• मुखपृष्ठ
  • अनहद के बारे में
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक नियम
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
अनहद
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
No Result
View All Result
अनहद
No Result
View All Result
Home कथा

राहुल सिंह एक अलग अंदाज में

by Anhadkolkata
June 25, 2022
in कथा, साहित्य
A A
4
Share on FacebookShare on TwitterShare on Telegram

बहुत पहले यहां  राहुल सिंह की कविताएं आप पढ़ चुके हैं..। राहुल एक अच्छे कथाकार भी हैं..। कई कहानियां चर्चित हो चुकी हैं। अभी-अभी उन्होंने एक नई कहानी लिखनी शुरू की है। यह कहानी का एक अंश है, लेकिन पढ़ने पर  पूर्णता का-सा आभास देता है। इस अलग तरह की अभिव्यक्ति को आपसे साझा करते हुए बहुत खुशी हो रही है।

                                               एक छोटी-सी प्रेम कथा_________________
उसके आने की कोई आहट, सुनी नहीं कभी, पर अक्सरहां कान उस आहट पर लगे रहे। आती तो उसके पास दुनिया जहां की बातें होती, जाती तो मेरी दुनिया का भी कुछ साथ होता उसके पास।
शायद हर बार थोड़ा उसके साथ मैं भी चला जाता। थोड़ा-थोड़ा जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। वह जाती तो मेरी दुनिया से कई जरुरी चीज गायब मिलते। लाख ढूंढता, नहीं मिलते और जब कभी वह फिर आती, चीजें वापस उसी जगह मौजूद मिलतीं। पूरी जादूगरनी थी। बात करते-करते बिस्तर पर ढलंग जाती और इससे पहले कि आप कुछ कहें वह सो चुकी होती। हाँ मन रखने के लिए उसके सोने के बाद भी उसकी मुस्कराहट थोड़ी देर के लिए जगी रहती और फिर वह भी सो जाती। वैसे उसके सोने के बाद उसका चेहरा भी सो जाता और जब वह जगती तो उसका चेहरा भी जग जाया करता। जब वह सो जाया करती तो मैं बस उसे देखा करता, निःशब्द। फिर मैं भी उसके साथ हो जाया करता, लेटे-लेटे मैं सोचता कि इस वक्त वह नींद की दुनिया में क्या कर रही होगी, जबकि मैं यहाँ हूँ। फिर इस खयाल से मैं डर जाया करता कि अगर वह नींद में सपने देख रही होगी तो मैं तो शर्तिया उसमें नहीं होंउगा क्योंकि मैं तो यहाँ हूँ। इसलिए उसके नींद में दाखिल होने के लिए मैं भी सो जाया करता, बिलकुल उसके पास, सटकर। नींद उसके आँखों के कोरों से उतर कर गालों के मैदानी इलाकों से होती हुई मेरे आँखों में आकर ठहर जाती और वहाँ थोड़ी देर सुस्ताने के बाद अचानक बड़ी तेजी से पूरे देह में पसर जाती। पेट से होते हुए वह तलुवों तक जाती और जब कभी मेरे तलुवे उसके तलुवों को छू जाते तो वह वापस उसके तलुवों के रास्ते उसके आँखों की पुतलियों तक लौट जाती। जब हम नींद में होते तो उसकी सोयी मुस्कराहट भी शरारत करती। मुस्कराहट उसके होंठों से उतर कर मेरे होठों में आ बसती। नींद खुलने पर जैसे ही उसकी निगाह मेरे होंठों में टिकी उसी की मुस्कराहट पर पड़ती, वह बेसाख्ता उसे चुन लिया करती। जब मैं जागता तो उसकी मुस्कराहट का स्वाद अपने होठों पर महसूस करता और हैरत होती।
अब जब वह आती तो उसके आने के साथ मैं चैकन्ना हो जाया करता, खिड़की-दरवाजे सब अच्छी तरह बंद किया करता कि नींद मेरे कमरे में दाखिल न हो, लेकिन … नींद अगर पलकों में ही छिपकर आये तो कोई क्या कर सकता है। वैसे नींद की आहट अब मैं सुनने लगा था, नींद जब आती तो मेरे कमरे की चीजें एक-एक कर गायब होने लगतीं, उनके गायब होने को मैं महसूसता रहता और फिर उन्हें बचाये रखने का एक ही रास्ता था कि खुद भी उन चीजों में शामिल हो जाया जाये। ऐसा करने से जाते वक्त नींद जब चीजें वापस करतीं तो सबसे आखिर में मुझे लौटाती और इस तरह जब मैं जागता तो सभी चीजें वापस अपनी जगह पर होतीं, मैं भी।
उसके जाने के बाद भी उसका अक्स वहीं बिस्तर पर सोया रहता। ठीक वैसे ही बायीं ओर करवट लेकर, और केश अलसाये से उसके दाहिनी गाल पर पड़े रहते, आपस में सटी उसकी हथेलियाँ सोते हुए भी जीती-जागती इबादत सरीखीं लगतीं। उसे सोता हुआ देखकर अक्सरहाँ जी करता कि जाकर उसके गालों पर तर्जनी रख दूं और तोता उड़े-मैना उड़े की तर्ज पर कहूँ कि दुःख उड़े, दुश्चिंता उड़े, संशय उड़े, परेशानी उड़े। एक दिन यूं ही मन में आया कि कहूं प्यार उड़े, तभी उसकी नींद खुली गई और उसने मेरी तर्जनी पकड़ के कहा – नहीं प्यार नहीं उड़े। यह सुन कर मैं भर नींद सोया था, अगली सुबह सभी चीजें सही सलामत थीं, बस तकिये के नीचे एक चेहरा पड़ा था और जिसकी आरजू में रातों का करवट-करवट होना बदा था।

