
सुरेन्द्र प्रजापति की इन कविताओं में प्रेम, मानवीय संबंधों की ऊष्मा, सामाजिक विडंबनाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के संकट की अलग-अलग छवियाँ मिलती हैं। उनकी संवेदना का विस्तार निजी अनुभवों से लेकर व्यापक सामाजिक यथार्थ तक है। ‘उर्वरता की कामनाएँ’, ‘तुम्हारा आना’ और ‘जो तुम तो’ जैसी कविताओं में प्रेम केवल किसी दूसरे की उपस्थिति से उपजा आनंद नहीं, बल्कि आत्मबोध और सृजन का माध्यम है। यहाँ प्रिय की उपस्थिति व्यक्ति के भीतर एक नई दुनिया रचती है और अनुपस्थिति विरह को सौंदर्यबोध में रूपांतरित करती है। इन कविताओं की भाषा में कोमलता, प्रकृति के बिंबों की सजीवता और भावनाओं को अभिव्यक्त करने की सहज आकांक्षा है। इसके बरक्स ‘एक बहुत ज़रूरी संवाद’ में कवि की दृष्टि निजी संबंधों की परिधि से निकलकर हमारे समय की राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक जटिलताओं तक पहुँचती है। यह कविता संवादहीनता, वैचारिक कट्टरता, सत्ता के अहंकार और मनुष्य की सुविधाजनक चुप्पी पर प्रश्न उठाती है। स्त्री, किसान, मज़दूर, बच्चे और वृद्ध के जीवन-संघर्षों को सामने लाकर कवि लोकतंत्र की अवधारणा को उसके मानवीय आधार पर परखता है। इस कविता का केंद्रीय आग्रह है कि असहमति को शत्रुता में बदलने के बजाय दूसरे के अनुभवों को सुनने और समझने की क्षमता विकसित की जाए। हालाँकि कविता का विस्तार कहीं-कहीं उसके कथ्य को घोषणात्मक बनाता है और कुछ विचारों की पुनरावृत्ति उसकी सघनता को प्रभावित करती है, फिर भी उसकी मूल चिंता हमारे समय की एक वास्तविक और गंभीर समस्या को रेखांकित करती है।
‘सीधी बात’, ‘दया की शर्त पर नहीं’ और ‘बहुत मुश्किल कि’ में कवि का स्वर अधिक प्रतिरोधी, प्रश्नाकुल और विचारप्रधान हो जाता है। वह इतिहास, हिंसा, नैतिकता, सामाजिक असमानता और प्रचलित मान्यताओं के भीतर छिपे अंतर्विरोधों को उजागर करने का प्रयास करता है। ‘दया की शर्त पर नहीं’ अपनी संक्षिप्तता और स्पष्ट वैचारिक आग्रह के कारण उल्लेखनीय है। इसमें जीवन की आकांक्षा किसी की कृपा या सहानुभूति पर निर्भर रहने से इनकार करती है और मनुष्य के सम्मान को केंद्रीय मूल्य के रूप में स्थापित करती है। ‘बहुत मुश्किल कि’ में दृश्य और अदृश्य, सत्य और असत्य तथा उपलब्धि और नैतिकता के बीच के संबंधों को लेकर उठाए गए प्रश्न कवि की संशयशील दृष्टि को सामने लाते हैं। विशेष रूप से भूख से जूझते बच्चे और सृजन पर आघात करने वाले संत के बिंब सामाजिक यथार्थ और नैतिक पाखंड के बीच का विरोधाभास उजागर करते हैं। फिर भी इन कविताओं में कहीं-कहीं बिंबों की अस्पष्टता, विचारों के बीच अपर्याप्त संबंध और भाषा की असमानता अर्थ की प्रभावशीलता को सीमित करती है। कुछ स्थानों पर कविता विचार को अनुभव में रूपांतरित करने के बजाय सीधे निष्कर्ष की ओर बढ़ती दिखाई देती है। इसके बावजूद इन रचनाओं का महत्त्व इस बात में है कि वे प्रेम को सामाजिक संवेदना से, निजी स्वतंत्रता को मानवीय गरिमा से और कविता को अपने समय के नैतिक प्रश्नों से जोड़ती हैं। सुरेन्द्र प्रजापति की काव्य-दृष्टि की संभावनाएँ इसी अंतर्संबंध में निहित हैं; उनकी कविताएँ जब विचार को जीवन के ठोस अनुभव और सघन बिंबों में ढालती हैं, तब उनका स्वर अधिक विश्वसनीय, प्रभावशाली और काव्यात्मक बनकर उभरता है।
