प्रतिरोध, स्त्री-अस्मिता और सामाजिक विवेक का कविता-संसार
हरे प्रकाश उपाध्याय
समकालीन हिंदी कविता में स्त्री के अनुभवों, उसकी सामाजिक स्थिति और उसके आत्मसम्मान को केंद्र में रखकर लिखी गई कविताओं की एक महत्त्वपूर्ण परंपरा रही है। किंतु स्त्री-विमर्श की सार्थकता केवल स्त्री के दुःख, उत्पीड़न या असमानता के चित्रण में नहीं है; उसकी वास्तविक शक्ति तब सामने आती है, जब कविता स्त्री को पीड़िता के सीमित खाँचे से बाहर निकालकर एक स्वतंत्र चेतना, प्रतिरोधी व्यक्तित्व और सामाजिक परिवर्तन की सक्रिय शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। नीलम का कविता-संग्रह ‘सबसे बुरी लड़की’ इसी अर्थ में पढ़े जाने योग्य संग्रह है। यह संग्रह स्त्री के अनुभव को निजी जीवन की चारदीवारी में बंद नहीं रखता, बल्कि उसे समाज, राजनीति, सत्ता, धर्म, जाति, अर्थव्यवस्था और बदलते समय के व्यापक प्रश्नों से जोड़ देता है।
संग्रह का शीर्षक अपने आप में एक वैचारिक वक्तव्य है। एक व्यापक अभिव्यंजना से समृद्ध। ‘सबसे बुरी लड़की’ कहना दरअसल उस सामाजिक मानसिकता पर व्यंग्य है जो अपने निर्धारित साँचे से बाहर निकलने वाली लड़की को ‘बुरी’ घोषित कर देती है। जो लड़की प्रश्न करती है, हँसती है, अपनी इच्छा व्यक्त करती है, बराबरी की माँग करती है, अपने निर्णय स्वयं लेना चाहती है और पुरुष-सत्ता द्वारा तय सीमाओं को स्वीकार नहीं करती—वही हमारे समाज की नजर में ‘बुरी लड़की’ बन जाती है। नीलम इसी ‘बुराई’ को प्रतिरोध की नैतिक शक्ति में बदलती हैं। संग्रह में स्त्री का स्वर कहीं करुण है, कहीं आक्रोशपूर्ण, कहीं व्यंग्यात्मक और कहीं भविष्य के प्रति आशावान; लेकिन उसकी मूल प्रवृत्ति आत्मसमर्पण की नहीं, अपने अस्तित्व की पुनर्परिभाषा की है।
‘सबसे बुरी लड़की’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें स्त्री को किसी एक भूमिका में सीमित नहीं किया गया है। वह बेटी है, पत्नी है, माँ है, प्रेमिका है, नागरिक है, कामकाजी स्त्री है और सबसे बढ़कर एक स्वतंत्र मनुष्य है। कविता ‘मेहंदी’ में विवाह और स्त्री-सौंदर्य से जुड़ी पारंपरिक प्रतीक-व्यवस्था को नए अर्थ मिलते हैं। मेहंदी का रंग, जो सामान्यतः स्त्री के सौभाग्य और दांपत्य से जोड़ा जाता है, कविता में आत्मविलोपन और पुनः अपने रंग को बचाए रखने के द्वंद्व से जुड़ जाता है। कवयित्री के यहाँ प्रेम अथवा दांपत्य स्त्री की स्वतंत्रता का विकल्प नहीं हो सकता।
संग्रह की आरंभिक कविताओं में ‘बेबसी’ की आवृत्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ‘बेबस योनि-एक’, ‘बेबस योनि-दो’ और ‘बेबस योनि-तीन’ जैसे शीर्षक स्त्री-शरीर को लेकर समाज की दृष्टि और उस पर लगाए गए नियंत्रण को कठोर ढंग से सामने लाते हैं। इन कविताओं में देवी-प्रतिमाओं, पौराणिक स्त्री-आदर्शों और वास्तविक जीवन की स्त्री के बीच जो विरोधाभास निर्मित होता है, वह संग्रह के स्त्री-विमर्श को धार देता है। समाज दुर्गा, चंडी, काली, सीता और सावित्री की पूजा कर सकता है, किंतु वास्तविक स्त्री की स्वतंत्रता स्वीकार करने में उसे कठिनाई होती है। यही हमारे देशकाल का एक मूल अंतर्विरोध है।
