
विमल चन्द्र पाण्डेय ने कथा लेखन की एक लंबी यात्रा की है और हमें कई यादगार कहानियाँ और कई मानीखेज उपन्यास दिए हैं। यह कहानी हमारे पास बहुत पहले आई थी लेकिन अनहद की अनियमितता की वजह से यहाँ हम इसे प्रस्तुत नहीं कर पाए। अब इस बेहतरीन कहानी को प्रस्तुत करते हुए हमें खुशी हो रही है। यह कहानी पक्षधर पत्रिका से साभार।
‘एक कॉलम की ख़बर’ केवल नक्षत्र की मानसिक विडंबना की कहानी नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है जहाँ मनुष्य को पहले प्रतीक बनाया जाता है, फिर भीड़ का हिस्सा, और अंततः एक छोटे-से समाचार में बदल दिया जाता है।
यह कहानी ‘एक कॉलम की ख़बर’ अपने व्यंग्य, राजनीतिक विडंबना और मनोवैज्ञानिक गहराई के माध्यम से समकालीन समाज की एक भयावह तस्वीर प्रस्तुत करती है।
अनहद कोलकाता पर प्रस्तुत है यह कहानी। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार तो रहेगा ही।
एक कॉलम की ख़बर
विमल चन्द्र पाण्डेय
मुझे आजकल भूख कम लगती है। दिन में अधिक से अधिक दो बार सिर उठा कर नाँद की तरफ देखती हूँ। प्रायः वहाँ भूसा मिलता है। कई बार नहीं भी होता। तब मेरा मन रम्भाने का नहीं करता। मेरी तबियत कदाचित ठीक नहीं है। मेरी स्मृति कदाचित ठीक नहीं है. मैं जहाँ हूँ ये स्थान मुझे नहीं भाता. मैं अपने असली मालिक के पास भाग जाना चाहती हूँ जो मुझे मेरे होने का अर्थ बताता है. जिसकी बातें सुन कर मुझे अनुभव हुआ कि मैं मात्र एक गाय नहीं हूँ. मेरा जन्म धरती पर दूध की नदियाँ बहाने मात्र के लिए नहीं हुआ बल्कि मेरे तुच्छ पशु जीवन का भी कोई बड़ा उद्देश्य हो सकता है. मैं इस घर से निकल कर कई बार उनके पास जाने का प्रयास कर चुकी हूँ लेकिन मुझे घेर कर पकड़ लिया जाता है और गले में रस्सी लपेट कर खूंटे से बांध दिया जाता है. मुझसे कहा जाता है कि मेरे असली मालिक यही लोग हैं, वो जिसे मैं असली मालिक समझ रही हूँ, मात्र एक भ्रम है.
प्रारंभ में इन लोगों का व्यवहार कुछ बेहतर था. इन्होने मुझे घर में रखा. मेरे मस्तक पर ऊपर पंखा भी लगा था लेकिन जब-जब मैं अपने असली मालिक के पास जाना चाहती हूँ, मुझे प्रताड़ित किया जाता है. अहाते में बांध दिया जाता है. चिकित्सक के पास ले जाया जाता है. मुझे वो चिकित्सक बिलकुल भी नहीं पसंद. वो मेरा उपचार ऐसे करता है जैसे मैं कोई पशु न होकर एक सोचने समझने वाला मनुष्य हूँ. वो मुझसे मनुष्यों की भाषा में बात करता है. मैं उसकी बात समझ भी लेती हूँ लेकिन उसे अपनी बात कैसे समझाऊं. मुझे रम्भाने के अलावा कुछ नहीं आता. मुझे अपनी देह में सुइयां नहीं लगवानी. मुझे अपने असली मालिक के पास जाना है.
इस मालिक ने मुझे कभी अपने बच्चों से अलग मुझे नहीं माना। सदा मुझे वो दिया जो मेरे लिए अच्छा था लेकिन आजकल वो बदल गए हैं। कल अति हो गई जब मैंने भूख लगने पर सिर ऊपर उठाया और नाँद की तरफ देखा। वहाँ एक थाली में रोटी सब्ज़ी और बैंगन का भरता था। मुझे क्रोध आया. क्रोध खाने को देख कर नहीं, उसे सजा कर थाली में दिए जाने से आया। ये सब मुझे मनुष्य बना कर न जाने क्या करवाना चाहते हैं.
