• मुखपृष्ठ
  • अनहद के बारे में
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक नियम
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
अनहद
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
No Result
View All Result
अनहद
No Result
View All Result
Home कविता

सुशांत सुप्रिय की कविताएँ

समकालीन कविताई

by Anhadkolkata
October 13, 2026
in कविता, लेखक, साहित्य
A A
0
Share on FacebookShare on TwitterShare on Telegram

 

सुशांत सुप्रिय

सुशांत सुप्रिय की इन कविताओं का केंद्रीय स्वर अपने समय की राजनीतिक विडंबनाओं, सामाजिक विसंगतियों, मनुष्य के आंतरिक विखंडन और संवेदनहीन होते समाज के विरुद्ध एक सजग प्रतिरोध का स्वर है। उनकी कविता ‘फ़िलिस्तीन’ भूगोल की सीमाओं को लाँघकर उत्पीड़ित मनुष्य की सार्वभौमिक पीड़ा और अपनी अस्मिता के लिए संघर्षरत कौमों की साझा नियति को अभिव्यक्त करती है, तो ‘किसान का फ़ोटो’ में सूखे की त्रासदी के बीच किसान की आँखों में बची हुई अनकही पीड़ा उस यथार्थ को सामने लाती है, जिसे कैमरे जैसी तकनीक भी पूरी तरह दर्ज नहीं कर सकती।

Related articles

​ऐनी कार्सन का पेरिस रिव्यु पत्रिका के लिए लिया गया साक्षात्कार

स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएँ

‘कल रात सपने में’ इतिहास और मिथक की स्थापित मान्यताओं को स्त्री-अस्मिता, स्वाभिमान और प्रतिरोध की आधुनिक दृष्टि से पुनर्परिभाषित करती है। ‘पागल’ में सांप्रदायिक हिंसा के दो ऐतिहासिक प्रसंगों के माध्यम से धार्मिक पहचान की राजनीति और मनुष्यता के सामूहिक पराभव को जिस तरह रेखांकित किया गया है, वह कविता को तात्कालिक राजनीतिक टिप्पणी से आगे ले जाकर सभ्यता के आत्मालोचन में बदल देता है। दूसरी ओर, ‘कोई और’, ‘जब दुख मेरे पास बैठा होता है’ और ‘डरावनी बात’ में व्यक्ति के भीतर बढ़ते अजनबीपन, अवसाद और अपने ही संसार से विस्थापित हो जाने की अनुभूति है। ‘इक्कीसवीं सदी में हिंदी का कवि’ समकालीन समाज की साहित्य-विमुखता और बाजार-संचालित मनोरंजन संस्कृति पर प्रश्न उठाती है, जबकि ‘सभ्य सत्य’ तथा ‘आज का आदमी’ आधुनिक मनुष्य के अहंकार, आत्मकेंद्रिकता और नैतिक खोखलेपन को व्यंग्य की तीक्ष्णता से उद्घाटित करती हैं।

इन कविताओं की विशेषता इनकी सहज भाषा, संक्षिप्त संरचना, प्रभावशाली बिंबों और कथन की स्पष्टता में निहित है; सुशांत सुप्रिय जटिल सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभवों को अनावश्यक भाषिक आडंबर के बिना कविता में रूपांतरित करते हैं। हालाँकि कुछ रचनाओं में विचार की प्रत्यक्षता कविता की बहुअर्थी संभावनाओं को सीमित करती हुई भी दिखाई देती है, फिर भी इन कविताओं का नैतिक आग्रह और अपने समय के प्रति इनकी बेचैनी इन्हें प्रासंगिक बनाती है। समग्रतः ये कविताएँ उस मनुष्य की पक्षधर हैं, जो इतिहास की हिंसा, समाज की उदासीनता और अपने भीतर के अँधेरे के बीच भी संवेदना, विवेक और प्रतिरोध की संभावना बचाए रखना चाहता है।