कवयित्री इस विरोधाभास को केवल आरोप की भाषा में नहीं रखतीं, बल्कि स्त्री की चेतना के विकास के रूप में सामने लाती हैं। संग्रह की स्त्री धीरे-धीरे उस सामाजिक व्यवस्था को पहचानती है जिसने उसके लिए पवित्रता, गृहस्थी, सहनशीलता और आज्ञाकारिता के आदर्श गढ़े हैं। इसलिए ‘सबसे बुरी लड़की’ का ‘बुरा’ होना वस्तुतः व्यवस्था की दृष्टि में बुरा होना है, मनुष्य की दृष्टि में नहीं।
संग्रह की एक कविता ‘हमें उपहार नहीं चाहिए’ स्त्री-अस्मिता की इस चेतना को अत्यंत स्पष्ट रूप देती है। यहाँ स्त्री को साड़ी, फ्रॉक, आभूषण या पारंपरिक वैवाहिक उपहारों की अपेक्षा नहीं है; उसकी आकांक्षा शिक्षा, कौशल, गतिशीलता और खुले आकाश की है। कविता का आग्रह है कि स्त्री को ऐसी चीजें दी जाएँ जो उसे निर्भर न बनाएँ बल्कि आत्मनिर्भर बनाएँ। यहाँ कविता का सामाजिक अर्थ अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। स्त्री-मुक्ति को केवल भावनात्मक स्वतंत्रता या पुरुष-विरोध तक सीमित न रखकर कवयित्री उसे शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता से जोड़ती हैं। ‘साइकिल चलाऊँगी’, ‘रोटी बनाऊँगी’, ‘चंचल होकर धरती पर घूमूँगी’ जैसी इच्छाएँ साधारण प्रतीत हो सकती हैं, लेकिन इनके भीतर स्त्री के जीवन पर लगाए गए अदृश्य प्रतिबंधों के विरुद्ध एक गहरी आकांक्षा मौजूद है। कविता के अंत में ‘खुले आसमान की उड़ान’ की माँग इस पूरे स्त्री-विमर्श का रूपक बन जाती है। यह उड़ान केवल घर से बाहर निकलने की नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और अस्तित्वगत मुक्ति की उड़ान है।
संग्रह की शीर्षक कविता में कवयित्री अपने ‘बुरे’ होने की सामाजिक घोषणा को उलट देती हैं। वह स्वीकार करती हैं कि वह हँसती हैं, खुलकर बोलती हैं, समानता की बात करती हैं, अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं और पारंपरिक स्त्री-संहिताओं को चुनौती देती हैं। इसीलिए यदि ऐसी स्त्री को समाज ‘सबसे बुरी लड़की’ कहता है, तो वह इस विशेषण को स्वीकार करने को तैयार है। यहीं संग्रह का स्त्री-विमर्श प्रतिरोध के अधिक व्यापक अर्थ में प्रवेश करता है। ‘बुरी लड़की’ दरअसल एक वैकल्पिक नैतिकता की प्रतिनिधि बन जाती है। वह उस नैतिकता को अस्वीकार करती है जिसमें स्त्री की अच्छाई का माप उसकी चुप्पी, सहनशीलता और समर्पण है। वह ऐसी नैतिकता चाहती है जिसमें मनुष्य की अच्छाई उसकी स्वतंत्र चेतना, न्याय-बोध और मानवीय व्यवहार से निर्धारित हो। इस दृष्टि से शीर्षक कविता संग्रह की वैचारिक कुंजी है। शेष अनेक कविताएँ इसी प्रश्न को अलग-अलग सामाजिक संदर्भों में खोलती हैं।
नीलम के संग्रह में पितृसत्ता किसी अमूर्त विचार की तरह नहीं आती। वह घर, विवाह, देह, परिवार, भाषा, परंपरा और सामाजिक व्यवहार में दिखाई देती है। ‘बेबसी’ की कविताओं में स्त्री-शरीर पर पुरुषवादी अधिकार का प्रश्न तीखे रूप में उठता है। स्त्री को देवी कहकर पूजने और उसे मनुष्य के रूप में सम्मान न देने की विसंगति कवयित्री को लगातार बेचैन करती है।
