
सुशांत सुप्रिय की इन कविताओं का केंद्रीय स्वर अपने समय की राजनीतिक विडंबनाओं, सामाजिक विसंगतियों, मनुष्य के आंतरिक विखंडन और संवेदनहीन होते समाज के विरुद्ध एक सजग प्रतिरोध का स्वर है। उनकी कविता ‘फ़िलिस्तीन’ भूगोल की सीमाओं को लाँघकर उत्पीड़ित मनुष्य की सार्वभौमिक पीड़ा और अपनी अस्मिता के लिए संघर्षरत कौमों की साझा नियति को अभिव्यक्त करती है, तो ‘किसान का फ़ोटो’ में सूखे की त्रासदी के बीच किसान की आँखों में बची हुई अनकही पीड़ा उस यथार्थ को सामने लाती है, जिसे कैमरे जैसी तकनीक भी पूरी तरह दर्ज नहीं कर सकती।
‘कल रात सपने में’ इतिहास और मिथक की स्थापित मान्यताओं को स्त्री-अस्मिता, स्वाभिमान और प्रतिरोध की आधुनिक दृष्टि से पुनर्परिभाषित करती है। ‘पागल’ में सांप्रदायिक हिंसा के दो ऐतिहासिक प्रसंगों के माध्यम से धार्मिक पहचान की राजनीति और मनुष्यता के सामूहिक पराभव को जिस तरह रेखांकित किया गया है, वह कविता को तात्कालिक राजनीतिक टिप्पणी से आगे ले जाकर सभ्यता के आत्मालोचन में बदल देता है। दूसरी ओर, ‘कोई और’, ‘जब दुख मेरे पास बैठा होता है’ और ‘डरावनी बात’ में व्यक्ति के भीतर बढ़ते अजनबीपन, अवसाद और अपने ही संसार से विस्थापित हो जाने की अनुभूति है। ‘इक्कीसवीं सदी में हिंदी का कवि’ समकालीन समाज की साहित्य-विमुखता और बाजार-संचालित मनोरंजन संस्कृति पर प्रश्न उठाती है, जबकि ‘सभ्य सत्य’ तथा ‘आज का आदमी’ आधुनिक मनुष्य के अहंकार, आत्मकेंद्रिकता और नैतिक खोखलेपन को व्यंग्य की तीक्ष्णता से उद्घाटित करती हैं।
इन कविताओं की विशेषता इनकी सहज भाषा, संक्षिप्त संरचना, प्रभावशाली बिंबों और कथन की स्पष्टता में निहित है; सुशांत सुप्रिय जटिल सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभवों को अनावश्यक भाषिक आडंबर के बिना कविता में रूपांतरित करते हैं। हालाँकि कुछ रचनाओं में विचार की प्रत्यक्षता कविता की बहुअर्थी संभावनाओं को सीमित करती हुई भी दिखाई देती है, फिर भी इन कविताओं का नैतिक आग्रह और अपने समय के प्रति इनकी बेचैनी इन्हें प्रासंगिक बनाती है। समग्रतः ये कविताएँ उस मनुष्य की पक्षधर हैं, जो इतिहास की हिंसा, समाज की उदासीनता और अपने भीतर के अँधेरे के बीच भी संवेदना, विवेक और प्रतिरोध की संभावना बचाए रखना चाहता है।
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फ़िलिस्तीन
ऐटलस हमेशा पूरा सच
नहीं देता है
कुछ क़ौमों का जीवन
भिंची हुई मुट्ठी-सा होता है
कोई नाम साँसों में
रचा-बसा होता है
कोई नाम होंठों पर
आयतों-सा होता है
इसे कहीं चेचेन्या
कहीं बोस्निया-हर्ज़ेगोविना कहते है
किंतु इसका मतलब
हर भाषा में
फ़िलिस्तीन ही होता है
किसान का फ़ोटो
वह हमारे देश का
एक गरीब किसान था
मिट्टी से सम्मानित हुआ था
मिट्टी ने अपमानित किया था
मिट्टी से मिट्टी तक की
उसकी सारी यात्राएँ थीं
इस साल भारी सूखा पड़ा था
इतना कि उसकी आँखों के
कोरों का पानी भी
सूख गया था
जब मैंने उसे देखा
मुरझाई फसल-सा
वह घुटनों के बल
