
‘रोशनी वाला आदमी’ विजयशंकर चतुर्वेदी की ऐसी कहानी है जो सत्ता, संस्थान और बौद्धिक विवेक के बीच बढ़ते तनाव को प्रोफ़ेसर नीलांश वर्मा के चरित्र के माध्यम से सामने लाती है। नीलांश समझौते के बजाय प्रश्न करने, तयशुदा निष्कर्षों के बजाय जिज्ञासा और आँकड़ों के साथ अनुभव को महत्व देते हैं।
कहानी का केंद्रीय सरोकार यह है कि जब बौद्धिक व्यक्ति व्यवस्था का सुविधाजनक हिस्सा बन जाता है, तब उसकी स्वतंत्र चेतना क्षीण होने लगती है। इस्तीफ़े के बाद भी नीलांश का प्रभाव रत्ना की सोच और अगली पीढ़ी के प्रश्नों में जीवित रहता है- इस तरह कहानी बताती है कि सच्चा शिक्षक उत्तरों से अधिक असहमति, प्रश्न और स्वतंत्र सोच की आदत छोड़ जाता है।
पढ़ते हैं विजयशंकर चतुर्वेदी की यह महत्वपूर्ण कहानी। आपकी राय का इंतजार तो रहेगा ही।
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रोशनी वाला आदमी
विजयशंकर चतुर्वेदी
अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर नीलांश वर्मा के बारे में पहली बात जो लोग नोटिस करते थे, वह उनकी आवाज़ नहीं, आदत थी।
वह बात करते समय सामने वाले को पूरा देखने की बजाय, उसके शब्दों को देखते थे। जैसे शब्द हवा में लिखे जा रहे हों और वह उन्हें पढ़ रहे हों।
उनकी किताबें अलमारी में क़ैद नहीं थीं, वे कमरे में अच्छी-ख़ासी जगह घेरे रहती थीं—कुर्सी पर, खिड़की की चौखट पर, कभी-कभी फ़र्श पर भी। लेकिन उन्हें हर किताब का पता रहता था कि कौन-सी कहाँ नहीं रखी है। प्रोफ़ेसर का आवास सबके लिए निस्संकोच खुला रहता था। अक्सर वह पुस्तकालय में छात्रों को नई किताबें सुझाते नज़र आते।
उनकी प्रिय शोधार्थी रत्ना ने एक दिन पूछा— “सर, आप नोट्स क्यों नहीं बनाते?”
वह हल्का मुस्कुराए— “नोट्स बनाने से आदमी भूल जाता है कि उसे याद रखना था।”
रत्ना को यह जवाब समझ नहीं आया, लेकिन उसने उसे अपनी नोटबुक में लिख लिया।
उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक नया लड़का आया। आँखों में थोड़ी ईमानदारी थी, जो अभी तक थकी नहीं थी— “सर, ये जो ‘समावेशी विकास’ है… सचमुच होता है क्या?”
प्रोफ़ेसर ने सीधे जवाब नहीं दिया। उन्होंने अलमारी खोली। तीन किताबें निकालीं। फिर चौथी उठाकर वापस रख दी, “पहले इन्हें पढ़ लो तब पूछना।”
लड़के ने किताबें लीं, फिर थोड़ा रुका— “सर… अगर मैं पढ़कर भी यही पूछूँ तो?”