‘ओ मनुओं के वंशज’ जैसी कविता में यह प्रतिरोध सीधे उस सामाजिक विधान की ओर जाता है जिसने स्त्री की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने वाली अनेक धारणाओं को वैधता दी। कविता का स्वर घोषणात्मक है और उसमें भविष्य की स्त्री की सामूहिक शक्ति का विश्वास है। जितना अधिक स्त्री को रोका जाएगा, वह उतनी ही अधिक फैलती जाएगी—यह भाव संग्रह में बार-बार दिखाई देता है।
यहाँ कवयित्री का दृष्टिकोण व्यक्तिगत शिकायत से आगे बढ़कर ऐतिहासिक प्रतिरोध का रूप लेता है। स्त्री का संघर्ष अकेली स्त्री का संघर्ष नहीं रह जाता; वह आने वाली स्त्रियों के लिए रास्ता बनाने वाला संघर्ष बन जाता है।
नीलम के यहाँ प्रेम भी परंपरागत रूमानियत से अलग अर्थ ग्रहण करता है। ‘यही तो मोहब्बत है’ में प्रेम को जीवन की सक्रिय ऊर्जा, संवेदना और मनुष्यता से जोड़ा गया है। प्रेम की शक्ति संसार को प्रकाशित करने वाली शक्ति के रूप में आती है।
यहाँ संग्रह का एक महत्त्वपूर्ण संतुलन दिखाई देता है। कवयित्री पितृसत्ता का विरोध करते हुए प्रेम को नकारती नहीं हैं। वे प्रेम को अधिक मानवीय, अधिक बराबरीपूर्ण और अधिक स्वतंत्र संबंध के रूप में देखती हैं। यह दृष्टि संग्रह को केवल ‘विरोध की कविता’ बनने से बचाती है। प्रेम, करुणा, स्मृति, उम्मीद और मनुष्यता इसके प्रतिरोधी स्वर को मानवीय गहराई प्रदान करते हैं।
‘सबसे बुरी लड़की’ केवल स्त्री-विमर्श का संग्रह नहीं है। इसकी एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि निजी स्त्री-अनुभव से कविता व्यापक राजनीतिक प्रश्नों तक जाती है। ‘मेरे देश की संसद फिर रोयी’ जैसी कविता लोकतंत्र की संस्थाओं और जनतांत्रिक आदर्शों के बीच पैदा हुई दूरी पर प्रश्न उठाती है। संसद का ‘रोना’ एक सशक्त मानवीकरण है, जिसके माध्यम से लोकतंत्र की निष्प्राण होती संवेदना को व्यक्त किया गया है।
कवयित्री संसद की चुप्पी को आने वाले संकट का संकेत मानती हैं। लोकतंत्र यदि सामाजिक न्याय, नागरिक स्वतंत्रता और वंचितों के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाता, तो उसकी संस्थाएँ केवल औपचारिक ढाँचे में बदल जाती हैं। इसीलिए कविता में राजतंत्र की वापसी की आशंका और लोकतंत्र के मौन पर चिंता एक साथ दिखाई देती है।
‘आया राजतंत्र’ तथा ऐसी ही और कविताओं में राजनीतिक चेतना और अधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। सत्ता, जनता और लोकतंत्र के संबंधों को लेकर कवयित्री का स्वर चेतावनी देता है। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना, बोलना और असहमति व्यक्त करना नागरिक अधिकार हैं; यदि इन्हीं पर रोक लग जाए तो लोकतंत्र का अर्थ खोने लगता है। इस तरह राजनीतिक कविताएँ संग्रह के स्त्री-विमर्श से भी जुड़ती हैं। जिस तरह पितृसत्ता घर में सत्ता का केंद्रीकरण करती है, उसी तरह राजनीतिक सत्ता भी नागरिक जीवन में नियंत्रण और चुप्पी पैदा कर सकती है। दोनों के विरुद्ध कविता का मूल आग्रह स्वतंत्रता और आवाज़ का है।
