
सत्यनारायण पटेल की कहानी ‘ब्रॉउन कुमार’ समकालीन भारतीय समाज, राजनीति और व्यवस्था के अंतर्विरोधों को तीखे व्यंग्य के माध्यम से उजागर करती है। ब्रॉउन कुमार उर्फ़ शिव कुमार एक ऐसा मामूली अपराधी है, जिसकी पहचान उसके वास्तविक नाम से नहीं, बल्कि उसकी आपराधिक छवि से निर्मित होती है; लेकिन कहानी आगे बढ़ते हुए उसके अपराधों के पीछे मौजूद सामाजिक विडंबनाओं, आर्थिक अभाव, बेरोज़गारी, पारिवारिक विघटन और टूटे हुए निजी स्वप्नों की ओर भी संकेत करती है। पिता द्वारा जुए में उसकी मेहनत की कमाई हार जाना और प्रेमिका का उसके सपनों के साथ चले जाना उसके भीतर के आक्रोश को समझने का एक संदर्भ प्रदान करते हैं, हालाँकि ये परिस्थितियाँ उसके हिंसक आचरण को उचित नहीं ठहरातीं।
कहानी का सबसे धारदार पक्ष यह है कि लेखक एक छोटे अपराधी की गिरफ्तारी के प्रसंग को सत्ता, धर्म और राष्ट्रवाद की समकालीन राजनीति से जोड़ देते हैं। ब्रॉउन कुमार का केसरिया दुपट्टे, तिलक, धार्मिक उद्घोष और प्रतीक-चिह्नों का अवसरवादी इस्तेमाल उस राजनीति का विद्रूप उद्घाटित करता है, जिसमें आस्था नैतिकता का प्रमाण न रहकर अपराध से बचने का कवच बन जाती है। इसके समानांतर पुलिस अधिकारी का कथन और आत्मवृत्तांत व्यवस्था की उस विडंबना को सामने लाता है, जहाँ अपराधी को पकड़ना कभी-कभी न्याय की सामान्य प्रक्रिया से अधिक जटिल राजनीतिक-सामाजिक कार्य बन जाता है। कहानी का अंत विशेष रूप से अर्थपूर्ण है: शर्ट पुलिस अधिकारी के हाथ में रह जाती है, लेकिन ब्रॉउन कुमार फिर गायब हो जाता है; तितलियों वाली शर्ट उसके व्यक्तित्व की चंचलता, उसकी पकड़ में न आने वाली प्रकृति और व्यवस्था की विफलता का एक प्रतीक बन जाती है।
ब्रॉउन कुमार
सत्यनारायण पटेल
वह सिर्फ़ नाम का ही ब्रॉउन कुमार था, बाक़ी यूँ देखने में किसी भी एंगल से ब्रॉउन नज़र नहीं आता था।
ब्रॉउन कुमार के शरीर की चमड़ी ब्रॉउन नहीं थी। उसके सिर या कहीं के भी बाल ब्रॉउन नहीं थे। उसके पीले दाँतों को भी ब्रॉउन नहीं कहा जा सकता था। उसकी स्याह पुतली वाली आँखें भी किसी ढक्कन कुमार को ही ब्रॉउन लग सकती थीं। पता नहीं कि वह कब, किसे, किस चौघड़िया में, ब्रॉउन नज़र आया था और उसका नाम ब्रॉउन कुमार रख दिया था।
ब्रॉउन कुमार पूरे मोहल्ले में, थाना के आपराधिक रिकॉर्ड में और जानें कहाँ-कहाँ ब्रॉउन कुमार नाम की छाप चस्पा कर चुका था। उसके माँ-बाप और पुलिस के अलावा कोई नहीं था, जो असल नाम शिव कुमार से जानता था।
ब्रॉउन कुमार की उम्र चौबीस साल थी और थाने में उसके ख़िलाफ़ छब्बीस अपराध पंजीबद्ध थे।
ब्रॉउन कुमार के विरुद्ध पंजीबद्ध अपराधों में ज़्यादातर अपराध जुआ खेलते पकड़ा जाना, सट्टा खाते पकड़ा जाना, चाकू-कट्टा लेकर घूमते पकड़ा जाना, लड़ाई-झगड़ा करना, अड़ीबाज़ी करना, डकैती की योजना बनाना, नक़बजनी आदि के अपराध पंजीबद्ध थे।
