
स्वप्निल श्रीवास्तव की इन कविताओं का वैशिष्ट्य उनकी सहज भाषा, अनुभवजन्य दृष्टि और जीवन के साधारण प्रसंगों में छिपे गहरे अर्थों को पहचानने की क्षमता में निहित है। वे बिना किसी बौद्धिक आडंबर के हमारे समय की विडंबनाओं, सामाजिक विषमताओं और मनुष्य के बदलते स्वभाव को रेखांकित करते हैं।
‘जो नहीं मिला’ प्रकृति के सहज उपहारों के बरक्स मनुष्य के अतृप्त लोभ पर प्रश्नचिह्न लगाती है, तो ‘कागज की नाव’ बचपन की स्मृतियों, सामूहिक संरक्षण और कल्पनाशील स्वतंत्रता का आत्मीय संसार रचती है। ‘भद्रजन’ में सभ्यता के मुखौटे और सहज मानवीय अभिव्यक्ति के बीच का अंतर उजागर होता है, जबकि ‘महान कवियों’ में कविता को दुर्बोध बनाने वाली बौद्धिकता, आयातित बिंबों और प्रदर्शनप्रियता पर तीखा व्यंग्य है। ‘अपनी तरह से लिखना’ व्यक्ति की प्रकृति और उसकी अभिव्यक्ति के संबंध को रोचक ढंग से सामने लाती है तथा ‘हाजिरजबाबी’ में पिता का चरित्र लोकबुद्धि, आत्मसम्मान और विनोदप्रियता का जीवंत उदाहरण बनकर उभरता है। ‘पक्षियों को बुलानेवाला आदमी’ में प्रकृति के साथ मनुष्य के आत्मीय संबंध के विनाश की त्रासदी है, जहाँ हिंसा की आहट पक्षियों ही नहीं, एक सहज जीवन-दृष्टि को भी विस्थापित कर देती है। ‘सुनयना मजूमदार’ में सौंदर्य, समय, उम्र और स्मृति के बीच एक जटिल भाव-संबंध बनता है, जबकि ‘यातायात’ आधुनिक विकास के साथ बढ़ती वर्गीय दूरी और मनुष्य के वस्तु तथा साधनों का गुलाम बन जाने की विडंबना को रेखांकित करती है। इन कविताओं में व्यंग्य की धार है, लेकिन उसके पीछे एक संवेदनशील मनुष्य की चिंता और आत्मीयता भी मौजूद है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की काव्य-दृष्टि की विशेषता यही है कि वे जीवन के मामूली दृश्यों से सामाजिक आलोचना का व्यापक परिप्रेक्ष्य निर्मित करते हैं और सहज कथन के भीतर ऐसे प्रश्न छोड़ जाते हैं, जो कविता समाप्त होने के बाद भी पाठक के भीतर बने रहते हैं।
जो नहीं मिला
जो नहीं मिला
उसका दुख क्या ?
जो मिला है वह
क्या कम है
हमें मिली है पृथ्वी
समूचा आकाश और
तारामंडल
हमे मुफ़्त मिली है
चाँद सूरज की रोशनी
और फेफड़ों में सांस भरने
के लिये हवा
हमें मिले हैं पर्वत
नदियां आकाश समुंदर
और वक्त – बेवक्त की बारिशें
हरे भरे जंगल और उसमें
गीत गाते हुये परिंदे
तुम्हें और क्या चाहिए
लालचियों ?