‘मकड़जाल’ कविता संग्रह की प्रमुख रूपकात्मक रचनाओं में है। मकड़ी द्वारा बुने गए महीन जाल का रूपक यहाँ सामाजिक व्यवस्था, छल, लालच और ऐसी संरचनाओं के लिए प्रयुक्त होता है जिनसे निकलना कठिन होता जाता है। मनुष्य स्वयं भी कई बार उस जाल को बुनता है और अंततः उसी में फँस जाता है।
कविता की विशेषता यह है कि कवयित्री जटिल सामाजिक संरचनाओं को किसी भारी-भरकम वैचारिक शब्दावली में नहीं समझातीं। वे रोजमर्रा की परिचित वस्तु—मकड़जाल—को प्रतीक बनाकर व्यवस्था की चालाकी को समझाती हैं। जाल जितना महीन होता है, उससे निकलना उतना ही कठिन होता है। यह आधुनिक जीवन की उस विडंबना का रूपक है जिसमें सुविधा, लालच, झूठ, वादे और उपभोग मनुष्य को धीरे-धीरे ऐसी निर्भरता में ले जाते हैं जिसका उसे आरंभ में पता भी नहीं चलता। कविता का उत्तर है—ज्ञान और चेतना। जब व्यक्ति व्यवस्था को पहचान लेता है, तब वह उसके धागों को तोड़ सकता है। यही बात संग्रह की अनेक कविताओं पर लागू होती है।
संग्रह का सामाजिक सरोकार जाति-व्यवस्था तक भी विस्तृत है। ‘सब होंगे बराबर’ जैसी कविता में सामाजिक बराबरी का आग्रह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यहाँ ब्राह्मण, दलित, मजदूर, जमींदार और अन्य सामाजिक वर्गों के बीच निर्मित असमानता को चुनौती दी जाती है। कविता एक ऐसे समाज की कल्पना करती है जिसमें मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, मनुष्यता से निर्धारित हो। यहाँ कवयित्री का स्वर वैचारिक रूप से स्पष्ट है। वह जातिगत श्रेणीकरण की पूरी संरचना को उलट देने की कल्पना करती हैं। कविता में अतिशयोक्तिपूर्ण और उलटबाँसी वाली संरचना का प्रयोग है—जिसमें सामाजिक भूमिकाएँ एक-दूसरे से बदलती हुई दिखाई जाती हैं। इस उलटाव का उद्देश्य सामाजिक व्यवस्था की कृत्रिमता को उजागर करना है। यह कविता बताती है कि कवयित्री का स्त्री-विमर्श जाति और वर्ग के प्रश्नों से अलग नहीं है। स्त्री की मुक्ति तभी पूर्ण हो सकती है जब समाज की दूसरी असमान संरचनाएँ भी चुनौती के घेरे में आएँ।
संग्रह की अनेक कविताओं में धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग दिखाई देता है। किंतु कवयित्री का उद्देश्य धर्म की आध्यात्मिकता को खारिज करना नहीं, बल्कि धार्मिकता के नाम पर मनुष्य-विरोधी व्यवहार पर प्रश्न उठाना है। ‘छप्पन भोग’ जैसी कविता में धार्मिक आस्था और सामाजिक व्यवहार के बीच का विरोधाभास सामने आता है। एक ओर देवताओं की पूजा है, दूसरी ओर मनुष्य के प्रति हिंसा और असंवेदनशीलता। तकनीक बदल गई है, संचार के माध्यम बदल गए हैं, लेकिन मनुष्य की चेतना में मौजूद कई पुराने अंधविश्वास और हिंसक प्रवृत्तियाँ जस की तस हैं। इसीलिए आधुनिकता का बाहरी रूप पर्याप्त नहीं; आवश्यक है कि मनुष्य की मानसिकता भी बदले।
यदि संग्रह में केवल आक्रोश होता, तो उसका प्रभाव सीमित हो सकता था। लेकिन नीलम की कविता का एक दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी आशावादी ऊर्जा है। ‘तुम्हारी उम्मीदों पर खरे उतरेंगे हम’ जैसी कविताओं में भविष्य के निर्माण की आकांक्षा है। यहाँ संघर्ष केवल विनाश के लिए नहीं, एक नए संसार की रचना के लिए है।
