अमिता नीरव की कहानी ‘लाल चाय’ अपरिचित परिवेश में स्त्री की असुरक्षा, अंतर्बोध और भय की मनोवैज्ञानिक पड़ताल करते हुए समकालीन जीवन के उस अंतर्विरोध को उजागर करती है, जहाँ सहज मानवीय विश्वास और संभावित खतरे के बीच की दूरी लगातार अस्थिर बनी रहती है। गुवाहाटी की यात्रा के दौरान सुप्रिया के मन में उठती आशंकाएँ, उसके भीतर चलने वाला आत्मसंवाद, हर छोटी घटना को संभावित संकट के संकेत के रूप में देखने की विवशता और पति सुजोय की सहज निश्चिंतता के साथ उसका टकराव कहानी को गहरी मनोवैज्ञानिक विश्वसनीयता प्रदान करता है। लेखिका ने भय को किसी बाहरी घटना की प्रतिक्रिया भर न मानकर एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया के रूप में चित्रित किया है, जिसमें अनिश्चित परिस्थितियाँ, अपरिचित लोग, स्त्री की सामाजिक असुरक्षा और कल्पना की सक्रियता मिलकर आशंका का संसार रचते हैं। कहानी का शिल्प मुख्यतः स्मृति, वर्तमान अनुभव और अंतःसंवाद के आवागमन पर आधारित है, जिससे घटनाक्रम में तनाव क्रमशः बढ़ता जाता है और पाठक भी नायिका की आशंकाओं के साथ उस अनिश्चित यात्रा का सहभागी बन जाता है। सुजोय और सुप्रिया की प्रतिक्रियाओं का अंतर स्त्री-पुरुष के अनुभवगत भेद तथा खतरे को पहचानने की अलग-अलग संवेदनात्मक प्रक्रियाओं की ओर संकेत करता है।
कहानी का शीर्षक ‘लाल चाय’ अपने भीतर विडंबनापूर्ण अर्थ समेटे हुए है; जिस लाल चाय को नायिका क्षणभर के लिए किसी भयावह आशंका से जोड़ बैठती है, वही अंततः अपरिचित सांस्कृतिक परिवेश की एक सामान्य पेय-परंपरा के रूप में सामने आती है, जबकि वास्तविक खतरा कहीं अधिक अप्रत्याशित रूप में उपस्थित होता है। अंतिम दृश्य का नाटकीय उद्घाटन कहानी के तनाव को चरम पर पहुँचाता है और आरंभ से चली आ रही आशंकाओं को एक नया अर्थ देता है।
हालाँकि कहानी का अंत सुप्रिया के भय को कथात्मक औचित्य प्रदान करता है, फिर भी उसकी प्रभावशीलता केवल इस संयोग में नहीं, बल्कि उस मानसिक और सामाजिक परिस्थिति के चित्रण में निहित है, जिसमें एक स्त्री अपनी सुरक्षा को लेकर निरंतर सतर्क रहने के लिए विवश है। इस प्रकार ‘लाल चाय’ एक रोमांचक यात्रा-वृत्तांत से आगे बढ़कर विश्वास, अंतर्बोध, स्त्री-असुरक्षा और मनुष्य के व्यवहार को समझने की सीमाओं पर केंद्रित कहानी बन जाती है।
*****
लाल चाय
अमिता नीरव
डर भीतर होता है, ठीक बात है, लेकिन उसके कारण बाहर होते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो एक घंटे पहले जो उत्साह था, वो एक घंटे बाद डर में नहीं बदल जाता।
ये शहर जिसका नाम मुझे बड़ा ग्लैमरस लगता था, लगता था जैसे ये कोई दूसरी दुनिया हो, यहाँ के लोग, जन-जीवन, खान-पान, विचार-व्यवहार, धर्म-परंपरा सब दूसरे हैं, अलग हैं। देश का सुदूर पूर्वी हिस्सा, ऐसे राज्य का शहर जिसकी धरती अ-सम है…। उसका शहर गुवाहाटी….