मैंने सींग मार कर थाली गिरा दी। मालिक मेरे पास आकर बैठ गए और रोने लगे.
आज रात जब सब सो जायेंगे, मुझे पीछे की दीवार फांद के असली मालिक के पास पहुँच जाना है.
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“नाम मार्कंडेय तिवारी. गाँव में कुल दो सौ की जनसँख्या रही होगी. डेढ़ सौ से कुछ ज्यादा हिन्दू, पचास से कुछ कम मुसलमान. गाँव में वो सब कहावतें सुनीं जिनसे मेरे बचपन का निर्माण हुआ. कुछ मेरी दादी सुनाती थीं कुछ माँ और कभी कभी बाबा. बाबा हालाँकि सुनाने के बाद हंस कर तम्बाकू थूकते थे जिससे लगता कि कहावत के असली अर्थ को उन्होंने बाहर थूक दिया है. ‘हिन्दू बढ़े नेती, मुसलमान कुनेती’, या ‘तुरुक तोता और खरगोस ई तीनों न माने पोस’, या फिर ‘जे खाई गाई के गोस्त कभी ना होखे हिन्दू के दोस्त’, ये हम सुनते हुए बड़े हुए थे. लेकिन जुम्मन चाचा बाबा के इतने करीबी थे कि ये सब कहावतें हमने हमेशा मजाक में लीं. गाँव का माहौल मस्त मलंग था. रामलीला में जुम्मन शेख और तुर्की टोला के कारीगर कमाल के मुखौटे और राम रावण के पुतले बनाते. मुहर्रम के वक़्त मुसलमानों के विरोध में कहावतें सुनाने वाली दादी मेरे नाम का मुनादी ताजिया रखतीं. अधिकतर परिवारों के मुखिया अकीदत की बुनियाद पर ताजिया रखते और अजादारी करते. हमारी उम्र के टोले के मुस्लिम दोस्त भी काफ़िरों के खिलाफ कही जाने वाली वो कहावतें सुनाते जो उन्हें उनके घर में बताई जाती थीं. हम अपने घर की कहावतों पर एक साथ हंसा करते और गाँव की हिन्दू मुस्लिम दोनों टोले में जवान हो रही लड़कियों को याद कर आसमान में देखा करते थे. हमने हमेशा से बातों में हिन्दू मुसलमान किया था लेकिन ज़मीन पर हम आराम से एक साथ रहते थे. रामलीला में राम का रोल जुम्मन चाचा का लड़का रहमान करता था. सीता का रोल मेरा दोस्त रामवतार करता था. आसपास के कई गाँव के लोग हमारी प्रसिद्ध रामलीला देखते और सराहते थे.”
“समझ गया मैं, आगे क्या हुआ, शार्ट में बताइए?”
“गाँव में पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं अपने टाउन यानि सुल्तापुर यानि सुल्तानपुर आ गया और वहां से ग्रेजुएट होने के बाद मेरी नौकरी लग गयी. नौकरी के साथ ही मैं यहाँ इलाहाबाद आया और कुछ सालों बाद शादी की. इनके मेरे जीवन में आने के बाद मेरे जीवन को दिशा मिल गयी. फिर नक्षत्र पैदा हुआ. हम बहुत खुश थे.”
‘नक्षत्र के बचपन के बारे में बताइए.’
‘जी?’
‘नक्षत्र के बारे में समझने से पहले मुझे आपका बचपन जानना ज़रूरी था. अब नक्षत्र के बारे में विस्तार से बताइए.’
‘जी. नक्षत्र शुरू से बहुत मेधावी था. कक्षा में हमेशा अव्वल रहता था. लेकिन जैसा कि ज़्यादातर मेधावी विद्यार्थियों के साथ होता है, वे अपनी मेधा को सही दिशा में बनाये नहीं रख पाते. उसे फ़िल्में देखने और शराब पीने का चस्का लग गया. उसके दोस्त कॉलेज से निकल कर बियर लेकर सिनेमा हॉल में फ़िल्में देखते और टिकट मांगने पर अक्सर उलझ जाया करते. एक बार नक्षत्र ने मैनेजर के ज्यादा शोर मचाने पर उसे बहुत पीटा और पीटता हुआ सड़क पर ले आया. उस घटना की ख्याति काफी दूर तक फैली और नक्षत्र और उसके दोस्तों से सिनेमा हॉल के मैनेजर डरने लगे. वे उनका आना जाना इग्नोर कर देते. नक्षत्र और उसके दोस्तों की आवारागर्दी बढती रही और उनमें कोई बदलाव नहीं आया जब तक उसकी ज़िन्दगी में इला नहीं आयी. इला से उसकी मुलाकात कॉलेज में हुई थी जब वो इंटर कर रहा था.’