झुक कर
बहुत देर तक ढूँढ़ता रहा था
सूखी मिट्टी में
शायद कहीं बच गया
ख़ुशहाली का कोई साबुत दाना
अंत में जब उसने
अपना चेहरा उठाया था
उसकी आँखों में
ऐसा कुछ था
जिसे मेरा कैमरा भी
क़ैद नहीं कर सका था
फ़ोटो में
कल रात सपने में
कल रात सपने में
गाँधारी ने इंकार कर दिया
आँखों पर पट्टी बाँधने से
एकलव्य ने नहीं काटा
अपना अँगूठा द्रोण के लिए
सीता ने मना कर दिया
अग्नि-परीक्षा देने से
द्रौपदी ने नहीं लगने दिया
स्वयं को जुए में दाँव पर
पुरु ने नहीं दी
ययाति को अपनी युवावस्था
कल रात
इतिहास और ‘ मिथिहास ‘ की
कई ग़लतियाँ सुधरीं
मेरे सपने में
कोई और
एक सुबह
उठता हूँ
और हर कोण से
खुद को पाता हूँ अजनबी
आँखों में पाता हूँ
एक अजीब परायापन
अपनी मुस्कान
लगती है न जाने किसकी
बाल हैं कि
पहचाने नहीं जाते
अपनी हथेलियों में
किसी और की रेखाएँ
पाता हूँ
मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि
ऐसा भी होता है
हम जी रहे होते हैं
किसी और का जीवन
हमारे भीतर
कोई और जी रहा होता है
जब दुख मेरे पास बैठा होता है
जब दुख मेरे पास बैठा होता है
मैं सब कुछ भूल जाता हूँ
पता नहीं सूरज और चाँद
कब आते हैं
और कब ओझल हो जाते हैं
क्या पता
बादल आते भी हैं या नहीं
क्या मालूम हवा
गुनगुना रही होती है
या शोक-गीत
गा रही होती है
न जाने दिशाएँ
सूखे बीज-सी
बज रही होती हैं
या चुप होती हैं
विसर्जित कर
अपना सारा शोर-शराबा
जब दुख मेरे पास बैठा होता है
मुझे अपनी परछाईं भी
नज़र नहीं आती
केवल एक सलेटी अहसास होता है
शिराओं में इस्पात के भर जाने का
केवल एक पीली गंध होती है
भीतर कुछ सड़ जाने की
और पुतलियाँ भारी हो जाती हैं
न जाने किन दृश्यों के बोझ से
ग़लत युग में
यदि तुम
सूरज को गाली देकर
धूप से दोस्ती नहीं कर सकते
यदि तुम
चाँद को दाग़दार कह कर
चाँदनी से इश्क़ नहीं कर सकते
यदि तुम
फूल को नकार कर
ख़ुशबू को नहीं अपना सकते
तो तुम
ग़लत युग में पैदा हुए हो
सभ्य सत्य
तुम मुझे मूर्ख बना रहे हो
मैं तुम्हें उल्लू बना रहा हूँ
हम दोनो ही
यह बात जानते हैं
फिर भी मुस्करा हैं
क्योंकि हम
सभ्य हैं और आधुनिक भी
पागल
बताओ तुम कौन हो
हिंदू हो या मुसलमान हो …
वह सबसे पूछता है
उसका बाप
बाबरी मस्जिद के
विध्वंस के समय
दिसंबर , 1992 में हुए
दंगों में
मारा गया था
बताओ तुम कौन हो
हिंदू हो या मुसलमान हो …
वह सबसे पूछता है
उसका बेटा
2002 में गुजरात में हुए
दंगों में
मारा गया था
बताओ तुम कौन हो
हिंदू हो या मुसलमान हो …
वह पेड़-पौधों
पशु-पक्षियों
कीड़े-मकोड़ों
धूप
बारिश
हवा
आकाश
मिट्टी …
सबसे पूछता है
जिन्होंने उसके बाप
और बेटे को मारा
वे हँसते हुए उसे
पागल कहते हैं
जिन्होंने उसके बाप
और बेटे को
दंगाइयों से नहीं बचाया
वे हँसते हुए उसे
पागल कहते हैं
इक्कीसवीं सदी का प्रेम-गीत
ओ प्रिये
दिन किसी निर्जन द्वीप पर पड़ी
ख़ाली सीपियों-से
लगने लगे हैं
और रातें
एबोला वायरस के
रोगियों-सी
क्या आईनों में ही
कोई नुक़्स गया है
कि समय की छवि
इतनी विकृत लगने लगी है ?