कितनी सारी प्लानिंग थी, कितनी सारी आशंकाएँ। खुद मेरे शहर से कितना तो दूर है। वहाँ के बारे में बस उतना ही तो पता था, जितना गूगल बताता था। कामाख्या का शहर… गुवाहाटी, एकमात्र नद ब्रह्मपुत्र का विलास। जीवन में न जाने कितनी बार टीवी पर ब्रह्मपुत्र की बाढ़ देखी है, बाढ़ में डूबता कसमसाता शहर गुवाहाटी देखा है। इसे देखने की इच्छा न जाने कब से सिर उठाने लगी थी।
तमाम आशंकाओं, परिजनों की चिंताओं को दरकिनार करके, प्रेम करने वाले लोगों की हिदायतों का पुलिंदा बाँधे बुकिंग करवाई थी। औऱ इस वक्त हम दोनों इस काले रंग की स्कॉर्पियो में तीन अनजान लोगों के साथ बैठे हुए हैं। रात के नौ बज रहे हैं। करीब एक घंटे पहले हमारी फ्लाइट लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई एयरपोर्ट पर लैंड हुई थी। पिछले घंटे भर से ये गाड़ी जिसमें हम दोनों तीन सर्वथा अपरिचित लोगों के साथ बैठे हुए हैं एक ही सड़क पर तीसरी बार दौड़ रही है।
मैंने एक बार फिर से उस अंधेरे में पास बैठे सुजोय की तरफ देखा, वह मेरे देखने से बेखबर बाहर की तरफ पीछे छूटती सड़क, पुल, रोशनी, लोग, मंदिर और दुर्गा पूजा पंडालों को देख रहा है। ये दुर्गा पूजा का वक्त है। सिर्फ बंगाल ही नहीं असम में भी… गुवाहाटी शहर में दुर्गा पूजा पंडाल सजे हुए हैं। मैं अपने भीतर के डर से अपना ध्यान हटाने के लिए संघर्ष करने लगी, लेकिन डर कहीं गया ही नहीं, वह उसी तरह इर्दगिर्द हवा की तरह मुझे घेरे रहा।
गाड़ी में बैठते ही जिस पहली चीज ने मुझे आशंकित किया वह थी कार परफ्यूम की तेज महक के बावजूद आ रही बीयर और सिगरेट की गंध। और उसी से डर के बीज में अंकुरण हुआ, मगर नहीं, उससे पहले उन तीनों के हुलिए को देखकर आशंका आ खड़ी हुई थी, बाद में बीयर की गंध ने डर को सिर उठाने की इजाजत दी। हालाँकि मैं जिस माहौल में पली हूँ, वहाँ बीयर की गंध की पहचान कैसे होती, इस डर के आलम में भी मैं चकित हूँ कि मुझे बीयर की गंध पता है, कैसे?
‘आप डरिये नहीं मैम…!’ अतुल ने बिना पीछे पलटे ही कहा। मैं चौंकी… मैंने तो ऐसा कोई जेस्चर दिया ही नहीं। इसे कैसे पता कि मुझे सचुमच डर लग रहा है। मैं दृढ़ता से जवाब देने की कोशिश करती हूँ, ‘नहीं, मैं क्यों डरने लगी!’
मगर मैं कुछ कह नहीं पाती। गाड़ी लगातार दौड़ रही है, मगर गंतव्य का पता नहीं है। मुझे उस दिन पर गुस्सा आया, जब मैंने भावुकता में फेसबुक मैसेंजर में एक अनजान आदमी को मैसेज किया था। या फिर उस वक्त पर, जब मैंने ये सब सुजोय से शेयर किया था, या फिर उस वक्त पर जब मैंने सुजोय की बात मान ली थी। डर और आशंका के इस आलम में न जाने क्या-क्या याद आ रहा है?
उन दिनों फेसबुक पर किसी लेखक की आत्महत्या की खबरों पर लोग लगातार लिख रहे थे। इस बहाने अवसाद पर भी बात होने लगी थी। लगभग उसी वक्त सोने से ठीक पहले मेरी नजर एक छोटे से स्टेटस पर पड़ी थी, ‘ऐसी जिंदगी से मर जाना बेहतर है।’ मुझे पिछले दिनों आत्महत्या की खबर और अवसाद पर पढ़ी सारी पोस्ट्स याद आ गई और मैंने खुद पहली बार किसी को मैसेज किया, ‘क्या हुआ? सब ठीक है न? यदि परेशान हैं तो अपनी परेशानी मुझसे कह सकते हैं!’, थोड़ी देर जवाब का इंतजार किया और फिर सो गई।
सुबह उठकर सबसे पहले इनबॉक्स देखा, एक छोटा-सा जवाब था, ‘अब सब ठीक है? आपकी चिंता का शुक्रिया!’, मुझे राहत हुई।
करीब दो महीने बाद फिर उसी अकाउंट से एक मैसेज आया, ‘उस दिन मैं कुछ परेशान था, इसलिए परेशानी में वो स्टेटस डाल दिया था। जैसे ही गलती समझ आई, उसे हटा लिया। मगर आपने मैसेज किया इसने मुझे खासा मुतास्सिर किया। भविष्य में कभी भी आपको जरूरत हो तो मुझे बेझिझक मैसेज कीजिएगा।’
