
शिवानी ‘शांतिनिकेतन’ की यह कहानी केवल एक बेटी के अपने मायके लौटने भर की कथा नहीं कहती, बल्कि रिश्तों में छिपे भय, संकोच, अपराधबोध और प्रेम की परतों को भी खोलती है। श्रेया अपनी माँ की असामान्य सफाई की आदतों और माता-पिता के तनावपूर्ण दांपत्य को लेकर इतनी आशंकित है कि उसने अपने पति रोहित से अपने ही घर को छिपाने की कोशिश की है, जबकि रोहित का सहज प्रेम और स्वीकारभाव उसे धीरे-धीरे उस दूरी से बाहर लाता है। कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि जिस घर को श्रेया वर्षों से शर्म और खामोशी का घर समझती रही, वहीं माता-पिता की सालगिरह पर उसे प्रेम की एक नई संभावना दिखाई देती है। लेकिन अंत में अधखुली खिड़की से माँ को फिर उसी जुनूनी सफाई में देखकर कहानी अचानक एक गहरी विडंबना पर ठहर जाती है—क्या रिश्तों में आई दरार सचमुच भर गई है, या कुछ आदतें और मानसिक गांठें इतनी गहरी होती हैं कि प्रेम के बीच भी अपना रास्ता बना लेती हैं? कहानी इसी सवाल के साथ पाठक को श्रेया के भीतर के उस डर, प्रेम और असहायता से जोड़ती है, जिसे वह वर्षों से अपने भीतर दबाए हुए है।
तो पढ़ते हैं यह कहानी आज अनहद कोलकाता पर। आपकी राय का इंतजार तो रहेगा ही।
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अधखुली खिड़की
शिवानी ‘शांतिनिकेतन’
“जल्दी आऊंगी मम्मी… रोहित को छुट्टी मिलते ही हम आपसे मिलने आते हैं। एक बार फिर से आपको और पापा को हैप्पी एनिवर्सरी।” मेरे इतना कहते ही मम्मी ने पापा को फोन थमा दिया था। मेरी बातों से पापा समझ चुके थे कि मैं फिर से वहाँ न आने के बहाने तलाश रही हूँ। उन्होंने मेरी खामोशी को समझते हुए बस इतना ही कहा, “बेटा, तुमसे मिलने का बहुत दिल चाह रहा है। तुमसे तो अपने घर आना ही कम कर दिया है।” पापा की भावुक आवाज़ सुनकर मैंने अपनी आती हुई रुलाई को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन फिर भी मेरी आँखें भर ही आईं। बात खत्म करके मैं जैसे ही पलटी तो देखा कि रोहित मेरे पीछे ही खड़े हैं। पिछली रात रोहित के साथ हुई जोरदार बहस के कारण मेरा मन बाहर पड़ रहे कुहासे की तरह ही धुंधला गया था, जिसके छटने की उम्मीद मुझे नज़र नहीं आ रही थी।
“कभी तो मेरी बात मान लिया करो, जब भी मैं वहाँ चलने की बात करता हूँ, तुम इनकार कर देती हो! तुमको भी पता है कि हमारे पहुँचने से उनको कितनी खुशी होगी।” रोहित ने बहुत ही नरम लहजे में मुझे समझाने की कोशिश की, लेकिन फिर भी उनकी बात सुनते ही मेरी आवाज़ कुछ तेज हो गयी।
“तुम फिर रात वाली बात लेकर बैठ गए।” कहते हुए मैं पैर पटकती हुई बेडरूम से बाहर आ गयी।
“ठीक है अगर तुम्हें नहीं जाना है मत जाओ, लेकिन आज तो मैं वहाँ जरूर जाऊंगा, कितने प्यार से उन्होंने बुलाया है और तुम बहाने बनाने में लगी हो! श्रेया तुम एकलौती बेटी हो उनकी, अगर तुम उनके सुख-दुःख में शामिल नहीं होगी तो उन्हें कैसा लगेगा।” रोहित मेरे पीछे-पीछे बेडरूम से बाहर आते हुए बोले।
सुबह की इस कड़कती ठंड में भी इस बहस से हमारे घर का माहौल गर्म हो चुका था। मुझे लगा था कि शायद रोहित पिछली रात को हुई हमारी नोक झोंक को भूल चुके होंगे लेकिन मैं ग़लत थी। बात खत्म करने के उद्देश्य से जब मैं रोहित की तरफ पलटी तो देखा कि बहसबाजी के चक्कर में इस कड़कती ठंड में वह बिना किसी गर्म कपड़े के खड़े हैं। पास रखे हुए स्वेटर को उनकी तरफ बढ़ाते हुए मैंने कहा “इसको पहन लो, बीमार होने का इरादा है क्या?” पर उन्होंने जैसे सुना ही नहीं, मैं भी स्वेटर को उनकी बाहों पर डालकर कॉफी बनाने किचेन में आ गयी।