——————०——————

फ़िलिस्तीन

ऐटलस हमेशा पूरा सच
नहीं देता है
कुछ क़ौमों का जीवन
भिंची हुई मुट्ठी-सा होता है
कोई नाम साँसों में
रचा-बसा होता है
कोई नाम होंठों पर
आयतों-सा होता है
इसे कहीं चेचेन्या
कहीं बोस्निया-हर्ज़ेगोविना कहते है
किंतु इसका मतलब
हर भाषा में
फ़िलिस्तीन ही होता है

 

किसान का फ़ोटो

वह हमारे देश का
एक गरीब किसान था

मिट्टी से सम्मानित हुआ था
मिट्टी ने अपमानित किया था

मिट्टी से मिट्टी तक की
उसकी सारी यात्राएँ थीं

इस साल भारी सूखा पड़ा था
इतना कि उसकी आँखों के
कोरों का पानी भी
सूख गया था

जब मैंने उसे देखा
मुरझाई फसल-सा
वह घुटनों के बल
झुक कर
बहुत देर तक ढूँढ़ता रहा था
सूखी मिट्टी में
शायद कहीं बच गया
ख़ुशहाली का कोई साबुत दाना

अंत में जब उसने
अपना चेहरा उठाया था
उसकी आँखों में
ऐसा कुछ था
जिसे मेरा कैमरा भी
क़ैद नहीं कर सका था
फ़ोटो में

 

कल रात सपने में

कल रात सपने में
गाँधारी ने इंकार कर दिया
आँखों पर पट्टी बाँधने से

एकलव्य ने नहीं काटा
अपना अँगूठा द्रोण के लिए

सीता ने मना कर दिया
अग्नि-परीक्षा देने से

द्रौपदी ने नहीं लगने दिया
स्वयं को जुए में दाँव पर

पुरु ने नहीं दी
ययाति को अपनी युवावस्था

कल रात
इतिहास और ‘ मिथिहास ‘ की

कई ग़लतियाँ सुधरीं
मेरे सपने में

 

कोई और

एक सुबह
उठता हूँ
और हर कोण से
खुद को पाता हूँ अजनबी

आँखों में पाता हूँ
एक अजीब परायापन
अपनी मुस्कान
लगती है न जाने किसकी

बाल हैं कि
पहचाने नहीं जाते
अपनी हथेलियों में
किसी और की रेखाएँ
पाता हूँ

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि
ऐसा भी होता है
हम जी रहे होते हैं
किसी और का जीवन
हमारे भीतर
कोई और जी रहा होता है

 

जब दुख मेरे पास बैठा होता है

जब दुख मेरे पास बैठा होता है
मैं सब कुछ भूल जाता हूँ

पता नहीं सूरज और चाँद
कब आते हैं
और कब ओझल हो जाते हैं

क्या पता
बादल आते भी हैं या नहीं

क्या मालूम हवा
गुनगुना रही होती है
या शोक-गीत
गा रही होती है

न जाने दिशाएँ
सूखे बीज-सी
बज रही होती हैं
या चुप होती हैं
विसर्जित कर
अपना सारा शोर-शराबा

जब दुख मेरे पास बैठा होता है
मुझे अपनी परछाईं भी
नज़र नहीं आती

केवल एक सलेटी अहसास होता है
शिराओं में इस्पात के भर जाने का

केवल एक पीली गंध होती है
भीतर कुछ सड़ जाने की

और पुतलियाँ भारी हो जाती हैं
न जाने किन दृश्यों के बोझ से

 

ग़लत युग में

यदि तुम
सूरज को गाली देकर
धूप से दोस्ती नहीं कर सकते

यदि तुम
चाँद को दाग़दार कह कर
चाँदनी से इश्क़ नहीं कर सकते

यदि तुम
फूल को नकार कर
ख़ुशबू को नहीं अपना सकते

तो तुम
ग़लत युग में पैदा हुए हो

 