मैंने बस शुक्रिया कहकर बात खत्म कर दी। न जाने वो कहाँ और मैं कहाँ, उसने सौजन्य बरता, मैंने उसे स्वीकार कर लिया। फिर मैंने उसकी फेसबुक वॉल देखी। नाम था अतुल वर्मा। डीपी ऐसा था कि उससे कोई पहचान नहीं बनती थी। पोस्ट्स भी इक्का-दुक्का थी, वो भी शेयर्ड। बाद में मैंने पाया मेरी हर पोस्ट पर अतुल का लाइक हुआ करता था।
गाड़ी चल रही है, मगर ये समझ नहीं आ रहा है कि जाना कहाँ है? मैं बार-बार अतीत-वर्तमान के बीच आ-जा रही हूँ।
उन दिनों हम केरल में थे औऱ वहाँ से फोटो पोस्ट किया था। देर रात अतुल का मैसेज देखा, ‘अगली बार नॉर्थ ईस्ट का प्रोग्राम बनाइएगा। मैं आपको घुमाना चाहता हूँ।’
‘जरूर!’, मैंने बात खत्म कर दी थी।
ऐसे ही एक दिन इस मैसेज के बारे में सुजोय को बताया था। सुजोय सुनकर बस मुस्कुराए थे। सुजोय ऐसा कभी करते नहीं हैं, लेकिन जब नॉर्थ ईस्ट का टूर बना तो उन्होंने अतुल से बात करने के लिए कहा। मेरे लिए ये बहुत ऑड सिचुएशन थी, ‘जब हमें किसी के घर जाकर नहीं ठहरना है, किसी के साथ नहीं घूमना है तो फिर क्यों किसी को अपने कार्यक्रम के बारे में बताया जाए?’
‘हाँ तो क्या हुआ? हम थोड़ी उसके घर जाकर ठहरने वाले हैं। कोई हमें इतने प्यार से बुला रहा है तो उसे सिर्फ सूचना ही तो देनी है।’, ये सुजोय भी न… एकदम ही अनप्रिडिक्टेबल हैं। कहाँ तो किसी के साथ कहीं नहीं जाना और कहाँ एक अनजान आदमी से अपना टूर प्लान शेयर कर लेना।
मैं अपनी हिचक से लड़ रही थी। कई बार इस सिलसिले में लंबी बहसें हुई, सुजोय ने पूछा, ‘तुम्हारी आपत्ति क्या है?’
मैं उलझ गई थी। हकीकत में तो कोई आपत्ति स्पष्ट नहीं थी, मगर इस तरह से किसी अनजान व्यक्ति से अपना टूर प्लान शेयर करने को लेकर कतई सहज नहीं थी। चिढ़कर कह दिया था, ‘तुम बात कर लो।’
‘अरे! मगर न वो मुझे जानता है न मैं उसे। मैं क्या बात करूँगा और क्या कहूँगा…!’, सुजोय की बात भी सही ही थी। मगर मैंने इस पर विचार करने में कुछ दिन लगाए थे। फिर सुजोय की बात मान ली थी और अतुल को कार्यक्रम बताया। उसकी तरफ से पहला प्रस्ताव था, हम गुवाहाटी में उनके घर स्टे करें। तब तक अतुल के बारे में कुछ भी पता नहीं था। वहाँ जाने के सप्ताह भर पहले अतुल का फोन आया, ‘चूँकि हमारा परिवार नहीं है और हम जहाँ रहते हैं वहाँ वर्कर्स भी साथ ही रहते हैं तो आपको कंफर्टेबल नहीं लगेगा। इसलिए हमने आपके लिए होटल बुक कर दिया है।’
मुझे असमंजस हुआ, ‘अरे आपने क्यों किया? हम खुद कर लेते।’
‘आपने किया, हमने किया एक ही बात हुई। आप अपना शेड्यूल शेयर कीजिए, मैं आपको रीसिव करने आऊँगा। मैं ही आपको घुमाऊँगा। ऐसी-ऐसी जगहें दिखाऊँगा जिन तक आमतौर पर पर्यटकों की पहुँच नहीं है। कुछ ट्राइबल एरिया, जो हैं बहुत खूबसूरत लेकिन वहाँ जाना थोड़ा रिस्की है।’, अतुल की इस बात पर हम दोनों के बीच फिर लंबी बहस हुई। मैंने फिर से सुजोय से कहा, ‘हम देश भर अपने आप घूमे हैं, यहाँ क्यों हम किसी की मदद से घूमे? न जानते हैं, न पहचानते हैं। मिलना एक अलग बात है, लेकिन रीसिव करना और होटल बुक करना, मुझे कुछ ज्यादा रास नहीं आ रहा है।’
‘अरे तो क्या हो गया? हम पैसे दे देंगे। हम भी तो करते न?’, सुजोय ने अपनी परिचित मुस्कुराहट से कहा था। मेरी इच्छा के खिलाफ ट्रेवल प्लान शेयर किया गया। शाम को पौने सात बजे फ्लाइट गुवाहाटी एयरपोर्ट पर लैंड करेगी। अतुल का जवाब आया, ‘मैं आपको एयरपोर्ट पर मिलूँगा।’
सुजोय ने कहा भी कि ‘हमें होटल का एड्रेस भेज दें, हम वहाँ खुद पहुँच जाएँगे।’
मगर अतुल अपनी बात पर अड़ा रहा। फ्लाइट लैंड होते ही सुजोय ने मुझसे कहा कि अतुल को मैसेज कर दो, मैंने एक शब्द लिखकर सैंड कर दिया, ‘रीच्ड’, मैसेज देखा ही नहीं गया। सुजोय व्यग्र हो रहे हैं। ‘जवाब आया!’