प्रोफ़ेसर ने उसे उड़ती नज़र से देखा, “तो समझूँगा कि तुमने पढ़ी हैं।”
दिल्ली में उस दिन काफी उमस थी। लेकिन उस विशाल कमरे में हमेशा ठंडक बनी रहती थी; एयर कंडीशनर से नहीं, औपचारिकता से। लंबी, शीशम की चमकदार टेबल; हर सीट के आगे नाम-पट्ट, पानी की बोतल, और फ़ाइलों का एक सधा हुआ ढेर।
दीवार पर स्क्रीन थी, जहाँ ग्राफ़ इतने साफ़ थे कि उनमें कोई झिझक नहीं थी। यह नीति-निर्धारण आयोग की बैठक थी, जहाँ फ़ैसले पहले आकार लेते हैं, बाद में भाषा।
प्रोफ़ेसर टेबल के दूसरे सिरे बैठे थे, जैसे उन्हें बुलाया गया हो, लेकिन समुचित आसन न दिया गया हो। बाकी लोग अपने-अपने कागज़ों में व्यवस्थित थे। अकेले वही थे जो उस व्यवस्था के बीच असुविधाजनक लग रहे थे।
प्रेज़ेंटेशन खत्म होते ही आयोग के वरिष्ठ सचिव ने हल्का-सा सिर घुमाकर कहा— “तो… इस फ्रेमवर्क पर अगर कोई टिप्पणी हो।”
स्क्रीन पर अंतिम स्लाइड चमक रही थी—रोज़गार की लक्षित दर: 19%
प्रोफ़ेसर ने पानी का गिलास उठाया, होंठ तक ले गए, लेकिन पिया नहीं। थोड़ी देर बाद उन्होंने औपचारिक होकर पूछा, “इससे क्या बदलेगा?”
वित्त मंत्रालय के अधिकारी ने चश्मा ठीक किया, जैसे सवाल को उसे ही संबोधित करना हो—“रोज़गार।”
प्रोफ़ेसर ने गिलास टेबल पर रख दिया, “…या उसकी परिभाषा?”
कमरे में वही ख़ामोशी आ गई, जिसमें लोग तय करते हैं कि कैसे जवाब देना है। कनिष्ठ सचिव ने कुर्सी पर थोड़ा आगे झुकते हुए कहा— “प्रोफ़ेसर वर्मा, हम यहाँ मैक्रो लेवल पर बात कर रहे हैं।”
प्रोफ़ेसर ने सिर हिलाया, “मैक्रो में माइक्रो छिपा रहता है, बस दिखता नहीं।”
एक हल्की-सी मुस्कान टेबल के दूसरे सिरे पर उभरी—तंज़ की, सहमति की नहीं। दूसरे अधिकारी ने फ़ाइल पलटते हुए कहा— “आप हमेशा चीज़ों को जटिल बना देते हैं।”
प्रोफ़ेसर ने कुछ लिखते हुए जवाब दिया, “नहीं… मैं सिर्फ़ उन्हें सरल दिखने से रोकता हूँ।”
आयोग के उपाध्यक्ष ने सीधे उनकी तरफ देखा। आवाज़ में विनम्रता थी, लेकिन शब्दों में दबाव— “देखिए, हमें एक प्रेज़ेंटेबल डॉक्युमेंट भी बनाना है, जो ऊपर तक जाएगा। आप जानते हैं… प्रधानमंत्री ख़ुद इस पर नज़र रखे हुए हैं।” थोड़ा रुककर उन्होंने जोड़ा— “और… वे आपकी राय का सम्मान करते हैं।”
प्रोफ़ेसर ने सिर उठाया, “सम्मान और सहमति अलग चीज़ें हैं।”
किसी ने कलम जेब में रख ली। कोई पानी पीने लगा। एक अधिकारी ने रिमोट से स्क्रीन के ग्रैफ़िक बंद कर दिए।
उपाध्यक्ष ने हल्की साँस छोड़ी— “सर, हमें यहाँ बहस नहीं… आगे बढ़ना है।”
“तो बढ़ जाइए…।“ कहकर प्रोफ़ेसर कुर्सी से उठ खड़े हुए।
बाहर निकलते समय प्रोफ़ेसर वर्मा को कॉरिडोर लंबा लगा। कमरे की हवा वहाँ तक चली आई थी। लोग छोटे-छोटे समूहों में बँटकर बात कर रहे थे। बड़ी हल्की आवाज़ों में, जैसे अभी भी माइक्रोफोन ऑन हो।
प्रोफ़ेसर वर्मा अकेले चल रहे थे। उनके हाथ में मेहनत से तैयार की गई अपनी वह फ़ाइल थी, जिसे मीटिंग में खोलने का मौका ही नहीं था।
