• मुखपृष्ठ
  • अनहद के बारे में
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक नियम
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
अनहद
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
No Result
View All Result
अनहद
No Result
View All Result
Home कविता

चन्दन कुमार की कविताएँ

समकालीन कविताई

by Anhadkolkata
October 5, 2026
in कविता, साहित्य
A A
0
Share on FacebookShare on TwitterShare on Telegram
चन्दन कुमार

चन्दन कुमार की कविताओं में समकालीन सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ के प्रति तीखा प्रतिरोध दिखाई देता है। कवि का मूल सरोकार समानता, स्त्री-मुक्ति, जाति-विरोध, लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ है। उनकी कविताएँ किसी अमूर्त आदर्श की बात नहीं करतीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में मौजूद पितृसत्ता, जातीय श्रेष्ठताबोध, सांस्कृतिक गुलामी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सत्ता के दमनकारी चरित्र को सीधे संबोधित करती हैं।

इन कविताओं की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उनकी सीधी, आक्रामक और संवादधर्मी भाषा है। कवि अलंकारिक जटिलता के बजाय सवाल, संबोधन, नारे और प्रत्यक्ष वक्तव्य को अपनी काव्य-भाषा बनाता है। कहीं-कहीं यह भाषा घोषणात्मक और अत्यधिक सीधी भी हो जाती है, लेकिन यही उनकी कविता के प्रतिरोधी स्वभाव का हिस्सा है। कुल मिलाकर चन्दन कुमार की कविताएँ वंचितों और प्रतिरोधरत मनुष्य के पक्ष में खड़ी सामाजिक चेतना की कविताएँ हैं, जिनमें आक्रोश के साथ बराबरी और मनुष्यता की आकांक्षा लगातार मौजूद रहती है।

Related articles

वह भागी थी

लैंगस्टन ह्यूज़ की कविताएँ

तो पढ़ते हैं चन्दन कुमार की कविताएँ अनहद कोलकाता पर। आपकी राय का इंतजार तो रहेगा ही।

 

तुम लड़की हो

हवा में उछलते स्लोगन
बस जुमले हैं
जिनसे किसी बदलाव की आहट महसूस नहीं होती

तुम किसी पुरुष के साथ
अकेली कैसे घूम सकती हो
तुम आधी रात को
घाटों पर अकेली कैसे जा सकती हो
तुम किसी से प्यार कैसे कर सकती हो
तुम्हें पता होना चाहिए
तुम लड़की हो

उनका नाता बराबरी – भाईचारे से नहीं
वे वर्चस्ववादी संस्कृति के पैरोकार हैं

सरेआम लफंगई पर उतारू
सामंती संस्कृति के पोषक
किसी के छोटे कपड़े पहनने पर
इतने बेचैन क्यों हो जाते हैं कि
वे लोकतांत्रिक होना भूल
जबरदस्ती करना अपना जैविक कर्तव्य मान बैठते हैं

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की जड़ें
इतनी गहरी हो चुकी हैं कि
टूटपूंजिया कवि महोदय लोग
ओढ़नी, बिछिया, पायल को जरूरी समझते हैं
और वे भूल जाते हैं इन चीजों के अलावा भी
एक स्त्री का जीवन होता है
जहाँ वह खुले में साँस ले सके
इस देश को अपना समझ सके

एक लड़की का पढ़ जाना
मर्दवादी – सामंतवादी पितृसत्ता से सवाल पूछना
उन्हें ठीक नहीं लगता
वे आ जाते हैं सरेआम
मुँह पर एक ऐसे रंग का गमछा लपेटे
जिससे प्रतिगामी शक्तियों के सरोकार जुड़े हैं

शाम ढले स्त्री का पुरुष साथी के साथ आगे बढ़ना
जोख़िम उठाने जैसा है
कि कहीं से आये वहशी दरिंदे
उसे पूरी तरह से नोच लेना चाहते हैं
वे नहीं छोड़ना चाहते हैं उसे किसी लायक
ताकि याद रहे तमाम बेटियाें को
वे फिर से पितृसत्ता की चौहद्दी न लांघें

तो सुनो !
आदिम हत्यारों
तुम किसी स्त्री के आगे बढ़ने से
क्यों हो जाते हो परेशान
तुम्हारी सारी पाबंदियों को तोड़
स्त्रियाँ उड़ान भरने के लिए आगे आ रही हैं
लड़ रही हैं, भिड़ रही हैं
और बदलाव की ओर आगे बढ़ रही हैं।

 