‘अभी तक तो मैसेज देखा ही नहीं है, जवाब कहाँ से आएगा?’, सुजोय की व्यग्रता मुझे बिना वजह डिफेंसिव बना रही थी।
‘शायद ड्राइव कर रहा होगा।’
‘तुम तो कॉल कर लो! यहाँ कब तक बैठे रहेंगे! न हो तो हम ही चलते हैं, गुवाहाटी में कौन-सी होटलों की कमी है। हम खुद ही होटल कर लेंगे।’, सुजोय ने चिढ़कर कहा। मेरा असमंजस गहरा गया था, एक तो अतुल ने होटल बुक कर दिया है, रिसीव करने आ रहा है और इधर सुजोय कह रहे हैं कि हम एयरपोर्ट से निकल पड़ें!
‘हाँ, हाँ हम रास्ते में हैं। आप ऐसा कीजिए एक-एक कॉफी पीजिए तब तक हम पहुँच जाएँगे।’, सुजोय को जवाब जस का तस सुना दिया।
‘चलो, कॉफी ही पी लेते हैं।’
कॉफी पिए भी आधा घंटा हो गया था। मैं संभलते-संभलते भी एंग्जाइटी का शिकार होने लगी थी। सुजोय भी खीज रहे थे। वो अपनी खीज मुझ पर निकाल रहे थे, मैं किस पर निकालूँ!
‘हद है यार…!’, कहकर सुजोय उठकर टहलने लगे। हर आती गाड़ी के रूकने की आस लिए हुए बैठी मैं लोगों की आवाजाही देख रही हूँ। और आधा घंटा गुजर गया था, तभी एक काले रंग की स्कॉर्पियो सामने रूकी। गाड़ी से तीन मध्य वय के पुरुष उतरे।
नमस्ते! सॉरी लेट हो गए।’, एक दुबले पतले, गेहुँआ रंग वाले पुरुष ने कहते हुए सुजोय से हाथ मिलाया औऱ मुझसे हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। तीनों ने जींस पहन रखी थी और तीनों के पैरों में स्लीपर थी। इनमें से एक का लुक खासा डरावना था, जिसका परिचय सोहन के रूप में दिया गया था, वह दोनों की तुलना में थोड़ा मोटा था, लंबी बेतरतीब दाढ़ी और लंबे ही बाल थे। तीसरा लंबा और दुबला-पतला था, लेकिन सिर से बाल उड़ रहे थे, उसका नाम आलोक बताया था, जिसने नमस्ते किया वो अतुल था। सोहन ने डिक्की खोलकर सामान रखना शुरू किया।
काली स्कॉर्पियो से धड़-धड़ उतरते तीन मुश्टंडो को देखकर ही मुझे सुजोय पर गुस्सा आने लगा। दिमाग अब इस पर विचार करने लगा कि इनके साथ न जाने के लिए क्या-क्या बहाने बनाए जा सकते हैं! मैंने सुजोय की हथेली दबाई तो उसने मुस्कुराकर हाथ छुड़ा लिया।
सामान रखा जा चुका है, सुजोय ने मुझसे कहा, ‘बैठो…!’
कलेजा मुँह को आने लगा, यूँ तो सुजोय सब समझते हैं मगर आज… आज इतने उत्साह में है कि कुछ भी देखने-समझने को ही तैयार नहीं है। तभी अतुल ने कहा, ‘आप नहीं, सर पहले आप बैठिए।’ हमारे बैठते ही खुद आगे वाली सीट पर जा बैठा, सोहन ड्राइविंग सीट पर बैठा और बचा आलोक वो पहले ही पिछली सीट पर जा बैठा था।
गाड़ी स्टार्ट हुई और किस रास्ते से जाना है, इस पर तीनों में कुछ विचार-विमर्श हुआ। गाड़ी एयरपोर्ट से बाहर आ गई।
एक बार फिर तीनों इस बात पर बहस कर रहे हैं कि किस रास्ते से जाएँ ताकि जल्दी पहुँच जाएँ। सोहन जो गाड़ी चला रहा था, उसने एकाएक गाड़ी किनारे खड़ी कर दी। ‘क्या हुआ?’, अभी तक जिस डर को मैं बहला रही थी, वह फिर से मचल गया। ‘पहले तय कर लो, किस तरफ जाना है?’