‘नहीं, इला से वो ग्रेजुएशन में मिला था. दोनों की दोस्ती तभी शुरू हुई.’
‘तुम्हें कैसे पता?’
‘मुझसे वो अपनी बातें शेयर करता था. तुम्हारे पास उसके लिए सिर्फ फरमान होते थे.’
‘बाप यही चाहेगा ना कि बेटा अच्छे से पढ़ लिख के सेट हो जाये.’
‘और माँ ये चाहेगी कि उसका बेटा हमेशा खुश रहे.’
‘प्लीज़ लड़िये मत. मैडम, आप बताइए. आपसे मैं थोड़ी देर बाद सुनता हूँ सर. पहले मैं मैडम से सुनना चाहूँगा.’
‘मेरा नक्षत्र शुरू से ही थोड़ा सेंसिटिव बच्चा था. और बच्चों से थोड़ा अलग, थोड़ा नाज़ुक. अँधेरे से डरता था. तेज़ आवाज़ से सहम जाता. दिन में उसको सुलाने के लिए मैं उसे फैक्ट्री के सायरन से डराया करती थी. मुझे बरसों बाद एहसास हुआ कि मैं गलत करती थी. मुझे एहसास तो हुआ, इनको तो आज तक एहसास भी नहीं हुआ. दस साल का होने पर एक बार उसे हम लेकर पार्क में गए. उसकी उम्र से छोटे बच्चे फिसलपट्टी पर सरक रहे थे. उसके पापा उसे सरकाने के लिए ऊपर ले गए तो वो रोने लगा. इन्होने जिद पकड़ ली कि लड़का हो के लड़कियों की तरह रोयेगा तो कैसे चलेगा. मैंने बहुत समझाया लेकिन इन्होने उसे उस उंचाई से सरका दिया. वो चिल्लाता हुआ नीचे आया और नीचे आने से पहले बेहोश हो गया. मैं उस दिन के बाद से सतर्क हो गयी. नक्षत्र इनसे बहुत डरता था. जब ये उसे तेज़ आवाज़ में डांट देते तो वो कई बार पैंट में पेशाब कर देता था.’
‘आप तो एकदम अलग ही कहानी बता रही हैं.’
‘ये कोई कहानी नहीं है. जो मैंने देखा वो देखने के लिए इनके पास कभी वक़्त नहीं रहा. ये हमेशा सिर्फ उसे मज़बूत बना चाहते थे. कभी उसे ज़बरदस्ती घोड़े की सवारी करवाने लगते तो कभी उसे मेले में ऊंचाई वाली चरखी पर बिठा देते. वो डरता और चीखता रहता. हमेशा कहते तू मेरा शेर बेटा है. एक बार जब वो बारह साल का था तो उसने मेरे पास आकर पूछा था, मम्मी जानवर होना अच्छा होता है या इन्सान, मैंने उसे गले लगा कर उसकी वजह पूछी. उसने कहा पापा मुझसे बहुत नफरत करते हैं. शायद मैं शेर या फिर कुत्ता होता तो पापा मुझे प्यार करते. मैंने अपने बच्चे को गले लगाया और उसे कहा कि तुझे अगर कुछ चीज़ों से डर लगता है तो इसके लिए अपने को कोसने की ज़रूरत नहीं है. हर किसी को किसी न किसी चीज़ से डर लगता है. तू चाहे जैसा भी आदमी बनेगा, हमेशा मेरा बेटा ही रहेगा. तू मुझे बहुत प्रिय है, जैसा है वैसा ही प्रिय है, तुझे शेर या कुत्ता बिल्ली कुछ भी बनने की जरूरत नहीं है.’
‘फिर उसकी संगत कब ख़राब हुई ?’
