान्यतः प्रत्येक सजग मनुष्य में होती है। दार्शनिक और वैज्ञानिक में भी होती है। परन्तु एक कवि में अलहदा दर्जे की, विशुद्ध असाधारण। यह बेमिसाल क्षमता हमारे दौर के किसी कवि में जैसे ही भर गयी, फिर बार-बार मुक्तिबोध, नागार्जुन, धूमिल के अभाव की पीड़ा नहीं उठेगी। धंसना क्या चीज होती है, सीखना हो तो चलिए अरबी कवि खलील जिब्रान की ओर—
सुबह ऐसे जागो कि
हृदय उड़ने में हो समर्थ
और अनुग्रहित हो एक और
प्यार भरे दिन के लिए
दोपहर विश्राम भरा और
प्रेम के भावातिरेक से समाधिस्थ हो
और शाम को कृतज्ञता पूर्वक
घर लौट जाओ
इसके उपरांत सो जाना है
प्रियतम के लिए
हृदय में प्रार्थना और होंठों पर
प्रशंसा का गीत लिए हुए!!
【सुबह ऐसे जागो—कविता】
समसामयिकता पर चतुर्दिक पैनी और विश्लेषक निगाह रखना सामयिक कवि कहलाने की जरूरी शर्त है। समकालीन कविता के मूल में यह मूल्य प्रतिष्ठित है। समकालीनता का अर्थ केवल घटनाएँ, राजनीतिक गोरखधंधे और चेहरों का दोहरापन नहीं, बल्कि प्रकृति के सम्मान और सुरक्षा का प्रहरी होना, जीवसत्ता की अपूर्व महत्ता का उद्घाटक होना और अनंत अलक्षित वस्तुओं की अनकही मौलिकता का गायक होना भी है। समकालीन कवि होने की एक और शर्त है, अपनी सांसारिक विशिष्टता, योग्यता, प्रतिभा और बौद्धिकता का साधारणीकरण। स्वयं को गलाना, बाँटना, फैलाना, विलीन करना साधारण उपलब्धि नहीं, असाधारण साधना है। नयी सदी के अभिनव और युवा कवि को सीखना है कि सृजनपथ में कोई मंजिल नहीं होती, राहें ही मंजिल का मूल्य रखती हैं। केवल दृश्यों में कविताई नहीं छिपी होती, बल्कि दृश्यों के पीछे जो छिपी शक्ति है, उसकी कल्पनाधर्मी खोज करना कविता है। कविताई के लिए जितना अवकाश मौन में है, अनकहे में है, गैप में है, अंधकार भरे समय में है, उतना और कहाँ? हमारी सदी के कवि विषय का चुनाव खुद करते हैं, जबकि है यह सुविधाजनक अतः दुर्बल प्रवृत्ति। हमें उन्मुक्त करना होगा, विषयों, घटनाओं, चरित्रों और दृश्यों के समुद्र में, कि वे हमारा चुनाव खुद करें। उनकी मौजूदगी का असर इतना अनिवार्य हो, कि चित्त दौड़े उनकी ओर, उनकी महत्ता का मस्तक बुलंद करने के लिए। जनकवि नागार्जुन समसामयिक घटनाओं पर सीधे कविताएँ लिखते थे, वह भी त्वरित गति से। बिना वक्त गंवाए। तात्कालिक घटनाओं पर तत्काल सृजन कर देने के अपने खतरे भी हैं, परन्तु जहाँ गैर मनुष्यता, अनाचार, भेदभावपूर्ण घृणा और गैर बराबरी भरी ईर्ष्या की आँधियाँ चल रही हों, वहाँ कविता जरा कम खनकदार हो जाय, कला की परिपक्व बारीकी तनिक कम रहे, ऊँची बात कह देने का कौशल जरा कम दिखाई पड़े तो क्या फर्क पड़ जाएगा? कठिन से कठिन, चुनौतीपूर्ण और असह्य घटना पर यदि तुरंत प्रतिक्रिया न दी गयी, तो एक तरह से वह हमारी कलम पर जीत गयी। उसके प्रभुत्व के आगे हमने मौन पराजय स्वीकार कर ली। हमने बिना अपनी सृजनात्मक पक्षधरता दर्ज किए, घुटने टेक दिए। फिर आप अपनी रुचि वाले, चुनावपूर्ण और मोहक विषयों पर लिखते रहिए गढ़-गढ़कर कविताएँ आप समकालीन सर्जक नहीं हैं, यदि हैं भी बहुत आधे-अधूरे। आधा जीवित और आधा मृत। “नया ज्ञानोदय” की साहित्य वार्षिकी-2016, जिसका सम्पादन तत्कालीन सम्पादक कवि लीलाधर मंडलोई ने किया, समसामयिक कविताओं से भरपूर है। जिसमें मदन कश्यप, कुमार अंबुज, एकांत श्रीवास्तव, अष्टभुजा शुक्ल, नीलेश रघुवंशी, श्रीप्रकाश शुक्ल, निर्मला पुतुल, हरिओम राजौरिया और नीलोत्पल जैसे सक्रिय कवियों को आगे रखा गया है। आइए चलते हैं, अपने समय के घर की तलाश में। इस विशेषांक में उपस्थित है—एकांत श्रीवास्तव की कविता—”घर” शीर्षक से।
यह घर क्या इतनी आसानी से
गिर जाएगा?