रोहित कहीं से भी गलत नहीं थे, गलत मैं ही थी लेकिन मैं अपनी गलती सुधारने से बच रही थी। कुछ महीने पहले मैंने ही कहा था कि इस बार मेरे मम्मी-पापा के शादी की 30वीं सालगिरह है हम दोनों जाकर उन्हें सरप्राइज़ देंगें। रोहित को भी ये बात अच्छी लगी थी। लेकिन अब मैं ही वहाँ जाने से मुकर रही थी या कहूँ तो बहाने बना रही थी। बल्कि रोहित तो ये भी चाहते थे कि हम मम्मी-पापा को यहाँ दिल्ली बुला लें या उन्हें कोई छोटी सी ट्रिप प्लान करके सरप्राइज़ दें लेकिन अचानक मैं इस सब बातों से असहज महसूस करने लगी थी। मुझे अच्छे से पता है कि रोहित मेरे मम्मी-पापा की बहुत इज़्ज़त करते हैं और मम्मी-पापा भी रोहित को बहुत चाहते हैं, लेकिन इस रिश्ते के दरम्यान मैंने रोहित के सामने अपने घरवालों के लिए एक भरम का पर्दा डाल रखा था।
रोहित के सामने कॉफी का मग रखकर मैं चुपचाप वापस किचेन में ब्रेकफास्ट तैयार करने आ गयी। कुछ देर बाद जब मैं कमरे में आई तो देखा कि रोहित स्वेटर पहने बालकनी में खड़े हैं जबकि कॉफी को उन्होंने छुआ भी नहीं था। इस बार रोहित की नाराज़गी थोड़ी ज़्यादा ही थी या शायद वह यह सोच रहे थे कि मेरे मम्मी-पापा को लगेगा कि वो मुझे उनसे मिलने से रोकते हैं। रोहित सच में क्या सोच रहे थे ये मैं नहीं जानती थी लेकिन मैंने अपने मन में एक अलग सोच बना रखी थी जो कि मुझे ख़ुद अपने घरवालों से दूर किये दे रही थी। सोचती हुई मैं जैसे ही कॉफी दोबारा गरम करने के लिए किचेन में आई तो बर्तन साफ करती हुई रमा मुझसे बोल पड़ी, “हाय दीदी ! रोहित भैया कितने अच्छे पति हैं, बताओ जरा कौन मरद अपनी ससुराल जाने की ज़िद करता है। मेरा आदमी तो न जाता है और न मुझे जाने देता है। चली जाओ दीदी भैया खुश हो जाएंगे और हमको भी इतनी ठंड में दो दिन की छुट्टी मिल जाएगी।”
“क्यों, दूसरों ने भी तुम्हें छुट्टी दे दी है क्या?”
“दीदी इतनी ठंड में घर में रहता ही कौन है। सब लोग तो कहीं न कहीं जाते ही हैं।”
“सब लोग जाते हैं तो क्या हम भी चले जाएं?”
“दीदी आप तो बेवजह बिगड़ रही हैं, लड़कियां अपने घर जाने को बेताब रहती हैं और आप हैं कि…” अपनी बात को अधूरी छोड़ते हुए रमा फिर से अपने काम को पूरा करने लगी। वह कह तो सही रही थी लेकिन उसका इस तरह सुझाव देना मुझे अच्छा नहीं लगा। रमा दोबारा कुछ कहती, इससे पहले ही मैं कॉफी की ट्रे लेकर बेडरूम में आ गयी। मैं समझ गयी इस बार मुझे, रोहित की बात माननी ही पड़ेगी।
कॉफी का मग रोहित को थमाते हुए मैंने कहा, “अच्छा चलते हैं, तुम ऑफ़िस से जल्दी आ जाना या छुट्टी ले लो।” मेरे मुँह से इतना निकलते ही उन्होंने झट से गर्म कॉफी को अपने होठों से लगा ली और मुस्कुराते हुए बोले, “छुट्टी की चिंता तुम मत करो! तुम कहो तो अभी ही छुट्टी कर दूं…” अचानक ही शरारत करते हुए उन्होंने मेरे गालों को चूम लिया और मैंने ये कहते हुए ये धक्का दे दिया कि घर में हम दोनों के अलावा कोई और भी है।