उर्वरता की कामनाएँ
इच्छाओं की मरुभूमि में
कभी दरारें नहीं आतीं
तपती धूप है, सैलाब आता है
बवंडर चलते हैं, धरती धसक जाती है।
वक्त का पहिया चलता है
सदियों की कठोरता
टूट-फूट कर धूल-कण हो जाती है।
तब भी
युगों तक बनी रहती हैं
उर्वरता की कामनाएँ…।
तुम्हारा आना
तुम्हारा आना
कुछ हँसकर बताना होता है।
सुबह की चलती हवाएँ
खिलते हुए कचनार
डोलती हुई लताएँ
ओस में भीगी दूब घास
सरसराती हुई पेड़ों की पत्तियाँ
लौटते हुए कुछ अलबेले शब्द
पंक्तियों में कुछ ऐसे चमकते हैं
जैसे बादलों से निकलता हो इंद्रधनुष।
तुम्हारा आना आनंद है,
तुम्हारा होना उतना ही सुंदर।
तुम्हारे नहीं आने का मतलब
मेरे मन में प्रेम की वह वीणा है
जो विरह की तान पर
सौंदर्य का गान लिखती है।
तुम्हारा आना
खुलती हुई स्वप्न-खिड़की से
अपनी दुनिया को बताना होता है।
जो तुम तो
तुम और तुम्हारी सुंदरता
मेरे साथ रहती है—
मेरे आनंद का पर्याय
मेरे प्रेम का अविस्मरणीय आलोक।
तुम कहती हो—
मैं तस्वीर में एक मूर्त रचता हूँ,
स्वप्निल आभा का विस्तार करता हूँ।
मैं कहता हूँ—
तुम्हारी तरह
मुझे भी मन की खूबसूरती में दिलचस्पी है।
देखो,
उस भावनात्मक परछाई को—
वह तुम्हारी ही है
तुम्हारी तरह सौंदर्यमयी
जिसमें चाहनाओं का आकाश है
और उपमाओं का कोई अनकहा संसार।
तुम अपने मन की सतह से
अपना रूपक खोजती हो
और मैं
अपने रूपकों से
तुम्हारे भीतर की उस सतह को पढ़ता हूँ
जहाँ भावनाएँ
धीरे-धीरे आकार लेती हैं।
एक अदृश्य शिल्प की तरह
वहीं
आनंद का उत्सव जन्म लेता है
वहीं प्रेम
अपनी सबसे सुंदर भाषा का निर्माण करता है।
तुम जानती हो
मानती भी हो—
तुम होती हो तो
मैं अपने भीतर का वह सब जान लेता हूँ
जो शायद तुम्हारे बिना
कभी जान ही नहीं पाता।
तुम्हें जानना
मेरे लिए
तुम्हारे होने को जानना भर नहीं—
अपने होने के
एक नए सृजन को जान लेना है।
तुम जो हो,
उसी में
मेरे प्रेम का पूर्ण अर्थ है।
और तुम होती हो तो
मैं भी
वह सब कुछ जान लेता हूँ—
जो तुम हो।
एक बहुत ज़रूरी संवाद
हम कई दिनों से एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं
सिर्फ़ अपने-अपने मतलब की
अपनी ही बात को मनवा लेने की फ़िराक में
लेकिन एक-दूसरे को सुन नहीं रहे हैं।
हमारे बीच शब्दों की कमी नहीं है—
न विचारों की, न कीमती जिद्द की।
कमी है तो बस उस जगह की
जहाँ शब्द उतरकर मनुष्य तक पहुँच सकें
और बोल सकें कुछ उसूलों की भाषा।
हर तरफ़ आवाज़ें हैं, बहुत-सी आवाज़ें—
बहुत सारे शोर और तेज़-तर्रार लोग।
बचत् हमारी दिनचर्चा में शामिल है
कोई परिवार बचा रहा है, कोई जाति
कोई अपनी कुर्सी, कोई धर्म
और कोई चुपचाप अपने घर की
आख़िरी रोटी बचाने में लगा है।
कोई सब कुछ बचाने में सब कुछ ठगा है,
लेकिन देश बचाने में कौन लगा है?