ब्रॉउन कुमार की कद-काठी बेहद अनाकर्षक थी। गिरफ़्तारी फार्म में उसकी ऊँचाई चार फुट तीन इंच लिखी जाती थी, उसका वज़न कभी तौला नहीं गया; अंदाज़न पैंतीस से चालीस किलो के बीच होगा। मैं उसे कहता कि जब कभी तेज़ आँधी-तूफ़ान आए, तब बिजली का खम्भा या किसी पेड़ का तना पकड़कर बैठ जाया कर, वरना कूड़े-करकट की तरह उड़ जाएगा। तेरा बाप थाने में गुमशुदगी लिखवाने आएगा।
-कूड़े-करकट की कौन मूर्ख गुमशुदगी लिखवाता है? वह हँसते हुए कहता।
ब्रॉउन कुमार के मोहल्ले वाले कहते कि ब्रॉउन कुमार दिखने में ज़रूर बारीक है, लेकिन हरामख़ोर का कलेजा शेर का है। अपनी पर उतर आए तो छप्पन इंची कलेजा भी चीर देता है।
ब्रॉउन कुमार अपनी लत का ग़ुलाम था। अगर उसे शराब, गांजा या पाउडर की तलब लगती, फिर उसे उसके सिवाय कुछ नहीं सूझता। किसी के घर के सामने रखी साइकिल, टिल्लू पंप, या इसी तरह का छोटा-मोटा सामान पलक झपकते गायब कर देता। यदि छोटा-मोटा सामान हाथ नहीं लगता, तो किसी को भी ब्लेड या चाकू अड़ाकर या चुभाकर घड़ी, पर्स और मोबाइल जैसी चीज़ छीनने में भी संकोच नहीं करता।
ब्रॉउन कुमार अपने मुहल्ले में वैसे ही कुख्यात था, जैसे कि देश में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे। ब्रॉउन कुमार की कुख्याति अपनी जगह थी।
मुझे एक मामले में ब्रॉउन कुमार की तलाश थी। मामला यूँ था कि एक रात अपने पड़ोसी दीपांशु कुमार से शराबखोरी के लिए रुपए माँगे थे।
दीपांशु कुमार ने कहा कि मेरे पास रुपए नहीं है। इस बात से ग़ुस्सा होकर ब्रॉउन कुमार ने पास ही पड़ी ईंट उठाई और दीपांशु कुमार पर टूट पड़ा था।
दीपांशु कुमार के पिता ने बीच-बचाव किया। लेकिन तब तक वह दीपांशु कुमार के सिर, हाथ, कोहनी और कमर पर ईंट के अनेक वार कर चुका था। दीपांशु कुमार ने थाने में आकर एफ़आईआर करवाई थी। जाँच मेरे पास थी और तभी से मुझे उसकी तलाश थी। मैं उसे पकड़ना चाहता था।
लेकिन ब्रॉउन कुमार को पकड़ना बलात्कारियों, हत्यारों की पैरोल पर बाहर रखने, जमानत का लाभ देने, फिर सज़ा माफ़ करने और उन्हें फूल-मालाएँ पहनाने, लड्डू खिलाने और उन्हें संस्कारी मनुष्य का प्रमाण पत्र देने जितना आसान भी नहीं था।
ब्रॉउन कुमार को पकड़ना कवियों, लेखकों, और पत्रकारों पर देशद्रोही होने का आरोप मढ़ना और उन्हें बरसों-बरस जेल में सड़ाने जितना भी आसान नहीं था।
ब्रॉउन कुमार को पकड़ना किसी गाय को पकड़ने जितना आसान भी नहीं था। मंदिर, मस्ज़िद में मांस फिंकवा कर समाज में तनाव पैदा करना या फ़साद कराने जितना भी आसान नहीं था। और न ही किसी मस्ज़िद, गिरजाघर, क़ब्रिस्तान या फिर किसी दूसरे के निजी निवास पर भगवा झंडा फहराने जितना आसान था।
लेकिन हाँ, इस तरह की राष्ट्र सेवा, भक्तों द्वारा ब्रॉउन कुमार को मेहनताने के रूप में अद्धी या बोतल देकर आसानी से करवाई जा सकती थी। हालाँकि वह राष्ट्रहित में इस तरह का काम करते हुए दो बार धरा जा चुका था। पंचायती लात-घूंसों व जूतों से स्वागत व सेवा करवाने के बावजूद उसका साहस कम नहीं हुआ था।
ब्रॉउन कुमार को पकड़ने का मतलब था कि हवा को पकड़ना। हवा को पकड़ने का मतलब था कि विकास की अवधारणा की चड्डी उतारना।