डरे हुए लोग

जिनका पानी मर चुका है
और जिनकी रीढ़ कभी सीधी नहीं हुई
वे भाषा  की चौहद्दी में डरे हुए लोग हैं

डरे हुए लोग जब
स्कूल – कॉलेज जाते हैं
कोर्ट – कचहरी जाते है
तो जाते ही मालिक के चरणों में लोट जाते हैं

जो कभी सीधे खड़े नहीं हो पाये
उनकी पीढ़ियाँ
गुलामी की नाजायज़ औलाद होती हैं
जो सच को सच और झूठ को झूठ कहना नहीं जानतीं

ऐसे लोगों से किसी बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती
वे सांस्कृतिक गुलामी के शिकार
पेट पलुआ संस्कृति के पोषक
समाज के लिए ख़तरा बने हुए हैं

समाज को चाहिए कि
ऐसे लोगों से जितना जल्दी हो सके
अलग हो जायें
ताकि इनसे बचायी जा सके

पढ़ाई – लिखाई –  लड़ाई।

 

श्रेष्ठता बोध

घृणित मानसिकता के शिकार लोग
श्रेष्ठ होने का दंभ पाले
हक़मारी के औज़ार बनाते हैं
जिससे वृहत्तर जनता को ढकेला जा सके
हीनता बोध की खाई में

जाति पर गर्व करने वाले
अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए
किसी हद तक जा सकते हैं

जिनके आत्मसम्मान को छीनकर
फेंक दिया जाता है पशु से भी नीचे
उनके पास संपत्ति के बावजूद
जातीय भेदभाव क्यों किया जाता है?

तुम घृणा करते हो ऐसे लोगों से
जो तुम्हारे समक्ष खड़े हो रहे हैं
लड़ रहे हैं और
अपना हिस्सा तुमसे छिन रहे हैं

तुम उन्हें मनुष्य नहीं मानते हो
श्रेष्ठता बोध में जकड़े
हवन – पूजा से सब कुछ शुद्ध कर देना चाहते हो
तो सुनो !
तुम मानसिक विकृति के शिकार हो

छुआछूत का व्यवहार
पुश्तैनी धरोहर की तरह
तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ रहा
कुकर्मों में सने तुम उच्चता की शेखी बघारते हो
और लोगों को मनुष्य मानने से इंकार करते हो
तो सुनो !
तुम्हें यह अधिकार कहां से मिला?

तुम्हारे शास्त्र भेदभाव की खाई पर खड़े
असमानता का भवन तैयार करते हैं
वे तुम्हें होंगे प्यारे
जिनसे शोषण – दमन को तुम अमलीजामा पहनाते हो

अब समय करवट बदल रहा है
श्रेष्ठता बोध की खाई को पाटना शुरू करो
नहीं तो एक दिन तुम स्वयं
बहुसंख्यक आबादी के द्वारा नकार दिए जाओगे

क्यों लोकतंत्र तुम्हारे पेट में मरोड़ पैदा करता है?
तुम जानते हो संसाधनों का बराबर बँटवारा
तुम्हें श्रम की तरफ लेकर जायेगा
जिधर तुम जाना नहीं चाहते हो

अब समय आ गया है कि
तुम अपनी सारी विकृतियों को त्याग
मनुष्यता की स्थापना में खड़े हो जाओ
और सभी से प्यार करो।

 

हक़ के लिए लड़ना गुनाह है क्या

जब बढ़ती जाए बेरोजगारी
भ्रष्टाचार आमजन के तबाही
का सबब बन जाय
जब बार – बार पेपर लीक
तमाम जिंदगियाँ तबाह करने को मजबूर कर दे
तो ऐसे में अपने हक़ के लिए लड़ना गुनाह है क्या?

तुम्हारी लाठियों में लगी कीलें
तुम्हारे संवेदनहीन होने के लिए काफी हैं

सड़कों पर बिखरे नारों में
‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘जय भीम’ का नारा
जब चारों तरफ गूँजने लगे
तब बदलाव की सोंधी खुशबू को महसूस किया जा सकता है

लाठी खाए लोग कौन हैं
कहाँ से आए हैं, क्यों आए हैं ?
कभी जानने की कोशिश की तुमने
अपनी जवाबदेही को न स्वीकारना
लोकतंत्र में तानाशाह हो जाने की निशानी है

तख्तियों में बिखरे नारे
सड़कों पर बहते खून
तुम्हारी हर लाठियों का जवाब
तुमसे माँग रहे हैं