रोहित को मैंने पसंद भी इसीलिए किया था कि उनकी नज़र में हर किसी की इज़्ज़त होती है, चाहे वह बड़ा आदमी हो या छोटा, या फिर उनके रिश्तेदार हो या मेरे। रोहित को जब भी छुट्टी मिलती हम अक्सर उनके गाँव चले जाते, लेकिन रोहित ये भी चाहते थे कि कभी-कभी मैं अपने घर भी जाया करूँ। मम्मी-पापा भी अक्सर हमें बुलाते रहते, लेकिन मैं ही आनाकानी करके सारा प्लान कैंसिल कर देती। मुझे अकेले अपने घर जाने में कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन रोहित को मैं अपने घर से दूर ही रखना चाहती थी। इस बार भी मैं यही चाह रही थी लेकिन जब से रोहित ये पता चल गया कि मेरे मम्मी-पापा की शादी की सालगिरह आने वाली है तबसे वे वहाँ जाने के लिए बेताब थे। उनकी ज़िद देखकर मैं बुरी तरह परेशान हो गयी थी क्योंकि आज तक तो मैंने अपने मम्मी-पापा को उनकी शादी की सालगिरह तो क्या एक त्यौहार भी ढंग से मनाते हुए नहीं देखा था। वे दोनों टॉम-जैरी की तरह हमेशा लड़ते ही रहते। यहाँ तक कि पिछले कुछ सालों में मैंने उन्हें आपस में ढंग से बात करते हुए भी नहीं देखा था, और अब मुझे इसी बात का डर था कि कहीं रोहित के सामने जो मैंने उनदोनों की इज़्ज़त बना रखी थी वो कहीं धूमिल न हो जाए। वहाँ एक दिन रुकने के हिसाब से मैं पैकिंग करने लगी साथ ही बाहर की ठंड को देखते हुए मैंने गिफ्ट लाने का विचार छोड़ दिया और सोच लिया था कि वहीं से कुछ ऑनलाइन आर्डर कर दूंगी।
रोहित दिए गए वक़्त से पहले ही घर लौट आये थे। मुझे रजाई में घुसा हुआ देख कर वे नाराज़गी से बोले, “तुम अभी तक तैयार नहीं हुई?”
“बाहर का मौसम देख रहे हो, कितनी ज्यादा ठंड पड़ रही है। हिम्मत नहीं हो रही है तैयार होने की।” कहते हुए मैनें रजाई को और ज्यादा ख़ुद से लपेट लिया।
“ठीक है तो तुम ऐसे ही रजाई लेकर गाड़ी में बैठ जाओ। अपने घर ही तो जाना है।” कहते हुए उन्होंने मेरी रजाई खींच ली।
कुछ देर बाद हम गाड़ी में बैठे थे। बैक सीट पर एक बड़ा सा केक का डिब्बा और कुछ गिफ्ट्स रखे हुए थे। ये सब देखकर मैं हैरान थी कि रोहित मुझसे कहीं आगे की सोच लेते हैं।
सुबह रोहित के ऑफिस जाते ही मैंने पापा को फोन करके हम दोनों के आने की ख़बर दे दी थी और ज़ोर देकर ये भी बता दिया था कि हम वहाँ एक-दो दिन रुकने वाले हैं। मेरी आवाज़ की कपकपाहट और परेशानी समझते हुए पापा ने जवाब में बस इतना ही कहा था, “बेटा तुम बेफिक्र होकर अपने घर आओ। तुम्हें ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है।”
पापा ने मुझे तसल्ली जरूर दी थी लेकिन मेरे मन में एक अजीब सी उठापटक चल रही थी। मैं अपने बारे में नहीं सोच रही थी बल्कि मुझे रोहित की फिक्र थी। अगर रोहित के सामने मम्मी ने कुछ ऊटपटांग हरकत कर दी तो मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होगी।
मम्मी को हमेशा से एक अलग तरह की सफाई करने का भूत सवार रहता। मम्मी एक नर्स हैं, हॉस्पिटल में हर तरह की बीमारी और इन्फेक्शन को देखते रहने के कारण सफाई के प्रति उनकी एक अलग सोच विकसित हो चुकी थी। हॉस्पिटल से आते ही वह सफाई में जुट जाती। एक हद तक उनकी इस आदत को घर में सब पसंद भी करते थे लेकिन समय गुजरने के साथ उनकी ये आदत उनकी सनक में बदल गयी और उनकी सनक घरवालों के लिए समस्या बन गयी। बाहर से आने वाली हर नई चीज पहले घर में धुली जाती फिर उसका इस्तेमाल होता। और जिसे न धुल पाती उस पर गंगा जल का छिड़काव कर देती। इस चक्कर में न जाने कितनी चीजे बर्बाद हो चुकी थी। यहाँ तक कि भारी ठंड में