हमने बहस को इतना तेज़ कर दिया है कि
उसमें संवाद की धीमी आवाज़
किसी को सुनाई ही नहीं देती
अपनी ही बात घिसती-पिसती दम तोड़ देती है।
अब असहमति बगावत है, सवाल अपराध है
चीखना-चिल्लाना अशांति लाता है
और चुप रहना सबसे अच्छी समझदारी है।
लेकिन एक दिन हमें बैठना होगा—
बिना किसी मंच के, बिना किसी माइक के
बिना किसी झंडे के, बिना किसी नारे के
सिर्फ़ संवाद की तरह, विवाद की तरह नहीं
सचमुच के मनुष्य की तरह।
तुम अपनी बात कहना, मैं बीच में नहीं टोकूँगा
अपनी बारिश में नहाए, अपने बसंत में जोगाए
नदी, पहाड़, जंगल की बात करना।
अपनी भूख-प्यास,
अपने फ़साद की बातें करना—
मजाल है कि मैं बीच में बोलूँगा।
मैं अपनी बात कहूँगा, शायद रोऊँ भी
तुम उसे ख़ारिज करने से पहले
एक बार समझने की कोशिश करना
ज़रूरी हो तभी कुछ कहना।
हो सकता है हम दोनों ग़लत हों
यह भी कि दोनों सच से अनजान हों।
सम्भव है सच हमारे बीच गुमसुम बैठा हो
और हम अपनी-अपनी तरफ़ से
सिर्फ़ उसे घसीट रहे हों।
आओ, एक बार यह भी पूछें कि
जिस आदमी से हम लड़ रहे हैं
क्या वह सचमुच हमारा दुश्मन है
या हमारे बीच खड़ी ईर्ष्या की दीवार का
एक और सबसे जुझारू शिकार?
आओ, उस स्त्री की बात सुनते हैं
जिसे सदियों से घरों में क़ैद कर रखा गया
जिसे बोलने से पहले इजाज़त माँगनी पड़ी
जिसे परिवार का सदस्य नहीं
उपभोग की वस्तु मान लिया जाता है।
उस किसान की,
जिसकी फ़सल डूबने से पहले
उसका भरोसा डूब जाता है बाढ़ में।
उस मज़दूर की, जिसके हाथों ने शहर बनाए
और जिसके हिस्से में शहर का फ़ुटपाथ आया
जिसकी थकी हुई नींद पर लाठी बरसाई जाती है।
उस बच्चे की, जो किताब में
इंसानियत पढ़ता है और स्कूल से लौटते हुए
भेदभाव का अर्थ सीखता है
बेहिसाब तर्कों में छुआछूत दिखता है।
और उस बूढ़े आदमी की भी, जो हर शाम
दरवाज़े पर बैठकर लोगों को लौटते हुए देखता है
और सोचता है— कहाँ चला गया वह समय
जब पड़ोसी का दुःख अपना दुःख होता था?
एक बहुत ज़रूरी संवाद
आज उनसे भी होना चाहिए जो
हमारे लिए निर्णय लेते हैं
हमारे ही नफ़ा-नुकसान के फ़ैसले करते हैं।
उन्हें बताना होगा कि लोकतंत्र सिर्फ़
चुनाव के दिन कतार में खड़े होने का नाम नहीं है।
लोकतंत्र वह क्षण भी है जब सत्ता एक अकेले
नागरिक की आवाज़ सुनती है और उसे
कमज़ोर समझकर अनसुना नहीं करती।
उन्हें बताना होगा कि प्रश्न करना देशद्रोह नहीं है,
कि विरोध व्यवस्था को तोड़ना नहीं है
कि नागरिक सिर्फ़
तालियाँ बजाने के लिए पैदा नहीं हुआ है।
हमें अपने भीतर झाँकना होगा—
कहीं ऐसा तो नहीं कि
हम अपने पक्ष की आज़ादी चाहते हैं
और दूसरे की आवाज़ से डरते हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि
हम न्याय की बात तभी करते हैं
जब अन्याय हमारे दरवाज़े तक पहुँचता है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि
हमने अपने सुविधाजनक मौन को
विवेक का नाम दे दिया है?
