
‘वह भागी थी’ केवल किसी लड़की के घर छोड़ देने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस समाज की परतों को खोलने वाली कथा है जहाँ प्रेम, स्वतंत्रता, भय, सामाजिक दबाव और स्त्री-अस्मिता एक-दूसरे से उलझे रहते हैं। कहानी का केंद्र एक ऐसी युवती है, जिसके ‘भाग जाने’ की घटना को समाज अपने-अपने अर्थ देता है, पर उसके भीतर चल रही बेचैनियों, इच्छाओं और संघर्षों को समझने की कोशिश बहुत कम लोग करते हैं। संवेदनशील भाषा और यथार्थपरक शिल्प में रची गई यह कहानी पाठक को लगातार यह सोचने के लिए विवश करती है कि आखिर कोई स्त्री कब, क्यों और किन परिस्थितियों में अपने परिचित संसार से बाहर निकलने का निर्णय लेती है। रहस्य, मनोवैज्ञानिक गहराई और सामाजिक प्रश्नों से भरी ‘वह भागी थी’ अंत तक पाठक की जिज्ञासा बनाए रखती है।
वह भागी थी
संदीप तोमर
“भिंडी बीस रुपए किलो… लौकी दस की… टमाटर तीस… हरी मिर्च बीस की पाव…”
आवाज़ में कोई खास मिठास नहीं थी, फिर भी वह गली के दूसरे सब्जीवालों से अलग सुनाई देती थी। शायद इसलिए कि हर भाव के साथ उसकी साँस भी चलती थी।
वह एक हाथ से सब्जी की रेहड़ी धकेलती और दूसरे हाथ से अपनी बैसाखी को थोड़ा पीछे खिसका देती। बायाँ पैर घुटने के नीचे से कमजोर था। चलते समय उसका शरीर एक ओर झुक जाता था और फिर जैसे अपनी ही जिद से सीधा हो जाता था।
मैं कई हफ़्तों से उसे देख रही थी। उसकी उम्र मुश्किल से तीस-पैंतीस होगी, मगर चेहरे पर उम्र की कई परतें थीं। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं और उनमें एक ऐसी स्थिरता थी, जैसी बहुत दूर तक चलकर लौटे हुए आदमी की आँखों में होती है।
एक दिन मैंने उससे पूछा— “बहन, रोज़ इतनी मुश्किलों से चल कर आती हो, कितना दूर है तुम्हारा घर?”
वह हँसी, जैसे कहना चाहती हो, गरीबों के भी कहीं घर हुआ करते हैं, हम तो गुजारे को कहीं भी टीन-टप्पर डाल सिर पर छत का इंतजाम कर लेते हैं, ताकि धूप, टपकते पानी और सर्दी में ठंडी हवा से बच पाएँ, लेकिन उसने नपा-तुला जवाब दिया— “दूर कहाँ है मैडम जी! बस दो गली छोड़कर।”
“तुम्हें चलने में तकलीफ होती होगी।”
“होती है, बहुत तकलीफ होती है।” उसने सहजता से कहा।
फिर टमाटरों पर पानी के छींटे मारते हुए बोली— “पर सब्जी लेने भी तो रोज़ मंडी तक जाना ही पड़ता है।”
मैं उसकी ओर देखने लगी, लेकिन वह मेरी ओर नहीं देख रही थी। शायद उसने अपने बारे में बात करना बहुत पहले छोड़ दिया था।
उसका नाम पार्वती था। पति का नाम रघु। दोनों मिलकर सब्जी बेचते थे।
सुबह रघु मंडी से माल लाता, अक्सर पार्वती भी उसके साथ जाती, वह रेहड़ी पर बैठती और रघु उसे धकेलता। जाने में तो कोई तकलीफ नहीं होती, लेकिन सब्जियाँ खरीदने के बाद उसे बैसाखी के सहारे आना पड़ता। डेरे पर आकर पार्वती सारी सब्जियाँ धोकर छाँटती, टोकरियों में सजाती और फिर दोनों गली-गली घूमते। शाम को हिसाब होता। कुछ पैसे कल की मंडी के लिए अलग रख दिए जाते, जितना आखिर में बचता, उतने में घर चलता।
घर, जिसे घर कहना भी शायद घर पर मेहरबानी थी। रेलवे लाइन के किनारे टीन की छत और ईंटों की तीन दीवारों से बनी एक कोठरी।
वहीं पर ईंटों को मिट्टी से लीपकर चूल्हा बनाया गया था। वहीं पर एक कोने में बिस्तर लगाया जाता। वहीं बच्चे का पालना रखा होता। और वहीं पार्वती की बैसाखी भी दीवार से टिककर खड़ी रहती थी।
एक दिन सब्जी लेते हुए मैंने पार्वती से पूछा— “पारो! तुम्हारे बच्चे कितने हैं?”