भी वह रजाई-कंबल धुल देती। प्लाई वाले डबल बेड भी धुले जाने के कारण फूल कर खराब हो चुके थे। महंगे सोफे गीले कपड़े से पोछने के कारण सड़ चुके थे। गर्मियों में तो उनकी धुलाई-सफाई से और भी बुरे हाल रहते, पूरा-पूरा दिन पानी का मोटर चलता रहता लेकिन छत पर बनी पानी की टंकी कभी भर नहीं पाती। जब कभी कोई रिश्तेदार हमारे घर रहने आ जाता तो मम्मी उनकी अटैचियों को गीले कपड़े से पोछने लगती, अगर वे किसी पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आये होते तो पहले मम्मी उनके कपड़े बदल लेने पर जोर देने लगती। फिर चाय पानी का इंतज़ाम करती। फिर उनके जाते ही सोफे के कवर और चादरें बदल दी जाती। यहाँ तक कि जब मम्मी घर की सफाई करने चलती तो वे घर में मौजूद हर सदस्य को घर के बाहर बगीचे में भेज देती और ख़ुद दरवाज़ा बन्द करके घर की धुलाई-सफाई करती रहती। इसी चक्कर में रिश्तेदार घर आने से परहेज के लगे। साथ ही अगर मम्मी किसी रिश्तेदारी में जाती तो उनकी बेवजह की रोक-टोक से लोग भी उनके पास बुलाने से कतराते। हद तो तब हो गयी जब एक दिन पापा ने उन्हें आटा, शक्कर और चायपत्ती जैसी चीजों पर गंगा जल छिड़कते देख लिया। उस दिन पापा को लगा कि अब मम्मी को इलाज की ज़रूरत है, लेकिन हर बार मम्मी इस बात पर उलझ पड़ती।
सालों तक घर के इस बोझिल माहौल में रहने के बाद पापा ने मुझे हॉस्टल में छोड़ने का फैसला कर लिया था। वह नहीं चाहते थे कि मम्मी की आदतें मेरे अंदर भी आ जाए, पर वे आदतें तो कुछ-कुछ मेरे अंदर आ चुकी थी, जिसका अहसास पापा तब हुआ जब वह मेरी शादी के बाद पहली बार मेरे घर दिल्ली आये। मम्मी की तरह मुझे भी बात- बात पर सफाई करने का भूत चढ़ा देख कर वे परेशान हो गए। मेरा, रोहित को बात-बात पर सफाई के लिए टोकना और रोहित का मेरी बातों पर चिढ़ जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था। उस दिन रोहित के ऑफिस जाने के बाद उन्होंने मुझे समझाते हुए बस इतना कहा था, “श्रेया बेटी, रोहित बहुत अच्छे इंसान और अच्छे जीवनसाथी हैं। अपने रिश्ते को सम्भाल लो! उसे हमारे रिश्ते जैसा मत बनने दो!” तब मुझे एहसास हुआ कि पापा सही कह रहे हैं।
हमने लगभग आधा सफर तय कर लिया था। कुहासा बहुत हद तक छट चुका था लेकिन दोपहर के ढलते ही बाहर की ठंड और बढ़ गयी थी। मुझे लगातार कई छींकें आ जाने के कारण रोहित ने गाड़ी एक ढाबे पर रोक दी। हमने चाय पी, गर्मागर्म पालक के पकौड़े खाए और फिर से अपने अधूरे सफ़र को पूरा करने निकल पड़े। इस बार मैं बहुत दिनों बाद अपने घर जा रही थी शायद कई महीनों बाद…
बरेली में घुसते ही अपनेपन के अहसास ने मुझे लपेट लिया। कुहासे की वजह से शाम और रात के बीच का अंतर खत्म हो चुका था। शहर में सब कुछ वैसा ही था जैसा कि मैंने पिछली बार देखा था बस इतना अंतर था कि ठंड की वजह से लोगों की चहल-पहल ज़रा कम दिखाई पड़ रही थी। और जो लोग दिख रहे थे वे अलाव जलाकर उसके चारो ओर सिकुड़े हुए बैठे थे। गाड़ी जैसे ही दरवाज़े पर रुकी, पापा-मम्मी दोनों ही एक साथ हमारे स्वागत के लिए बाहर तक आ गए। दोनों जरूरत से ज़्यादा ख़ुद को खुश दिखाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके खुश रहने के पीछे का प्रयास सिर्फ और सिर्फ मैं समझ रही थी।
