आजकल हमारे चारो तरफ संस्कृति के नाम पर सांप्रदायिक तांडव बहुत ही चिंताजनक है। संस्कृति कर्मियों की जमात के हाथ में कुछ होता नहीं है। लेकिन क्या संस्कृति कर्मियों की कोई जमात होती है! हो सकती है! या होनी चाहिए। क्या साहित्य को भी भी संस्कृति और साहित्यकार को संस्कृति कर्मी माना जाता है! संस्कृति कर्मियों की समझ में अतीत की महानताओं का मोह संकीर्ण सोच और भविष्य विमुख बनाकर आत्म-मुग्धता के दल-दल में डाल देता है।
आत्माधिकार के बोध से लबालब और आत्म-मुग्धताओं से भरे समय में विभिन्न स्तर के लोगों की व्यक्तिगत जीवन-स्थिति और सामाजिक मानसिकता को समझना जरूरी है। आत्म-मुग्धताओं से ग्रस्त लेखक किसी के काम का नहीं रह जाता है। आत्म-मुग्धताओं से ग्रस्त पाठक के लिए कोई साहित्य पठनीय नहीं रह जाता है। तो फिर! न लिखनेवाला रहा, पढ़नेवाला! क्या कभी ऐसा भी हो सकता है कि साहित्य का कोई वजूद न बचे! क्या संस्कृति समुदाय की होती है जबकि सभ्यता मानव की होती है। जवाब है — हां। संस्कृति! संस्कृति के नाम पर सांप्रदायिक तांडव! सांप्रदायिक तांडव किस का होता है? समुदाय का? सभ्यता का?
संस्कृति के नाम पर सांप्रदायिक तांडव होता रहता है। संस्कृति कर्मियों के हाथ में कुछ होता नहीं है।
संस्कृति समुदाय की होती है। जबकि सभ्यता मानव की होती है। भिन्न-भिन्न समुदायों की संस्कृतियां भी अलग-अलग होती है। सभ्यता तो पूरी मानव जाति की एक ही होती है। संस्कृति का बड़ा आधार प्राकृतिक परिस्थितियों में बनता है। प्राकृतिक परिस्थितियों की भिन्नताओं के आधार पर संस्कृति के विभिन्न संस्करण तैयार होते हैं। सभ्यता का तात्पर्य मनुष्य की अपनी सृजन-शक्ति से खड़ी की गई सृष्टि से होता है। पिछली पीढ़ियों की सृजन की शक्तियों से खड़ी की गई सभ्यता की संरचना अगली पीढ़ी और पीढ़ियों के लिए मिली हुई परिस्थितियों जैसी होती है। प्रकृति और संस्कृति का फर्क महीन और मानीखेज होता है। मुश्किल भी।
प्रकृति मुख्य रूप से मिली हुई स्थिति की गतिशीलता से संचालित होती है। सृष्टि मुख्य रूप से मनुष्य की अपनी संरचना में सन्निहित सृजन की शक्तियों से संचालित रहती है। संस्कृति के शीर्ष पर देवी-देवता-राक्षसी शक्तियां और उनकी महागाथाएं होती हैं। इन महागाथाओं में अंत में दैवीय शक्तियों की जीत होती हुई दिखाई जाती है। अंत में जो होता है असल में वह नहीं होता है, असल जनजीवन के लिए महागाथाओं के अंत में जो होता हुआ दिखाया जाता है, उसका विपरीत ही होता है। विडंबना है कि महागाथाओं में दैवीय शक्तियों की जीत होती है और जीवन में राक्षसी शक्तियां कोहराम मचाये रहती हैं। महागाथाओं के मिथ और जीवन के वास्तव को विरोधाभासों के रूप में रखा जाता है। जबकि उन में विरोधाभास यानी विरोध का आभास नहीं, बल्कि विरोध का वास्तव होता है। आभास को दिखाकर वास्तव को छिपा लिया जाता है या आभास के आवरण में वास्तव छिप जाता है!
संस्कृति प्रकृति की तरफ उन्मुख रहती है, सभ्यता सृष्टि की तरफ! अंतर बारीक है, प्रभाव बड़ा — बारीक और बड़ा का द्वंद्व! हिंदी में प्रकृति और संस्कृति का लगभग एक ही अर्थ में, पर्याय की तरह इस्तेमाल होता है।
एक के रूप में अनेक के होने और अनेक के रूप में एक के होने का स्पष्ट बोध भारत का सांस्कृतिक हुनर है। यह हुनर सभ्यता की संरचना में अपने लिए पर्याप्त जगह घेरता है। यह एक ऐसी जबरदस्त विडंबना है जिधर हमारा ध्यान नहीं जाता है या बहुत कम जाता है। विडंबना यह कि भारत का सांस्कृतिक हुनर सभ्यता की स्वाभाविकता को बुरी तरह से गछार लेता है। सांस्कृतिक हुनर के उल्लास और सभ्यता के मुर्झास के व्युत्क्रमानुपाती- Inversely Proportional संबंधों पर गंभीरता से सोचना तो होगा ही — न आज, तो कल जरूर!