अब तुम देख लो तुम्हें क्या करना है
लेकिन ये जनता
जो तुम्हारे हर छलावे को बर्दाश्त करती रही है
अब उठ खड़ी हुई है, लड़ रही है
और वह बदलाव के अंतिम दिनों तक लड़ती रहेगी।

 

अब हमें ऐसा नहीं करना चाहिए

जब भूख दम तोड़ने पर मजबूर कर दे
और राजा करता रहे अठखेलियाँ
तो हमें पुरखों को याद कर
रास्ता बदल लेना चाहिए

कबीर अनायास मगहर नहीं चले गए थे
जब होने लगीं थीं
तमाम साजिशें उनके खिलाफ़
परिवर्तन की आवाज़ दब न जाए
इसलिए उन्होंने मगहर जाना चुना
जहाँ दमनकारी व्यवस्था का पहुँच पाना नामुमकिन था

साथियों! एक लंबी लड़ाई के लिए
भूख हड़ताल को तोड़ना होगा
जब सत्ताएँ संवेदनहीन हो जायें
तो लड़ने के और तरीकों को अपनाना होगा

आसान नहीं होता अपने भीतर
परिवर्तनकामी सोच पैदा करना
बहुत कुछ से लड़ते हुए
बहुत कुछ बदलने की प्रतिबद्धता अचानक नहीं आती

साथी! अब छोड़ो न जिद
उठो ! अन्न ग्रहण करो
ऐसे जान गँवाने से कोई क्रांति नहीं आने वाली
क्रांति आएगी लगातार डटे रहने से

यह प्रण लेो कि अघोषित आपातकाल के दौर में
जब राजा की भूख शांत ही न हो
तमाम दमनकारी नीतियों को पोषित करता
वह आगे बढ़े
तब हमें सचेत हो जाना चाहिए कि
अब हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।

 

***

चन्दन कुमार – सहायक आचार्य ( हिंदी )
गांधी शताब्दी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोयलसा – आजमगढ़।
ग्राम + पोस्ट – इमलीपुर
जिला आजमगढ़
राज्य – उत्तर प्रदेश
पिन कोड – 276121

जन्मतिथि – 05/07/1993
मोबाइल नंबर : 9559091747
ईमेल : chandan032014@gmail.com

कथादेश, जलवायु , अदहन , अनुनाद , सम्मुख पत्रिकाओं में कुछ कविताएं तथा अपनी माटी, समय संज्ञान, शोधमाला पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित।

 

 

 

Tags: चन्
ShareTweetShare
Anhadkolkata

Anhadkolkata

अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें। प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।

Related Posts

वह भागी थी

वह भागी थी

by Anhadkolkata
October 6, 2026
0

संदीप तोमर ‘वह भागी थी’ केवल किसी लड़की के घर छोड़ देने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस समाज की परतों को खोलने वाली कथा...

लैंगस्टन ह्यूज़ की कविताएँ

लैंगस्टन ह्यूज़ की कविताएँ

by Anhadkolkata
October 4, 2026
0

लैंगस्टन ह्यूज़ (1901-1967) लैंगस्टन ह्यूज़ (1901-1967) हार्लेम पुनर्जागरण के एक प्रमुख व्यक्ति थे, जो 1920 के दशक में कई अमेरिकी शहरों, विशेष रूप से हार्लेम में...

मज्झिम प्रतिपदा

मज्झिम प्रतिपदा

by Anhadkolkata
October 3, 2026
0

  अपने वितान में पाँच दशकों से भी अधिक समय को समेटे हुए मौजूदा हिन्दी कविता आधुनिक काल के सबसे लंबे कालखंड की यात्रा है। यह...

लोचन कोना

लोचन कोना

by Anhadkolkata
September 30, 2026
0

आजकल हमारे चारो तरफ संस्कृति के नाम पर सांप्रदायिक तांडव बहुत ही चिंताजनक है। संस्कृति कर्मियों की जमात के हाथ में कुछ होता नहीं है। लेकिन...

रोशनी वाला आदमी–विजयशंकर चतुर्वेदी

रोशनी वाला आदमी–विजयशंकर चतुर्वेदी

by Anhadkolkata
September 29, 2026
1

विजयशंकर चतुर्वेदी ‘रोशनी वाला आदमी’ विजयशंकर चतुर्वेदी की ऐसी कहानी है जो सत्ता, संस्थान और बौद्धिक विवेक के बीच बढ़ते तनाव को प्रोफ़ेसर नीलांश वर्मा के...

Next Post
वह भागी थी

वह भागी थी

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.

No Result
View All Result
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.