पापा रोहित को लेकर अंदर जाने लगे। रोहित ने बिना कहे ही घर के मुख्य दरवाजे पर जूते के साथ अपने मोजे भी उतार दिए और सीधे बाहर की तरफ बने बाथरूम में पैर-हाथ धुलने चले गए। मुझे याद है कि जब वह पहली बार यहाँ आए थे तो मम्मी ने उन्हें टोक दिया था कि जूते पहन कर अंदर नहीं जाना है । मम्मी ने जिस तरह से कहा था उससे पापा शर्मिंदा से हो गए थे और मैं झेप गयी थी।
घर में घुसते ही रोहित ने आर्डर दे दिया कि घर में कुछ भी नहीं बनेगा। हम सब बाहर डिनर पर जाएंगे। पर फिर भी मम्मी किचेन में घुसी हुई थी। जब हमने उन्हें बताया कि हम रास्ते से थोड़ा बहुत खा-पीकर आये हैं तब कहीं वे हमारे साथ आकर बैठीं, फिर भी चाय उन्होंने बना ही ली। बाहर खाने को लेकर पहले तो मम्मी ने थोड़ी न नुकुर की, लेकिन फिर पापा के समझाने पर वह मान गयी। मैं भी नहीं चाहती थी कि मम्मी हमारी वजह से किचेन में उलझी रहें। मम्मी पहले से कमजोर लग रही थी। जरूरत से ज्यादा काम उन्होंने अपने सिर पर लाद रखा था। घर में सिर्फ दो जन ही थे लेकिन उसके बाद भी वह हर एक दिन पूरे घर का एक-एक कोना अपने हाथों से साफ़ करती। अभी भी घर हमेशा की तरह वैसे ही चमक रहा था। ड्राइंगरूम में पड़े हुए दीवान पर बिछी हुई नई चादर देखकर मुझे याद आया कि इस दीवान पर चादर तभी बिछाई जाती है, जब घर में कोई मेहमान आने वाला होता है। मम्मी की बढ़ती हुई सफाई को देखकर पापा कई बार हाउस हेल्पर रखने की बात चुके थे, लेकिन मम्मी को किसी दूसरे का काम ही नहीं भाता था और न ही किसी हाउस हेल्पर को मम्मी के काम करवाने का अंदाज़ भाता था!
गर्मागर्म चाय पीने के बाद मम्मी-पापा को तैयार होने का कहकर मैं भी फ्रेश होने चली गयी और रोहित ने एक लंबी ड्राइव के बाद कुछ आराम करने के मूड से सोफे को ही अपना बिस्तर बना लिया था।
महीन काम की कश्मीरी सिल्क की साड़ी पहने हुए मम्मी काफी समय बाद फ्रेश लग रही थी। पापा ने भी नया कोट पहन रखा था। रोहित ने गाड़ी से सारे गिफ्ट्स निकालकर मुझे थमा दिए। मम्मी-पापा के लिए एक्सपेंसिव रिस्ट वाच के साथ महँगे परफ्यूम का सेट देखकर मैं रोहित की पसंद की मन ही मन तारीफ़ कर बैठी। साथ में मम्मी के लिए एक लांग कोट भी था जिसे रोहित ने उसी समय पहनने की गुजारिश की।
कुछ देर बाद हम सब उस छोटे से शहर के सबसे बड़े होटल में बैठे थे। जहाँ खाने के साथ संगीत का भी इंतज़ाम था। रोहित ने सब कुछ पापा-मम्मी की पसंद का ऑर्डर किया था। रोहित और मैं चल रहे संगीत कार्यक्रम को लेकर बात कर ही रहे थे कि तभी मुझे एहसास हुआ कि कोई तो है जो मुझे बार-बार देख रहा है। मैंने थोड़ा गौर से उस तरफ देखा तो पाया कि वहाँ स्मिता बैठी है जो कभी मेरी दोस्त हुआ करती थी। लेकिन एक वाकये के कारण न सिर्फ हमारी दोस्ती टूट गयी बल्कि मुझे, दूसरी सहेलियों के सामने भी शर्मिंदा भी होना पड़ा था। ये बात तब की है जब हम दोनों सातवीं या आठवीं कक्षा में रहे होंगें। एक बार स्मिता छुट्टी के दिन, मेरे साथ खेलने मेरे घर आयी थी। उसने कई बार बेल बजायी, दरवाजा खटखटाया लेकिन दरवाजा नहीं खुला तो उसने गलियारे में लगी उस अधखुली खिड़की से घर के अंदर झांकने की कोशिश की जिसका लकड़ी का दरवाज़ा फूल जाने के कारण ठीक से बंद नहीं होता था। तब उसने देखा कि मम्मी अर्धनग्न कपड़ो में घर की धुलाई-सफाई करने में लगी हैं जिसे देखकर वह घबराती हुई वापस अपने घर लौट गई। उस समय मम्मी ने मुझे बाबा के साथ उनके कमरे में