एक अधिकारी उनके साथ आ मिला— “सर… आप दिल पर ले लेते हैं चीज़ों को।”
प्रोफ़ेसर मुड़े— “लेता नहीं… छोड़ नहीं पाता।”
अधिकारी ने दोस्ताना हँसी के साथ बात कही— “थोड़ा एडजस्ट करना पड़ता है।”
प्रोफ़ेसर ने उसे ताड़ते हुए कहा, “एडजस्ट करते-करते एक दिन पता चलता है… आप उसी चीज़ का हिस्सा बन गए हैं जिसे बदलना था, और तब… ”
अधिकारी ने थूक गटक लिया। वे आगे बढ़ गए।
कार में बैठने के बाद उन्होंने अपनी फ़ाइल खोली। कुछ देर पन्ने पलटते रहे। फिर जैसे ख़ुद से ही— “ये लोग सुनते नहीं… बस दर्ज़ करते हैं, मानो यही पर्याप्त हो।”
खिड़की के बाहर अर्थव्यवस्था बिना किसी बहस के बदस्तूर चल रही थी। एक आदमी दोहरा होता हुआ ठेले पर सामान का पहाड़ खींचता चला जा रहा था। उन्होंने आँख़ें बंद कर लीं।
रात काफ़ी हो चुकी थी। घर में रोशनी सिर्फ उसी कमरे में थी जहाँ प्रोफ़ेसर बैठे थे। टेबल पर काग़ज़ फैले नहीं थे, सलीके से रखे थे। एक कोने में काँच का ख़ूबसूरत गिलास रखा था, आधा भरा हुआ। उसमें बर्फ़ की चिकनाहट तैर रही थी, या शायद रोशनी का भ्रम था।
उन्होंने कुर्सी पर पीठ टिकाई, फिर तुरंत सीधी कर ली। टिकना उन्हें सूट नहीं करता। सामने खुली डायरी का पन्ना खाली था। काफी देर तक वह सिर्फ तारीख़ देखते रहे। उन्होंने पेन उठाया। एक शब्द लिखा फिर उसे काट दिया। कुर्सी से उठे। कमरे में दो-तीन कदम चले। वापस आकर बैठे। डायरी में फिर लिखा— “समस्या…”, लेकिन “समस्या” के बाद कुछ नहीं लिखा गया।
उन्होंने पेन बंद कर दिया। खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए। बाहर सड़क पर एक बुलेट गुज़री। दिल दहला देने वाली आवाज़ आई, फिर गुज़र गई। शहर की बाकी आवाज़ें बहुत दूर थीं।
उन्होंने ख़ुद से कहा— “शायद… मैं गलत हूँ।”
कमरे में कोई नहीं था। फिर भी उन्होंने यह ऐसे कहा जैसे कोई सुन रहा हो। कुछ देर बाद बोले— “या सही हूँ।” और इस वाक्य पर ठहर गए।
वापस आकर कुर्सी पर बैठे और डायरी को थोड़ा अपनी तरफ खींचा। लिखा— “अगर वे सुनते नहीं…।” फिर उसके नीचे एक और पंक्ति शुरू की— “तो क्या अपनी भूमिका समाप्त कर देनी चाहिए?”
उन्होंने डायरी बंद नहीं की। पेन भी वहीं पड़ा रहने दिया।
सुबह दस बजे की क्लास थी। कमरा भरा नहीं था। कुछ छात्र आगे की बेंचों पर नोटबुक खोलकर बैठे थे, कुछ पीछे की तरफ ढीले होकर। पंखा अपनी रफ़्तार से घूम रहा था, जैसे उसे किसी बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता।
प्रोफ़ेसर समय से थोड़ा पहले आकर खड़े हो गए थे। उन्होंने बैग मेज़ पर रखा। चॉक उठाया और बोर्ड को देखने लगे। कुछ पल बाद क्लास की तरफ मुड़े, “हम… आज पिछले अध्याय से शुरू करेंगे।”
पहली बेंच पर बैठा एक छात्र तुरंत बोला— “सर, आपने कहा था कि ‘आँकड़े सच नहीं बताते’। फिर हम उन पर भरोसा कैसे करें?”