‘जब वो सत्रह अठारह साल का हुआ, स्कूल से कॉलेज में गया. मोहल्ले और कॉलेज के बदमाश लड़कों से दोस्ती कर ली. नशा करने लगा. कॉलेज ख़तम करने के बाद जब यूनिवर्सिटी में गया तो वहां नेता टाइप के विद्यार्थियों के बीच उठने बैठने लगा.’
‘अभ्युदय तिवारी से उसकी मुलाकात वहीँ हुई ?’
‘हाँ. एक छात्रसंघ चुनाव में जब उसने पूरे मन से मेहनत की और अपने कैंडिडेट को जितवाया तो अभ्युदय तिवारी वहां आये थे. उन्होंने भाषण दिया और मंच से नक्षत्र की तारीफ की. उन्होंने कहा कि वो कॉलेज ख़तम कर के उनके पास आये तो वो उसे अपने साथ रखना चाहते हैं. राजनीति में मेहनती लड़कों की कमी है. नए बने अध्यक्ष ने अगले ही दिन नक्षत्र को उनके घर पहुंचा दिया. नक्षत्र का आना-जाना उनके घर शुरू हो गया. अख़बारों में राजनीतिक कार्यक्रमों में उसका नाम आने लगा. वो कई बार शराब पीकर आता और जब मैं दरवाज़ा खोलती, चुपचाप सिर झुकाए अपने कमरे में जाता और सो जाता. जब ये दरवाज़ा खोलते, ऊँची आवाज़ में अभ्युदय तिवारी जिंदाबाद के नारे लगाता और शोर मचाता हुआ अपने कमरे में जाता. एक रात इन्होने उसे दरवाज़े पे ही डांटना शुरू कर दिया. वो इन्हें धकेल कर अंदर जाना चाहता था तो इन्होने जवान बेटे पर हाथ उठा दिया. उसने जेब से गन निकाली और हाथ ऊपर उठा कर गोली चला दी. ये डर के मारे गिर पड़े और वो हंसने लगा. वो देर तक हँसता रहा. उसकी हंसी देख कर मैं डर गयी. उसने अपने बाप की ओर देखा और चिल्लाया, ‘डरपोक!’ वो अक्सर देर रात तक बाहर रहने लगा था और कुछ भी पूछने पर जवाब नहीं देता या कई बार पूछने पर अचानक चिल्ला पड़ता. बहुत तनाव में रहने लगा था. मैंने अकेले में एक दो बार पूछा भी कि इतना परेशान क्यों है. उसने बताया कि अभ्युदय तिवारी ने उसे गौ रक्षा मंच में उप-सेनापति बना दिया है और उसे समझ नहीं आ रहा है कि वह कौन है और दुनिया में आने का उसका मकसद क्या है. मुझसे लिपट कर थोड़ी देर रोता रहा. मुझे कुछ समझ नहीं आया. मैंने इनसे कहा भी तो इन्होंने बात हवा में उड़ा दी कि वो सही जा रहा है. बड़े लोगों के साथ काम कर रहा है थोड़े मोड़े टेंशन तो होंगे ही. राज्य सरकार के सभी मंत्रियों से अभ्युदय तिवारी के घनिष्ठ संपर्क हैं और वो आज नहीं तो कल प्रदेश में मंत्री बन ही जायेगा. इनको लगता था सरकार के करीबी लोगों के करीब रहने से उसका भविष्य बन जायेगा क्योंकि नौकरियां तो कई सालों से निकल नहीं रहीं, जो निकल रही हैं उनके पेपर आउट हो जा रहे हैं. लेकिन मैं सिर्फ उसके बारे में सोच रही थी. मैं उसकी हालत देख कर बहुत दुखी रहने लगी थी तभी मोहल्ले में एक नए किरायेदार आये जिनकी लड़की इला से उसकी दोस्ती हो गयी क्योंकि दोनों की यूनिवर्सिटी एक थी. वो लड़की उसे कविताएँ सुनाती थी और उसकी दोस्ती के बाद नक्षत्र में मैंने बहुत से पॉजिटिव बदलाव देखे थे.’
‘किस तरह के बदलाव?’