बंद कर रखा था। अगले दिन स्कूल में जब स्मिता ने मुझे ये सब बताया तब मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। मैंने ख़ुद भी अक्सर मम्मी को इस तरह से सफाई करते हुए देख चुकी थी। मैं लगभग रोते हुए उसके आगे गिड़गिड़ाई थी कि ये बात वह किसी और सहेली को नहीं बताएगी। मुझे स्मिता पर विश्वास था लेकिन उस दिन, स्कूल खत्म होते-होते ये बात लगभग सब सहेलियों के बीच फैल चुकी थी और उसके बाद हर दिन मेरा मजाक बनाया जाने लगा था। स्मिता से दोबारा मेरी नज़र न टकराये इसलिये मैंने अपनी सीट बदल ली।
“श्रेया! क्या वह तुम्हारी दोस्त है! जाकर मिल लो उससे…” रोहित की आवाज़ से अचानक मेरा ध्यान टूटा। उसने स्मिता की तरफ इशारा करते हुए कहा तो मैं उन्हें बस इतना ही कह सकी कि वह लड़की बस मेरी एक क्लास फेलो थी।
केक कटिंग के बाद जब मम्मी-पापा ने एक दूसरे को अपने हाथों से केक खिलाया तो मैं पहली बार रोहित के सामने मम्मी-पापा को लेकर सहज महसूस करने लगी। दोनों को इतने सालों बाद इतना सामान्य व्यवहार करता देखकर मुझे भी रोहित पर प्यार आ गया और मैं ख़ुद को कोसने लगी कि अगर रोहित ने यहाँ आने की ज़िद न की होती तो मैं आज मम्मी-पापा के बीच की घटती दूरी को देख न पाती। उन दोनों के बीच ये चमत्कार कैसे हुआ ये मुझे नहीं पता लेकिन सब कुछ अच्छा लग रहा था। शायद मेरी तरह मम्मी ने भी अपने सम्बन्ध को बचा लिया था।
लंबे सफर और पार्टी के दौरान हम इतना थक चुके थे कि मुझे अब सिर्फ बिस्तर नज़र आ रहा था। पापा ने जब हमारे रुकने का इंतजाम अपने कमरे में किया तो मैं हैरान थी! और लगातार हैरान होती जा रही थी। ये नामुमकिन सी बात थी कि पापा इस कमरे में किसी को रुकने की इजाज़त दें। असल में ये कमरा पापा का नहीं बल्कि उनके पापा का था यानी कि मेरे बाबा का ! उस कमरे में कदम रखते ही मैं उस जगह को हैरत से देखने लगी। थोड़े बहुत बदलाव के साथ कमरे में सब कुछ वैसा ही था जैसा बाबा रखते थे। पापा, बाबा को बहुत चाहते थे पर उनका असमय गुजर जाना, पापा के लिए किसी सदमे जैसा था। उनको लगता था कि बाबा की मौत मम्मी के कारण ही हुई है।
सालो पहले एक ऐसा ही ठिठुरने वाला दिन था जब बाबा मुहल्ले में किसी के अंतिम संस्कार में गए थे। जब वह वहाँ से लौटे तो शाम गहरा चुकी थी। बाबा अभी दरवाजे पर पहुंचे ही थे मम्मी ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। और उसी ठिठुरती ठंड में खुले बगीचे में नहाने की वजह से बाबा की तबियत बिगड़ गयी। उसके बाद भी मम्मी उन्हें हर दिन नहाने पर जोर देती जिस कारण बाबा को निमोनिया हो गया जिससे जब वे बीमार हुए तो कभी सही नहीं हो पाए और ठंड के जाते-जाते बाबा भी हमको छोड़कर चले गए। दादी पहले से नहीं थी अब बाबा के जाने से पापा टूट गए, जिसका असर उनके काम पर भी पड़ा। धीरे-धीरे पापा का जमा-जमाया बिज़नेस नुकसान की तरफ़ चला गया। अंत में घर की गृहस्थी, मम्मी की नौकरी के सहारे चलने लगी। पापा जो पहले मम्मी की आदतों पर लड़ जाते थे वे अब बिज़नेस खत्म होने के बाद चुप रहने लगे। उनकी चुप्पी उनपर इतनी हावी हो गयी कि उन्होंने मम्मी के साथ अपने कमरे में रहना छोड़ दिया और बाबा के कमरे को ही उन्होंने अपना ठिकाना बना लिया था। इस तरह हमारे घर में लोगों से ज्यादा उनकी खामोशियाँ रहने लगी थी।