इसलिए आज कोई फ़ैसला मत करो।
आज एक-दूसरे को सुनो।
जिसके पास सबसे कम शब्द हैं
शायद उसके पास कहने के लिए
सबसे अधिक जीवन है।
जिसकी आवाज़ सबसे धीमी है
शायद उसने सबसे अधिक सहा है।
और जो सबसे अधिक बोल रहा है,
संभव है वह अपने भीतर की
किसी गहरी चुप्पी से भाग रहा है।
बात इतनी-सी है—
हमें एक-दूसरे को हराना नहीं है,
हमें एक-दूसरे तक पहुँचना है।
क्योंकि जब संवाद मरता है
तो सबसे पहले भाषा मरती है
फिर संवेदना
फिर भरोसा
और अंततः मनुष्य मर जाता है।
इससे पहले कि हमारे बीच की
आख़िरी खिड़की भी बंद हो
उम्मीद रेत की तरह बह जाए
इससे पहले कि हम एक-दूसरे के चेहरों को
सिर्फ़ पहचान-पत्रों, जातियों, धर्मों
और विचारधाराओं में बाँट दें—
आओ
एक-दूसरे के सामने बैठें।
तुम अपनी बोलो
मैं सुनूँ।
मैं अपनी बोलूँ
तुम सुनना।
शायद इसी सुनने के बीच
बची हुई मनुष्यता की
कोई छोटी-सी लौ फिर दिखाई दे,
और शायद वहीं से एक बेहतर दुनिया की
शुरुआत हो।
और यह
किसी घोषणा से नहीं
किसी नारे से नहीं
बल्कि
एक बहुत ज़रूरी संवाद से होगा।
सीधी बात
एक बड़ा बैनर गिरती हुई दीवारों पर चमक रहा है।
अतीत के पन्नों में भूगोल का अवशेष है
जिसमें दंगों में मारे गए लोगों के चेहरे झाँक रहे हैं
कि अपनी ही लाश को पछतावे से ताक रहे हैं।
बड़ी विचित्र बात है कि
आँकड़ों में अलिखित इतिहास के पन्ने फड़फड़ाते हैं।
ये चमचमाते हुए गुंबद, नक्काशीदार कंगूरे
गहरी उदासी, थकान और चिलचिलाती धूप में पकते हैं
और जिस्म की मंडी में बैठा रईस इंसान
इसका घिनौना व्यापार करता है।
यहाँ खोने के लिए कुछ भी नहीं है
एक पोस्टर की तरह चिपका दिए जाते हैं आदमी
रहस्यमय मौन की दीवार पर
अपनी घुटन और ख़ामोशी से बाहर।
फिर एक खोजी दिनचर्या के बाद
वापस लौटा दिए जाते हैं अपनी ही दशा में।
वैसे सीधी सी बात है कि सच
हमेशा जुर्म के चौराहे पर सुबक रहा होता है।
सवाल भीड़ में उठते शोर के तापमान का नहीं है
बल्कि उस खींचती रेखाओं का है
जो इस शोर में भी सुरक्षित हैं।
वैसे जब हम हारते हैं
सच उसी चौराहे पर साथ छोड़ देता है
जैसे फूल में छिपा शूल हृदय को वेध देता है।
आदतों और विकारों को ढोता हुआ आदमी अक्सर संदेह में नप जाता है।
खूब उजाले में ही ईमानदारी
नैतिकता में एक अद्रश्य सुराख करती है
और अहले सुबह ही प्रगति-गीत गाए जाते हैं,
रात के अंतिम प्रहर में ही
शोक का विलाप बढ़ जाता है।
दया की शर्त पर नहीं
अपनी याचना
और मौत की सहानुभूति पर
हम जीना नहीं चाहते।
एक पल साँस लेना भी नहीं—
इस शर्त पर तो
और भी नहीं
कि तुम मुझ पर
दया बरसाओ।
अच्छा होगा
जीने की हज़ार ख़्वाहिशें
बिखर जाएँ
इस संपूर्ण धरा पर
जीवन का
सम्मान करते हुए।
बहुत मुश्किल कि
बहुत मुश्किल है
दृश्य को अद्रश्य की तरह देखना
और प्रत्यक्ष को अप्रत्यक्ष की तरह
सच को झूठ की तरह देखना
और झूठ को उपलब्धि की तरह।
यह दृष्टि की उपलब्धता का पुरस्कार है
या मचलती जिज्ञासा का?
यवनिका को देखने के लिए
मैं कितना बेचैन हूँ!
कितना दूर सफ़र करता हूँ
भीरुता के संकीर्ण मार्ग पर
और सादगी की मैली चादर ओढ़कर
कितना मग्न होता हूँ!
कभी पहुँच जाता हूँ
बादलों के पार क्षितिज पर
जहाँ एक बच्चा लक्ष्य को नहीं
भूख पर निशाना लगाता है
और एक संत वरदान में
सृजन पर घात लगाता है।
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सुरेन्द्र प्रजापति
जन्म- 8 अप्रैल 1985
आवासीय पता:-
घर-असनी, पोस्ट-बलिया
थाना-गुरारू, जिला-गया, बिहार
पिन न. 824205
ईमेल-surendraprar01@gmail.com
Mob. 7061821603
9006248245
पिता-स्व०.जगदीश
माता-स्व०.मैना देवी
शिक्षा-मैट्रिक
शौक-साहित्य की पुस्तकें पढ़ना, कहानी कविताएं लिखना,
ग्रामीण चहल-पहल, धरती, प्रेरणा अंशु एवं कुछ पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। समालोचन, पुरवाई, पहलीबार, अनहद कोलकाता, साहित्य रचना जैसे महत्वपूर्ण बेव पोर्टल पर रचनाएं प्रकाशित।
एक कविता संग्रह –उम्मीद की किरणें – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से 2026 में प्रकाशित।