‘अरे तू ड्राइव कर। हम ठीक चल रहे हैं।’, अतुल ने कहा।
‘अरे मगर जाना कहाँ है, ये तो पता चले।’, सोहन थोड़ा चिढ़ गया।
‘कम से कम होटल का नाम तो बता, आलोक!’, अतुल अब भी स्थिर है और उसने पलटकर पीछे बैठे आलोक से पूछा तो आलोक मोबाइल में कुछ देखने लगा। इस बीच अतुल ने फिर मुझसे कहा, ‘सुप्रिया जी! आप डरिए नहीं। ये हम लोगों का रोज का है।’, मैं लगातार चुप हूँ। वह आगे की सीट पर बैठा है, उसे कैसे दिखाई दे रहा है कि मैं डर रही हूँ? मेरे लिए वह रहस्य बनता जा रहा है।
फिर उसने पलटकर आलोक की तरफ इशारा करते हुए सुजोय से कहने लगा, ‘इसका माथा ठीक नहीं रहता है। इसके सिर का ऑपरेशन हुआ है न, तो उसे कुछ याद नहीं रहता है।’
मुझे एकाएक कई सारी थ्रिलर फिल्मों के सीन याद आने लगे… सब कुछ ऐसा ही तो होता है। मैंने अपना सिर झटककर डर से उबरने की कोशिश की, बस कोशिश…। सफलता मिलती और फिर फिसल जाती। नया सवाल सिर उठा रहा है, ‘अजीब बात है कि होटल बुक किया है और न तो होटल का रास्ता पता है न ही उसका नाम… रह-रहकर डर की नई-नई वजहें सामने आने लगीं।
‘किस एरिया में है होटल?’, सुजोय ने पूछा।
‘वहीं, जहाँ हम लोग रहते हैं, लाल माटी! हमारे घर के पास ही होटल बुक किया है ताकि आपको कोई परेशानी न हो।’
डर और गाढ़ा होने लगा है, होटल का नाम इन्हें याद नहीं, वहाँ कैसे पहुँचे वो रास्ता इन्हें याद नहीं है, जबकि होटल इसी एरिया में है, जहाँ ये लोग रहते हैं? मैं खतरों के सिम्टम्स तय करने की कोशिश करने लगी हूँ। अनुमान लगा रही हूँ कि क्या-क्या खतरे हो सकते हैं, क्या हमें किडनैप करके, फिरौती की माँग की जाएगी? फिर फिरौती की रकम क्या होगी! यदि पाँच-सात करोड़ माँगे जाएँगे तो घरवाले कैसे चुका पाएँगे? यदि मारना चाहें तो…! मगर मारना क्यों चाहेंगे, हमसे क्या दुश्मनी है? यदि बला… सोचकर सिहरन होने लगी। खतरे के सारे संकेत फिर से सूँघती हूँ।
‘मैम आप डरिए नहीं।’, अतुल ने फिर दोहराया…। डरिए नहीं…! जो हो रहा है, उसमें कौन नहीं डरेगा? मैं फिर से सुजोय की तरफ देखती हूँ, सुजोय निश्चिंत हैं, डर के मारे मेरा गला सूखने लगा है। यदि मेरे साथ कुछ होगा तो सुजोय… उफ्फ!
इस सबके बीच मेरा इस बात पर ध्यान ही नहीं गया कि उसने मुझे बीच में बैठाने की जगह दरवाजे के पास बैठने के लिए कहा। जबकि सुजोय का इस बात पर ध्यान ही नहीं गया था कि यदि मैं बीच में बैठी तो मेरी दूसरी तरफ वह लड़का बैठा होगा। राहत का झोंका आया।
गाड़ी उसी फ्लाय ओवर पर चौथी बार आ पहुँची जहाँ से पहले तीन बार हम गुजर चुके हैं। अतुल का धैर्य मुझे चौंका रहा है, उसने उसी शांति से फिर से आलोक से पूछा, ‘होटल का नाम याद आया?’