जिसमें भरी है
मेरे बचपन की चौकड़ी
दीवारों में आज भी है
पुराने दिनों की खुशबू!
【जनवरी-2016, पृष्ठ संख्या-219】
सहज, भावपूर्ण, चित्त में बैठने वाली पंक्तियाँ बेशक। परन्तु असाधारण अर्थ भंगिमा की नहीं। घर के प्रति अलहदा चेतना की नहीं, न ही घर की ऊँचाई को आकाशधर्मी बनाती हुईं। कुमार अंबुज जैसे स्थापित हस्ताक्षर में इसी अंक में प्रतिष्ठित हैं। उनकी कविता है—”कहीं कोई जमीन नहीं”, जिसमें सपाट विचार हैं, एक रेखीय प्रतिरोध है, गद्यात्मक प्रतिरोध है और बातचीत के अंदाज़ में कविता का पूर्णविराम है। देखिए कुछ पंक्तियाँ—
अब कोई कवि, चित्रकार, दार्शनिक
या राजनीतिज्ञ नहीं कहता
यहाँ से देखो, यह दुनिया ऐसी है
और संभव है
एक बिल्डर कहता है देखो
इस ब्राशर में देखो
यह दुनिया इतनी ही है
सुंदर है और सबके लिए मुमकिन नहीं।।
【पृष्ठ संख्या-220】
हमारे आगे जो कुछ भी घट रहा, उसमें से एक भी क्षणिक नहीं। एक भी मात्र अभी का नहीं। सबकी जड़ें पुरानी हैं, सबके कारण गहरे हैं, सभी का रहस्य कहीं अदृश्य में छिपा हुआ है। सूर्य जो आज उग रहा है, वह करोड़ों वर्षों के अविश्वसनीय परिवर्तनों का चमत्कार है। जो फल आज पक रहा है, उसके भीतर बारिश, धूप, वायु और मिट्टी की मौन तराश है। जो आग अभी जल रही है, उसके पीछे लकड़ी की कोमलता, जिंदापन और हरियाली का समर्पण जमा हुआ है। इसीलिए कोई भी कवि जब तक परा चैतन्य निगाहें सक्रिय नहीं करता, जब तक दृश्य के आगे अदृश्य से आँखें मिलाने का साहस नहीं जुटाता, जब तक वर्तमान के पीछे सघन अतीत के निचाट सन्नाटों में विचरण नहीं करता, वह टिकने वाली समसामयिक कविता नहीं लिख पाएगा। मुक्तिबोध, नागार्जुन, धूमिल, रघुवीर सहाय जैसे कालदर्शी कवियों में यह पराजागरूक क्षमता नैसर्गिक तौर पर थी, तभी वे स्थायी ताकत से लबरेज़ सामयिक कविताएँ रच सके। जरूरी है कि हम समकालीन विश्व कविता के एक स्थापित हस्ताक्षर—हिब्रू कवि येहूदा अमिखाई की एक कविता पढ़ें—
उस घर से दूर
मैं कल्पना नहीं कर सकता
कि एक दूसरे के बिना हम
कैसे रहेंगे?
हमने यह कहा..
