
ध्यान सिंह जी का जन्म 2 मार्च, 1939 ई को जम्मू के घरोटा नामक गाँव में हुआ। वे डोगरी के वरिष्ठ कवि-गद्यकार हैं। विभिन्न विधाओं में इनकी लगभग 75 किताबें प्रकाशित हैं। अपने राजनैतिक स्वर और सामाजिक चेतना के लिए जाने जाते हैं। साहित्य में ही नहीं; बल्कि इनकी जनपक्षधरता इनके व्यवहार में भी देखी जा सकती है। वे श्रमिक संघ के कार्यकर्ता रहे हैं। लोक संस्कृति-संरक्षण हेतु कार्य करते रहे हैं। 2015 में इन्हें ‘परछावें दी लो’ शीर्षक कविता संग्रह पर ‘साहित्य अकादमी, 2014 में ‘बाल साहित्य’ श्रेणी में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2022 में ‘दीनू भाई पंत सम्मान’ के अलावा डोगरी साहित्य सेवा के लिए 2023 में जम्मू-कश्मीर स्टेट अवॉर्ड मिला है। वे आज भी सक्रिय हैं, और प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य लिखते हैं।
इन कविताओं का अनुवाद किया है युवा कवि कमल जीत चौधरी ने। साथ ही यह कहना भी जरूरी है कि कवि का परिचय भी कमल जीत चौघरी ने ही उपलब्ध कराया है।
ध्यान सिंह
गाँव व डाक- बटैहड़ा
तहसील व ज़िला- जम्मू, पिन कोड- 181206
जम्मू-कश्मीर
फोन नम्बर- 9419259879
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~ मूल: (डोगरी) ध्यान सिंह
अनुवाद: कमल जीत चौधरी
| सिर और पैर |
पहाड़ों के सिर नुकीले होते हैं
पहाड़ों के पैर नहीं चलते
रिसते रहते हैं
वैसे मेरे हाथ-पैर चलते रहते हैं
बहुत पहले लोग नंगे पैर ही चलते थे
कुछ लोग चप्पलें सिर पर उठाकर चलते थे
धर्मस्थान पर पैर धोकर जाते थे
मगर पैर सिर पर उठाकर कोई नहीं चलता था
आज भी मनुष्य कदम उठाता, ऊपर देखता
सिर-पैर की सोच रखता है
तो यह समझें कि
सोच-विचार का भी सिर-पैर होता
जो पहले होता था
आज भी है
बस महसूस करने की सोच चाहिए
…
सिर्फ़ कलबूत^ ही नहीं
बसावट के लिए छत्तर^ भी चाहिए।
××
कलबूत^ – काया/काठ का साँचा, जिस पर रखकर मोची जूते-चप्पल बनाता है।
छत्तर^- छत्र/औज़ार
| छींट |
कोई छींट पड़ी कहीं की
बाहर से अन्दर
चाहे बारिश की ही थी
मगर मुँह से ‘सत्यनाश हो’, फूटा
…
दाग़ जो पड़ा
फिर कभी नहीं छूटा।
××
| दृश्य-कला |
अपनी आँखें होते हुए भी
नहीं देखना
अपने कान होते हुए भी
नहीं सुनना
अपनी बुद्धि होते हुए भी
नहीं समझना
दूसरों का ही देखना, सुनना और समझना-
यह सब दृश्य की अदृश्य कला है।
××
| किंग^|
सबरस रंग हूँ
मैं एक किंग हूँ
सिर्फ़ एक तार से कसी हुई
पतली सी तंद हूँ
छेड़ो तो
बजती हुई तरंग हूँ…
कोई तान लगाऊँ
सांस बजाऊँ
लय-ताल की मुकरियाँ पाऊँ
मेरे सुर-झंकार की चाहत
नित गूँजती है
इन तरंगों को
कोई दीवार नहीं
इकतारी किंग हूँ
मुझे कोई कारागार नहीं
एक तार से कसी हूँ
इसी में आज़ाद हूँ।
××
किंग^ – एक वाद्ययंत्र
| सवाल के लिए खेद है |
कैसे, क्यों और किसलिए ?
इसका उत्तर दें।
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पंक्तियाँ खाली छोड़ दी हैं
उत्तर दें
तो कविता होगी।
| चलचित्र |
सावन की झड़ी लगती है
तो कोरा दिन याद आता है
लेटे-लेटे बिस्तर पर करवटें बदलते हुए
घर के अन्दर जब
अन्धेरे में नींद नहीं आती
तो बाहर की चाँदनी याद आती है
याद आती है
तो सपने टूटते हैं
लेटे-लेटे छत के बरगे गिनता रहता हूँ
चिड़िया के बच्चों की
चुरमुर सुनता रहता हूँ
उनके घोंसले को देखकर
आशा के पंख करवटें लेते हैं।
जब बुझता दीवा फड़-फड़ करता है
तो सांस रोक देने वाली हिचकी लग जाती है
मौत के हुंकारों की करवटें सुनता
अपना चलचित्र देखता हूँ…
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अनुवादक का परिचय:
कमल जीत चौधरी हिन्दी के सुपरिचित कवि-गद्यकार-अनुवादक व संपादक हैं। हिन्दी की लगभग साठ साहित्यिक पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ, आलेख, अनुवाद और कथाएँ प्रकाशित हुई हैं। इनके दो कविता संग्रह – ‘हिन्दी का नमक’ ( 2016 ), ‘दुनिया का अंतिम घोषणापत्र’ ( 2022 ) और चुनिंदा कविताओं का एक संग्रह; ‘समकाल की आवाज़-चयनित कविताएँ’ (2022) प्रकाशित हुए हैं। इन्होंने जम्मू-कश्मीर की प्रतिनिधि कविताओं के संकलन; ‘मुझे आई डी कार्ड दिलाओ’ ( 2018 ) का संपादन भी किया है। इनकी कविताओं के अनुवाद उड़िया, बंगला, मराठी और अंग्रेज़ी में हुए हैं। इसके अलावा इन्होंने डोगरी की अनेक कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी किया है। सुप्रसिद्ध ऑनलाइन पत्रिका ‘पहलीबार’ में ‘परांस’ शीर्षक एक मासिक स्तम्भ लिख रहे हैं, जिसमें जम्मू-कश्मीर के 15 कवियों की कविताई को रेखांकित कर चुके हैं।
सम्पर्क:
कमल जीत चौधरी
गाँव व डाक- काली बड़ी (रेलवे क्रॉसिंग साम्बा के नज़दीक)
तहसील व जिला- साम्बा
पिन कोड- 184121
मेल आई डी- kamal.j.choudhary@gmail.com