सभ्य सत्य

तुम मुझे मूर्ख बना रहे हो
मैं तुम्हें उल्लू बना रहा हूँ
हम दोनो ही
यह बात जानते हैं
फिर भी मुस्करा हैं
क्योंकि हम
सभ्य हैं और आधुनिक भी

 

पागल

बताओ तुम कौन हो
हिंदू हो या मुसलमान हो …
वह सबसे पूछता है

उसका बाप
बाबरी मस्जिद के
विध्वंस के समय
दिसंबर , 1992 में हुए
दंगों में
मारा गया था

बताओ तुम कौन हो
हिंदू हो या मुसलमान हो …
वह सबसे पूछता है

उसका बेटा
2002 में गुजरात में हुए
दंगों में
मारा गया था

बताओ तुम कौन हो
हिंदू हो या मुसलमान हो …
वह पेड़-पौधों
पशु-पक्षियों
कीड़े-मकोड़ों
धूप
बारिश
हवा
आकाश
मिट्टी …
सबसे पूछता है

जिन्होंने उसके बाप
और बेटे को मारा
वे हँसते हुए उसे
पागल कहते हैं

जिन्होंने उसके बाप
और बेटे को
दंगाइयों से नहीं बचाया
वे हँसते हुए उसे
पागल कहते हैं

 

इक्कीसवीं सदी का प्रेम-गीत

ओ प्रिये
दिन किसी निर्जन द्वीप पर पड़ी
ख़ाली सीपियों-से
लगने लगे हैं
और रातें
एबोला वायरस के
रोगियों-सी

क्या आईनों में ही
कोई नुक़्स गया है
कि समय की छवि
इतनी विकृत लगने लगी है ?

 

इक्कीसवीं सदी में हिंदी का कवि

जैसे रहते हैं
सन्नाटे में स्वर
वैसे रहता है
इक्कीसवीं सदी में
हिंदी का कवि

जैसे रहती है
धमनियों में बेचैनी
जैसे रहती है
शिराओं में छटपटाहट
जैसे गहरे कुएँ के तल पर
रहता है आदिम अँधेरा
वैसे रहता है
इक्कीसवीं सदी में
हिंदी का कवि

जब वह लिखता है कविताएँ
तब काले-भूरे शब्द कविताओं में से
रुलाई की तरह
फूट कर बाहर आते हैं

जैसे अपना सबसे प्यारा
खिलौना टूटने पर
बच्चा रोता है
ठीक वैसे ही रोते हैं
हिंदी कवि के शब्द
अपने समय को देखकर

इस रुलाई का
क्या मतलब है —
लोग पूछते हैं
एक-दूसरे से
और बिना उत्तर की
प्रतीक्षा किए
व्यस्त हो जाते हैं
टी. वी. पर
रियलिटी-शो और
सीरियल देखने में

किसी को क्या पड़ी है आज कि
वह पढ़े हिंदी कवि को ऐसे
जैसे पढ़ा जाना चाहिए
किसी भी कवि को

 

डरावनी बात

एक दिन
मैं अपने घर गया
लेकिन वह मेरे घर जैसा
नहीं लगा

मकान नंबर वहीं था
लेकिन वहाँ रहते
सगे-संबंधी
बेगाने लगे

गली वही थी
लेकिन वहाँ एक
अजनबीपन लगा

पड़ोसी वे ही थे
लेकिन उनकी आँखें
अचीन्ही लगीं

यह मेरा ही शहर था
लेकिन इसमें
अपरिचय की
तीखी गंध लगी

यह एक डरावनी बात थी

इससे भी डरावनी बात यह थी कि
मैंने पुकारा उन सबको
उनके घर के नाम से
लेकिन कोई अपना वह नाम
नहीं पहचान पाया

 

आज का आदमी

मैं ढाई हाथ का आदमी हूँ
मेरा ढाई मील का ‘ ईगो ‘ है
मेरा ढाई इंच का दिल है
दिल पर ढाई मन का बोझ है