मैं यह तय कर रही हूँ कि यदि कोई खतरा मुझे महसूस होगा तो मैं गाड़ी का दरवाजा खोलकर कूद जाऊँगी, मगर फिर सुजोय… ? मैंने सुजोय की हथेली थाम ली! उसने मुझे मुस्कुराकर देखा। अपने तय करने में संशोधन किया, सुजोय को भी साथ ही खींच लूँगी। फिर सिहर गई, इसमें तो सुजोय के एक्सीडेंट का खतरा है। फिर…? मगर वो कौन सा संकेत होगा जब मुझे गाड़ी से कूद जाना चाहिए? मतलब वो कौन सा खतरा होगा, जो मुझे अलार्म करेगा कि अब कूद जाने के अलावा और कोई विकल्प बचा ही नहीं है। मैं गाड़ी के दरवाजे के लॉक को टोह रही हूँ, ये आसानी से खुल तो जाएगा न? एकबारगी लगा कि इसे खोलकर कूद ही जाऊँ, क्यों उस अलार्म का इंतजार करूँ, जिसमें सामने वाले को सम्भलने का अवसर मिल जाए? फिर लगा कि अभी ऐसा क्या हो रहा है कि मैं इस किस्म का खतरा उठाऊँ! फिर से सुजोय की तरफ देखा, वो एकदम से निश्चिंत हैं औऱ ये मुझे एकसाथ कई भाव और भावनाओं में स्थित कर रहा है। मसलन, गुस्सा, डर, खीज, चौंकना… आदि-आदि।
सुजोय ने गूगल खोल लिया, टाइप किया, ‘होटल्स इन लाल माटी एरिया?’ हर हाल में रास्ता निकाल लेने और कभी न हारने की सुजोय की क्षमता मुझे हमेशा हैरान करती है, आज फिर से…। होटल के नाम खुल गए, सुजोय एक-एक होटल के नाम पढ़ने लगा। ‘होटल कम्फर्ट रेसिडेंसी? होटल एम्पायर रिजेंसी! द ग्रीनवुड? रॉयल द कासा, रॉयल पार्क रेसिडेंसी! विवांता गुवाहाटी? पिनाकल इन! नक्ष….?’
‘पिनाकल इन…।’, आलोक ने बीच में ही रोककर मुनादी की तरह कहा।
‘अब रास्ता भी बता, किस तरफ से चलना है?’, सोहन ने चिढ़कर कहा। तब तक सुजोय गूगल मैप खोल चुका थे। अपना मोबाइल उन्होंने सोहन की तरफ बढ़ा दिया।
‘उफ्फ! ये आदमी?’, उसके मोबाइल देने से मेरी खीज और बढ़ गई। अतुल और सोहन दोनों इस बात पर माथापच्ची करने लगे कि कहाँ से जाना चाहिए? फिर सहमति बनी तो थोड़ी राहत महसूस हुई। गाड़ी चल रही है। पहले भी कोई चहल-पहल वाली सड़कों से नहीं गुजर रहे थे, अब तो और भी सुनसान रास्ता आ पहुँचा है। रह-रहकर डर सिर उठाता है। फिर से योजना बनने औऱ बिगड़ने लगी है। एकबारगी ये विचार भी आया कि जो होगा देखा जाएगा। यदि मरना होगा तो मर ही जाएँगे या कि यदि…। लेकिन हार ही जाए वो क्या जिजीविषा… चाहे मेरा स्वभाव जल्दी हार जाने का हो, लड़ाई तो शुरू हो। एक सांत्वना उठी, अगली लहर में वो सांत्वना बह गई। एकाएक गाड़ी कच्चे में उतर गई। आसपास ऊँची-ऊँची घास, अँधेरा और कच्ची सड़क। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। प्रिकॉशन के लिए सोची गई सारी तरकीबें हवा हो गई, यहाँ गाड़ी से कूद भी जाएँगे तो क्या होगा? कौन आएगा बचाने! दिल बैठने लगा औऱ दिमाग सुन्न हो गया। सुजॉय ने फोन भी सोहन को दे दिया है अब तो ये भी देख नहीं सकते हैं कि गाड़ी होटल के रास्ते की तरफ ही जा रही है या कहीं और…।
मैं अपना फोन देखने लगती हूँ, उफ्फ चश्मा निकालना पड़ेगा। इस वक्त इतने तनाव में हूँ कि मुझे अभी बताया गया होटल का नाम भी याद नहीं आ रहा है। गाड़ी लगातार कच्चे और अँधेरे रास्ते पर आगे बढ़ रही है। सुजोय अब भी उतने ही निश्चिंत हैं। अतुल सुजोय से न जाने किस विषय पर बात कर रहा है और बार-बार मुझे कह रहा है आप डरिए नहीं। मैं बार-बार इस बात पर उलझ रही हूँ कि इसे कैसे पता कि मुझे डर लग रहा है।
करीब पंद्रह मिनट बाद दूर रोशनी दिखाई दी। सामने की तरफ से आ रही रोशनी का सोर्स नहीं समझ आ रहा है, मगर रोशनी के दिखाई देने मात्र से थोड़ा इत्मीनान आया। एकाएक एक दरवाजा दिखाई दिया… जिस पर टीन की चद्दर के हल्के हरे रंग से पुते अर्धचंद्राकार बोर्ड पर लिखा था, पिनाकल इन…!