और तबसे हम उसी भावना से
रहते आ रहे हैं
रोज ब रोज एक दूसरे से दूर
उस घर से दूर
जहाँ हमने ये शब्द कहे थे।।
【नया ज्ञानोदय : जनवरी-2016, पृष्ठ संख्या-44】
सदी ने करवट बदली है। भूमंडलीकरण, बाजार, पूंजी की सत्ता सिर चढ़कर बोल रही है। स्थानीयता, देशजपन, आंचलिकता की गंध और गाँव का भदेस सौन्दर्य अपूर्व खतरे में है। तो मौजूदा कवियों का पहला रचनात्मक दायित्व क्या बनता है? उस सशक्त तेवर का विकास जो बाजारपरस्त ताकतों को मात दे सके, या उस जटिल कलाकारी की सिद्धि जो दिलोदिमाग को अबूझ चमत्कार से हत्प्रभ कर दे? विश्व साहित्य ऐसे अनेक अग्रधावक कवियों से अंटा पड़ा है, जिन्होंने वक्त की चट्टानों पर अपनी साहसिक कलम की धार तेज की, जिन्होंने समय की पुकार के अनुसार अपनी प्रतिभा को तराशा, जिन्होंने अपने लिए कविता का चुनाव नहीं किया, गुमनाम को जुबान देने के लिए लेखनी उठाई। ऐसे वैश्विक कवियों में महमूद दरवेश, नाज़िम हिकमत, लोर्का, पाब्लो नेरूदा, शिम्बोर्स्का का नाम नि:शंक अदब के साथ लिया जाता है। विश्व कविता में जब-जब युद्ध की विभीषिका और उसके अंधकार में जमींदोज़ हो चुकी निर्दोष, लाचार मनुष्यता की बात होगी, तो फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश सबसे आगे खड़े हो जाएंगे। जब भी जनसैलाब की मानिंद कविता के प्रवाह की बात उठेगी, तो नेरूदा चमकते हुए दिखाई देंगे। समकालीन यूरोप की कविताई प्रतिरोध, पक्षधरता, प्रतिबद्धता और आधुनिक मानवता का अविस्मरणीय, अनुकरणीय युग है। इन कवियों की पृष्ठभूमि में सहज ही यह सवाल चित्त के कोने में उठता है। अपने देश के प्रति, आतंक, उन्माद, बौद्धिक जड़ता और जातीय हिंसा के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने वाले हिन्दी कवि क्या सक्रिय हैं? विश्व भाषाओं में स्पैनिश के अंतोनियो पोर्चिया और एडवर्ड हिर्श। अंग्रेजी में क्लाउडिया रैंकिन। अरबी में अल सद्दीक अल रद्दी। अमेरिका की कवयित्री टोनी मारीशन, इस्टोनिया की डोरिस कारेवा, इंग्लैंड की सारा टीसडेल और अरबी भाषा की दुन्या मिखाइल महत्वपूर्ण हैं। जब हम किसी यूरोपीय कवि को याद करते हैं, उसका उल्लेख करते हैं, उसे बार-बार उद्धृत करते हैं, तो यह प्रश्न सहज ही मन में उठता है कि हमारी समकालीन कविता के हस्ताक्षर क्या इसी आदर, यकीन और ऊँची निगाह के साथ यूरोपियन, अमेरिकन या अफ्रीकी साहित्य में उद्धृत होते होंगे? आज जबकि हम न केवल असंख्य अंतरराष्ट्रीय कवियों से परिचित हैं, उनकी कविताओं के उद्धरण देते हुए गौरवान्वित हो जाते हैं, क्या इसी तरह फ्रांस, जर्मनी, रूस या अमेरिका का लेखक वर्ग हिन्दी कवियों का उल्लेख करते हुए फूला नहीं समाता होगा? अज्ञेय के बाद केदारनाथ सिंह ऐसे हस्ताक्षर हुए जिन्होंने भारत के बाहर कविता के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनायी। मंगलेश डबराल ने भी एक हद तक उस स्तर की कामयाबी हासिल की। कुंवर नारायण जिनकी काव्यदृष्टि और चिंतन गांभीर्य श्रेष्ठ स्तर का है, वैश्विक फलक पर उपस्थिति न बना सके। मुक्तिबोध विश्व स्तर की क्लासिक प्रतिभा, किन्तु अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल हुई, मृत्यु के बाद। समकालीन युवा कवियों में इस जरूरी किन्तु दुर्लभ ऊँचाई का एक भी नाम नहीं। इसका एक स्पष्ट कारण विश्व की चिंताओं, सवालों, संघर्षों और चुनौतियों से अक्सर रूबरू न होना है। दूसरा कारण अपनी हिन्दी के स्तर को विश्व की प्रतिनिधि भाषाओं के समक्ष खड़ा न करना है। और तीसरा कारण है, विश्व स्तरीय रचनात्मक विजन का अकाल। यह विजन जो कि श्रेष्ठ को पाने से आता है। अपनी सोच का आधुनिक विस्तार करने से पैदा होता है। दुनिया की तमाम भाषाओं का श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने से भी आता है। विजन सृजन की रोशनी है। इसमें संवेदना, दर्शन, तथ्य, यथार्थ और कल्पना सब समाहित हैं। कई बार कवि का विजन ही उसकी कविता की उम्र तय कर देता है। लीजिए अरबी कविता का एक अनोखा उदाहरण—
पेड़ बतियाते हैं एक दूजे से
पुराने दोस्तों की तरह
और उन्हें पसंद नहीं
किसी की टोकाटाकी
वे पीछा करते हैं हर उस शख्स का
जो काटता है उनमें से किसी को भी
और उसे तब्दील कर देते हैं
एक तन्हा कटी हूई डाल में!!
