वह जो उनका अक्षय आश्रय है
शुभ चक्रबर्ती

युद्ध में युवा कवि विल्फ्रेड ओवेन की असामयिक मृत्यु के बाद उनकी माँ, सुज़ैन एच. ओवेन ने एक बार रवींद्रनाथ को एक पत्र लिखा था। नहीं, उन्होंने सिर्फ पत्र ही नहीं लिखा था, बल्कि अपने कलेजे के टुकड़े, पच्चीस वर्षीय पुत्र विल्फ्रेड ओवेन की मृत्यु के समय की कुछ बातें भी लिखी थीं। क्या था उस पत्र की मृत्युमयी बातों में? टूटते हुए हृदय के साथ वॉर-पोएट (युद्ध-कवि) विल्फ्रेड की माँ ने रवींद्रनाथ को लिखा कि उनका बेटा युद्ध में शामिल होने के लिए फ्रांस गया था, और वह जाना ही उसका अंतिम जाना साबित हुआ। जाने से पहले युवा कवि विल्फ्रेड अपनी माँ से विदा लेने आया था। माँ और संतान के इस विछोह का साक्षी समुद्र के जल में जगमगाती वह रोशनी की किरण बनी। आसन्न विछोह की वेदना से उस समय उनका भरा हुआ हृदय टूट रहा था। कवि बेटा अपनी माँ के सामने रवींद्रनाथ की कविता की कुछ पंक्तियाँ अपने मन से दोहरा रहा था: ‘जाने के दिन यह बात/बताकर जाना चाहता हूँ-/जो देखा है, जो पाया है, उसकी कोई तुलना नहीं…’
जब विल्फ्रेड की पॉकेटबुक (जैबी डायरी) उनकी माँ के पास वापस आई, तब उनकी माँ ने देखा कि बेटे ने रवींद्रनाथ की ये पंक्तियाँ डायरी में लिखकर नीचे रवींद्रनाथ का नाम लिख रखा है। सुज़ैन यकीनन इस लिखावट को इस रूप में नहीं चाहती थीं, क्योंकि क्या कोई माँ अपने पुत्र की मृत्यु से जुड़ी छाया को सहना चाहती है? सुज़ैन चाहती थीं कि उनके बेटे द्वारा लिखी गई कविताओं को रवींद्रनाथ पढ़ें। लेकिन पॉकेटबुक के जिस पन्ने पर विल्फ्रेड ने वे पंक्तियाँ लिखी थीं, वह निश्चित रूप से पूरी कविता नहीं थी! इसके बाद भी और पंक्तियाँ होंगी, होनी ही चाहिए—ऐसा ही विल्फ्रेड की माँ सुज़ैन उस समय सोच रही थीं। इसलिए उन्होंने रवींद्रनाथ को पत्र में लिखा: ‘यदि आप बुरा न मानें, तो क्या मुझे बताएँगे कि आपकी किस पुस्तक में यह पूरी कविता मिलेगी?’
हम स्तब्ध रह जाते हैं, लेकिन हम स्तब्ध क्यों होते हैं, उस समय यह ध्यान नहीं रहता कि यही स्तब्धता किसी दिन हमें गहरे दर्द के आंसुओं से भर देगी। तब कुछ लोगों की आँखें नम हो जाएँगी। ‘मैं’ का मन छटपटाने लगेगा। लेकिन सुज़ैन वह पूरी कविता क्यों चाह रही थीं? वह तब तो वह जान चुकी थीं कि उनका दुलारा बेटा अब इस धरती पर नहीं घूमेगा, वह जान चुकी थीं कि उनका विल्फ्रेड घृणा की सामग्रियों को छोड़कर मृतकों के पास वापस लौट गया है। ‘कोहरे से ढकी धुंधली तख्तियों के बीच हरी रोशनी में उसे देखकर मुझे लग रहा था, जैसे वह हरे समुद्र में डूब रहा है।’ तब तक युद्ध भी समाप्त हो चुका था। लेकिन, क्या उन्होंने उस कविता में कुछ ढूँढ निकाला था? क्या उन्होंने जीवन के साथ, उन स्नेह भरे प्रसंगों को जोड़ लिया था, मिला लिया था? जब सुज़ैन यह पत्र लिख रही थीं, तब रवींद्रनाथ लंदन में थे, और हमें इस प्रसंग की जानकारी रथींद्रनाथ ठाकुर की ‘पितृस्मृति’ से मिलती है।