‘नयी दुनिया के रचयिता’ जैसी कविता में यही चेतना और स्पष्ट होती है। भविष्य को नियति की तरह स्वीकार करने के बजाय उसे मनुष्य द्वारा निर्मित किए जाने की संभावना व्यक्त की गई है। यह दृष्टि संग्रह को निराशा के दस्तावेज से उम्मीद के दस्तावेज में बदल देती है।
कवयित्री का विश्वास है कि वर्तमान की विडंबनाओं के बावजूद परिवर्तन संभव है। यह परिवर्तन किसी एक महानायक से नहीं, सामूहिक चेतना से आएगा। इसलिए उनकी कविताओं में ‘हम’ का प्रयोग बार-बार सामने आता है।
संग्रह में प्रकृति भी केवल सजावटी तत्व नहीं है। ‘नदी की धार’ जैसी कविता में नदी को गतिशीलता, जिजीविषा और मिलन की आकांक्षा से जोड़ा गया है। प्रकृति के तत्व कवयित्री की संवेदना में मनुष्य की तरह बेचैन, स्वप्नशील और सक्रिय हो उठते हैं।
नदी यहाँ परिवर्तन का भी प्रतीक है। वह ठहरती नहीं; बहती है, रास्ते बनाती है, सीमाओं को चुनौती देती है और अपने विस्तार की ओर बढ़ती है। स्त्री के प्रतिरोध और नदी की गतिशीलता के बीच एक अंतर्ध्वनि महसूस की जा सकती है। इसी कारण प्रकृति की कविताएँ संग्रह के सामाजिक और स्त्री-विमर्श से पूरी तरह अलग नहीं पड़तीं।
‘खामोश शहर’ संग्रह की उल्लेखनीय सामाजिक कविताओं में है। शहर चारों ओर मनुष्यों से भरा हुआ है, लेकिन भीतर से मौन है। हर व्यक्ति अपनी दीवारों में घिरा हुआ है और आसपास घट रही घटनाओं का मूक दर्शक बना हुआ है। यह कविता आधुनिक शहरी जीवन की अकेलेपन और सामाजिक निष्क्रियता दोनों को पकड़ती है। भीड़ बढ़ती है, लेकिन संवाद घटता जाता है। लोग अपने-अपने संसार में सीमित हैं। इस चुप्पी में कवयित्री को एक गहरी सामाजिक त्रासदी दिखाई देती है—अन्याय को देखकर भी प्रतिक्रिया न करना। इस कविता का महत्त्व इसलिए भी है कि यह संग्रह के प्रतिरोधी स्वर को आत्मालोचनात्मक बनाती है। प्रश्न केवल सत्ता से नहीं है; प्रश्न नागरिक से भी है कि वह अपने आसपास के अन्याय के प्रति कितना सजग है।
‘देख तमाशा लोटे का’ जैसी कविता में लोकभाषा, राजनीतिक व्यंग्य और सत्ता-परिवर्तन की विडंबना एक साथ आती है। ‘लोटा’ जैसी सामान्य वस्तु को राजनीतिक प्रतीक में बदल देना कवयित्री की व्यंग्यात्मक कल्पना का परिचायक है। कविता में सत्ता, जनता और राजनीतिक तमाशे की स्थितियाँ हास्य और व्यंग्य के माध्यम से उभरती हैं।
यहाँ कविता की भाषा अपेक्षाकृत बोलचाल की है। दोहराव, ध्वन्यात्मकता और छोटे वाक्य कविता को मंचीय प्रभाव देते हैं। इसका एक लाभ यह है कि कविता तुरंत पाठक तक पहुँचती है; लेकिन साहित्यिक दृष्टि से यही प्रवृत्ति कहीं-कहीं कविता को तत्कालीन राजनीतिक टिप्पणी के निकट भी ले आती है
नीलम की कविता की भाषा मुख्यतः सरल, सीधी और संवादपरक है। वे जटिल बिंबों अथवा संस्कृतनिष्ठ शब्दावली की अपेक्षा बोलचाल की हिंदी, रोजमर्रा के मुहावरों और सीधे संबोधन को प्राथमिकता देती हैं। इससे कविताओं में सहज संप्रेषणीयता आती है।