कागज की नांव
बारिश में हम
कागज की नांव
बन जाते थे
जहां पानी मिलता था
हम तैरने लगते थे
हमारे ऊपर कई हथेलियों
के छाते थे
जो हमें भिगोने से बचा
लेते थे
हमारी यात्रा में
छोटे छोटे बंदरगाह थे
जहां हम अपने ईंधन
भरते थे
थोड़ी देर ठहर कर आगे
बढ़ जाते थे
कागज की नावें सिर्फ
बारिशों में चलती थीं
बाकी दिन उसे सहेज कर
रखते थे
जब भी बारिश होती
कागज की नावें बेचैन
होने लगती थीं
वे कहती थीं
हमें बाहर निकालो
ये हमारे सैर के दिन हैं
उनके साथ हम भी अपने
पाल खोल लेते थे और
जल पथ की यात्रा पर
निकल जाते थे |
भद्रजन
भद्रजन उस तरह
नही खाँसते
जैसे गाँव का कोई आदमी
खाँसता है
भद्रजन खांसी को
कलात्मक बना देते हैं
वे इतने धीमें-से खाँसते हैं कि
पास के आदमी को पता
नहीं चलता है
गाँव का आदमी अपनी अभिव्यक्ति
को छिपा नहीं पाता और
वेग के साथ खाँसता है
लोग सुन कर डर जाते हैं
वे अपनी स्वाभाविक क्रिया
स्थगित नहीं करते
भद्रजन भले ही उनका
मजाक उड़ायें वे उनकी
परवाह नहीं करते
गाँव का आदमी
जैसे होता है वैसा दिखता है
लेकिन भद्र आदमी को सभ्य
होने का नाटक करना
पड़ता है
महान कवियों
महान कवियों !
ऐसी भाषा में मत लिखो
कि जिसके लिये हमें अनुवाद की
जरूरत पड़ जाय
अपनी भाषा में विदेशी शब्द
और बिम्ब मत आयातित करो
तुम जिन लोगों के बीच रहते हो
उनकी भाषा में लिखो
उनके दुख दर्द की बातें करो
बौद्धिकता और मैनेरिज्म दिखा कर
हमे चमत्कृत मत करो
इतना जटिल लिखोगे तो हम
तुम्हें पढ़ना बंद कर देंगे
तुम्हारी कविताएं किताबों में
कैद होकर रह जाएंगी
पढ़ने के लिये कोई नहीं खोलेगा
कोई पन्ना
हमारे सामने महानता का ढोंग
मत करो
न दिखाओ देह मुद्राएं
हमने बड़े-बड़े विदूषक देखे हैं
एक अच्छे कवि की तरह
कविता–पाठ करोगे तभी हम
तुम्हें सुनेंगे
अपनी तरह से लिखना
सब लोग अपनी अपनी
तरह से लिखते हैं
कुछ लोग इतने इत्मीनान के साथ
लिखते हैं कि अगर उन्हें
तीन घंटे की परीक्षा में बैठा
दिया जाय तो वे छः घंटे में
प्रश्नपत्र नहीं हल कर सकते
कुछ लोग लिखने में हड़बड़ी करते हैं
उनके बारे में पिता कहते थे कि वे
नौ माह के पहले इस दुनिया में
आ गये थे और अपना हुनर दिखाते
रहते हैं
अगर उन्हें सड़क पार करनी हो तो
दुर्घटनाओं की परवाह नहीं करते
कूद कर निकल जाते हैं
पिता की लिखावट इतनी साफ थी कि
उसे नजर का चश्मा उतार कर
पढ़ा जा सकता था
लेकिन मैं इतना नाकारा निकला कि
अपने लिखे हुये को नहीं पढ़ पाता था
मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि
जो जिस प्रकृति का होता है
उसका प्रमाण उसके लिखे हुये में
दिखाई देता है
बड़े-बड़े अपराधियों को उनके लिखने
के आधार पर पकड़ा जा सकता है
जबसे मुझे इस तथ्य का पता लगा
मैं सावधान होकर लिखने लगा।
हाजिरजबाबी
दस मील पैदल चलने के बाद
जब पिता इजलास पर पहुंचे
तो हाकिम ने फ़ाइल देखते हुए कहा
कुछ पढे लिखे हो
पिता ने जबाब दिया
पढे लिखे होते तो आपकी
कुर्सी पर न बैठे होते