पारो सुनकर उसे भी देवदास की पारो की फीलिंग होती, अगर उसने देवदास की पारो के बारे में सुना, जाना या समझा होता, उसने जवाब दिया— “एक।”
“दूसरा नहीं किया?”
वह कुछ देर चुप रही। फिर बोली— “पहला ही बहुत था।”
मैं उसके चेहरे को देखती रही। उसने बड़े तरीके से बात बदल दी— “मैडम जी, पालक ले जाइए। आज बहुत ताज़ा है।”
पार्वती को देखकर मुझे अक्सर लगता था कि उसके शरीर का कमजोर पैर ही उसकी सबसे बड़ी तकलीफ नहीं था। उसकी सबसे बड़ी तकलीफ यह थी कि लोगों ने उसके कमजोर पैर को देखकर उसके बाकी सारे शरीर से अधिकार वापस ले लिए थे।
लड़की होने का अधिकार, सुंदर कहलाने का अधिकार, किसी के चाहने का अधिकार, माँ बनने का अधिकार और सबसे बढ़कर— अपनी इच्छा से जीवन चुनने का अधिकार।
वह जब पैदा हुई थी, गाँव की औरतों ने उसकी माँ से कहा था— “कोई बात नहीं। भगवान की मर्जी।”
जब वह चलने लगी और एक पैर घसीटकर चलती थी, बच्चों ने उसे चिढ़ाया— “लँगड़ी!”
स्कूल घर से कुछ ज्यादा ही दूर था, फिर भी वह जाती थी। लेकिन पाँचवीं की परीक्षा देने के बाद पिता ने कह दिया— “अब घर पर रहो। लड़की जात को पढ़कर क्या करना है, ऊपर से अपाहिज?”
वह घर पर ही रहने लगी थी। उम्र बढ़ी, जवानी उफ़ान पर आई। साथ की लड़कियाँ ब्याही जाने लगीं। उसका नाम भी दो-तीन गाँवों में गया। लेकिन हर बार एक ही जवाब आया— “लड़का मान जाए तो हमें क्या आपत्ति है… लेकिन लड़का या लड़के वाले तैयार नहीं होते।”
फिर एक दिन गाँव के मेले में उसे रघु मिला। वह वहाँ सब्जी की रेहड़ी लगाता था। उसने पार्वती को देखा। सिर्फ देखा नहीं, उससे बात भी की। फिर दूसरी बार बात की और तीसरी बार भी।
पार्वती ने उससे एक दिन पूछा— “तुम जो इतना प्रेम जताते हो, तुम्हें मेरा पैर दिखाई नहीं देता?”
रघु ने कहा— “दिखता है, पैर भी दीखता है।”
“फिर?”
“फिर क्या?”
“कुछ नहीं।”
“तुम्हें मेरी आँखें दिखाई देती हैं?”
पार्वती ने पहली बार उसकी ओर सीधे देखा।
रघु मुस्कराया— “और आवाज़ भी।”
उस दिन पार्वती देर तक चुप रही थी।
और एक दिन वो आया जब पार्वती रघु के साथ घर से चली गई। गाँव से कोई लड़की भागती तो गाँव भर में तहलका मच जाता, तरह-तरह की बातें बनती, खोजबीन शुरू हो जाती, जाति के कोण भी तलाशे जाते, लेकिन पार्वती भागी तो गाँव में किसी ने कोई शोर नहीं मचाया, कोई बातचीत नहीं हुई। न कहीं कोई ढोल पीटा गया। न ही पंचायत बैठी। न कोई पीछा करने निकला।
उसकी माँ ने बस इतना कहा— “कौन ले जाएगा इसे?”