‘वो खुश रहने लगा था. पहले के उल्टा अब उसको गुस्सा जल्दी नहीं आता था. उसने मुझसे एक बार कहा था कि वो अब अभ्युदय तिवारी का काम छोड़ कर अपना कोई बिजनेस शुरू करना चाहता है. मैंने पूछा भी क्या तो उसने कहा कि वो समय आने पर बताएगा. एक दिन जब वो देर रात घर लौटा तो बहुत डरा हुआ था. कमरे में जाकर उसने दरवाज़ा बंद कर लिया और बहुत खुलवाने पर भी नहीं खोला. मैं रात भर उसके दरवाज़े के बाहर बैठी रही. सुबह मेरे खटखटाने पर उसने दरवाज़ा खोला और मुझसे लिपट कर रोने लगा. उसकी आँखों में वही डर था जो मैंने बचपन में देखा था. मैंने उसे सीने से लगा लिया. वो घंटो मुझसे लिपटा सुबकता रहा. मैं उसका सिर सहलाती रही.’
‘वजह क्या थी ?’
‘मैंने बहुत पूछा क्या हुआ लेकिन उसने नहीं बताया. वो मेरी गोद में ही लेटा रहा फिर अचानक ही जीभ निकाल कर मुझे चाटने लगा. मुझे पहले अजीब लगा फिर बहुत डर लगा. मैंने पूछा क्या कर रहे हो, तो वो अजीब आवाज़ में बोलने लगा जैसे रम्भा रहा हो.’
‘ठीक है, रोइए मत प्लीज़. देखिये, पिछले दो बार से इस बार वो काफी शांत दिख रहा है. सुधार हो रहा है. धैर्य रखिये. अब आप दोनों बाहर बैठिये और बाहर जो लड़की है उसे भेज दीजिये. क्या नाम बताया आपने उसका?’
‘जी, इला.’
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“बड़े ही शोक की बात है कि हमने इतना बड़ा कार्यक्रम किया और समाचारपत्र ने एक कॉलम का समाचार बनाया है. गौशाला में एसी लगा है, गायों का आधार कार्ड बन रहा है, ये इतने छोटे स्थान में कही जाने वाली बात है? कौन देख रहा था मीडिया कल?”
“भैया जी, नक्षत्र को बोला था.”
“कैसे हुआ ये? तुम लोग प्रदेश के ऊर्जावान युवा हो. तुम लोगों से ही प्रदेश और देश का विकास हो रहा है. संस्कृति का डंका बज रहा है. लोग नकरात्मक बातें छोड़ गर्व और उत्थान की बातें सोच पा रहे हैं. जितना संस्कृति का काम करना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उन समाचारों का अपने गंतव्य तक पहुंचना. और उतना ही आवश्यक है उनका बड़े आकार में होना. सूचना लोगों तक ऐसी पहुँचनी चाहिए कि उन्हें खोजना न पड़े, उनकी आँखों में चुभे.”
“भैया जी मैंने बड़ी खबर बना कर दी थी…”
“फिर वही खबर…उर्दू है ख़बर.”
“क्षमा चाहता हूँ, बड़ा समाचार दिया था. उनसे बात की मैंने फोन पर, कहते हैं एक विज्ञापन आ गया था तो छोटी करनी पड़ी खबर…समाचार.”
“इस बात की ग्लानि है तुम्हें?”
“जी भैया जी.”
“प्रदेश का भविष्य बनना है?”
“जी भैया जी.”
“नेतृत्व क्षमता है तुममें?”
“है भैया जी.”
“कब दिखाओगे?”
“समय आने पर दिखा देंगे भैया जी.”
“शाब्बास, तुम्हें प्रदेश की राजनीति के आसमान पर एक दिन नक्षत्र की तरह चमकना है. पूरी शक्ति से लग जाओ.”
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‘इला, आप नक्षत्र को कैसे और कितना जानती हैं, वो जानकर मैं समस्या की वजह तक पहुँचा हूँ. मैं ये जानना चाहता हूँ उस रात क्या हुआ था ?’