सामने सीमेंट का रास्ता था, बाँई ओर हरा लॉन था और उस पर लोहे का झूला पड़ा हुआ था। सीमेंट का रास्ता तीन मंजिला भवन के सामने खत्म होता है।
एक गहरी साँस ली थी… पहुँच गए। इच्छा तो ये थी कि ये लोग हमें यहीं अकेला छोड़कर चले जाए। सुबह से सफर कर रहे हैं और मुझे तो पिछले दो घंटे के तनाव ने बुरी तरह से थका दिया है।
आधार कार्ड देकर मैं सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई थी। काउंटर के सामने टीवी चल रहा था, भाषा असमी थी और मैं जहाँ बैठी थी, वहाँ से स्क्रीन ठीक से दिखाई भी नहीं दे रही थी, उस पर इतना थ्रिल पिछले दो घंटों में झेल चुकी थी कि मैं बस कमरे में पहुँचकर मन भर रो लेना चाहती थी।
होटल का स्टाफ सामान लेकर जा चुका था। मैं अतुल की तरफ असमंजस में देख रही थी। इंतजार कर रही थी अतुल के गुडनाईट का। मगर ये क्या! तीनों हमारे साथ-साथ सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। पहली ही मंजिल पर सीढ़ियों के पास वाला पहला ही कमरा था। अतुल के साथ सोहन हमारे पीछे-पीछे कमरे में चले आए थे। उस पर सुजोय… मेरे डर और फिर खीज से बेपरवाह अतुल एंड कंपनी को कह रहे थे, ‘आइए, साथ खाना खाते हैं।’
मन रोने-रोने को हो आया। तेज भूख का भी अहसास हो चला था। सुबह के पहने कपड़े बदले जाने की इच्छा होने लगी थी। रिलेक्स होने की तलब तेज थी, मगर तीन अनजान पुरुषों के सामने अपना सामान खोलने की कल्पना भी असहज कर रही थी। मन मारकर वॉशरूम गई, मुँह धोया और कुछ देर गहरी गहरी साँसें लेकर खुद को संयत किया।
खाने का ऑर्डर करने के लिए फोन का रिसिवर उठाया ही था सुजोय ने कि अतुल ने साफ कर दिया, वे खाना खाकर आए हैं, इसलिए उनका खाना ऑर्डर न किया जाए, तो अब क्यों बैठे हैं? चिढ़ सिर पर सवार होने लगी थी।
सुजोय की व्यवहारिकता…‘चाय! चाय तो लीजिए, हम खाना खाएँ और आप कुछ न लें, ये अच्छा नहीं लगता है।’
‘अरे..! ठीक है, ऐसा कीजिए आप लाल चाय मँगवा लीजिए।’
लाल चाय!
डर फिर से फन फैला चुका था। हो सकता है होटल वाला भी मिला हुआ हो। लाल चाय क्या होती है! ग्रीन टी, ब्लैक टी, ब्लैक कॉफी, लेमन टी, देसी चाय… मगर ये लाल चाय! दिमाग में बोतल, गिलास, चखना… की छवि बनने लगी थी।
मैं चाय ऑर्डर करने के लिए फोन के पास बैठी थी, लाल चाय सुनकर माथा ठनका था, मैंने फिर से अतुल की तरफ देखा, जैसे मैं उसकी बात नहीं समझ पाई होऊँ। ‘लाल चाय?’
वह अपनी कुर्सी से उठा, ‘लाइए मैं ऑर्डर करता हूँ। वो समझ जाएगा।’
वो समझ जाएगा… क्या समझ जाएगा? दिमाग फिर तेजी से चलने लगा। आज तक कभी पुलिस हेल्प लाइन का नंबर देखने, याद करने की जरूरत नहीं लगी। खुद पर तेज गुस्सा आया। याद करने की कोशिश की। शायद सौ… या शायद 101…!