और पिता ने कहा— “जिसे ले जाना था, ले गया।”
जैसे पिता खुद चाहते हों कि कोई साथ ले जाए, उनके कन्धों से बोझ उतरे। उन्हें तसल्ली हुई, जैसे घर से कोई पुराना सामान निकल गया हो।
पार्वती बाद में कई बार सोचती थी— “अगर वह दोनों पैरों से बिल्कुल ठीक होती तो? क्या तब भी उसके भाग जाने पर इतनी शांति रहती? क्या तब भी उसके पिता चारपाई पर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते? क्या तब भी माँ आँगन में शांति से झाड़ू लगाती रहती?”
शायद नहीं, शायद तब गाँव में इज्जत का प्रश्न उठता। लेकिन उसके विकलांग शरीर ने उसके प्रेम को भी विकलांग समझ लिया था। किसी को चिंता ही नहीं हुई कि वह किसके साथ जा रही है।
भागने के बाद उसके जीवन की शुरुआत अच्छी थी, बहुत अच्छी। रघु उसे कहीं अकेला नहीं छोड़ता था। मंडी में भारी टोकरा उठाने नहीं देता। बारिश में उसका हाथ पकड़कर कीचड़ पार कराता।
कभी सब्जी न बिकती तो अपनी रोटी उसके सामने रख देता और कहता— “तुम खाओ।”
“और तुम?”
“मैंने मंडी में खा लिया।”
पार्वती जानती थी, उसने मंडी में कुछ नहीं खाया। फिर वह रोटी आधी कर देती। आधी-आधी रोटी खाते दोनों खूब हँसते। मानों यही हँसी जीवन का सबसे बड़ा सुख है।
गरीबी में प्रेम का भी अपना ही गणित होता है। एक रोटी हो तो आधी-आधी खाओ। एक कप चाय जितना दूध हो तो खूब पानी मिलाकर दो कप कर लेना। एक सपना हो तो वह दोनों का हो।
पार्वती गर्भवती हुई। उसे पहली बार डर लगा। उसका शरीर पहले से ही एक तरफ झुका रहता था। अब पेट बढ़ने लगा तो चलना कठिन हुआ। बैसाखी सँभालना कठिन हुआ। मंडी से लौटते समय कई बार उसे रास्ते में बैठना पड़ता।
आते-जाते लोग उसे, उसकी हालत को देखते। कुछ के देखने में सहानुभूति होती तो कुछ कौतूहल से देखते। और कुछ ऐसे, जैसे किसी विकलांग औरत का गर्भवती होना कोई असामान्य दृश्य हो।
एक बूढ़ी औरत ने एक दिन पूछा— “तुम्हें बच्चा कैसे सँभलेगा?”
पार्वती ने कहा— “जैसे दूसरी औरतें सँभालती हैं।”
बूढ़ी हँस दी— “तुम दूसरी औरत कहाँ हो?”
पार्वती ने उस दिन पहली बार महसूस किया कि लोग उसे औरत मानते ही नहीं। उस रात वह बहुत देर तक जागती रही।
रघु ने पूछा— “क्या हुआ, परेशान हो, सो नहीं रही हो? तुम तो दिन भर की थकन के चलते घोड़े बेचकर सो जाती हो। आज क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“दर्द है?”
“हाँ।”
रघु उठकर उसके पैर दबाने लगा। पार्वती उसे देखती रही। फिर बोली— “रघु।”
“हूँ?”
“अगर बच्चा भी मेरे जैसा हुआ तो?”
रघु ने उसके पैर पर हाथ रखते हुए कहा— “तो मेरे जैसा होगा।”
“तुम्हारे जैसा?”
“हाँ। जिद्दी।”
पार्वती हँस पड़ी। उस हँसी में डर भी था और भरोसा भी।
बच्चा पैदा होने के दिन अस्पताल पहुँचने में ही दो घंटे लग गए। रिक्शेवाला पहले तैयार नहीं हुआ, बोला— “इतनी हालत में है, रास्ते में कुछ हो गया तो?”
रघु ने कहा— “कुछ नहीं होगा। मैं तुम्हें तुम्हारा पूरा किराया दूँगा।”
“दोगे क्या?”
रघु ने जेब से सिक्के निकालकर उसके हाथ पर रख दिए— “इतना है।”
रिक्शेवाला मान गया। थोड़ी मशक्कत के बाद दोनों ने पार्वती को रिक्शे में बैठाया, रघु ने साथ बैठकर उसे अपनी बाहों का सहारा दिया।
अस्पताल गए तो डॉक्टर ने कहा— “तुम्हारा केस थोड़ा मुश्किल है।”
पार्वती ने केवल एक बात पूछी— “बच्चा ठीक रहेगा?”