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Related articles

पहाड़ी लोक परंपरा को आधुनिकता से जोड़ता हुआ कविता संग्रह – देवेश पथ सरिया

अनिल गंगल की नई कविताएँ

बहुत पहले यहां  राहुल सिंह की कविताएं आप पढ़ चुके हैं..। राहुल एक अच्छे कथाकार भी हैं..। कई कहानियां चर्चित हो चुकी हैं। अभी-अभी उन्होंने एक नई कहानी लिखनी शुरू की है। यह कहानी का एक अंश है, लेकिन पढ़ने पर  पूर्णता का-सा आभास देता है। इस अलग तरह की अभिव्यक्ति को आपसे साझा करते हुए बहुत खुशी हो रही है।

                                               एक छोटी-सी प्रेम कथा_________________
उसके आने की कोई आहट, सुनी नहीं कभी, पर अक्सरहां कान उस आहट पर लगे रहे। आती तो उसके पास दुनिया जहां की बातें होती, जाती तो मेरी दुनिया का भी कुछ साथ होता उसके पास।
शायद हर बार थोड़ा उसके साथ मैं भी चला जाता। थोड़ा-थोड़ा जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। वह जाती तो मेरी दुनिया से कई जरुरी चीज गायब मिलते। लाख ढूंढता, नहीं मिलते और जब कभी वह फिर आती, चीजें वापस उसी जगह मौजूद मिलतीं। पूरी जादूगरनी थी। बात करते-करते बिस्तर पर ढलंग जाती और इससे पहले कि आप कुछ कहें वह सो चुकी होती। हाँ मन रखने के लिए उसके सोने के बाद भी उसकी मुस्कराहट थोड़ी देर के लिए जगी रहती और फिर वह भी सो जाती। वैसे उसके सोने के बाद उसका चेहरा भी सो जाता और जब वह जगती तो उसका चेहरा भी जग जाया करता। जब वह सो जाया करती तो मैं बस उसे देखा करता, निःशब्द। फिर मैं भी उसके साथ हो जाया करता, लेटे-लेटे मैं सोचता कि इस वक्त वह नींद की दुनिया में क्या कर रही होगी, जबकि मैं यहाँ हूँ। फिर इस खयाल से मैं डर जाया करता कि अगर वह नींद में सपने देख रही होगी तो मैं तो शर्तिया उसमें नहीं होंउगा क्योंकि मैं तो यहाँ हूँ। इसलिए उसके नींद में दाखिल होने के लिए मैं भी सो जाया करता, बिलकुल उसके पास, सटकर। नींद उसके आँखों के कोरों से उतर कर गालों के मैदानी इलाकों से होती हुई मेरे आँखों में आकर ठहर जाती और वहाँ थोड़ी देर सुस्ताने के बाद अचानक बड़ी तेजी से पूरे देह में पसर जाती। पेट से होते हुए वह तलुवों तक जाती और जब कभी मेरे तलुवे उसके तलुवों को छू जाते तो वह वापस उसके तलुवों के रास्ते उसके आँखों की पुतलियों तक लौट जाती। जब हम नींद में होते तो उसकी सोयी मुस्कराहट भी शरारत करती। मुस्कराहट उसके होंठों से उतर कर मेरे होठों में आ बसती। नींद खुलने पर जैसे ही उसकी निगाह मेरे होंठों में टिकी उसी की मुस्कराहट पर पड़ती, वह बेसाख्ता उसे चुन लिया करती। जब मैं जागता तो उसकी मुस्कराहट का स्वाद अपने होठों पर महसूस करता और हैरत होती।
अब जब वह आती तो उसके आने के साथ मैं चैकन्ना हो जाया करता, खिड़की-दरवाजे सब अच्छी तरह बंद किया करता कि नींद मेरे कमरे में दाखिल न हो, लेकिन … नींद अगर पलकों में ही छिपकर आये तो कोई क्या कर सकता है। वैसे नींद की आहट अब मैं सुनने लगा था, नींद जब आती तो मेरे कमरे की चीजें एक-एक कर गायब होने लगतीं, उनके गायब होने को मैं महसूसता रहता और फिर उन्हें बचाये रखने का एक ही रास्ता था कि खुद भी उन चीजों में शामिल हो जाया जाये। ऐसा करने से जाते वक्त नींद जब चीजें वापस करतीं तो सबसे आखिर में मुझे लौटाती और इस तरह जब मैं जागता तो सभी चीजें वापस अपनी जगह पर होतीं, मैं भी।
उसके जाने के बाद भी उसका अक्स वहीं बिस्तर पर सोया रहता। ठीक वैसे ही बायीं ओर करवट लेकर, और केश अलसाये से उसके दाहिनी गाल पर पड़े रहते, आपस में सटी उसकी हथेलियाँ सोते हुए भी जीती-जागती इबादत सरीखीं लगतीं। उसे सोता हुआ देखकर अक्सरहाँ जी करता कि जाकर उसके गालों पर तर्जनी रख दूं और तोता उड़े-मैना उड़े की तर्ज पर कहूँ कि दुःख उड़े, दुश्चिंता उड़े, संशय उड़े, परेशानी उड़े। एक दिन यूं ही मन में आया कि कहूं प्यार उड़े, तभी उसकी नींद खुली गई और उसने मेरी तर्जनी पकड़ के कहा – नहीं प्यार नहीं उड़े। यह सुन कर मैं भर नींद सोया था, अगली सुबह सभी चीजें सही सलामत थीं, बस तकिये के नीचे एक चेहरा पड़ा था और जिसकी आरजू में रातों का करवट-करवट होना बदा था।