अगले दिन मम्मी ने अस्पताल से छुट्टी ले रखी थी। घर में रहने के बावजूद भी उन्हें हमेशा की तरह सफाई में व्यस्त न देखकर मुझे थोड़ा आश्चर्य होने लगा।
किचेन से तरह तरह की महक आ रही थी। गाजर का हलवा, मक्खन-मलाई, पूड़ी-कचौरी और भी कई तरह के नाश्ते से पूरी डाइनिंग भरी हुई थी। “दामाद की पसंद का इतना कुछ और मेरी पसंद का कुछ भी नहीं” झूठी नाराज़गी दिखाते हुए मैं मम्मी की मदद करने चली तो पापा ने ये कहते हुए मुझे किचेन से बाहर भेज दिया कि शादी के बाद पहली बार तो दामाद जी घर में रुके हैं।
सच में रोहित ने पहली बार यहाँ रात बिताई है वरना रात होने से पहले ही हम लौट जाते । हालांकि रोहित ने कई बार इच्छा जताई थी कि हम यहाँ रात में रुक जाते हैं लेकिन मैं ही हज़ार बहाने बनाकर यहाँ रुकने को टाल देती। मुझे हमेशा डर लगता कि कहीं मम्मी अपनी साफ-सफाई रोहित के साथ न करने लगें। इस बार भी मुझे यही डर लग रहा था, लेकिन इस बार मम्मी ने ख़ुद को बहुत सम्भाल रखा था। इसका अंदाजा मुझे इस बात से हुआ कि हमारा ट्रेवलिंग बैग बिना धुले ही घर के भीतर तक स्थान पा चुका था।
नाश्ता खत्म करने के बाद पापा रोहित को अपने साथ शहर घुमाने ले गए जबकि मैं मम्मी के साथ समय बिताना चाहती थी। स्कूल वाले वाकये के बाद मेरी दोस्ती लगभग सभी दोस्तों से टूट चुकी थी, और कोई रिश्तेदार भी हमारे घर आने से कतराता था। इस सब के बीच मैं बेहद अकेली हो चुकी थी। जिसका ज़िम्मेदार मैं मम्मी को ही मानती थी। इसी वजह से एक लंबे समय तक हमारे बीच एक दूरी सी बन गयी थी।
श्रेया, क्या तुम कुछ दिन रुक नहीं सकती। कितने दिन बाद आई हो ,दो चार दिन रुक जाओ हमारे साथ…” मम्मी ने कहा तो मेरा मन भी भर आया। मम्मी मेरे सिर पर हाथ फेर रही थी और मैं उनकी गोद में सिर रखकर आँख बंद किये अतीत के उस सुनहरे पलो को खोजने की कोशिश कर रही थी जो बमुश्किल मेरे हिस्से में आये थे।
“मम्मी रोहित को दिक्कत होगी, आप तो जानती हैं कि उन्हें खाना बनाना नहीं आता।” मैंने बहाना किया।
मम्मी ने फिर कुछ नहीं कहा। कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद वे दोपहर के खाने की तैयारी करने किचेन में चली गयी और मैं भी अपना बिखरा सामान समेटने लगी क्योंकि रोहित बोल कर गए थे कि लंच करते ही हम दिल्ली के लिए निकल लेंगें।
बाहर हल्की धूप खिल आयी थी। मैं घर से निकलकर बाहर बगीचे में चली आयी जहाँ जैस्मीन, कैनिलिया और स्वीट एलिसम जैसे फूलों से उस जगह की खूबसूरती और ज्यादा बढ़ चुकी थी। पापा को बागवानी का खासा शौक था। मम्मी जब घर बंद करके सफाई करती रहती तब पापा अपना सारा समय इस छोटे से बगीचे को देते। अपने घर के उस छोटे, लेकिन सुंदर से बगीचे की खूबसूरती को मैं अपने मोबाइल में कैद ही कर रही थी कि रोहित की गाड़ी आती हुई दिखाई दे गई।
मम्मी ने खाने में वही सब बनाया था जो रोहित की पसंद का था। मम्मी अपने दामाद की आवभगत पूरे दिल से कर रही थी। आज मैं उनको दिल से बताना चाहती थी कि सालों बाद इस घर की खामोशी में मुझे सबकुछ खनकता हुआ महसूस हो रहा है।