डॉक्टर ने कहा— “कोशिश करेंगे।”
वह शब्द उसके भीतर हथौड़े की तरह लगा— कोशिश करेंगे। उसने आँखें बंद कर लीं। कई घंटे बाद बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
रघु बाहर बैठा था। वह पहली बार किसी पुरुष की तरह नहीं, एक छोटे बच्चे की तरह रोया।
पार्वती ने बच्चे को छाती से लगाया। उसका शरीर थककर टूट चुका था। लेकिन वह मुस्करा रही थी। रघु ने झुककर उसके माथे को चूमा।
“देखा?”
“क्या?”
“तुमसे ज्यादा जिद्दी है।”
बच्चे के बाद जिंदगी और कठिन हो गई। पार्वती अब पहले की तरह सब्जी नहीं बेच पाती थी। बच्चे को दूध पिलाते-पिलाते उसका एक हाथ खाली नहीं रहता। बैसाखी दूसरे हाथ में। बैसाखी वाले हाथ से ही वह रेहड़ी को आगे की ओर धकेलती।
बीच-बीच में बच्चा रोता। चलते हुए वह कमर पर झोली बना बच्चे को उसमें लिटा देती, कभी वह बच्चे को दूध पिलाने के लिए गोद में लेकर बैठ जाती तो ग्राहक लौट जाता। कुछ पुरुष उस दृश्य को देख उसके स्तन को घूरते। वह किसी देश की शासनाध्यक्ष होती तो दुनिया के लिए यही दृश्य मिसाल बन जाता, लेकिन सब्जी बेचने वाली भी कहीं कोई मिसाल होती हैं?
कभी ऐसे दृश्य देख ग्राहक कहता— “बहन, जल्दी कर।”
वह जल्दी करती तो कोई टमाटर दब जाता। टमाटर दबता तो दो रुपये का घाटा। दो रुपये का घाटा भी उनके घर में बहुत बड़ा था।
रघु जितना कमाता, उतना ही थकता। थककर शाम को ताड़ी पीने लगा। पहले कभी-कभी ऐसा होता, लेकिन फिर रोज़-रोज़ ऐसा होने लगा था, लेकिन नशे में भी वह बुरा आदमी नहीं बनता था।
यही बात पार्वती को और दुख देती थी। वह उसे मारता नहीं था। गाली नहीं देता था। बस चुप होकर बैठ जाता।
कभी बच्चे को देखता। कभी पार्वती को और फिर धीमे से कहता— “तुम मेरे साथ क्यों आई थीं?”
पार्वती चुप रहती।
वह फिर कहता— “तुम्हें क्या मिला मेरे साथ आकर?”
वह फिर चुप रहती।
एक रात उसने कहा— “तुम्हारे घरवालों ने तो तुम्हें रोका भी नहीं था।”
पार्वती ने पहली बार उसकी ओर देखा, फिर झुंझलाकर बोली— “तुम्हें यह बात अब याद आती है?”
रघु ने सिर झुका लिया— “नशे में याद आती है।”
पार्वती ने सवाल किया— “और होश में?”
“होश में तुम याद आती हो।”
पार्वती कुछ नहीं बोली। रघु फूट-फूटकर रोने लगा— “मैंने तुम्हें अपने साथ लाकर क्या दिया?”
पार्वती ने बच्चे को अपनी छाती से लगाया।
“जो किसी ने नहीं दिया।”
“क्या?”
“मुझे यह भरोसा कि कोई मुझे देखकर भी मेरे साथ चल सकता है।”
रघु ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखें शर्म से झुकी हुई थीं।
कुछ महीनों बाद एक सुबह रघु मंडी से लौटा तो उसके हाथ में फूल थे। बहुत सस्ते वाले। पीले-पीले गेंदे के फूल। पार्वती ने पूछा— “आज ये फूल किसलिए?”
“आज हमारी शादी की सालगिरह है।”
पार्वती चौंकी— “तुम्हें वो तारीख याद थी?”
“सब याद है।”
वह हँसी।
“ताड़ी में?”