————————०————————

 

 

सुशांत सुप्रिय
जन्म : 28 मार्च , 1968 ; पटना ।
शिक्षा : अमृतसर , ( पंजाब ) तथा दिल्ली में ।
हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार , कवि तथा साहित्यिक अनुवादक । इनके दस कथा-संग्रह , पाँच काव्य-संग्रह तथा विश्व की अनूदित कहानियों के दस संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । इनकी कहानियाँ और कविताएँ पुरस्कृत हैं और कई राज्यों के स्कूल-कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में बच्चों को पढ़ाई जाती हैं । कई भाषाओं में अनूदित इनकी रचनाओं पर कई विश्वविद्यालयों में शोधार्थी शोध-कार्य कर रहे हैं । इनकी कई कहानियों के नाट्य मंचन हुए हैं तथा इनकी एक कहानी “ दुमदार जी की दुम “ पर फ़िल्म भी बन रही है । हिंदी के अलावा अंग्रेज़ी व पंजाबी में भी लेखन व रचनाओं का प्रकाशन । साहित्य व संगीत के प्रति जुनून ।सुशांत सरकारी संस्थान , नई दिल्ली में अधिकारी हैं और इंदिरापुरम् , ग़ाज़ियाबाद में रहते हैं ।
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com
पता : A-5001 ,
Gaur Green City,
Vaibhav Khand ,
Indirapuram,
Ghaziabad-201014
UP.

—————————0—————————

 

Tags: अनहद कोलकाता Anhad Kolkata हिन्दी बेव पत्रिका Hindi Web Magzineकवितासमकालीन हिन्दी कविताएँसुशांत सुप्रियसुशांत सुप्रिय की कविताएँ
ShareTweetShare
Anhadkolkata

Anhadkolkata

अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें। प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।

Related Posts

​ऐनी कार्सन का पेरिस रिव्यु पत्रिका के लिए लिया गया साक्षात्कार

​ऐनी कार्सन का पेरिस रिव्यु पत्रिका के लिए लिया गया साक्षात्कार

by Anhadkolkata
October 12, 2026
0

यह अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिका पेरिस रिव्यु से साभार लिया गया है। यह साक्षात्कार विल ऐटकिन ने साल 2002 में लिया था। अनुवाद: शुभ चक्रबर्ती   ANNE CARSAN...

स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएँ

स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएँ

by Anhadkolkata
October 11, 2026
0

स्वप्निल श्रीवास्तव स्वप्निल श्रीवास्तव की इन कविताओं का वैशिष्ट्य उनकी सहज भाषा, अनुभवजन्य दृष्टि और जीवन के साधारण प्रसंगों में छिपे गहरे अर्थों को पहचानने की...

वह जो उनका अक्षय आश्रय है : शुभ चक्रबर्ती

वह जो उनका अक्षय आश्रय है : शुभ चक्रबर्ती

by Anhadkolkata
October 9, 2026
0

वह जो उनका अक्षय आश्रय है शुभ चक्रबर्ती विल्फ्रेड ओवेन ​युद्ध में युवा कवि विल्फ्रेड ओवेन की असामयिक मृत्यु के बाद उनकी माँ, सुज़ैन एच. ओवेन...

लोचन कोना – तीसरी किस्त – प्रफुल्ल कोलख्यान

लोचन कोना – तीसरी किस्त – प्रफुल्ल कोलख्यान

by Anhadkolkata
October 7, 2026
0

  सब से कठिन और कंटीला सवाल ---- हिंदी का अधिकतर लेखक हिंदी का पाठक क्यों नहीं रहा! यह तो चित्रगुप्त ही जानते हैं कि पहले...

वह भागी थी

वह भागी थी

by Anhadkolkata
October 6, 2026
0

संदीप तोमर ‘वह भागी थी’ केवल किसी लड़की के घर छोड़ देने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस समाज की परतों को खोलने वाली कथा...

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.

No Result
View All Result
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.