फोन पर वह कह रहा है, ‘हाँ, हाँ… साथ में नींबू भी ले आना।’
फिर से एक गहरी साँस।
सोहन चुपचाप चाय सिप कर रहा था। जिसे हम लेमन टी कहते हैं, उसे यहाँ लाल चाय कहा जाता है। अतुल कप हाथ में लेकर पता नहीं किन-किन विषयों पर सुजोय से बात कर रहा है। आलोक कमरे में आया ही नहीं। वह बाहर गैलरी में ही बैठा रहा।
मेरा दिमाग इस सबसे इतना थक गया था कि मुझे बस आवाजें आ रही थी, व्यर्थ आवाजें, उन आवाजों के कोई अर्थ मुझ तक नहीं पहुँच रहे थे।
अंततः अतुल को समझ आया कि हम थके हुए हैं। दोनों खड़े हो गए। ‘ठीक है सर! आपसे बात करने में बहुत मजा आ रहा है, मगर आप थके हुए हैं, रात भी बहुत हो गई है। मैम ज्यादा थकी हुई नजर आ रही हैं। सुबह कॉल करूँगा, आपके प्रोग्राम की तफ्सील के लिए। गुड नाइट।’
उसके कमरे से निकलते ही मैंने दरवाजा लगाया औऱ सुजोय के गले लगकर ढह गई। सुजोय अब भी नहीं समझ पा रहे हैं कि हुआ क्या है?
‘क्या हुआ! थक गई हो?’, सुजोय सिर सहला रहे हैं।
‘डर गई थी!’
‘डर गई थी! किससे?’
‘तुम्हें नहीं लगा कि हमें डरना चाहिए था!’
सुजोय को मेरी बातें अटपटी लग रही थी। ‘डरना क्यों चाहिए था! सरल और भले लोग हैं।’
इसके बाद मैं क्या समझातीं। मैं बस रोती रही। सुजोय थपकते रहे। रोते-रोते नींद लग गई।
सुबह चाय पीते हुए सुजोय ने कहा, ‘अभी तक बंदे का फोन नहीं आया। क्या हमें फोन करना चाहिए! उनके भी अपने काम होंगे? हम खुद ही चलते हैं। आज उमानंदा चलते हैं। ब्रह्मपुत्र को देखते हैं। शाम को कॉल करेंगे!’
मुझे राहत हुई थी। दिन भर में हमने बस उमानंदा ही देखा। कामाख्या देर रात तक भी जाया जा सकता है। दिन भर की गर्मी और उमस से बेहाल तय किया कि रात में ही कामाख्या जाएँगे।
शाम को हम कामाख्या जाने के लिए ऊबर का इंतजार करते हुए, होटल की लॉबी में बैठे हैं। हमेशा की तरह टीवी पर असमी में समाचार चल रहे हैं। मैं अपने मोबाइल में सिर दिए हुए हूँ। सुजोय होटल मैनेजर से कुछ पूछने गए हुए हैं, तभी मैनेजर ने सुजोय को टीवी की तरफ इशारा किया।
मैं भी उठकर टीवी के सामने चली गई, टीवी पर अतुल की तस्वीर आ-जा रही है। बात समझ नहीं आ रही है, मैनेजर बता रहा है, ‘तीन दिन पहले इसी क्षेत्र में एक मर्डर हुआ था। आज उसी सिलसिले में इन्हें पकड़ा गया है। ये तो कल आपके साथ आए थे न! क्या आपके रिश्तेदार हैं!’
सुजोय तेजी से मेरी तरफ आए, मैं धम्म से जमीन पर गिर पड़ी हूँ।
****
अमिता नीरव
88 लंदन विलाज़
भांग्या, साँवेर रोड
इंदौर 453555
मध्यप्रदेश
फोन नंबर 9827288818
ई-मेल – amita.neerav@gmail.com
अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें।
प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।
उर्मिला शिरीष उर्मिला शिरीष की कहानी ‘हरा पत्ता’ वैश्वीकरण, विदेश-मोह और मध्यवर्गीय जीवन की उन विडंबनाओं को उजागर करती है, जिनमें बेहतर भविष्य की आकांक्षा धीरे-धीरे...
मनींद्र गुप्त (1926–2018) आधुनिक बांग्ला साहित्य के एक महत्त्वपूर्ण कवि, निबंधकार, कथाकार और चित्रकार थे। उनका जन्म 24 अक्टूबर 1926 को अविभाजित बंगाल के बरिशाल ज़िले...
लोकप्रियता और लोकशक्ति के दुश्चक्र में कविता उदास प्रफुल्ल कोलख्यान अभिव्यक्ति नहीं तो व्यक्ति नहीं! व्यक्ति अपने को अस्वीकार किया जाना बहुत मुश्किल से बर्दाश्त कर...
सुरेन्द्र प्रजापति सुरेन्द्र प्रजापति की इन कविताओं में प्रेम, मानवीय संबंधों की ऊष्मा, सामाजिक विडंबनाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के संकट की अलग-अलग छवियाँ मिलती हैं। उनकी...
सुशांत सुप्रिय सुशांत सुप्रिय की इन कविताओं का केंद्रीय स्वर अपने समय की राजनीतिक विडंबनाओं, सामाजिक विसंगतियों, मनुष्य के आंतरिक विखंडन और संवेदनहीन होते समाज...