‘हमें उपहार नहीं चाहिए’ में पुनरावृत्ति, ‘बेबस…’ श्रृंखला में संरचनात्मक पुनरावृत्ति और ‘आया राजतंत्र’ जैसी कविताओं में घोषणात्मक वाक्य कविता की लय रचते हैं। कई रचनाएँ पाठ के स्तर पर गीतात्मक कम और वक्तव्यात्मक अधिक हैं। यह शैली कवयित्री की सामाजिक प्रतिबद्धता के अनुकूल है। लेकिन संग्रह की सभी कविताएँ समान कलात्मक ऊँचाई पर नहीं हैं। कुछ कविताएँ अपने विचार को इतनी प्रत्यक्षता से कहती हैं कि कविता और नारे के बीच की दूरी कम हो जाती है। जहाँ प्रतीक, बिंब और व्यंजना सक्रिय हैं, वहाँ रचना अधिक प्रभावशाली बनती है; जहाँ विचार सीधे घोषणा में बदल जाता है, वहाँ काव्यात्मक जटिलता कुछ कम हो जाती है। यह संग्रह की एक स्वाभाविक सीमा है। सामाजिक प्रतिबद्ध कविता के सामने हमेशा यह चुनौती रहती है कि वह संदेश को कविता पर हावी न होने दे। नीलम की सफल कविताएँ इस संतुलन को अधिक प्रभावी ढंग से साधती हैं।
कवयित्री की भाषा में कई जगह लोकधर्मी लय दिखाई देती है। उनकी कविताएँ पाठक से किसी दूरस्थ साहित्यिक भाषा में संवाद नहीं करतीं। वे सामान्य मनुष्य के अनुभवों, उसके शब्दों और उसकी चिंताओं को कविता का हिस्सा बनाती हैं। यह जनपक्षधरता विशेष रूप से तब प्रभावी होती है जब कविता सामाजिक असमानता या राजनीतिक छल को संबोधित करती है। ‘दहेज के लोभी’ जैसी कविता में दहेज की सामाजिक बुराई सीधे उस वर्ग के सामने रखी जाती है जो विवाह को लेन-देन में बदल देता है। कविता का स्वर व्यंग्यात्मक होने के साथ-साथ नैतिक आक्रोश से भरा है।
इसी तरह ‘झूठा रंग’ में सफलता, वादों और सामाजिक प्रदर्शन की बनावटी चमक पर प्रहार किया गया है। कविता दिखाती है कि झूठ के सहारे बनाई गई उपलब्धि का रंग अंततः कृत्रिम ही रहता है।
संग्रह के उत्तरार्ध में माँ से संबंधित कविताएँ एक अलग भावभूमि निर्मित करती हैं। ‘माँ आने दे’, ‘माँ’ आदि कविताओं में मातृत्व स्मृति, सुरक्षा, प्रेम और बचपन की ओर लौटने की आकांक्षा का प्रतीक बनता है। यहाँ संग्रह का आक्रोश कुछ देर के लिए करुणा और आत्मीयता में बदलता है। माँ का बिंब कवयित्री की सामाजिक चेतना को मानवीय ऊष्मा देता है। यह पक्ष महत्वपूर्ण है, क्योंकि केवल राजनीतिक और वैचारिक कविताओं से निर्मित संग्रह में भावात्मक विविधता कम हो सकती थी।
संग्रह की एक और विशेषता ‘मैं’ का निर्भीक प्रयोग है। ‘मैं कोई कवि नहीं’, ‘मैं कोई कवि नहीं जो प्रतीकों और बिंबों से सब कुछ बयां कर दूँ’ जैसी पंक्तियों वाली कविता कवयित्री की रचनात्मक आत्मचेतना को सामने लाती है। वह अपने लिए स्थापित साहित्यिक श्रेणियों की आवश्यकता को नकारती हुई सीधे अनुभव की जमीन पर खड़ी होती है। यह आत्मस्वीकृति दो स्तरों पर महत्त्वपूर्ण है। पहला, कवयित्री साहित्यिक आडंबर से दूरी बनाती हैं। दूसरा, वह यह संकेत देती हैं कि कविता का मूल्य केवल अलंकार, प्रतीक और बिंबों की जटिलता से नहीं, बल्कि अनुभव की प्रामाणिकता से भी निर्धारित होता है।
हालाँकि साहित्यिक दृष्टि से यह भी ध्यान देने योग्य है कि कविता को केवल अनुभव की तीव्रता से नहीं, उसकी कलात्मक संरचना से भी शक्ति मिलती है। नीलम की कविताओं में जहाँ अनुभव और शिल्प का संतुलन मजबूत है, वहाँ उनका प्रभाव अधिक स्थायी बनता है।