वह काम मुश्किल था, लेकिन इतना भी नहीं कि किया ही नहीं जा सकता था। मुझे और मेरे सहकर्मियों को अनुभव था कि मुश्किल से मुश्किल काम कैसे आसान बनाया जा सकता है।
लेकिन ब्रॉउन कुमार की ताक़त उसकी फुर्ती, चपलता, चालाकी और साहस ही नहीं थी, उसकी एक ताक़त यह भी थी। यदि वह कभी घर में घिर जाता, तो दरवाज़ा खोलने से पहले गले में केसरिया दुपट्टा डाल लेता । दाहिने हाथ में दस-बारह रंग-बिरंगे नाड़े बाँध लेता । भाल पर तिलक लगा लेता। कभी-कभी सिर पर काली या केसरिया टोपी भी पहन लेता।
देखने वालों को ऐसा लगता कि पुलिस उसे पूजा में से उठाकर ले जा रही है। पुलिस भक्त पर ज़ुल्म कर रही है।
हालाँकि उसकी इस ताक़त का हमारे पास यह तोड़ था कि ब्रॉउन कुमार जैसे ही हमारे हाथ लगता था, हम उसके गले से दुपट्टा निकाल लेते, हाथ से नाड़े उतरवा लेते। भाल से तिलक को पोंछ देते; पानी उपलब्ध रहता तो चेहरा धुलवा देते।
लेकिन ब्रॉउन कुमार भी कोई आसानी से हार मानने वाला नहीं था। वह हनुमान चालीसा का पाठ करने लगता। बीच-बीच में जय श्रीराम, जय श्रीराम का उद्घोष करता। यह ऐसा उद्घोष था, जिसके समक्ष लोकतंत्र के चारों खंभे असहाय हो जाते थे और किसी बुजुर्ग के दाँतों की तरह हिलने लगते थे। पुलिस के भी हाथ-पैर फूल जाते थे।
हालाँकि ब्रॉउन कुमार की इस हरकत को क्षेत्र के संघी, बजरँगी और तमाम भक्तों ने भाँप लिया था। समझ गए थे कि ज़रूरत पड़ने पर ब्रॉउन कुमार उनके प्रतीक-चिह्नों का कंडोम की तरह इस्तेमाल करता था और फिर उतार कर फेंक देता था। उन प्रतीक-चिह्नों के प्रति उसके दिल में सम्मान का भाव नहीं था।
फिर वह दो बार पंचायती लात-घूंसों से स्वागत व सेवा करवा चुका था और दोनों बार उसने राज़ को राज़ नहीं रखा था, जिससे भक्तों की पोल खुली थी और उनकी छवि ख़राब हुई थी। इसलिए भक्तों ने ब्रॉउन कुमार को तवज्जो देना बंद कर दिया था। उसे राष्ट्रहित के काम भी लगभग नहीं बताए जाते थे।
एक रात मेरी शबगश्त थी। मैंने करीब एक बजे अपने थाना क्षेत्र की दो बीट के चार गश्ती जवानों को चन्द्रगुप्त मौर्य चौराहा पर इकट्ठा किया। उन्हें क्षेत्र में सतर्कतापूर्वक ग़श्त करने व निगरानी बदमाशों को चेक करने की हिदायत दी। मैंने उन्हें समझाइश दी कि धार्मिक स्थलों का ध्यान रखना। देश के अलग-अलग हिस्सों में चुनाव हैं। किसी धार्मिक स्थल में कोई माँस या किसी तरह की गंदगी न फेंक सके। कहीं ऐसी हरकत हो जाए, तो तुरंत उसे हटाना और जगह को साफ़ करना है। अपने क्षेत्र में लगी एटीएम मशीनों पर नज़र रखना, भूखमरी और बेरोज़गारी के कारण लोग एटीएम मशीन उखाड़कर या गैस कटर से काटकर ले जा रहे हैं। ध्यान रहे कि अपने क्षेत्र में ऐसा नहीं हो। अंत में कहा कि पुनः इसी जगह पर ढाई बजे मिलना है। एक आरोपी के घर दबिश देना है।
जब हम ढाई बजे के करीब वापस मिले, मैंने जवानों को ब्रॉउन कुमार के बारे में बताया कि उसकी एक मामले में ज़रूरत है।
सभी जवान पहले तो हँसे कि जैसे मेरा दिमाग़ सरक गया है, जो मैं हवा को पकड़ने की बात कर रहा हूँ। लेकिन जानते वे भी थे कि मेरे सामने उसे पकड़ने के सिवाय कोई चारा भी नहीं था।