‘नक्षत्र एक टफ बॉडी के अंदर एक सॉफ्ट लड़का था. लेकिन उसे पता नहीं क्यों रफ टफ रहने और अपनी उम्र से बड़ी बातें करने में मज़ा आता था. शायद इसी बात ने मुझे उसकी तरफ आकर्षित किया. मैंने उसे अभ्युदय का साथ छोड़ने के लिए बहुत समझाया था. पहले वो मेरी बात नहीं सुनता था लेकिन जब से उसे गौ रक्षा यूनिट का कुछ-कुछ बना दिया गया तब से उसके अंदर बदलाव हुआ. एक दिन उसने मुझे बताया कि उसके ग्रुप के कुछ लोगों ने एक टेम्पो पर जा रही गाय की रक्षा की है जिसे विधर्मी काटने के लिए ले जा रहे थे. कुछ दिन बाद उसने उदास आवाज़ में बताया कि उसके ग्रुप के लड़कों में गाय की रक्षा करने से ज्यादा मुस्लिमों को परेशान करने और उन्हें पीटने का जूनून है. उसने ये भी बताया कि ग्रुप का एक लड़का नितिन उसकी जगह लेना चाहता है. मैंने उसे समझाया कि उसे ये सब बेकार के काम छोड़ कर अपने भविष्य की चिंता करनी चाहिए. अपने ग्रुप में उसके नितिन से एकाध बार बहसें वगैरह हुईं और वो कुछ काम धंधा करने के बारे में गंभीरता से सोचने लगा था. अचानक उस दिन….’
‘इला, ये लो पानी पियो. आगे बताओ क्या हुआ. प्लीज़ रोवो मत, वो ठीक हो जायेगा. उस दिन क्या हुआ था?’
‘वो और उसका ग्रुप हाईवे पर नाश्ता कर रहा था. अचानक उनको खबर मिली कि एक टेम्पो पर दो टोपी पहने लोग एक गाय को लेकर जा रहे हैं. उन लोगों ने घेरा बंदी कर दी. थोड़ी देर में टेम्पो आया तो उन्होंने उसे रोका. टेम्पो का ड्राईवर उन पर चिल्लाने लगा. नितिन टेम्पो के सामने आ गया और उसने रॉड से टेम्पो का आगे का शीशा तोड़ दिया. ड्राईवर को गुस्सा आ गया और उसने नितिन को गाली दे दी. नितिन आगबबूला हो गया. लड़के पीछे जाकर गाय को चेक करने लगे तो पता चला कि वो बैल था जिसके पैर में चोट लगी थी. ये लोग उसे हॉस्पिटल ले जा रहे थे. नितिन गुस्से में टेम्पो वालों को गालियां देने लगा. उसने सभी लड़कों को ललकार कर उन्हें जोश दिलाया कि आखिर इतने लोग सामने होने के बावजूद इसने गाली कैसे दे दी. लड़के जोश में आ गए और टेम्पो वालों को मारने लगे. नक्षत्र ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो नितिन ने उसे धकेल दिया और गलती से एक जोर का रॉड उसके सिर पर भी लग गया. नक्षत्र गिरा और गिरे-गिरे उसने देखा की नितिन और उनके दोस्तों ने टेम्पो ड्राईवर को डंडों और रॉड से पीट पीट कर मार डाला. एक की तो खोपड़ी खुल गयी थी, सब कुछ बाहर आ गया. नक्षत्र ये सब देख रहा था. उसने पेंट में पेशाब कर दिया और बेहोश हो गया.’
‘हूँ. आप जा सकती हैं. मैं अब नक्षत्र से मिलना चाहूँगा. सबको अंदर बुला लीजिये.’
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“बेटा नक्षत्र, तुम्हें सिर्फ ये लगता है कि तुम गाय हो, तुम एक इंसान हो. तुम अगर मेरी बात समझ पा रहे हो तो यही कहूँगा कि बार-बार घर से भागने की कोशिश बंद कर दो. यही लोग तुम्हारी फेमिली हैं और तुम्हें प्यार करते हैं.”
ये मनुष्यों का चिकित्सक न अपनी बात मुझे समझा पाता है न मेरी बात समझ पाता है. मुझे अपने असली मालिक के पास जाना है.
“नक्षत्र, रम्भाओ नहीं, अपनी आवाज़ में बोलने की कोशिश करो. बोलो कहाँ रहते हो? कहो प्रयागराज. बोलो बेटा. बेटा देखो, मैंने कुछ दवाइयां दी हैं, वो तुम्हें पापा खिलाएंगे. जिससे तुम्हें नींद ज्यादा आयेगी और सपने भी अजीब आएंगे. साथ में हम तुम्हें तुम्हारी पुरानी चीजें दिखाते रहेंगे ताकि तुम अपने कांशसनेस को वापस पा सको.”