प्रोफ़ेसर ने जवाब देने से पहले एक पल लिया, “भरोसा नहीं, इस्तेमाल करें।”
उन्होंने बोर्ड पर धीमी गति से दो शब्द लिखे—डेटा और अनुभव। फिर व्याख्या करने लगे, “डेटा आपको एक तस्वीर देता है… अनुभव आपको बताता है कि तस्वीर के बाहर क्या है।”
पीछे के छात्र ने ऊँची आवाज़ में कहा— “सर, इंटरव्यू में तो डेटा ही पूछा जाता है।”
प्रोफ़ेसर ने मुड़कर देखा— “हाँ। क्योंकि इंटरव्यू में समय कम होता है, ज़िंदगी में थोड़ा ज़्यादा।”
क्लास चुप हो गई। एक लड़का अपनी सीट पर खड़ा हो गया— “सर, अगर हम दोनों को साथ रखें तो?”
उन्होंने चॉक टेबल पर रखते हुए कहा, “तो… तुम्हें तय करना पड़ेगा कि किसे कब आगे रखना है।” उन्होंने आगे कुछ लिखने की जल्दी नहीं दिखाई।
रत्ना अपनी नोटबुक में कुछ लिख रही थी, फिर रुक गई। उसने सिर उठाया— “सर… अगर हमें ही नहीं पता कि सही क्या है… तो हम कैसे तय करेंगे?”
“तय करने से पहले… सब मान लो कि तुम गलत भी हो सकते हो।” प्रोफेसर एक विराम लेकर बोले— “और फिर भी… जो तुम्हें सही लगता है, उसका अनुसंधान करो।”
पहली बेंच पर बैठा छात्र नोट्स लिखने लगा। पीछे वाला मोबाइल उठाकर कुछ टाइप करने लगा। रत्ना ने नोटबुक में कुछ काटकर दोबारा लिखा।
प्रोफ़ेसर ने बोर्ड की तरफ देखा। डेटा और अनुभव के बीच उन्होंने एक पतली-सी रेखा खींची और बोले— “आज के लिए…।”
किसी ने “थैंक यू, सर” कहा। बाकी लोग उठने लगे। कुर्सियों की हल्की आवाज़, बैग के ज़िप, फुसफुसाहटें। प्रोफ़ेसर वहीं खड़े रहे। फिर चॉक से उस रेखा को थोड़ा और गहरा कर दिया।
अड्डा छोटा था, जैसे किसी ने दोस्तों के अक्सर बैठ जाने के लिए ही बनाया हो। प्लास्टिक की कुर्सियाँ अलग-अलग दिशाओं में मुड़ी हुई थीं। कोई आधा कुर्सी पर, आधा आगे झुका हुआ, कोई पीठ टिकाकर छत देखता हुआ बैठा था। बीच की टेबल पर चाय के पुराने घेरे थे, जिन पर नए कप रख दिए गए थे। यहाँ नामी लोगों की बातचीत भी हर बार कहीं से शुरू होकर कहीं और पहुँच जाया करती थी।
कवि ने अपनी डायरी खोली और चाय का कप उठा लिया, “अब कुछ रचने का मन नहीं करता।“
फिल्ममेकर ने मोबाइल से नज़र उठाए बिना कहा— “या करने नहीं दिया जाता?”
कवि ने हँसने की कोशिश की— “तुम लोग हर बात में सीन ढूँढ लेते हो।”
वकील बीच में बोला— “कोर्ट में भी अब लोग फिल्मी सीन क्रिएट करते हैं।”
चित्रकार कुर्सी पर तिरछा बैठा था। उसने दीवार को घूरते हुए अपनी बात कही— “यार, मैंने एक पेंटिंग हटा दी पिछले हफ्ते।” उसने उँगलियों से हवा में जैसे फ्रेम का आकार बनाया— “तीन दिन तक दीवार खाली रही… फिर दूसरी लगा दी। पहली वाली ज़्यादा देर टिकती तो शायद…।” उसने कंधे हिलाए—“लोग समझ नहीं पाते… या ज़्यादा समझ लेते हैं… दोनों झंझट हैं।”
चित्रकार ने सर पकड़ लिया—“आजकल ख़ुद ही पेंटिंग बनाओ… ख़ुद ही लोगों को समझाओ…!”