क्या ऐसी ही कुछ बातें, गीत या यादें हमने भी कभी अपने जीवन में नहीं समेट ली हैं? क्या मृत्यु के पथ पर चलता कोई व्यक्ति जीवन से जोड़कर किसी कविता की पंक्तियों को याद करता है? क्या हम अपने हर दिन के मृत्यु-रूपी मार्ग में ऐसी किसी कविता के संदर्भ को शामिल नहीं करते? हमने किया है, और इस तरह अपनाना ही तो अपने पूरे जीवन को समेटकर रखना है, प्रेम में मन को जगाए रखना है। लेकिन यह जो समेटने का प्रसंग आया, क्या यह भी हमारे अनुभवों से नहीं मिला है? विल्फ्रेड की मृत्यु के बाद उनकी माँ सुज़ैन चाहती थीं कि वह पूरी कविता मिलना बेहद आवश्यक है। लेकिन क्यों आवश्यक है? क्या वह विश्व-प्राण के साथ उस कविता को मिला लेना चाहती थीं? या फिर पुत्र को खो चुकी माँ, पुत्र-शोक के तमाम साधनों के बीच उस कविता के आश्रय से स्वयं को जीवित रखना चाहती थीं? क्या केवल एक कविता किसी इंसान को इतना बड़ा आश्रय दे सकती है, जीवन का मार्ग खोल सकती है? क्या यह भी संभव है? उन्होंने अपने पुत्र की मृत्यु के साथ उस कविता को किस तरह एक कर लिया? जीवन के हर क्षण में वह आत्मा के उस मिलन को कहाँ छू पाई थीं?
क्या रवींद्रनाथ को लेकर भी हमें ऐसा ही एक प्रसंग याद नहीं आता, जब माधुरीलता की मृत्यु के बाद उन्होंने लिखा था, “यह बात सदा सुनता हूँ, ‘चली गई’, ‘चली गई।’ फिर भी कहता हूँ/मत कहो, ‘वह नहीं है।’ वह बात झूठ है, इसलिए किसी भी तरह सही नहीं जाती, मर्म में जाकर चुभती है।” शायद जीवन का यही बोध उनकी साधना के आसन पर प्राणों का मिलनोत्सव बन गया था, तभी तो वह कह सके थे—’मैं वहाँ प्राण मिलाना चाहता हूँ, जहाँ होना और न होना दोनों समान रूप से परिपूर्ण हैं।’
शायद इस विस्मय का स्पर्श रवींद्रनाथ ने अपने संपूर्ण जीवन-मार्ग पर पाया था, जब जीवन-देवता स्वयं आकर एक गहन आत्मीयता को छूते हैं। जो विश्व के तमाम प्राणों के माध्यम से, उनकी तीर्थयात्रा की धूल बनकर, विश्व-सत्ता के अपने गौरव में उद्भासित होता है। तभी मानो एक कविता आत्म-उपलब्धि का मार्ग बन जाती है—जीवन-देवता का एक प्रच्छन्न इशारा।
जो बाहर से देखते हैं, क्या वे जान पाएँगे कि भीतर निर्माण (सृष्टि) की एक प्रक्रिया चल रही है! तब ऐसा नहीं लगता कि यह सृष्टि केवल किसी व्यक्तिगत ‘मैं’ का प्रलय है। क्या सृष्टि के भीतर इतना अंधकार होता है? क्या हम इस तरह से नहीं सोचते! कभी-कभी जब हम उस प्रलय, उस अंधकार को ही सत्य मान बैठते हैं; जब इस सृष्टि को ही प्रलय समझकर भूलवश मन के भीतर विष घोल लेते हैं, तब वह हमारा काई जमा हुआ (कलुषित) मन होता है, जो ‘मैं’ के आवरण में तैरता रहता है। उसकी भी तो जीवन-रूपी नाव को तैराने की इच्छा होती है, क्या वह मूल्यहीन है? शायद नहीं। जो जीवन की हर वस्तु के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं, वही तो कह सकते हैं—’जीवन को सत्य के रूप में जानना हो, तो मृत्यु के माध्यम से ही उसका परिचय पाना होगा।’ तब क्या यह महसूस नहीं होता कि सृष्टि के प्रलय से भिन्न कोई अंधकार हमें उनके समीप पहुँचा देता है? कोई जीवन के केंद्र तक कैसे पहुँच जाता है? केवल कविता की कुछ पंक्तियों के सहारे!