दूधनाथ सिंह का उपन्यास आखिरी कलाम जिस में माना गया कि लोगों का बिखर जाना उतना बुरा नहीं है, जितना गलत कामों के लिए खतरनाक ढंग से संगठित हो जाना। कैसे! इस के लिए तो दूधनाथ सिंह के आखिरी कलाम की खोजबीन की जा सकती है। यह वाक्य उपन्यास के केंद्रीय विचार को पकड़ता है। संगठन से ताकत मिलती है। ताकत में विवेक न हो तो संगठन की शक्ति अन्यायी के साथ खड़ी हो जाती है। संगठित होकर अन्यायी हो जाना सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना में जहर घोलने जैसा ही होता है। सामान्य बिखराव में पड़े रहना, असंगठित रहकर कमजोर बने रहना संगठित होकर अन्यायी होने से बेहतर है। यह निराशाजनक मनःस्थिति की अभिव्यक्ति है। असल में समाधान संगठन से दुराव में नहीं, दृढ़तापूर्वक विवेक के अपनाव में है, बचाव में है।
साहित्य तो भीड़ में अकेला और अकेले में भीड़ को महसूस कर लेता है। लेकिन 2026 का यथार्थ क्या 1936 जैसा ही है — जीवनयापन का यथार्थ, समाज का यथार्थ, राजनीति का यथार्थ साहित्य का यथार्थ! शायद नहीं, बल्कि साफ-साफ कहा और समझा जाए तो तब जीवनबोध और मूल्य अधिक सघन था। 2026 तो सामने है, 2026 को तो देख रहे है, भोग रहे हैं! 1936 में झांक लेना होगा।
साल, 1936 तीन कार्यक्रम लगभग एक ही समय लखनऊ में हुए थे। प्रगतिशील लेखक संघ (All India Progressive Writers’ Association) का पहला अखिल भारतीय अधिवेशन 9-10 अप्रैल 1936 को लखनऊ के रिफाह-ए-आम क्लब में हुआ। अध्यक्षता प्रेमचंद ने की।
अप्रैल 1936 में लखनऊ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन भी लखनऊ में हुआ — अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे। जवाहरलाल नेहरू के कांग्रेस अध्यक्ष बनने और अधिवेशन में उनके भाषणों में समाजवाद के संकेतों की बड़ी भारी प्रतिक्रिया हुई। जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ 8 मई 1936 को बंबई के 21 प्रमुख व्यापारियों और उद्योगपतियों ने एक संयुक्त बयान जारी किया। इस बयान को अखबारों में “बॉम्बे मैनिफेस्टो अगेंस्ट जवाहरलाल नेहरू” कहा गया।
उसी माहौल में अखिल भारतीय किसान सभा की भी स्थापना लखनऊ में हुई। स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे किसान नेता कांग्रेस अधिवेशन में मौजूद थे। प्रगतिशील लेखक संघ का घोषणापत्र किसानों, मजदूरों और उत्पीड़ित वर्गों के साहित्य की बात करता था, इसलिए दोनों आंदोलनों का एक साथ होना स्वाभाविक था। प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण — साहित्य का उद्देश्य — में साहित्य को जीवन की आलोचना और समाज परिवर्तन का साधन बताया। यह भाषण बाद में प्रगतिशील आंदोलन का आधार बना।
साल 1936 का साल इसलिए भी ध्यान में रखने योग्य है कि वैश्विक स्तर पर फासीवाद के विस्तार से लोकतंत्र संकट में फंसा हुआ था! और भारत में? ये तीनों कार्यक्रम कांग्रेस अधिवेशन के आसपास और उसी शहर में आयोजित किए गए थे, ताकि प्रगतिशील लेखक, वामपंथी मिजाज के कार्यकर्ताओं और और किसान नेता एक-दूसरे से सहजता से मिलते-जुलते रह सकें। स्वतंत्रता आंदोलन से सभी लोग जुड़ सकें।
पूरा संदर्भ1936 में कांग्रेस लखनऊ अधिवेशन के दौरान कई प्रगतिशील संगठन सक्रिय हुए। प्रेमचंद को अध्यक्ष बनाया गया क्योंकि वे हिंदी-उर्दू दोनों में सम्मानित थे और किसान-मजदूर जीवन पर लिखते थे। किसान सभा की स्थापना भी उसी माहौल में हुई। स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे किसान नेता कांग्रेस अधिवेशन में मौजूद थे। प्रगतिशील लेखक संघ का घोषणापत्र किसानों, मजदूरों और उत्पीड़ित वर्गों के साहित्य की बात करता था, इसलिए दोनों आंदोलनों का एक साथ होना स्वाभाविक था। प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण — साहित्य का उद्देश्य — में उन्होंने साहित्य को जीवन की आलोचना और समाज परिवर्तन का साधन बताया। यह भाषण बाद में प्रगतिशील आंदोलन का आधार बना। संक्षेप में, अप्रैल 1936 का लखनऊ उन दिनों का केंद्र बना हुआ था जहां कांग्रेस, प्रगतिशील लेखक और किसान आंदोलन एक साथ सक्रिय थे। यही कारण है कि तीनों कार्यक्रम एक ही शहर और लगभग एक ही समय में हुए।
ध्यान देने योग्य यह भी है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में पहली बार और अब तक के इतिहास में आखिरी बार किसी नेता के खिलाफ कोई मेनिफेस्टो जारी हुआ था, जी मेनिफेस्टो। 8 मई 1936 को बंबई के 21 प्रमुख व्यापारियों और उद्योगपतियों ने एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसे अखबारों में “बॉम्बे मैनिफेस्टो अगेंस्ट जवाहरलाल नेहरू” कहा गया था।
यहां मूल बात है — साहित्य को जीवन की आलोचना और समाज परिवर्तन का साधन बताया गया। आज हिंदी साहित्य ‘जीवन’ और ‘जीवन की आलोचना’ के आशय को कैसे समझता है? समाज में कैसा परिवर्तन हिंदी साहित्यकार चाहता है?