प्रोफ़ेसर कोने में थे, कुर्सी पर टिके हुए। शोधार्थी रत्ना सबसे किनारे, कुर्सी के बिल्कुल आगे बैठी, दोनों हाथ कप के चारों तरफ जकड़े हुए काफी देर से कुछ कहना चाह रही थी। उसने एक बार संकोच से प्रोफ़ेसर की तरफ देखा फिर आहिस्ता से बोली— “सर… हम लोग कुछ ज़्यादा नहीं सोच रहे हैं क्या?”
वकील ने कप टेबल पर रखते हुए कहा— “सोचने से ज़्यादा… बोलने का डर है।”
फिल्ममेकर ने चिंता जताई— “डर नहीं… ऑडियंस बहक जाती है।”
चित्रकार ने चुहल की— “या बॉक्स ऑफिस बंद हो जाता है?”
रत्ना चुप ही रही। कुछ देर बाद उसने हिम्मत करके अस्पष्टता से कहा— “अगर हम कुछ न बोलें तो…”
प्रोफ़ेसर ने सीधे उसकी तरफ नहीं देखा। टेबल पर उँगली से चाय का एक पुराना घेरा छूते हुए बोले— “प्रश्न हमेशा स्पष्ट पूछना चाहिए।”
रत्ना ने नज़र झुका ली— “पता नहीं… सही क्या है।”
प्रोफ़ेसर ने उसकी आँखों में सीधे देखा— “सही पता होने के बाद बोलना आसान होता है।”
अड्डे में कोई हरकत नहीं हुई। फिल्ममेकर ने मोबाइल बंद कर दिया। चित्रकार ने पैर समेट लिए।
कुछ महीनों बाद प्रोफ़ेसर वर्मा का पढ़ाया एक लड़का लौटा। आवास के दरवाज़े पर खड़े-खड़े ही बोला— “सर, मैं इंटरव्यू में फेल हो गया।”
प्रोफ़ेसर ने सिर उठाया, जैसे पहचानने में एक पल लगा हो, “हूँ।”
“वे कह रहे थे कि मैं ‘बहुत ओल्ड स्कूल’ हूँ।”
“यह एक किस्म की तारीफ़ ही है।”
लड़का मुस्कुराया नहीं, “सर, आपने हमें तैयार नहीं किया इस दुनिया के लिए।”
प्रोफ़ेसर ने होठ सिकोड़े—“तुम्हें दुनिया के लिए नहीं… अपने लिए तैयार होना था।”
लड़का कुछ कहने ही वाला था, फिर रुक गया। उसे लगा कि यह जवाब बातचीत नहीं, दीवार है। वह चला गया।
समय उसी तरह बीतता रहा। लेकिन आयोग की उस मीटिंग के बाद कुछ बदल गया था। गलियारों में अब उनके बारे में बात होती थी, मगर आहिस्ता, आधे-अधूरे वाक्यों में।
“बहुत ‘प्योर’ बनते हैं…”
“सिस्टम समझते नहीं…”
“अड़ियल टट्टू हैं।” फिर हँसी।
कॉलेज के स्टाफ़-रूम में उस दिन थोड़ी भीड़ थी। चाय के कपों के साथ बहस भी खुली हुई थी। काम और बातचीत एक-दूसरे में घुल गए थे। एक नए प्रोफ़ेसर ने मोटी-सी किताब टेबल पर रखी। हल्का-सा धप्प हुआ।
राजनीति शास्त्र का प्रोफ़ेसर बोला— “देखिए, इंटेलेक्चुअल होना और काम का आदमी होना, दो अलग चीज़ें हैं।”
इतिहास के प्रोफ़ेसर ने मुस्कुराकर सहमति जताई— “और आजकल… उपयोगी होना ज़्यादा ज़रूरी है।”
समाजशास्त्र के अध्यापक ने चाय सुड़कते हुए जोड़ा—“आपको रिज़ल्ट देना होता है… बाकी बातें भाड़ में।”
नए प्रोफ़ेसर ने वही किताब उठा ली— “देखिए, पुरानी किस्म की नैतिक बौद्धिकता अब काम नहीं करती। हर आदमी अपना सोचे, वही बेहतर…।”
दूसरा बोला— “हाँ, यह ‘समग्रता’ वगैरह… थ्योरी में ही अच्छा लगता है।”
नेता टाइप प्रोफ़ेसर ने बात को और स्पष्ट किया— “देखिए, अब बौद्धिकों की भूमिका बदल चुकी है। आप ‘क्रिटिकल थिंकर’ कम, ‘प्रोसेस हैंडलर’ ज़्यादा हैं। आपको सिस्टम के भीतर रहकर काम करना है, उसे चुनौती देकर नहीं।”
नया प्रोफ़ेसर तुरंत सहमत हुआ— “बिल्कुल। और जो लोग अब भी पुराने तरीके से सोचते हैं… वे अपना ही नुकसान करते हैं।”
प्रोफ़ेसर वर्मा ने अपने कोने में खड़े-खड़े पूरी बातचीत सुनी। नया प्रोफ़ेसर उनकी तरफ मुड़ा— “सर, आप कुछ बोल नहीं रहे?”