मन तो करता है इस मूर्खतापूर्ण बातें करने वाले चिकित्सक को अपनी सींगों से उठा कर ऐसा फेंकूं कि ये सीधा मेरे नए मालिकों के पास जाकर गिरे लेकिन इसके बाद ये सब मिल कर जो मुझे जकड़ते हैं, सुइयां कोंच देते हैं, उससे भय लगता है.
“देखिये तिवारी जी, ये दवाइयां चलाते रहिये बाकी कल दिल्ली से मेरे सीनियर आ रहे हैं. एम्स में सीनियर साईकियाट्रिस्ट हैं. दिक्कत ये है कि हमने इस बीमारी के बारे में पढ़ा तो है लेकिन ये इतनी रेयर है कि अलग से इसकी कोई परफेक्ट रेमेडी नहीं है पर हम अपना बेस्ट करने की कोशिश कर रहे हैं. आप इसे परसों लेकर आइये, एक बार सर को ये केस दिखा दूंगा, उनके पास ज़रूर कोई सलूशन होगा.”
“जी डॉक्टर साहब.”
**
“ये डायरी हमेशा अपने पास रखती हो?”
“हाँ.”
“क्या है इसमें?”
“कुछ ख़ास, जो कुछ यहाँ वहां पसंद आ जाता है, लिख लेती हूँ.”
“अच्छा! हमारे लायक कुछ है इसमें?”
“बिलकुल है.”
“सुनाओ फिर.”
“सच में सुनना चाहते हो?”
“और नहीं तो क्या?”
“सुनाउंगी. पहले प्रॉमिस करो कि अभ्युदय तिवारी को छोड़ के अगले महीने मोबाइल शॉप शुरू कर दोगे.”
“अरे जगह खाली होने में लगेगा, तुमको पता तो है.”
“हाँ तो तुम वहाँ से पहले अपना नाता तो तोड़ो. उनको बोल दो कि अब रक्षा मंच में नहीं जाओगे.”
“अरे बाबा, इतना आसान है क्या. तुम सुनाओ क्या है हमारे लायक. बोल दूंगा.”
“वादा?”
“वादा.”
“तो सुनो. एक कविता है.
- नन्ही लड़की
साहिल के इतने नज़दीक
रेत से अपने घर न बना
कोई सरकश मौज इधर आई तो
तेरे घर की बुनियादें तक बह जाएँगी
और फिर उन की याद में तू
सारी उम्र उदास रहेगी!”
“वाह. बहुत समझ में तो नहीं आया लेकिन सुंदर लिखा है तुमने.”
“मैंने नहीं, परवीन शाकिर ने लिखा है.”
“तुम्हारी दोस्त है?”
“हा हा हा, नहीं दोस्त तो नहीं लेकिन दोस्त जैसी ही समझो.”
“पहले तुम्हारा सुनाया सब समझ में आता था. अब तुम बहुत कठिन कठिन कवितायेँ पढने लगी हो, कुछ पल्ले नहीं पड़ता.”
“सब फिर से समझ में आने लगेगा, बस तुम उन लोगों का साथ छोड़ दो.”
“फिर शुरू हो गया तुम्हारा वही?”
“अरे यार, वही ज़रुरी है फ़िलहाल सबसे.”
“पकाओ मत प्लीज़. तुमसे मैं अपने दिल दिमाग की शांति के लिए मिलता हूँ, टेंशन बढ़ाने के लिए नहीं.”
“नक्षत्र, तुम उन लोगों की सोहबत में बदल रहे हो. कहाँ जा रहे हो, सुनो तो.”
“हट साली, हर समय एक ही बात.”
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आज मेरी स्वतंत्रता का दिन है. मुझे नहीं ज्ञात था मैं आगे के दो पैरों का उपयोग इस तरह भी कर सकती हूँ. मैं अगले दो पैरों से घर की दीवार को पकड़ कर ऊपर चढ़ गयी हूँ और पिछले दो पैरों को सिकोड़ने से मैं दीवार के ऊपर हूँ. अब मैं सीधा कूद कर गली में आ गयी हूँ. अब सीधा दौड़ते जाना है जब तक मेरे असली मालिक का घर न आ जाए.