पिता का जबाब सुनकर
मनहूस-सा दिखनेवाला हाकिम
ठठा कर हँस पड़ा
बोला- भले ही मैं पढ़ा लिखा हूँ
लेकिन तुम्हारी तरह हाजिरजबाब
नहीं हो सकता
अपनी हाजिरजबाबी की बदौलत पिता
मुकदमा जीत गये थे
पिता की हाजिरजबाबी जवार में
मशहूर थी
वे अपने इस हुनर से बड़े-बड़े
मसले सुलझा देते थे
एक दिन कहने लगे कि
जब यमराज आएगा तो उसे भी
उस हाकिम की तरह लाजबाब
कर दूंगा।
पक्षियों को बुलानेवाला आदमी
मेरे गाँव में एक आदमी रहता था
जिसके बुलाने से पक्षी पेड़ों से
उतर आते थे
वे उसके कंधे और हथेली पर
बैठ जाते थे
वह पंख की तरह हाथ फैलाता था
पक्षी उसकी तरफ आने लगते थे
वह अपने कंठ से विभिन्न पक्षियों की
आवाज निकालता था
जैसे वह आदमी न होकर कोई
परिंदा हो
मैं उसकी तरह बनना चाहता था
लेकिन माँ कहती थी, उसके लिये तुम्हें
पक्षियों की बोली–बानी समझनी
पड़ेगी
उनकी तरह उड़ना सीखना होगा
और यह कठिन काम है
मेरी जिद्द थी कि मैं भी
पक्षियों को बस में करने का हुनर
हासिल करूंगा
मैं उससे पक्षियों को बुलाने
की कला सीखने लगा
इसी बीच बहेलिये आ गये
उनके कंधों पर तीर –धनुष नहीं
बंदूके थीं और आंखे हिंसा से
भरी हुई थीं
उन्हें देखकर पक्षी जंगल की तरफ
उड़ गये और वह आदमी भी
अचानक गुम हो गया |
सुनयना मजूमदार
अपने युवा दिनों में
कितनी शोख और दिलकश
दिखती थी सुनयना मजूमदार
नाभि दर्शना साड़ी पहने
जुड़े में वेणी लगाए
वह जब हौले-हौले चलती थीं
तो लोगों की साँसे रुक जाती थीं
किसी संगीत सभा में जब वह
रबीन्द्र संगीत गाती थीं तो उनके
कंठ में सरस्वती उतर आती थी
लोग हो जाते थे विस्मित
जब वह चलती थी तो देह की धारियाँ
सुडौल नितंबों के साथ लय में
हिलती थी
उम्र के साथ उनकी देह बोझिल
हो गयी है
चेहरे पर पहले जैसी रौनक
नहीं रही
अब उनका सांवला रंग भी गाढ़ा
होता जा रहा है
वह पचास की उम्र लांघ चुकी हैं
दाम्पत्य ने उनका सौन्दर्य ही नहीं
खिलंदड़पन भी छीन लिया है
किसी वक्त गौरैये की तरह फुदकती थी
सुनयना मजूमदार
अब पहले जैसी फुर्ती नहीं रही
मेरे ख्वाबों के राहगुजर पर वह
अक्सर दिखाई दे जाती हैं
मेरे हाथों में हाथ डाले, तनिक मुझे
झुका कर मेरे कानों में प्रेम का
कोई न कोई मंत्र फूँकती रहती हैं
यातायात
जो पैदल चलते थे
उनके पास स्कूटर हैं
स्कूटर सवार लोग तरक्की करके
कार चालक हो गये हैं
जिनके पास कार थी
उनमें से कई लोग हवाईजहाज
से उड़ने लगे हैं
यातायात के साधन बदलने से
लोग भी बदल गये हैं
जिनके पास कार है वे कार विहीन
लोगों से दूर रहते हैं
रास्ते में कोई मिल जाय तो
कार का रास्ता बदल देते हैं
हवा में छलांग लगानेवाले प्रभुजन
इतना ऊंचा उड़ते हैं कि उन्हें
बाकी लोग चीटियों जैसे लगते हैं
इस आधुनिक समय में आदमी
आदमी नहीं रहा यातायात का गुलाम बन गया है
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स्वप्निल श्रीवास्तव
510 – अवधपुरी कालोनी – अमानीगंज
फैजाबाद – 224001
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