प्रोफ़ेसर ने हाथ को थोड़ा घुमाया, जैसे शब्द वहीं कहीं हों। फिर बोले—“आप लोग जो कह रहे हैं, ग़लत नहीं है… ।” कमरे में असहमति टल जाने की हल्की-सी राहत आई। लेकिन उन्होंने जोड़ दिया— “बस… अधूरा है।”
नए प्रोफ़ेसर ने मुस्कुराकर बात हल्की करनी चाही— “सर, पूरा भी कर दीजिए फिर।”
प्रोफ़ेसर वर्मा ने उसे देखा और कहने लगे— “पूरा कोई नहीं करता। हम लोगों को अधूरेपन में ही असलियत ढूँढ़नी होगी।“
स्टाफ़ रूम में असहजता छा गई। किसी ने विषय बदल दिया। कोई किताब में घुस गया। किसी ने झटके से चाय ख़त्म कर दी। प्रोफ़ेसर वर्मा कोने में खड़े रहे। जैसे हमेशा से वहीं खड़े थे।
शाम के उनके अनौपचारिक जमावड़े भी बदल गए थे। फिल्ममेकर अब “फ़ाइल्स” की भाषा में बात करता था। उसके शब्द वही थे, लेकिन किनारे घिसे हुए। वकील सिर्फ भ्रष्टाचारियों के केस हाथ में लेता था। कवि का कोई अता-पता नहीं था।
एक शाम वकील ने पूछा— “प्रोफ़ेसर, तुम अभी भी वैसे ही हो?”
उन्होंने थोड़ा सोचा— “नहीं तो। मैं अब… पहले से धीमे बोलता हूँ।”
चित्रकार ने बात शुरू करने से पहले हमेशा की तरह कहा—“व्यावहारिक रूप से…”
अड्डे पर हँसी फैल गई।
दोपहर का समय था जब वह लिफ़ाफ़ा आया। सरकारी मोहर, साफ़ टाइप किया हुआ पता। जैसे कोई निर्णय पहले से तय हो। प्रोफ़ेसर ने उसे तुरंत नहीं खोला। पहले कुर्सी पर बैठे, फिर चश्मा ठीक किया और तब काग़ज़ निकाल कर पूरा पढ़ा।
कुछ देर तक काग़ज़ हाथ में ही रखा। फिर उसे दूसरी फ़ाइलों के बीच टेबल पर रख दिया। कुछ देर बाद उन्होंने ख़ुद से कहा— “… अपेक्षित था।”
आवाज़ में न दुख था, न राहत, “नहीं… मैं कोई स्पष्टीकरण नहीं भेजूँगा।” फिर बुदबुदाए, “सम्मान था… अब नहीं है।”
उन्होंने एक किताब उठाई, खोली, फिर बिना पढ़े बंद कर दी। खिड़की के बाहर लोग थे, शोर था। लेकिन कमरे में तनाव भरी शांति थी। उन्होंने कुछ तय किया— “अब और नहीं।”
उन्होंने कुर्सी पर पीठ टिका दी। आँखें खुली रखीं। कोई योजना नहीं बनाई। किसी से शिकायत नहीं की। सिर्फ़ एक जगह खाली हो रही थी, जिसे भरे रखने में अब उनकी कोई दिलचस्पी नहीं बची थी।
इस्तीफ़े के कुछ दिनों बाद अड्डा फिर जमा। रत्ना पहले से कम झिझक के साथ, लेकिन अब भी पूरी तरह सहज नहीं। कुछ देर सामान्य बातें होती रहीं, जैसे कि हर बार होती थीं। फिर रत्ना ने सीधे पूछ लिया—“सर… हमारे समय में एक बौद्धिक की भूमिका क्या है?”