【दुन्या मिखाइल: सदानीरा-शरद अंक-2019, पृष्ठ संख्या-53】
हमें यह कहने में तनिक भी झिझक या संकोच नहीं होना चाहिए कि उत्तर समकालीन कविता मुक्तिकामी चेतना की आवाज है। भय से, सत्ता के आतंक से, राजनेताओं के रसूख से, धनतंत्र से, पुलिस तंत्र से और भी न जाने कितने तरह की मुक्ति। देश के आजाद हुए बीते 75 साल। यह दौर तो अमृतकाल भी घोषित हुआ, परन्तु मुक्ति की पुकार सब तरफ से, पहले से कहीं व्यापक और तीक्ष्ण स्वर में उठ रही है। कारण स्पष्ट है—अस्मिता पर मंडराता आसन्न संकट मेहनतकश सिर पीट रहा है, युवाओं का भविष्य निराशा की भेंट चढ़ रहा। धर्म और सत्ता का अटूट गठजोड़ मायावी हो चला है। सत्ता लोकतंत्र के सभी स्तम्भों पर कुंडली मार चुकी है। न न्यायालय स्वतंत्र है, न चुनाव आयोग, न खुफिया विभाग और न ही देश का सर्वोच्च पद। ऐसे में कवि, लेखक की भूमिका सर्वाधिक कीमती और चुनौतीपूर्ण हो जाती है। यह कविता में उत्तर राजनीतिक चेतना का भी दौर है। जहाँ केवल व्यंग्य मारने, निर्मम आलोचना करने, प्रतिरोध की मुट्ठी बाँधने और चरित्र का पोस्टमार्टम करने से काम न चलेगा। बल्कि यह देश का यह दौर कवि से ऐसी तल्खी, ऐसे साहस, ऐसे अभिव्यक्ति कौशल की मांग कर रहा है, जो सत्ता की मनमानी का सबसे निर्णायक जवाब हो, जो सिर्फ प्रतिरोध न लगे, बल्कि प्रतिरोध को जमीनी हकीकत में तब्दील करे। इस अंदाज़ की हिन्दी कविता फिलहाल प्रतीक्षित है, किन्तु राजनीतिक चेतना की उत्तर समकालीन कविता नागार्जुन, रघुवीर सहाय, धूमिल, गोरख पांडे के अंदाज़ की कविता न होगी, बल्कि उनकी प्रखरता का अगला मौलिक विकास सिद्ध होगी। लाल्टू समर्थ कवि होकर भी परिदृश्य में किनारे दिखते हुए से कवि, जिनकी स्मरणीय कविता है—”स्वर्ण युग”, कुछ पंक्तियाँ देखिए—
बच्चों से कह दूं
कि आसमां के रंग देखना अपराध है
कि बहिष्कार मेरी जाति का नाम है
यह वक्त जिसमें किसी भी दिन
मैं कैद हो सकता हूँ
यह भारतवर्ष का स्वर्णयुग है।
कह दूं कि अपनी जुबान नाम की
कोई चीज नहीं होती है।
(प्रसंग : उपरोक्त विशेषांक : पृ. सं. 192)
अपने वक्त के प्रति जवाबदेह होना कवि होना है। मन में उठते सवालों को न दबाना कवि होना है। निराश दिलों में उम्मीद की लौ जला देना कवि होना है। इसके उलट कवि वह नहीं, जो सुविधाजनक शब्दों में खेलता हो, जो कागज के मैदान पर लिजलिजे अर्थों का ढेर लगाता हो, जो कला की आड़ में पलायन करने का आदती हो, जिसके लिए कविता राजसत्ता की ताकत के आगे रीढ़ झुका देने का कौशल हो। रंजीत वर्मा ने अपनी कविता—”मुठभेड़ कविता की विडम्बना है” में कवि होने को परिभाषित किया है—
विडम्बना का कवि होना