इक्कीसवीं सदी में हिंदी का कवि
जैसे रहते हैं
सन्नाटे में स्वर
वैसे रहता है
इक्कीसवीं सदी में
हिंदी का कवि
जैसे रहती है
धमनियों में बेचैनी
जैसे रहती है
शिराओं में छटपटाहट
जैसे गहरे कुएँ के तल पर
रहता है आदिम अँधेरा
वैसे रहता है
इक्कीसवीं सदी में
हिंदी का कवि
जब वह लिखता है कविताएँ
तब काले-भूरे शब्द कविताओं में से
रुलाई की तरह
फूट कर बाहर आते हैं
जैसे अपना सबसे प्यारा
खिलौना टूटने पर
बच्चा रोता है
ठीक वैसे ही रोते हैं
हिंदी कवि के शब्द
अपने समय को देखकर
इस रुलाई का
क्या मतलब है —
लोग पूछते हैं
एक-दूसरे से
और बिना उत्तर की
प्रतीक्षा किए
व्यस्त हो जाते हैं
टी. वी. पर
रियलिटी-शो और
सीरियल देखने में
किसी को क्या पड़ी है आज कि
वह पढ़े हिंदी कवि को ऐसे
जैसे पढ़ा जाना चाहिए
किसी भी कवि को
डरावनी बात
एक दिन
मैं अपने घर गया
लेकिन वह मेरे घर जैसा
नहीं लगा
मकान नंबर वहीं था
लेकिन वहाँ रहते
सगे-संबंधी
बेगाने लगे
गली वही थी
लेकिन वहाँ एक
अजनबीपन लगा
पड़ोसी वे ही थे
लेकिन उनकी आँखें
अचीन्ही लगीं
यह मेरा ही शहर था
लेकिन इसमें
अपरिचय की
तीखी गंध लगी
यह एक डरावनी बात थी
इससे भी डरावनी बात यह थी कि
मैंने पुकारा उन सबको
उनके घर के नाम से
लेकिन कोई अपना वह नाम
नहीं पहचान पाया
आज का आदमी
मैं ढाई हाथ का आदमी हूँ
मेरा ढाई मील का ‘ ईगो ‘ है
मेरा ढाई इंच का दिल है
दिल पर ढाई मन का बोझ है
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सुशांत सुप्रिय
जन्म : 28 मार्च , 1968 ; पटना ।
शिक्षा : अमृतसर , ( पंजाब ) तथा दिल्ली में ।
हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार , कवि तथा साहित्यिक अनुवादक । इनके दस कथा-संग्रह , पाँच काव्य-संग्रह तथा विश्व की अनूदित कहानियों के दस संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । इनकी कहानियाँ और कविताएँ पुरस्कृत हैं और कई राज्यों के स्कूल-कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में बच्चों को पढ़ाई जाती हैं । कई भाषाओं में अनूदित इनकी रचनाओं पर कई विश्वविद्यालयों में शोधार्थी शोध-कार्य कर रहे हैं । इनकी कई कहानियों के नाट्य मंचन हुए हैं तथा इनकी एक कहानी “ दुमदार जी की दुम “ पर फ़िल्म भी बन रही है । हिंदी के अलावा अंग्रेज़ी व पंजाबी में भी लेखन व रचनाओं का प्रकाशन । साहित्य व संगीत के प्रति जुनून ।सुशांत सरकारी संस्थान , नई दिल्ली में अधिकारी हैं और इंदिरापुरम् , ग़ाज़ियाबाद में रहते हैं ।
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com
पता : A-5001 ,
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Vaibhav Khand ,
Indirapuram,
Ghaziabad-201014
UP.
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