इधर 1936 प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास गोदान के प्रकाशन का भी साल है। जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य कामायनी के प्रकाशन का भी साल है। छायावाद के समापन का साल भी 1936 है। प्रेमचंद के गोदान, जयशंकर प्रसाद की कामायनी और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की लंबी कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ के भी लिखे जाने का समय है।
‘राम की शक्ति-पूजा’ में हमारा संचित सांस्कृतिक अनुभव पैवस्त है! ‘रावण’ ‘शक्ति’ की ‘आराधना’ कर शक्ति को ‘अपने पक्ष’ में कर लिया करता है। यह आज की भी स्थिति है! लेकिन शक्ति और अन्याय ——
बोले रघुमणि —“मित्रवर, विजय होगी न समर,
यह नहीं रहा नर-वानर का राक्षस से रण,
उतरीं पा महाशक्ति रावण से आमन्त्रण,
अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।”
कहते छल-छल हो गये नयन,
राम की आंख भर आती हैं। वे समझते हैं कि जब तक शक्ति अन्याय के पक्ष में रहेगी, विजय संभव नहीं। इसके बाद राम स्वयं शक्ति की कठोर उपासना करते हैं, देवी को प्रसन्न करते हैं और अंत में शक्ति न्याय के पक्ष में आ जाती है।
निराला के युग में राम की शक्ति-पूजा की यह चिंता थी — जब संगठित शक्ति अक्सर अन्याय के साथ खड़ी दिखती थी। हमारे युग में राम की शक्ति-पूजा से निकली कौन-सी चिंता आज की हिंदी कविता में किसी तरह से पैवस्त है?
आधुनिक हिंदी साहित्य के इन तीन संदर्भों — गोदान, कामायनी और राम की शक्ति पूजा — में समकालीन, विगत और आगत सभ्यता की तलाश थी। आज हिंदी साहित्य में सभ्यता की कैसी तलाश है! कैसा हाहाकार है?
आजकल राजनीति में सच्चे भारतीय की तलाश जारी है, कविता में और साहित्य में भी सच्चे भारतीय की तलाश नहीं है? सवाल जरूरी है — क्या राजनीति के सच्चा भारतीय और हिंदी साहित्य का सच्चा भारतीय एक ही है। समाज में सभ्य और बेहतर मानवीय जीवन के लिए जद्दोजहद की क्या स्थिति है और साहित्य में वह किस तरह से प्रेक्ष्य है और कितना परोक्ष है! सच की हैसियत झूठ के दुमछल्ला से अधिक कुछ रह गई है क्या? हिंदी साहित्य में क्या प्रेक्ष्य है, क्या परोक्ष है और क्या दुष्प्रेक्ष्य है?
हिंदी साहित्य में किस की तलाश है! किसका हाहाकार है! या फिर मौसम खुशगवार है। यह सवाल हिंदी साहित्य और साहित्यकार के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘हिंदी-प्रदेश’ का राजनीतिक मिजाज और उस का इस्तेमाल जिस तरह से हो रहा है — खतरनाक है।
बहुत हद तक हिंदी साहित्य का यह नुकीला सवाल आंख में आंसू की तरह अटका हुआ है — रामचरितमानस का संदर्भ हो कि लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना॥ या फिर राम की शक्ति पूजा का ढलका हुआ दृगजल हो! होरी की अंतिम सांस का आंख में पानी बनकर अटक जाना क्या याद है हिंदी साहित्य को! हिंदी-समाज की आंख में अटका आंसू किस का है? कामायनी में वर्णित देव-संस्कृति के पतन के विदा संगीत में कामायनी के संदेश के आंसू-पक्ष का क्या हुआ? हिंदी साहित्य क्या मान चुका है कि — आंसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा – तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा।
(लोचन कोना के माध्यम से जगह देने के लिए अनहद कोलकाता का आभार। अगली टिप्पणियां शायद आकार में छोटी हों। मुद्दे कुछ मेरी, कुछ आप की।)
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प्रफुल्ल कोलख्यान वरिष्ठ चिन्तक, आलोचक तथा कवि हैं।