रोहित रात होने से पहले ही दिल्ली पहुंच जाना चाहते थे इसलिए खाना खाते ही हम अपने सफर पर निकल पड़े। हमारी पूरी गाड़ी खाने-पीने के सामान से भरी हुई थी जो कि पापा लेकर आये थे। मम्मी ने भी रात का खाना हमें पैक करके दे दिया था। ऐसा नहीं था कि ये सब वे दोनों पहली बार कर रहे थे लेकिन इस बार सब कुछ बहुत सहज और खुशनुमा लग रहा था। उनदोनों का प्यार देखकर एक बार मेरा मन किया कि मैं यही रुक जाऊं। अचानक मुझे मम्मी की कही वह बात भी याद आ गयी कि क्या मैं एक दो दिन यहाँ रुक नहीं सकती? लेकिन अब मैं रोहित से ये बात कैसे कहूँ, क्योंकि मैं तो यहाँ आना ही नहीं चाहती थी। मुझे शान्त और उदास बैठा देख रोहित ने पूछ लिया तो मैं बस इतना ही कह पाई कि, “मम्मी रुकने के लिए कह रही थी और इस बार मेरा मन भी कर रहा था कि कुछ दिन रुक जाऊं…।” बोलते-बोलते मेरा गला भर आया। अभी हम घर से कुछ दूर ही पहुँचे थे कि रोहित ने गाड़ी घर की तरफ वापस मोड़ दी और बस इतना बोले, “ अरे इसमें इतना झिझकने की क्या बात है। तुम्हारा घर है, तुम आराम से कुछ दिन रहकर आ जाना, या मैं ख़ुद आ जाऊंगा तुम्हें लेने…” उनकी बात खत्म होते-होते हम दोबारा घर के बाहर पहुँच चुके थे। पापा बगीचे में पौधों को पानी दे रहे थे मुझे वापस आता देख वे दौड़कर हमारे पास आते हुए बोले, “कुछ छूट गया क्या…? पापा गंभीर थोड़े गंभीर थे लेकिन रोहित ने उनसे मजाक करते हुए कहा, “ पापा जी कुछ छूटा नहीं है बल्कि मैं कुछ जबरदस्ती ले जा रहा था।” रोहित के मजाक को न समझते हुए पापा मेरी तरफ देखने लगे तब मैंने उन्हें बताया कि मेरा मन है कि मैं कुछ दिन आप सब के साथ रहूं।” कहते हुए मैं गाड़ी से निकलकर घर की तरफ बढ़ने लगी तो वहीं रोहित मेरा बैग गाड़ी से निकालने लगें। मुझे इस तरह घर की तरफ बढ़ता हुआ देखकर पापा के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्होंने घर के मुख्य दरवाजे की तरफ देखा जो कि अंदर से बंद था। कुछ सोचते हुए अचानक मेरे कदम भारी हो गये, मैं घूम कर गलियारे में बनी उस अधखुली खिड़की की तरफ चली गयी जहाँ से मुझे झाँकने पर नज़र आया कि मम्मी लगभग अर्धनग्न कपड़े में मेरे ठहरने वाले कमरे की सफाई के साथ घर के बाकी हिस्सों में गंगा जल छिड़क रही थी।
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शिवानी ‘शांतिनिकेतन’
एंड्रूस पल्ली, जिला: बीरभूम, शान्तिनिकेतन, प.बंगाल – 731235
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उत्तर प्रदेश के बाराबंकी की मूल निवासी शिवानी पिछले एक दशक से भी अधिक समय से शांतिनिकेतन में रह रही है. वर्ष 2024 में इनका कहानी संग्रह “मुड़ी हुई पर्चियां” प्रकाशित हो चुका है. इसके अतिरिक्त, इनकी साहित्यिक यात्रा में उजेश काव्य संग्रह, कस्तूरी, रत्नावली और आयाती जैसे साझा संग्रहों का भी विशेष योगदान रहा है. इनकी लेखनी केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इनकी कविताएं और कहानियां देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से स्थान पाती रही हैं. इनकी रचनाएं ‘सेतु’ (अमेरिका) और ‘साहित्यकुंज’ (कनाडा) जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं से लेकर ‘अहा! ज़िन्दगी’, में प्रकाशित हो चुकी हैं. “तेजाब प्रेम”, “सहज स्वीकृति”, और “जीवन अभी बाकी है” जैसी रचनाओं के माध्यम से आपने सामाजिक संवेदनाओं और मानवीय रिश्तों के विभिन्न पहलुओं को संजीदगी से उकेरा है. प्रतिष्ठित सम्मुख ऑनलाइन पत्रिका के दिसंबर 2025 के अंक में इनकी कहानी ‘सभ्य हत्यारा’ प्रकाशित हुई है. मार्च 2026 में कृति बहुमत तथा वनमाली कथा के अगस्त अंक में भी एक कहानी प्रकाशित हुई है।