क्या जीवन से जुड़े प्रेम के बल पर कोई स्वर्णिम विश्वास अर्जित कर सकता है? शायद कर सकता है, वरना सुज़ैन उस कविता की संपूर्णता को क्यों पाना चाहतीं! क्यों? क्योंकि जब कोई सत्य के एकांत में अपनी सत्ता को स्पर्श करता है, तभी एक व्यक्तिगत जलचित्र साकार हो उठता है। तभी वह विश्व-हृदय में विचरण कर सकता है।
कभी-कभी हम विश्व-संसार से अपने मन को अलग कर लेते हैं। हमें ऐसा क्यों लगता है, हम उस समय संसार से मन को क्यों हटा लेते हैं? इस समय हमारा सांसारिक मन किसी न किसी चीज़ को थामकर खुद को तृप्त करना चाहता है। तब वह उस क्षणिक सुख को ही सत्य मानकर उससे लिपट जाता है। क्षणिक जीवन-बोध में हम उसकी एक छवि हर पल ढोते रहते हैं। तब समय का एक बड़ा हिस्सा उस व्यक्तिगत सुख के पीछे ढक जाता है। जिस ‘मैं’ की मृत्यु हर क्षण अनिवार्य होती जा रही है, उसकी चेतना में भी क्या क्षण भर का सुख ही एकांत का सुख है? क्या यह एकांत का सुख कभी-कभी हमारे व्यक्तिगत ‘मैं’ के शोक की धुंधली छाया को मिटा सकता है? और यदि यह शोक की छाया ‘विश्व-मैं’ का शोक हो, तो? क्या ये प्रश्न कभी हमारी असफलता या सफलता के गहरे और मानसिक पक्ष के प्रच्छन्न भाव को उजागर नहीं करते? और जब कुछ लोग यह मानते हैं कि यह भाव रवींद्रनाथ का एकांत अपना भाव है, तब क्या हम व्यक्ति के भीतर की संपूर्णता को ध्यान में रखकर यह कहते हैं, या फिर किसी मनुष्य के दैनिक जीवन के संचय को याद रखते हुए कहते हैं? क्या उस संचय के मार्ग पर हमारा कोई सत्य जागृत रहता है? लगता है, नहीं रहता। तो फिर एक कविता किसी इंसान को इस तरह जीवन से कैसे सराबोर कर सकती है? क्या कर सकती है? क्या ऐसा संभव है? शायद संभव है, क्योंकि ‘अक्सर किसी प्रियजन की मृत्यु जो वैराग्य लाती है, उसका अर्थ यह है कि तब घायल प्राण सब कुछ त्यागकर किसी ऐसी चीज़ में जीना चाहता है, जिसका न कोई क्षय हो, न विलोप।’ ठीक यहीं पर जो कहा गया है—’जिसका न क्षय है, न विलोप’, वह हमारे दैनिक जीवन की सभी घटनाओं के बीच प्रवाहित हो रहा है। वह केवल जीवन की तरंग नहीं है। वह तो ‘शाश्वत की निर्मल निस्तब्धता के बीच बैठकर अपनी अंतरतम सत्य-वाणी को स्वयं के भीतर से पुनरुद्धार करना’ है। यह स्वयं के साथ परम एकांत का संबंध स्थापित करना है।

’इस स्थान पर साथ पाने की कोई आशा नहीं है, अकेले ही मन का दीपक जलाना होगा।’ लेकिन मन के दीपक की वह लौ किसके लिए आगे बढ़ानी होगी, क्या वह मेरी ही तरह कोई और है, जिसे हम अपने प्राणों में धारण करते हैं? हमें प्राणों की धारा से बहुत कुछ मिलता है, इसीलिए तो अन्य प्राणों के साथ हमारे प्राणों का संबंध एकांत रूप से हृदय-लोक में विस्तृत होता है। जीवन में जब सत्य का कोई कोना खाली हो जाता है, तभी क्या ऐसा नहीं लगता कि मृत्यु नहीं, बल्कि प्राण ही प्राणों का स्पर्श चाहता है! ‘वह किसी भी तरह मृत्यु से छला जाना नहीं चाहता।’ कभी-कभी हम अपनी दृष्टि को अपने जीवन की व्यक्तिगत घटनाओं से जोड़कर एक महान ‘मैं’ के सामने स्मृति-चिह्न जगाकर रखते हैं। जो केवल अपने हृदय के विस्तृत और एकांत मार्ग पर ‘मैं’ के पार जाकर स्वयं को विश्व-सृष्टि की ओर अग्रसर करता है। ऐसे ही एक जीवन-सत्य को अपने मार्ग और अपने कर्म में लेकर आगे बढ़ने की बात रवींद्रनाथ अपने संपूर्ण जीवन-प्रवाह में सोच सके थे। लेकिन खुद को आगे बढ़ाने की जो बात वे सोच सके थे, महान हृदय के कार्य में खुद को जोड़ सके थे, क्या वह केवल व्यक्तिगत ‘मैं’ के लिए था? ‘मैं केवल यही सोचता हूँ कि जब सत्य के दो विपरीत रूपों को देखता हूँ, एक तरफ स्नेह, तो दूसरी तरफ विनाश; एक तरफ निर्माण, तो दूसरी तरफ संहार। तब मैं किस पर बल दूँ?’ लेकिन जो चला जाता है, उस क्षति को हमें स्वीकार करना ही पड़ता है; और यदि मृत्यु जैसा कोई सत्य का आश्रय ही चला जाए? तब हमारा प्राण इस क्षति को कैसे सहन करेगा?
प्राणों को जगाए रखने के इसी कार्य में रवींद्रनाथ ने अपनी जीवन-शैली में निर्माण की समन्वित प्रतिमा को सत्य के मूल्य पर जीवन के हर बिंदु से स्पर्श किया है। इस स्पर्श के भीतर निर्माण का जो ‘मैं-रूप’ है, वह झड़ जाता है; तब केवल उस महान ‘मैं’ का ही एकमात्र परिचय रह जाता है। यदि हम ऐसे ही किसी संवेदनात्मक स्पर्श के बारे में विचार करें, तो समझ पाएँगे: ‘भिक्षा की झोली चाहे जितने भी अन्य सुखों से भर जाए, मेरे लिए बस वही एक सुख सुरक्षित रखना’, हमारे ‘मैं’ के साथ उस परम सत्ता को एक करके देखने का जो एकांत आयोजन वे करते जा रहे थे, क्या वह भी पीड़ा के बीच से होकर नहीं था? और पीड़ा जब मुक्ति का रूप लेकर हमारे भीतर से अनंत की ओर धकेलती है, तब ‘मैं’ का भाव फिर सिर उठाकर खड़ा नहीं हो पाता, वह मृत्यु के समक्ष जीवन को एक नए रूप में प्राप्त कर लेता है।
जब वे लिखते हैं ‘ओगो मरण, हे मोर मरण’ (हे मृत्यु, ओ मेरी मृत्यु), तब ‘मैं’ के कमरे का दरवाज़ा खोलकर क्या विश्व-प्रकृति के साथ अपनी प्रकृति के मेल को महसूस नहीं किया जा सकता? बिल्कुल किया जा सकता है, और किया जा सकता है इसीलिए तो रवींद्रनाथ का जीवन-प्रवाह और उनकी रचनाएँ ‘एक विश्वास’ के सत्य में मानो एक होकर विलीन हैं। यही विलीन रहना रवींद्रनाथ के सृजन का मार्ग और जीवन का अक्षय आश्रय है।
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शुभ चक्रवर्ती बांग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध कवि हैं। बांग्ला के साथ-साथ वे हिंदी और अंग्रेज़ी में भी लेखन करते हैं और विश्व साहित्य का अनुवाद करते हैं। वर्तमान में उनका साहित्यिक कार्य मुख्यतः रवीन्द्रनाथ ठाकुर और मिर्ज़ा ग़ालिब के साहित्य के अध्ययन, लेखन और अनुवाद पर केंद्रित है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर पर उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं— ‘तुमार सृष्टिर पथे’ और ‘छंदेर बंधने मुक्ति’। इसके अतिरिक्त ग़ालिब के पत्रों, कविताओं, शायरी तथा विभिन्न साहित्यिक विषयों पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। कविता, अनुवाद और भारतीय साहित्य की विविध परंपराओं पर उनका अध्ययन और लेखन निरंतर जारी है।
शुभ चक्रबर्ती
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