ऐसी बात नहीं थी कि उसे हमने कभी पकड़ा ही नहीं था। एक बार नक़बजनी के मामले में पकड़कर कोर्ट पेश किया था, तब वह आठ महीने जेल में रहा था। डकैती की योजना में छह महीने जेल की रोटी खानी पड़ी थी, तब जमानत हुई थी। चार-छह मर्तबा पुरानी 151, 107, 116(3) जा.फौ. कुछ-कुछ दिन जेल में रहा था। लेकिन अनेक मर्तबा जेल की हवा खाने के बावजूद उसका स्वभाव कुत्ते की पूँछ सा टेढ़ा का टेढ़ा ही रहा था।
उस रात हम जैसे उसके घर के नज़दीक पहुँचे, उसकी गली के कुत्तों ने हमारा ज़बरदस्त स्वागत किया। भौं-भौं…। जैसे कि हम पुलिस वाले नहीं, चोरी करने वाले हों। पूरी गली को सूचना दे दी। लेकिन गली नींद के नशे में धुत्त थी। कुत्तों की भौं-भौं… से कुछ और कुत्ते ही जागकर भौं..भौं करने लगे, बाकी गली का कोई शरीफ़ कुमार तो नहीं जागा था। नहीं…। माफ़ कीजिए। एक शख़्स जागा था और वह ब्रॉउन कुमार था। हम अपनी बाइकें टिकाते और उसके घर की तरफ़ बढ़ते उससे पहले, ब्रॉउन कुमार के घर का दरवाज़ा खुला, और हम सभी की आँखों के सामने वह नौ दो ग्यारह हो गया।
मैं इतना मोटा हूँ कि पचास मीटर भी नहीं भाग सकता। उसका पीछा क्या ख़ाक करता ! लेकिन हाँ, मेरी दबिश टीम दो-तीन जवान अच्छे-खासे फिट थे। उन्होंने साँवरिया नमकीन व मिठाई भण्डार तक उसका पीछा किया और ख़ाली हाथ लौट आए थे। उन्होंने अपना पसीना पोंछते हुए बताया था कि साँवरिया नमकीन व मिठाई भण्डार तक तो वह हमें दिखता रहा था। उसके बाद समझ नहीं आया कि वह किधर मुड़ गया। वह हवा में घुल गया कि उसे अँधेरा पी गया या ज़मीन निगल गई। पता नहीं कि कैसे और कहाँ गायब हो गया था।
यह बात सही थी कि मुझे उसे पकड़ना था, लेकिन गिरफ़्तार कर न्यायालय के समक्ष तुरंत पेश नहीं करना था। उसने जो जुर्म किया था, उसमें सात साल से कम की सज़ा थी और मुझे उसे धारा 35 (3) बी एन एस एस का नोटिस तामील करवाकर और न्यायालय द्वारा तलब करने पर हाज़िर होने की समझाइश देकर रुख़्सत ही करना था। और साफ़ कहूँ तो यह कि उसे पकड़ना भी नहीं था। बस, नोटिस की तामील के लिए बुलाना था। उसे सूचना भेजी भी थी। ख़ुद दो बार उसके पिता को भी कहा था। वह जिस पान की दुकान से सिगरेट, तंबाकू, गुटका लेता था, उस दुकान वाले के मार्फत ब्रॉउन कुमार को भी ख़बर भेजी थी। लेकिन वह आ नहीं रहा था और ख़बर भेज रहा था कि मैं दीपावली के बाद आऊँगा। मुझ पर केस का जल्दी निपटारा करने का दबाव था। यही वजह थी कि उसके और मेरे बीच पिछले करीब पन्द्रह-बीस दिन से चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा था।