अपने समय का कवि होना है
जो कहते नहीं अघाते कि
सच्ची कविता अभी तक
नहीं लिखी गयी
दरअसल वे ढूंढ़ते हैं
कविता को यातनाओं से बाहर।
(प्रसंग : उपरोक्त अंक : पृ. सं. 203)
चंद रोज पहले सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने फैसला दिया कि 100 मीटर से नीचे के भाग को अरावली पर्वत श्रृंखला के अंतर्गत नहीं माना जाएगा। यह फैसला है—पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया—बी. आर. गवई का, जिन्हें भीमराव अंबेडकर का अनुयायी माना जाता रहा। वह दिन दूर नहीं, जब देश की हर पहाड़ी श्रृंखला सत्ता और कानून के दुष्चक्र में ऐसे ही जमींदोज़ होगी। आधुनिकता का उत्थान प्रकृति के अंधाधुंध विनाश की शर्त पर होता है। वन, तालाब, नदियाँ, समतल भूमि, हवा, रोशनी, मिट्टी दिनोंदिन अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। 200 वर्षों के बाद शायद ही पृथ्वी किसी जीवधारी के रहने योग्य बचे। कविता बेहद सशक्त प्रतिरोध दर्ज कराती है, प्रकृति की मृत्यु के विरुद्ध। मनुष्य का सबसे अक्षम्य अपराध स्वयं की सत्ता को प्रकृति से अलग कर लेना। सच तो यह है, मनुष्य प्रकृति के विकासक्रम में अस्तित्व में आया और प्रकृति के ही विकासक्रम में समाप्त हो जाएगा। यह प्रकृति हमसे अधिक, हमसे अधिक उम्र की, हमसे ज्यादा शक्तिशाली जीवित सत्ता है, अपनी निर्जीवता में प्राणमय, अपनी निष्क्रियता में क्रांतिकारी और अपने अवाकपन में निरंतर बोलती हुई। मनुष्य की यह भी बड़ी चूक हुई, खुद को सजीव और प्रकृति को जड़ एवं निर्जीव घोषित कर देना। इस सतही वैज्ञानिक निष्कर्ष के चलते भौतिक सत्ता के प्रति उपेक्षा और शोषण का भाव पैदा हुआ, जिसका परिणाम आज सामने है—शहर-दर-शहर की हवा प्राणघाती जहर में तब्दील हो रही है। यह सच है कि प्रकृति की सुरक्षा और सम्मान कविता, लेख, उपन्यास, कहानी भर लिख देने से तय न होगा, न ही सोशल मीडिया पर भर-भर कर शाब्दिक आँसू बहा देने से, न ही सार्वजनिक मंचों पर फैशनी चिंताएँ बाँटकर रोज सो जाने से। अभियान, आंदोलन, मोर्चा, रैलियाँ अंतिम विकल्प हैं—प्रकृति की सत्ता लौटाने के लिए। हूबहू “चिपको आंदोलन” की तर्ज पर प्रकृति के हर रूप, हर अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए देश भर में अंतहीन आंदोलन की तत्काल आवश्यकता है। कानून और सत्ता के बीच कायम स्वार्थी गठजोड़ को कवि भगवान स्वरूप कटियार ने बेबाकी से प्रकट किया है—
सोचो! जब सरकार, संसद, न्यायालय
और खुद संविधान
शामिल हो जाएँ, देश के खिलाफ
साजिश में
जब हमें सिर्फ वोट की फसल
माना जाने लगे
तब रोना और लिखना
गुनाह लगने लगते हैं !
