मनिंद्र गुप्त
(1926–2018) आधुनिक बांग्ला साहित्य के एक महत्त्वपूर्ण कवि, निबंधकार, कथाकार और चित्रकार थे। उनका जन्म 24 अक्टूबर 1926 को अविभाजित बंगाल के बरिशाल ज़िले के गैला गाँव में हुआ था, जो अब बांग्लादेश में है। उनका निधन 31 जनवरी 2018 को कोलकाता में हुआ।मनीन्द्र गुप्त ने 1940 के दशक में कविता लिखना और चित्र बनाना शुरू किया। उनकी पहली कविता-पुस्तक नील पाथरेर आकाश (नील पत्थर का आकाश) 1969 में प्रकाशित हुई। उनकी कविता तत्कालीन बांग्ला कविता की प्रचलित धारा से अलग थी। उनकी रचनाओं में प्रकृति, स्मृति, मनुष्य और दूसरे जीवों के अस्तित्व के प्रति गहरी संवेदनशीलता दिखाई देती है। उनकी काव्य-दृष्टि में मनुष्य केवल अपने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और प्रकृति के व्यापक संसार से भी जुड़ता है। उनकी कविताओं में कल्पना, दृश्यात्मकता और जीवन के रहस्यमय अनुभवों का विशिष्ट मेल मिलता है। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि एक कुशल चित्रकार भी थे। उनकी कविता और चित्रकला के बीच एक गहरा संबंध था।
प्रमुख रचनाएँ
उनकी प्रमुख काव्य-पुस्तकों —
नील पाथरेर आकाश (1969)
मौपोका देर ग्राम (1974)
लाल स्कूलबाड़ी (1978)
छत्रपलाश चैत्ये दिनशेषे (1986)
शरतमेघ ओ काशफुलेर बंधु (1992)
टुंग टांग शब्द निःशब्द (2005)
बने आज कन्सेर्तो (2009)
उनकी आत्मकथात्मक कृति अक्षय मालबेरी तीन खंडों में प्रकाशित हुई। यह उनकी स्मृतियों, जीवनानुभवों और आत्मचिंतन का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। उनकी निबंध-पुस्तक चाँदेर ओपिठ भी उल्लेखनीय है।
मेरे पिता एक दिन सूर्यास्त के समय बैठे हुए थे, उनके पास करने के लिए कुछ नहीं था।
उस दृश्य ने, उस शाम ने, विरासत में मुझे सबसे गहरी निराशा दी।
अब उन बातों को रहने दो
एक लाख साल साथ रहने के बाद तय होगा, तुम मेरे हो या नहीं। वे बातें अब रहने दो।
अब चलो, मिकिर पहाड़ियों में जंगली बेर पक गए हैं,
चलो खाकर आते हैं।
लाल रूखे बाल
सूर्यास्त के बीच
ऑर्किड की चमकीली जड़ों की तरह उड़ रहे हैं।
-देखूं-देखूं, तुम्हारा ताम्बे जैसा चेहरा तो देखूं!