फिर एक रात मुझे लगा कि चूहे-बिल्ली का खेल ख़त्म हुआ। किसी योजना के तहत नहीं, इत्तिफ़ाक़न हमारा आमना-सामना हो गया। मैं इलाका भ्रमण पर था। मेरा हमराह सिपाही था। मुझे पेशाब की तलब लगी तो मैंने हमराह सिपाही से कहकर मेन रोड के किनारे गाड़ी रुकवाई और गाड़ी से उतरकर सुलभ कॉम्प्लेक्स और वाइन शॉप के बीच वाली गली चला गया था। उस गली में अँधेरा था, लेकिन अँधेरा इतना सघन, गहरा नहीं था कि किसी को पहचाना नहीं जा सकता था। वहाँ कुछ दूरी पर स्ट्रीट लाइट थी, जिसकी रोशनी ने अँधेरे को बहुत हल्का कर दिया था। लेकिन हाँ, गली पर्याप्त संकरी थी और एक तरफ़ से बंद भी थी। सुलभ कॉम्प्लेक्स में ठीक से साफ़-सफ़ाई नहीं रहती थी, इसलिए मैं उस गली में गया था। मैं जैसे ही पैंट की ज़िप खोलने को हुआ कि मेरी नज़र ब्रॉउन कुमार पर पड़ी। उसका मुँह सुलभ कॉम्प्लेक्स की दीवार की तरफ़ था, वह आँखें मूँद कर मुँह से अद्धा लगाए गट-गट शराब गटक रहा था। मैं तलब भूल गया था। मेरी बाँछें खिल गई थीं। ब्रॉउन कुमार की शर्ट की कॉलर मेरे हाथ में थी। ब्रॉउन कुमार के चेहरे का रंग फ़ाख़्ता हो चुका था।
-क्यों ब्रॉउन… थाने क्यों नहीं आ रहा? मैंने उसे लगभग पुचकारते हुए पूछा।
ब्रॉउन कुमार अचानक मेरे पैरों की ओर झुकने लगा। मैंने उसे पैर छूने से रोक दिया। मुझे मन में खुटका था कि कहीं वह मेरे पैरों के बीच से ही न भाग जाए। मुझे किसी भी तरह उसे बहला-फुसलाकर सड़क किनारे खड़ी गाड़ी तक ले जाना था, क्योंकि गाड़ी में बैठाने के बाद, उसकी भागने की संभावना कम रह जानी थी।
-मैं तो ख़ुद ही आपके पास आने वाला था। मुझे भागना पसंद नहीं। लेकिन कुछ हिसाब-किताब था, सोचा कि निपटा लूँ, फिर चलूँ। उसने बहुत विनम्रता से कहा और आगे बोला, फिर जेब में पैसा भी नहीं था। सोचा कि कुछ पैसा होगा, तो आपकी भी सेवा कर दूँगा।
-ठीक है, कोई बात नहीं। तेरा काम भागना है और पुलिस का काम पकड़ना। मैंने उसे माफ़ कर देने वाले भाव से कहा था।
-आप मुझे फिर से जेल भेज दोगे। भेज दो। और कर भी क्या सकते हो ! मुझे काम तो नहीं दे सकते। मेरी शादी तो नहीं करवा सकते। मुझे न्याय भी नहीं दिला सकते। जब मैं किसी का काम करता हूँ और वह मेहनताना नहीं देता है। या आधा-अधूरा देता है। माँगने पर पुलिस से शिकायत करता है कि मैं नशे के लिए पैसे माँग रहा हूँ।
वह एक बार फिर पैर छूने की कोशिश करते हुए बड़बड़ाया, “मुझे मेरे हक़ का पैसा चाहिए, फिर मैं अपने पैसों का कुछ भी करूँ। खाना खाऊँ। नशा करूँ। कपड़े सिलवाऊँ। जो जी चाहे करूँ। लेकिन कोई मेरा हक़ मारे, मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। मेरा भेजा सटक जाता है। मैं जो कर सकता हूँ, कर देता हूँ। मेरा नाम ब्रॉउन कुमार है और मैं डरकर जीना पसंद नहीं करता हूँ।
ब्रॉउन कुमार दो-चार क़दम ख़ामोशी के साथ चला। वह कुछ भावुक हो गया था। आँखों में पानी भी रिस आया था। शायद कहीं स्मृति का काँटा चुभ गया था। फिर उसने अपनी आँखों से पानी पोंछते हुए पूछा, “आपको याद है, मुझे पिछली बार क्यों पकड़ा था ?
मुझे एकदम से कुछ याद नहीं आया था, इसलिए प्रतिप्रश्न किया- क्यों पकड़ा था, तू ही बता दे।
-मैंने अपने बाप को चाकू मारा था। बाप ने एफ़आईआर करवाई थी। ब्रॉउन कुमार ने कहा और आगे बोला, बाप को कोई चाकू मारता है ! लेकिन मैंने मारा था।
-क्यों मारा था तूने ? मैंने पूछा था। वह मेरी तरफ़ देखते हुए बोला, मुझे पकड़ना और जेल भेजना याद रहता है। मेरी बातें याद नहीं रहती हैं आपको?