‘सबसे बुरी लड़की’ की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि इसकी स्त्री अपने व्यक्तिगत प्रश्नों से निकलकर नागरिक प्रश्नों तक पहुँचती है। वह दहेज के विरुद्ध बोलती है तो लोकतंत्र पर भी सवाल उठाती है; वह विवाह में बराबरी चाहती है तो जाति-व्यवस्था की बराबरी पर भी बात करती है; वह अपनी देह पर अधिकार चाहती है तो राजनीतिक सत्ता की मनमानी पर भी प्रश्न उठाती है। इसलिए संग्रह को केवल ‘स्त्री कविता’ कह देना उसके दायरे को छोटा करना होगा। यह मूलतः मनुष्य की स्वतंत्रता और सम्मान की कविता है, जिसमें स्त्री उसका केंद्रीय प्रवेश-द्वार है। यही कारण है कि ‘सबसे बुरी लड़की’ की सामाजिक चेतना व्यापक होती जाती है। कवयित्री का सरोकार किसी एक वर्ग की स्त्री तक सीमित नहीं है। उनके यहाँ स्त्री की समस्या परिवार, समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था से जुड़ती है।
नीलम की कविताओं का सबसे बड़ा गुण उनकी स्पष्टता है, लेकिन कुछ स्थानों पर यही स्पष्टता काव्यात्मक बहुस्तरीयता को सीमित करती है। राजनीतिक या सामाजिक विषयों वाली कुछ कविताएँ अपने कथ्य को सीधे कहती हैं; पाठक के लिए अर्थ-निर्माण की अतिरिक्त गुंजाइश कम बचती है। इसी प्रकार कई कविताओं में पुनरावृत्ति प्रभाव उत्पन्न करती है, लेकिन कहीं-कहीं वही पुनरावृत्ति कविता की गति को लंबा कर देती है। कुछ रचनाओं में तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ इतने प्रत्यक्ष हैं कि उनका प्रभाव अपने समय से गहराई से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। भविष्य में ऐसी कविताओं का स्थायी साहित्यिक मूल्य उनके तत्काल राजनीतिक संदर्भ से आगे जाकर उनकी मानवीय व्यंजना पर निर्भर करेगा। फिर भी इन सीमाओं को संग्रह की मूल उपलब्धियों को कम करने वाला नहीं माना जाना चाहिए। बल्कि ये उस काव्य-प्रवृत्ति की स्वाभाविक सीमाएँ हैं जिसमें कविता को सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम भी माना गया है।
‘सबसे बुरी लड़की’ अंततः एक ऐसी कविता-पुस्तक है जो पाठक को आरामदायक सहमति नहीं देती। वह उसे असुविधाजनक प्रश्नों के सामने खड़ा करती है। स्त्री क्यों चुप रहे? उसे अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार क्यों न हो? देवी की पूजा करने वाला समाज वास्तविक स्त्री की स्वतंत्रता से क्यों डरता है? लोकतंत्र में संसद क्यों मौन हो जाती है? जाति मनुष्य से बड़ी क्यों हो जाती है? धर्म मनुष्यता से अलग कैसे हो सकता है? विकास के बीच मनुष्य इतना अकेला क्यों हो जाता है? इन प्रश्नों का कोई एक उत्तर संग्रह नहीं देता, लेकिन प्रश्नों को दबाने से इंकार करता है। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
नीलम की कविता में स्त्री करुणा की वस्तु नहीं, चेतना की वाहक है। वह टूटती है, लेकिन टूटकर समाप्त नहीं होती; वह दुख से गुजरती है, लेकिन दुख को अपनी नियति नहीं मानती; वह प्रेम करती है, लेकिन प्रेम के नाम पर अपना अस्तित्व नहीं खोना चाहती; वह परिवार चाहती है, लेकिन परिवार में बराबरी भी चाहती है; वह परंपरा से संवाद कर सकती है, पर परंपरा के नाम पर अन्याय स्वीकार नहीं करती।
