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संकलन “कविता से लंबी उदासी” की एक कविता

सपना                                  गाँव से चिट्ठी आई है                                                                         और सपने में गिरवी पड़े खेतों कीफिरौती लौटा रहा हूँपथराये कंधे पर हल लादे पिताखेतों की तरफ जा रहे हैंऔर मेरे सपने में बैलों के गले...

कहना सच को सच की तरह : विमलेश त्रिपाठी

कुछ अरसा पहले वागर्थ के संपादक विजय बहादुर सिंह ने अपने संपादकीय में एक बहुत ही अच्छी कविता लिखी थी। कविता के रूप में संपादकीय लिखने का शायद पहला सिससिला उन्होंने शुरू...

कथाकार मार्कण्डेय का न रहना

उनसे हमारा परिचय बस एक पाठक साहित्यकार का था। हमारी नजर में वे हमेशा एक बड़े कथाकार रहे। तमाम साहित्यिक गुटों से परे और बहुत सालों से चर्चा में न रह कर...

उसे सुनो कभी अपने एकांत में….

रविन्द्र, सच सिर्फ वही नहीं होता जो दिखता है, उसके आगे भी सच के कई छोर होते हैं। मुझे इस बात का कोई मलाल नहीं कि तुम उन छोरों तक पहुँचने की...

लौट आना चाहता हूँ…..

दोस्तों की शिकायतें बाजिब हैं, लेकिन क्या करूं कि कोई एक कहानी पूरी हो जाय। आपको जानकर शायद ही विश्वास हो कि मेरे पास १५ अधूरी कहानियाँ हैं, जो रोज रात को...

करता हूँ प्यार….

कहते हैं दुनिया जा रही नाउम्मिंदी की ओरसमय की पीठ पर रह गए हैं महजहमारी अच्छाईयों के निशानआज जो दिखतावह एक अंधी दौड़किसे किसकी फिकरभागते लोग बेतहासा स्वयं में सिमटे ऐसे सपनों...

विमलेश त्रिपाठी की गजलें.

तेरी ज़ुल्फों के आर पार कहीं इक दिल अजनबी सा रहता हैलम्हा लम्हा जो मिला था कि हादिसों जैसावो वक्त साथ मेरे हमनशीं सा रहता हैये जो फैला है हवा में धुंआ-धुंआ...

विमलेश त्रिपाठी, कुछ और कविताएँ

कविता से लंबी उदासीकविताओं से बहुत लंबी है उदासीयह समय की सबसे बड़ी उदासी हैजो मेरे चेहरे पर कहीं से उड़ती हुई चली आई हैमैं समय का सबसे कम जादुई कवि हूँमेरे...

अनहद की तरफ से प्रिय साथियों को होली की ढेर सारी रंग-विरंगी बधाईयाँ.....साथियों हमें बेहद खुशी है कि आप हमारे ब्लॉग को इतनी शिद्दत से पसन्द कर रहे हैं....यह सूचित करते हुए...

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