-मैंने मकान पुताई कर बीस हज़ार रुपए जोड़े थे। मुझे शादी करनी थी। एक लड़की भी तैयार थी। मैंने कुछ छोटी-मोटी चोरी कर उसको जेवर भी बनवा दिए थे। प्लान था कि भागकर दूसरे शहर जाएँगे। आर्य समाज मंदिर में शादी करेंगे। और उसी शहर में ज़िन्दगी की नई शुरुआत करेंगे। लेकिन स्साला मेरा बाप…। मेरी मेहनत की कमाई । मेरा सपना । जुए में हार गया। ब्रॉउन कुमार ने कहने के बाद दो-तीन लंबी साँसें ली थी। कुछ देर ख़ामोशी से ख़ुद को भीतर ही भीतर सम्भालता रहा था।
-आपको यह तो याद ही होगा! वह दशहरा की रात थी और आपने चौरसिया धर्मशाला के पीछे किसी गोदाम में चल रहा जुआ पकड़ा था। उन जुआरियों में एक मेरा बाप भी था। वहाँ जुए में मिले रुपये आपने ज़ब्त कर लिये थे। फिर मैं जिस लड़की से शादी करना चाहता था, वह एक ड्राइवर के साथ भाग गई। साथ में जेवर भी ले गई। मेरा भेजा सटका, और मैंने बाप के कूल्हे में चाकू घोंप दिया। बाद में पछतावा हुआ कि पेट में क्यों नहीं घोंपा ! ब्रॉउन कुमार ने कहा और कुछ देर चुप हो गया था।
-अच्छा, मुझे यह नहीं मालूम था। मैंने कहा, हम मेन रोड पर खड़ी गाड़ी से कुछ क़दम की दूरी पर थे। मेरा हमराह सिपाही गाड़ी में बैठा उँघ रहा था।
-आपको तो मुझे जेल भेजना ही याद रहता है। भेजो। वहाँ कम से कम दो टेम रोटी तो मिलेंगी! ब्रॉउन कुमार ने हताश-निराश स्वर में कहा और आगे मुस्कराते हुए बोला- या ऐसा करो कि गोली ही मार दो। मुक्ति मिल जाएगी।
-गोली क्यों मारूँगा पगले, तू मेरा दुश्मन थोड़ी है? मैंने समझाने वाले लहज़े में कहा और तभी ब्रॉउन कुमार ने अपनी कलाबाज़ी दिखाई।
वह बातचीत के दौरान अपनी शर्ट के बटन खोल चुका था और मुझे जरा भी भनक नहीं लगी थी। मैंने अभी भी कस कर उसकी शर्ट की कॉलर पकड़ी हुई थी। मुझे ध्यान है कि ऊपर से शर्ट का दूसरे नंबर वाला बटन लगा हुआ था, और उसके नीचे के बटनों पर मैंने ध्यान नहीं दिया था। लेकिन चलते-चलते और बतियाते-बतियाते अचानक से वह नीचे झुका, शर्ट का दूसरे नंबर वाला बटन टूटकर अलग जा गिरा था। उसकी शर्ट मेरे हाथ में थी। शर्ट पर छपी तितलियाँ, शर्ट से अलग होकर मेरे इर्द-गिर्द घूम रही थीं। उसकी शर्ट अभी भी मेरे पास है और मैं उससे अपनी बाइक साफ़ करता हूँ। कुछ बरस बाद भी ब्रॉउन कुमार की तलाश जारी है। मैंने उड़ती-उड़ती सुनी है कि वह वाया ग्वालियर दिल्ली की तरफ़ गया है और आख़िरी बार उसे फूल छाप शर्ट पहने देखा गया है। यदि किसी को कहीं दिखाई दे, तो मुझे ज़रूर सूचना दें, प्लीज़।
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सत्यनारायण पटेल
जन्म 6 फ़रवरी 1972
प्रकाशित कृतियॉं
उपन्यास -गॉंव भीतर गॉंव (2015)
कहानी संग्रह –
1- भेम का भेरू मॉंगता कुल्हाड़ी ईमान (2008)
2- लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना (2011)
3- काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस (2014)
4-तीतर फॉंद (2018)
संपादन-त्रेमासिक पत्रिका ‘बया’ के कुछ अंकों का संपादन
पुस्तिका -लाल सलाम एक और दो का संपादन
ब्लॉग संपादन -बिजूका ब्लॉग
पुरस्कार -वागीश्वरी सम्मान 2008 भोपाल (म प्र ), प्रेमचन्द स्मृति कथा सम्मान 2011 (उ प्र )
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