सूरज अभी डूब जाएगा। जानवर-से कमज़ोर शरीर के साथ हम घुटने तक पानी की धारा पार कर रहे हैं…
जलधारा और तेज़… ठिठुरती हुई…
प्रलय या समाधि
बेलपत्र और टपाटप गिरते बारिश के पानी के नीचे शालिग्राम (शिवलिंग) दबा हुआ है। उन गीले पत्तों के ढेर के नीचे दिन: आषाढ़ की शाम जैसा, रात: देह-मिट्टी-बन-चुके वन के गर्भ जैसी है। वहाँ, उस पूरी तरह से बेसहारापन की खामोशी में मैं शिवलिंग की तरह हूँ- सिर्फ इसी कल्पना से मुझे प्रलय का बोध होता है।
घुग्गू
सर्दी का दिन। अस्सी साल पुराना फेफड़ा जैसे उमा कर्मकार की पैबंद लगी धौंकनी हो—साँस लेता हूँ और घुर-घुर की आवाज़ होती है, मानो दो घुग्गू आकर उजड़े हुए घर (खंडहर) पर बैठ गए हों।
निकोटीन से घास और चोरकाँटे भूरे हैं—उनके ऊपर धूप और टूटे हुए चूल्हे की छाया।
मैं घुर-घुर की आवाज़ सुनता हूँ और बहुत गौर से देखता हूँ कि छाती के भीतर घुग्गू उतर आया है।
घुग्गू-घुग्गू—पेड़ साँस लेता है, छाया पक्षी के खुले पिंजरे का डिज़ाइन, ताड़ के पेड़ की छाप और टूटी खिड़की की तस्वीर बनाते-ब बनाते दाईं ओर खिसक जाती है।
बुढ़ापा बहुत मीठा होता है। उजड़े हुए घर में घुग्गू उतरते हैं, चहलकदमी करते हैं और बोलते हैं।
असीम बाबू की कहानी
श्राद्ध समाप्त होते-होते दोपहर ढलकर शाम हो गई—शाम के वक्त असीम बाबू का पिंड और भोजन नन्द लेक के पानी में विसर्जित करके नन्द लौट आया।
लेक के उस हिस्से में कोई ज़्यादा जाता नहीं है।
पानी में दलदली घास उग आई है, कच्ची नरकट घास उग आई है, पानी के नीचे शैवाल हैं।
विदेह असीम बाबू मानो जानते थे—वहीं पेड़ के नीचे उदास और भूखे बैठे थे—नन्द के जाते ही मैले पैंट के पाँचे ऊपर समेटकर पिंड लेने के लिए पानी में उतर पड़े।
दाह संस्कार के समय चश्मा साथ नहीं दिया था, अब उन्हें ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है।
उधर सूरज की आखिरी किरणें विलीन हो रही हैं—क्या पिंड पानी में मिल गया?
या मछलियाँ खा गईं?
असीम बाबू अंधे की तरह अपने दुबले हाथों से टटोल-टटोल कर खोजते हैं।
माघ की ठंड लेक के पानी में घुल गई है, अंधकार लेक के पानी में घुल गया है। बहुत कष्ट होता है।
क्या ठंड, भूख और अकेलापन यहाँ भी पीछा करते-करते आ गए?
ज़रा सा पका हुआ अन्न पाने के लिए
पूरी ज़िंदगी इतनी प्रतीक्षा, सहनशीलता—असीम बाबू स्रावली (बतख) जैसी तीली-तीली सी टाँगों से रात के भीतर भात के टुकड़े, सड़े हुए मछली के टुकड़े खोजने लगे।
ॐ भूः भुवः स्वः।
सर्दी अल्पकालिक होती है। दो महीने बाद वसंत आ गया।
प्रवासी स्रावलों के साथ ही असीम बाबू दो पंख फैलाकर आसमान में उड़ चले। ॐ पार्थिव आकाश। ॐ अपार्थिव आकाश।
ॐ आकाश
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शुभ चक्रवर्ती बांग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध कवि हैं। बांग्ला के साथ-साथ वे हिंदी और अंग्रेज़ी में भी लेखन करते हैं और विश्व साहित्य का अनुवाद करते हैं। वर्तमान में उनका साहित्यिक कार्य मुख्यतः रवीन्द्रनाथ ठाकुर और मिर्ज़ा ग़ालिब के साहित्य के अध्ययन, लेखन और अनुवाद पर केंद्रित है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर पर उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं— ‘तुमार सृष्टिर पथे’ और ‘छंदेर बंधने मुक्ति’। इसके अतिरिक्त ग़ालिब के पत्रों, कविताओं, शायरी तथा विभिन्न साहित्यिक विषयों पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। कविता, अनुवाद और भारतीय साहित्य की विविध परंपराओं पर उनका अध्ययन और लेखन निरंतर जारी है।

शुभ चक्रबर्ती
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