
मोतीलाल दास की इन कविताओं में भाषा की सहजता, शिल्प की सादगी और विचार की वैचारिक दृढ़ता मिलकर एक ऐसी काव्यभूमि का निर्माण करती हैं, जहाँ निजी संवेदना सामाजिक यथार्थ और राजनीतिक चेतना से अविच्छिन्न रूप से जुड़ती है। कवि की भाषा संवादधर्मी है, लेकिन उसकी सरलता के भीतर अर्थ की कई परतें खुलती हैं; हवाओं, नदियों, आँखों, घरों और चादर जैसे बिंबों के माध्यम से वह मनुष्य के अंतर्द्वंद्व, असुरक्षा और जीवन की अनिश्चितताओं को अभिव्यक्त करता है, तो ‘तुम्हें नहीं मालूम’ में ‘मानुख’ और उसकी ‘मानुखता’ की खोज मनुष्यता के दुर्लभ होते जाने की विडंबना को मार्मिक स्वर देती है। ‘चुनाव’ और ‘प्रतिरोध’ जैसी कविताएँ लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति, प्रश्नाकुलता और सत्ता के चरित्र पर विचार करते हुए प्रतिरोध और प्रतिशोध के बीच के बुनियादी अंतर को रेखांकित करती हैं। विशेष रूप से ‘आधी शताब्दी में’ विकास और उपलब्धियों के प्रचलित आख्यान के बरक्स विनाश, सांस्कृतिक विस्मृति, पर्यावरणीय क्षरण और भूख की भयावह सच्चाइयों को सामने लाती है। यहाँ शिल्प किसी कलात्मक चमत्कार या भाषिक जटिलता का सहारा नहीं लेता, बल्कि कथन की स्पष्टता, पुनरावृत्ति, प्रतीकात्मकता और प्रश्नाकुल स्वर के जरिए अपनी अर्थवत्ता अर्जित करता है।
समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में इन कविताओं का महत्त्व इस बात में है कि वे राष्ट्र, लोकतंत्र और विकास की अवधारणाओं को मनुष्यता की कसौटी पर परखती हैं तथा यह संकेत करती हैं कि जिस समाज में सवाल पूछना, असहमति व्यक्त करना और मनुष्य की गरिमा बचाए रखना कठिन होता जाए, वहाँ प्रतिरोध केवल राजनीतिक कर्म नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की अनिवार्य शर्त बन जाता है।
परिभाषा
मेरी बात सुनो
कि आरंभ की वह बिन्दु
हाथ से न छूटे
और बहुत देर तक
टंगा न रह जाए
इन हवाओं के बीच
छूटने का श्रोत
अंतस से फूटता हो जब
जैसे उग आये हों
ढेर सारे नागफनी
इन आंखों में
और बहती हो कहीं
एक नदी
चांद पर जाने को आतुर
संभलने की प्रक्रिया
चुभता क्यों रहता है
उन्हीं आंखों में
परिभाषा की चादर
शायद तुमने लंबी तानी है
जो उम्र की डोर पर
सही सही नहीं बंधती
ना ही बसाया जाता है
कोई घर
इन आंखों में
मेरी बात
तुम सुनो या नहीं
कोई बात नहीं
लेकिन तुम सुनो
हवाओं को
फूलों को
नदियों को
शब्दों को
घरों को
और उन आंखों को भी
तब बतलाना
सचमुच में परिभाषा
तुम्हें कहीं ले जाती है या नहीं।
तुम्हें नहीं मालूम
तुम्हें नहीं मालूम
मैंने आज क्या पाया
जिसे पाना दुर्लभ था
तुम्हें नहीं मालूम
मैंने आज क्या देखा
जिसे देखना दुर्लभ था
तुम्हें नहीं मालूम
मैंने आज क्या सुना
जिसे सुनना दुर्लभ था
तुम्हें नहीं मालूम
मैंने आज क्या छुआ
जिसे छूना दुर्लभ था
तुम्हें नहीं मालूम
मैंने आज क्या महसूसा
जिसे महसूसना दुर्लभ था
तुम्हें नहीं मालूम
मैंने आज क्या समझा
जिसे समझना दुर्लभ था
तुम्हें नहीं मालूम
मैंने आज क्या पाया
बता दूं तो हंसना मत
भले तुम मुझे पागल समझो
लेकिन आज मैंने पा लिया
एक भरा पूरा मानुख
और उसकी मानुखता।
चुनाव
आप
मेरे मुखर विरोधी हैं
जानता हूं मैं
मेरे हर उत्तर को आपने
सवालों के घेरे में
बंद कर दिया
आप
शायद यह नहीं जानते
उन्हीं सवालों के बीच
बची है मेरी राजनीति
और हमारी कूटनीति।
प्रतिरोध
कविता में
हो प्रतिरोध
प्रतिरोध की तरह
जनता में भी
हो प्रतिरोध
एक रोष की तरह
सत्ता में
न हो प्रतिशोध
किसी प्रतिशोध की तरह
जिस दिन
कोई प्रतिरोध
प्रतिशोध बन जाए
समझो उस दिन
मर जाएगा
हमारा प्रतिबिंब
किसी बदहावास नींद की तरह।
आधी शताब्दी में
आधी शताब्दी बीत चुकी है
नई कविताओं को रचे हुए
पाया कम है
नष्ट बहुत हो गया है
इस आधी शताब्दी में
बहुत कुछ नष्ट हो चुका है
वन्दे मातरम् के गीत
भूल चुके हैं
तिरंगा लहराने के लिए
हाथ नहीं उठ रहे हैं
भाषा की चादर फट चुकी है
इस आधी शताब्दी में
बहुत कुछ नष्ट हो चुका है
मानवता की धूलें
जंगल के जंगल
और आग
चूल्हे की जगह
पेट में समा गए हैं
इस आधी सदी में.
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मोतीलाल दास
जन्मतिथि – 08.12.1962
जन्म स्थान – मनोहरपुर, झारखंड
संप्रति – रेल सेवा से सेवानिवृत, स्वतंत्र लेखन
पद्य प्रकाशन – तीन काव्यसंग्रह (1) आखिर क्या करता (2) देह पर दिन की भाषा (3) समय के ढेर पर
गद्य प्रकाशन – कुछ कहानियाँ सरस्वती, इमरोज आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित। कई लघुकथाएं पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। एक कहानी पर “एक डर” नामक लघुफिल्म निर्मित।
अन्य प्रकाशन – हंस, वागर्थ, वीणा, सरस्वती समेत विभिन्न महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में लगभग 275 रचनाएं प्रकाशित।
अन्य गतिविधि – ईप्टा से जुड़ाव, पाँच नाटकों में अभिनय व लेखन।
सम्मान – सृजनलोक काव्य सम्मान, नीलम सम्मान तथा हिन्दी अकादमी/मुंबई की लघुकथाकार सम्मान।
संपर्कः
मोतीलाल दास
10ए, डोंगाकाटा, नंदपुर
मनोहरपुर – 833104 (झारखंड)
संपर्क 7978537176