अर्धरात्रि का समय होने से मार्ग पर यातायात अल्प है. मुझे अपने असली मालिक का घर याद है जिन्होंने बताया है कि मेरा साँस लेना इस पर्यावरण के लिए कितना आवश्यक है. मैं साँस लेते हुए ऑक्सीजन छोड़ती हूँ, ये कोई छोटी मोटी बात नहीं है. आज जब हर कोई कार्बन डाई ऑक्साईड छोड़ रहा है, वैसे में मैं कार्बन डाई ऑक्साईड सोख कर इस संसार को मनुष्यों के जीने योग्य बना रही हूँ, इस बात के लिए जितना सम्मान मुझे मिलना चाहिए वो सिर्फ मेरे असली मालिक दे सकते हैं. और तो और, मेरी त्वचा पर हाथ फेर कर असाध्य व्याधियों का उपचार हो सकता है, ये बात चिकित्सकों ने सबसे छिपा कर रखी थी क्योंकि इससे उनका व्यवसाय बंद हो सकता है. मेरे असली मालिक इन बातों को सामने लाकर संसार का उद्धार कर रहे हैं. पुत्रों की प्राप्ति के लिए मेरे गोबर से निकला गेहूँ पिसवाने की आजकल चक्कियों में लम्बी कतार लगी रहती है.
बस थोड़ी दूर और, मैं उनके मोहल्ले में आ चुकी हूँ. बीच में एक चौक पड़ता है जहाँ मेरे जैसी बहुत सारी गायें और बैल दिन भर बैठे पगुराते रहते हैं. उनका हालचाल लेती चलूंगी और उनके बारे में मालिक को बताउंगी कि उनका भी कुछ उद्धार हो सके. इतनी चमत्कारिक शक्तियों से लैस प्रजाति इस तरह सड़क पर अच्छी नहीं लगती.
सारी गायें मुझे देख कर खुश हो गयी हैं. उन्होंने रम्भाना शुरू कर दिया है. वो मेरा हालचाल पूछ रही हैं. कुछ उठ कर मेरी तरफ आने लगी हैं. कुछ बैल भी हैं जो मेरी तरफ आ रहे हैं. कदाचित वो जानना चाहते हैं कि हल चलाने के अलावा उनके जीवन का कोई अर्थ है या नहीं. मैं उनके बीच में हूँ, एक गाय ने मुझे अपनी सींग से मारा है, शायद वो अपनी बात मेरे माध्यम से जल्दी से जल्दी मेरे मालिक तक पहुँचाना चाहती है. सबने मुझे घेर लिया है. मैं अवश्य इनकी बात मालिक तक पहुँचा दूंगी.
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प्रयागराज, 11 सितम्बर, कार्यालय संवाददाता
प्रदेश में आवारा पशुओं की समस्या को लेकर राजनीती तो खूब होती रही है लेकिन सरकार अभी भी इस पर नियंत्रण नहीं कर पायी है. तमाम प्रयासों के बावजूद किसानों और आम जनता को इन पशुओं से निजात नहीं मिल सकी है. ऐसी ही एक दुर्घटना में हनुमानगंज थाना क्षेत्र के सुरभिपुरा इलाके में एक नवयुवक की कल रात मृत्यु हो गयी.
मृतक की पहचान नक्षत्र तिवारी के रूप में हुई है. बताया जा रहा है कि नक्षत्र तिवारी प्रदेश के गौ रक्षा मंच के प्रमुख अभ्युदय तिवारी के लिए काम करता था लेकिन श्री तिवारी ने उन्हें पहचानने से इंकार किया है. दुर्घटना उनके घर से दो सौ मीटर की दूरी पर हुई है, इसे लेकर उन्होंने कुछ कहने से मना कर दिया है. मृतक के माता पिता बात करने की स्थिति में नहीं थे इसलिए उनके बयान नहीं लिए जा सके.
सूबे के पशुधन मंत्री श्री धेनुभद्र शुक्ला ने माना कि उत्तर प्रदेश में चार लाख से ज्यादा आवारा पशु हैं जिन्हें गोशाला भेजना बाकी है लेकिन सरकार के कई बार निर्देश जारी करने के बावजूद जिम्मेदार प्राधिकरणों ने ठोस कदम नहीं उठाये हैं. इस सम्बन्ध में जब इस संवाददाता ने मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
‘पक्षधर’ से साभार
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विमल चन्द्र पाण्डेय
प्लाट नम्बर 129-130
मिसिरपुरा, लहरतारा
वाराणसी – 221002
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