“नहीं।”
रघु ने कहा— “आज होश में हूँ।”
उसने फूल उसकी बैसाखी पर बाँध दिए। पार्वती देर तक उन्हें देखती रही। फिर बोली— “रघु।”
“हाँ?”
“अगर उस दिन मैं तुम्हारे साथ नहीं भागती तो?”
रघु ने कुछ देर सोचा, फिर बोला— “शायद तुम किसी घर में बैठी होती।”
“और?”
“शायद सुखी होती।”
पार्वती मुस्कराई— “शायद?”
“शायद।”
“और तुम?”
रघु हँसा— “मैं भी किसी और के साथ सब्जी बेच रहा होता।”
दोनों हँस पड़े। बच्चा उनके बीच आकर बैठ गया। पार्वती ने उसे गोद में उठा लिया। फिर वह धीरे-धीरे उठी, बैसाखी सँभाली।
टोकरियाँ उठाकर रेहड़ी में रखे और गली की ओर चल पड़ी। उसका कमजोर पैर हर कदम पर पीछे रह जाता था, लेकिन वह हर बार उसे अपने साथ आगे ले आती थी।
पीछे से रघु की आवाज़ आई— “रुको, मैं आता हूँ।”
पार्वती ने मुड़कर कहा— “नहीं।”
“क्यों?”
“आज खुद चलने दो।”
रघु मुस्कराया और उसके पीछे-पीछे चलने लगा।
उस दिन गली में पार्वती की आवाज़ कुछ अलग थी— “पालक ले लो… ताज़ी पालक…”
मैंने उससे दो गठ्ठियाँ खरीदीं। वह पैसे गिन रही थी। तभी बच्चा उसकी गोद में मचलने लगा। उसने बच्चे को संभाला। बैसाखी को घुटने के पास टिकाया। और एक हाथ से पालक की गठ्ठी बाँध दी।
मैंने पूछा— “बहुत मुश्किल होता होगा?”
वह कुछ क्षण मेरी ओर देखती रही। फिर बोली— “क्या?”
“यह सब… बच्चा, सब्जी, चलना…”
उसने सिर झुकाकर बच्चे के बालों में हाथ फेरा— “मुश्किल तो था।”
“फिर भी?”
वह मुस्कराई— “भागी थी न।”
मैं चुप रही। वह फिर बोली— “तब किसी को चिंता नहीं हुई थी कि मैं किसके साथ भाग रही हूँ।”
उसने पालक की गठ्ठी मेरी ओर बढ़ाई— “अब चिंता होती है कि मैं कहाँ तक चल पाऊँगी।”
मैं उसके शब्दों का अर्थ समझने की कोशिश करती रही। वह आगे बढ़ गई। बैसाखी जमीन पर पड़ती रही— ठक… ठक… ठक…
हर कदम जैसे कह रहा था— जिस औरत के भाग जाने पर किसी ने रास्ता नहीं रोका था, वह अब अपने रास्ते की हर बाधा से अकेली लड़ रही है। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी विडंबना थी— वह प्रेम के लिए घर से भागी थी, लेकिन जीवन ने उसे यह सिखाया कि किसी के साथ भाग जाना आसान है, किसी के साथ पूरी जिंदगी चलना नहीं।
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— संदीप तोमर
जन्म: जून 1975
जन्म स्थान: खतौली (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा: स्नातकोत्तर (गणित, समाजशास्त्र, भूगोल), एम.फिल. (शिक्षाशास्त्र), पी.एच.डी. शोधरत
सम्प्रति: अध्यापन
साहित्य: 4 कविता संग्रह, 4 उपन्यास, 3 कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह सहित आत्मकथा प्रकाशित।
Ø हिन्दी प्रचारिणी सभा कैनेडा द्वारा कराई लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा “वाजिब कीमत” को तृतीय पुरस्कार, इस प्रतियोगिता में मिली दो हजार रुपये की राशि एक पढ़ने में होशियार परंतु आर्थिक रूप से कमजोर बच्ची के कपड़ों पर खर्च की।
Ø साहित्य सरोज द्वारा कराई गयी कहानी प्रतियोगिता में कहानी “नया सवेरा” को द्वितीय पुरस्कार।
Ø राजेंद्र यादव हंस लघुकथा सम्मान २०२५ से सम्मानित।
Ø हिंदी अकादमी मुंबई द्वारा साहित्य साधना सम्मान २०२५।
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