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Tags: राहुल सिंह
ShareTweetShare
Anhadkolkata

Anhadkolkata

अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें। प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।

Related Posts

पहाड़ी लोक परंपरा को आधुनिकता से जोड़ता हुआ कविता संग्रह – देवेश पथ सरिया

पहाड़ी लोक परंपरा को आधुनिकता से जोड़ता हुआ कविता संग्रह – देवेश पथ सरिया

by Anhadkolkata
September 22, 2026
0

पहाड़ी लोक परंपरा को आधुनिकता से जोड़ता हुआ कविता संग्रह देवेश पथ सारिया  उत्तराखंड के वरिष्ठ कवि भूपेंद्र बिष्ट का कविता संग्रह ‘गोठ में बाघ’ पढ़ा।...

अनिल गंगल की नई कविताएँ

अनिल गंगल की नई कविताएँ

by Anhadkolkata
September 19, 2026
0

अनिल गंगल इन कविताओं की प्रमुख विशेषता यह है कि कवि बड़े प्रश्नों को घोषणात्मक वैचारिकता के बजाय रोज़मर्रा के दृश्य, वस्तु और अनुभवों से जोड़कर...

शिवानी ‘शांतिनिकेतन’ की कहानी – अधखुली खिड़की

शिवानी ‘शांतिनिकेतन’ की कहानी – अधखुली खिड़की

by Anhadkolkata
September 17, 2026
0

शिवानी शांतिनिकेतन शिवानी ‘शांतिनिकेतन’ की यह कहानी केवल एक बेटी के अपने मायके लौटने भर की कथा नहीं कहती, बल्कि रिश्तों में छिपे भय, संकोच, अपराधबोध...

एक कॉलम की ख़बर

एक कॉलम की ख़बर

by Anhadkolkata
August 27, 2026
0

विमल चन्द्र पाण्डेय विमल चन्द्र पाण्डेय ने कथा लेखन की एक लंबी यात्रा की है और हमें कई यादगार कहानियाँ और कई मानीखेज उपन्यास दिए हैं।...

रूपा सिंह की कहानी – लकीरें

रूपा सिंह की कहानी – लकीरें

by Anhadkolkata
May 16, 2025
0

रूपा सिंह रूपा सिंह की कहानियाँ हमें मानवीय संबंधों और उनकी विसंगतियों की ओर ले जाती हैं और हमें पता ही नहीं चलता कि हम कब...

Next Post

देश भीतर देश - प्रदीप सौरभ (एक अंश)

नील कमल की एक गज़ल

संजय राय की कविताएं

Comments 4

  1. रविकर says:
    15 years ago

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
    पढ़कर आनंदित हुआ ||
    बधाई ||

    Reply
  2. Patali-The-Village says:
    15 years ago

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

    Reply
  3. Shivanjali srivastava says:
    15 years ago

    Atyant jivant prastuti ! Dhanyavaad padhvaane hetu !!

    Reply
  4. Pawan Kumar says:
    15 years ago

    राहुल सिंह का नया रूप अच्छा लगा….. कहानी सारगर्भित और दिल को छु जाने वाली है….. आपकी प्रस्तुति बेहतरीन है.

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.

No Result
View All Result
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.