अड्डे में हल्की-सी हरकत हुई। फिल्ममेकर हँसकर बीच में बोला— “पहले मालूम कर लो कि ‘बौद्धिक’ बचा भी है या नहीं।”
वकील— “अब तो ‘प्रोफ़ेशनल’ शब्द चलता है।”
कवि इस बार मौजूद था। बोला— “सेवा प्रदाता।”
चित्रकार— “या… कंटेंट मैनेजर।”
हल्की हँसी उठी और वहीं बैठ गई। रत्ना ने फिर से प्रोफ़ेसर की तरफ देखा—“सर… आप?”
प्रोफ़ेसर ने सबके चेहरे भाँपने के बाद कहा— “बौद्धिक व्यक्ति की सबसे बड़ी विफलता यह नहीं कि वह सत्ता के साथ है, बल्कि यह कि वह अपने भीतर से अनुपस्थित हो गया है।“ फिर रुक कर बोले— “भूमिका नहीं बदली… बस निभाने वाले कम हैं।”
फिल्ममेकर— “और निभाने की कीमत?”
प्रोफ़ेसर—“जो भी लगे।”
रत्ना— “सर… क्या इतना काफी है?”
प्रोफ़ेसर ने टेबल पर रखा कप उठाया, देखा, वापस रख दिया। बोले— “शुरू करने के लिए इतना काफी होता है।”
उस दिन के बाद अड्डा वैसा नहीं रहा।
कुछ सालों बाद उसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर रत्ना स्टाफ़ रूम में बैठी अपनी एक नोटबुक देख रही थी। स्टाफ़ रूम बदल गया था। कुर्सियाँ नई थीं, दीवार पर लगा बोर्ड अब डिजिटल स्क्रीन में बदल चुका था। कोने की वह पुरानी अलमारी, जिसमें कभी फ़ाइलें तिरछी पड़ी रहती थीं, अब बंद रहती थी।
उसकी निगाह इन पंक्तियों पर ठहर गई—“सर ने हमें केवल जवाब नहीं दिए थे…जवाब से असहमत होने की आदत दी थी। उन्होंने समझाया था कि तुम किसी बड़ी मशीन में लगा हुआ आज्ञाकारी और समर्पित पुर्ज़ा नहीं हो।”
नोटबुक आगे कहती थी—“मुझे कई बार लगता है कि जिस समय में मैं साँस ले रही हूँ, उसमें सर जैसे लोग होना लगभग असंभव है। यह समय उनकी तरह के लोगों के लिए बना ही नहीं लगता, या शायद हमने ही अपने समय को इस तरह बना लिया है कि उनके लिए जगह…।”
फिर उसने कुछ जल्दी से पन्ने पलट दिए—“…यह अजीब है कि उनकी उपस्थिति—जितनी भी, जितनी देर के लिए, मेरे भीतर किसी ठोस चीज़ की तरह बनी रहती है। जैसे कोई विचार नहीं, कोई तर्क नहीं, बल्कि एक तरह का सहारा, जो बिना दिखे भी साथ रहता है।”
वह उसी पन्ने में देर तक डूबी रही। वहाँ इबारत नहीं, पुराना समय खुल रहा था—“मैं जब भी उलझती हूँ, किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाती, तो याद आता है कि उन्होंने कभी निष्कर्ष देने की जल्दी नहीं दिखाई। और तब लगता है कि शायद उलझन ही वह जगह है जहाँ से सोचना शुरू होता है।”
रत्ना ने पेन उठाया और “उलझन” शब्द के नीचे एक हल्की-सी रेखा खींच दी, जो सीधी नहीं बनी। दो-तीन पेज छोड़ कर लिखा था—“कभी-कभी डर भी लगता है कि उनके बाद क्या बचेगा। मैंने एक बार सचमुच खोजने की कोशिश की थी—उनका परिवार, उनकी किताबें, उनके नोट्स, जो अधूरे छोड़ गए होंगे… लेकिन कुछ भी ठीक से नहीं मिला। जैसे वह सब धीरे-धीरे गायब हो गया हो। यह बात मुझे विचलित करती है कि इतना सादा बौद्धिक जीवन… और अंत में उसका कोई प्रत्यक्ष निशान भी न बचे।”
तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई। एक छात्र खड़ा था। हाथ में लैपटॉप, आवाज़ में झिझक—“मैम… एक बात पूछनी थी।”
रत्ना ने गंभीर होकर सिर उठाया।
“मैम, ये जो हम क्लास में पढ़ने आते हैं… उसके सीधे नोट्स क्यों नहीं दे दिए जाते?”
रत्ना ने नोटबुक बंद कर दी और छात्र के सवाल को परखते हुए पूछा, “पहले ये बताओ कि पूछ क्या रहे हो?”
छात्र थोड़ा चौंका। कुछ कहने की कोशिश की, फिर चुप हो गया।
रत्ना ने मुस्कुराना चाहा, मगर ख़ुद को रोक लिया। उसे अचानक कुछ याद आ गया। किसी ने कभी कहा था, “नोट्स बनाने से आदमी भूल जाता है कि उसे याद रखना था।”
कैम्पस से आती हुई आवाज़ों के बीच स्टाफ़ रूम शांत था। कुछ देर बाद उसे लगा कि उसकी टेबल पर किसी ने एक नई किताब धीरे से रख दी हो।
उसने गौर से देखा। टेबल खाली थी।
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लेखक परिचय
विजयशंकर चतुर्वेदी हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार, कवि-लेखक हैं, जिनकी कलम साहित्य, राजनीति और समाज के दार्शनिक व जटिल अंतर्संबंधों की गहन पड़ताल करती है। वे मानते हैं कि सत्ता से प्रश्नाकुल संवाद और नागरिक विवेक को सक्रिय बनाए रखना, साहित्य का मूल दायित्व है।
मध्यप्रदेश के सतना जिले की नागौद तहसील के ग्राम आमा में 15 जून 1970 को जन्मे विजयशंकर चतुर्वेदी ने अभिव्यक्ति के विविध आयामों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। पिछले तीन दशकों से अधिक समय से सक्रिय रहते हुए उन्होंने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के साथ-साथ साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
वे जनसत्ता के संपादकीय परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे। इसके अतिरिक्त उन्होंने नया सिनेमा, दोपहर, प्लस चैनल, सोनी टीवी, रिलायंस कम्युनिकेशंस और टारगेट पब्लिकेशंस जैसे संस्थानों में भी अपनी लेखकीय और पत्रकारीय सेवाएँ दी हैं।
उनकी प्रमुख कृतियों में उपन्यास ‘विदूषक’ (जनसत्ता की सबरंग पत्रिका में धारावाहिक, 1995–96), कविता-संग्रह ‘पृथ्वी के लिए तो रुको’ (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2009) शामिल हैं। पुस्तक-संपादन के क्षेत्र में उन्होंने ‘समय के सुलगते सरोकार’ (डा. सेवाराम त्रिपाठी, 2019) और ‘देशनामा–गांवनामा’ (देवीशरण सिंह ग्रामीण, 2023) जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। वर्तमान में वे स्वतंत्र लेखन, पुस्तक-संपादन, अनुवाद और वैचारिक हस्तक्षेप के माध्यम से सार्वजनिक विमर्श में सक्रिय हैं।
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