‘सबसे बुरी लड़की’ शीर्षक इसलिए अंततः एक व्यंग्यात्मक आत्मसम्मान बन जाता है। समाज जिस स्त्री को ‘बुरा’ कहता है, वही स्त्री प्रश्न पूछने, हँसने, बोलने, निर्णय लेने और उड़ने का साहस करती है। इस अर्थ में संग्रह की ‘बुरी लड़की’ वास्तव में एक जाग्रत नागरिक, स्वतंत्र स्त्री और मानवीय भविष्य की प्रतिनिधि है।
कविता-संग्रह का साहित्यिक महत्त्व इसी बिंदु पर सबसे अधिक उभरता है। यह पुस्तक केवल स्त्री के दुखों की सूची नहीं है; यह स्त्री की चेतना के क्रमिक विस्तार का दस्तावेज है। निजी पीड़ा से सामाजिक प्रश्न, सामाजिक प्रश्न से राजनीतिक प्रतिरोध और राजनीतिक प्रतिरोध से एक समानतामूलक भविष्य की कल्पना—यह इसकी व्यापक यात्रा है।
नीलम की कविता का मूल आग्रह सरल है, लेकिन उसकी सामाजिक परिणति गहरी है—मनुष्य को मनुष्य की तरह जीने का अधिकार मिले। इस अधिकार की सबसे पहली माँग स्त्री करती है, क्योंकि उसके अनुभव में सदियों की असमानता सबसे तीव्र रूप में संचित है। इसलिए ‘सबसे बुरी लड़की’ की आवाज केवल एक लड़की की आवाज नहीं रह जाती; वह उन सभी आवाज़ों का प्रतिनिधित्व करने लगती है जिन्हें व्यवस्था ने कभी न कभी चुप कराने की कोशिश की है।

इस संग्रह को पढ़ते हुए सबसे महत्त्वपूर्ण अनुभूति यही होती है कि यहाँ कविता सजावटी अभिव्यक्ति नहीं, जीवन में हस्तक्षेप करने वाली चेतना है। कहीं वह प्रश्न है, कहीं प्रतिरोध, कहीं व्यंग्य, कहीं प्रेम, कहीं स्मृति और कहीं भविष्य का स्वप्न। उसकी भाषा सहज है, कभी-कभी अत्यंत सीधी है, और कुछ रचनाओं में घोषणात्मक भी; फिर भी इसी सीधेपन में कवयित्री की रचनात्मक ईमानदारी निहित है।
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में ‘सबसे बुरी लड़की’ को स्त्री-अस्मिता, सामाजिक बराबरी और नागरिक प्रतिरोध की चेतना से निर्मित संग्रह के रूप में देखा जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह स्त्री को ‘अच्छी लड़की’ बनने की सामाजिक अनिवार्यता से मुक्त कर उसे प्रश्न करने वाली मनुष्य-इकाई के रूप में स्थापित करता है। और शायद यही इस पुस्तक का सबसे सार्थक साहित्यिक और सामाजिक प्रतिपक्ष है— जिसे समाज ‘सबसे बुरी लड़की’ कहता है, वही अपने भीतर एक बेहतर समाज का सपना बचाए रखती है।
‘सबसे बुरी लड़की’ एक स्पष्ट सामाजिक सरोकार, मजबूत स्त्री-चेतना, लोकतांत्रिक विवेक और प्रतिरोध की ऊर्जा वाला संग्रह है। इसकी काव्यात्मक शक्ति उन रचनाओं में सबसे अधिक दिखाई देती है जहाँ विचार अनुभव, प्रतीक और संवेदना में रूपांतरित होता है। कुछ कविताओं की प्रत्यक्षता और वक्तव्यात्मकता इसकी सीमा अवश्य है, लेकिन समग्र रूप से यह संग्रह अपने समय के महत्त्वपूर्ण सामाजिक प्रश्नों को स्त्री की दृष्टि से देखने और उन्हें कविता के विमर्श में लाने का सार्थक प्रयास है।
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कविता-संग्रह : ‘सबसे बुरी लड़की’
कवयित्री : नीलम
प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
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