(प्रसंग : उपरोक्त विशेषांक—पृ. 211)
जिसे हम दुनियावी परिभाषा में प्रकृति कहते हैं, वह न निर्जीव है, न जड़तामय, न मौन ही। प्रकृति में प्राणत्व है, जीवंतता है, भाषा भी है। बस हमारे तरह की नहीं है। यह प्रकृति ही है, जिसने अपने अनंत विकास की यात्रा में मानव जाति को संभव किया। यह प्रकृति ही है, जिसने प्राणातीत रहकर लाखों प्राणियों को उत्पन्न किया। इसलिए प्रकृति को अपनी बौनी, आत्ममुग्ध परिभाषा में मत बाँधिए। हम हैं, फिर नहीं रहेंगे। किन्तु प्रकृति थी, आज है और रहेगी। वह बेरोकटोक तीनों कालों में एक साथ यात्रा कर रही है। हिन्दी कविता का उत्तरकाल एक और अर्थ में विलक्षण दौर है, जहाँ कवि की अनुभूतियों ने सूक्ष्मता धारण कर ली हैं, जहाँ विषय दृश्यमय नहीं रहे, जहाँ अज्ञात, अलक्षित भावनाएँ हावी हो गयी हैं, सृजन में। कवि की कल्पना शक्ति अधिक कुशल, बारीक और धारदार हुई है। काव्य कौशल में पहले से कहीं आगे का निखार आया है। सामयिक मुद्दे जो समकालीन कविता की अनिवार्य पहचान होते थे, अब केन्द्रीय नहीं रह गये हैं। कवि सामयिकता के प्रति जवाबदेह है, और उससे मुक्त भी। हिन्दी कविता में नये प्रतीक, नये बिम्ब, नये मुहावरे तो हैं ही। इस उत्तरकालीन दौर में अब खुद प्रतीक कविता का आकार ले रहे हैं। कोरा कागज, पानी का रंग, भूख का स्वाद, कोने का झाड़ू, रफ कागज इत्यादि ऐसे ही विषय हैं, जिन पर कविता रचने का साहस समकालीन कवि ने किया है। ऐसे ही विलक्षण दृष्टि के धनी कवि हैं—संतोष चतुर्वेदी, जिनकी कविता “स्टेपनी” की कुछ लाइनें पढ़िए—
हर जगह एक ऐसा व्यक्ति होता है
जिस पर किसी की नजर नहीं जाती
हालांकि अदृश्य नहीं होता वह।
(प्रसंग : उपरोक्त विशेषांक : पृ. सं. 322)
सुशील कुमार, राज्यवर्धन, चन्द्रेश्वर, महादेव टोप्पो, सुभाष राय, कैलाश मनहर, योगेन्द्र कृष्ण, राजकिशोर राजन, शहंशाह आलम, वसंत सकरगाए, शैलेय, रजतकृष्ण, विनय सौरभ, शिरोमणि महतो, महेश चन्द्र पुनेठा, अरुण शीतांश, विमलेश त्रिपाठी, निशांत, कुमार मुकुल, रमेश प्रजापति, अशोक सिंह, भानु प्रकाश रघुवंशी, ललन चतुर्वेदी, अनुज लुगुन, कविता कृष्ण पल्लवी, शैलेन्द्र कुमार शुक्ल, रूपम मिश्र, अरुण देव, शिव कुशवाहा, जितेन्द्र श्रीवास्तव, केशव तिवारी, अनुपम सिंह, विहाग वैभव, पराग पावन, अदनान कफील, बच्चालाल उन्मेष, प्रकाश उदय, विमल किशोर समकालीन हिन्दी कविता के उस पथ को प्रशस्त करने वाले कवि हैं, जिनकी रचनात्मकता गवाही देती है कि 20वीं सदी के बाद की कविता ने हिन्दी साहित्य को न केवल व्यापक बनाया है, बल्कि कलात्मक सोच, अभिनव दृष्टि, भाषाई नयापन और अभिव्यक्ति के आयाम का नव-विस्तार भी किया है। प्रमाण के लिए पेश हैं कवि आशीष त्रिपाठी की कविता की पंक्तियाँ—
खड़ा होता है जो भी
हमारे विरुद्ध
सबसे पहले उसे गाली दो
सेक्युलर कहकर।
(“शांतिपर्व” कविता)
न केवल इक्कीसवीं सदी की कविता बल्कि समकालीन हिन्दी कविता के दौर को “विचार कविता” कहा जाता है, जो कि शब्दशः सच है। पुनः यह प्रश्न उठ जाता है कि विचार कविता क्या खालिस बौद्धिक कविता का पर्याय है या और भी कुछ? मनुष्य के व्यक्तित्व में संवेदना और सोच को अलग-अलग नहीं माना गया है, और वे हैं भी नहीं। सत्य तो यह है कि विचार, वेदना, तर्क, कल्पना और संस्कार पाँचों आपस में गूंथे हुए हैं। आपकी दृष्टि के निष्कर्षों को आपके द्वारा अर्जित संस्कार को प्रभावित और प्रेरित करते हैं। यहाँ तक कि कल्पना की भी सत्ता अलग नहीं, पृथ्वी पर जितने मनुष्य हैं, उससे कई गुना कल्पनाओं के रूप, रंग, ढंग और रेंज। कई बार भावना की तीक्ष्णता कल्पना शक्ति को उद्दीप्त करती है और कई बार कल्पनाशील मनुष्य अधिक परिपक्व भावना का अधिकारी हो जाता है। इसीलिए विचार कविता को किसी विशेष विचारधारा मात्र से आबद्ध कर देना गैरतार्किक और आधी व्याख्या है। यह हकीकत है कि विचार परोसने की अधीरता ने, अतिशय बौद्धिक सिद्ध होने के व्यामोह ने मौजूदा हिंदी कविता को गहरी क्षति पहुंचाई है, क्योंकि हमारे वर्तमान वरिष्ठ कवियों ने कविता की आत्मा का साक्षात्कार किए बगैर, उसके मर्म के रेशा-रेशा को परखे बगैर अपनी पक्षधर बौद्धिकता के आत्मविश्वास में कविताएँ रचनी आरंभ कर दीं। एक तो गद्य कविता, ऊपर से बौद्धिक। पाठक वर्ग मारे बौद्धिक आतंक के कविता छोड़कर भाग खड़ा हुआ। और अब दशा यह कि साहित्य के बाहर के आम पाठकों को आज की कविता पढ़ते, समझते, स्वीकार करते हुए कंपकंपी छूट जाती है। फिर वे घूम-फिरकर मजबूरीवश छंद कविता या गीतात्मक कविता में शरण ले लेते हैं। विष्णु खरे आज हमारे बीच उपस्थित नहीं, इसीलिए उनकी कहानीपरक कविता पर आलोचकीय टिप्पणी करने से बचते हुए कहना जरूरी मानते हैं कि खालिस और खाँटी प्रदीर्घ वाक्यों में तनी हुई विचार कविता के वे एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। यही बौद्धिकता का आग्रह और बेलगाम गद्यात्मकता ही वह कठिनाई है, जिसके कारण उदय प्रकाश लोकप्रिय और पारंगत कवि न बन सके। हमारे उपस्थित दौर के कवियों में भी यह अति बौद्धिकता बढ़-चढ़कर नजर आती है। यदि यही विचार जरा तत्त्वदर्शी आँसुओं में डूब जाएँ, जरा बेचैनी और अहक की आँच में तप जाएँ, तनिक बहुआयामी यथार्थ के रस में स्नान कर लें, तो उसमें जान आ जाएगी। जिस विचारक को समकालीन ही नहीं, प्रगतिवादी और नयी कविता का मूलप्रेरक कहा जाता है, वह कवि न होकर भी जब कविताएँ रचता है, तो कैसे अपनी हिम्मत, महत्वाकांक्षा, समर्पण, अनुभव और नेक जिद को पिरो देता है, कैसे वह दार्शनिक सर्जक की भूमिका में उठ खड़ा होता है, आइए आगे साक्षात्कार करते हैं—
ओ कला! तू खोल मानवता की धरोहर
अपने अमूल्य कोशों के द्वार
मेरे लिए खोल
अपनी प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में
अखिल विश्व को बाँध लूँगा मैं
आओ!
हम बीहड़ और सुदूर यात्रा के नाम
पर चलें
आओ! क्योंकि हमें स्वीकार नहीं
छिछला, निरुद्देश्य और
लक्ष्यहीन जीवन!
【कार्लमार्क्स : असली इंसान की तरह जिएंगे】
[मज्झिम प्रतिपदा भरत प्रसाद का स्थायी स्तंभ है जिसे हर महीने के पहले शनिवार को पढ़ सकते हैं।]
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भरत प्रसाद
हिंदी विभाग
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय
शिलांग – 793022
मेघालय।
अक्टूबर – 2026






