लोचन कोना – 6 – प्रफुल्ल कोलख्यान
कविता सभ्यता की निर्दलीय उम्मीदवार है और सच!
शुरू के पहले एक अस्वीकरण :
मैंने आलोचना का कारोबार समेट लिया है और जो पसार रहा वह पाठानुप्रवेश है — सीधे-सरल शब्दों में कहें तो पाठ में घुसपैठ! आलोचक यानी रचना का घुसपैठिया — रचनाकार जब चाहे कान पकड़कर, जब चाहे जुबान पकड़कर रचना के पाठ से बाहर कर दे!
कविता उक्ति नहीं अभिव्यक्ति है। अभिव्यक्ति! कविता अभिव्यक्ति ही नहीं अभिव्यक्ति के खतरे को उठाने का आग्रह है। तो फिर! कविता आग्रह है — सभ्यता विकास में अभिव्यक्ति को सामने लाने का खतरा उठाने का आग्रह! हर खबर कविता नहीं होती, लेकिन हर कविता अपने आप में खबर होती है — हम को हम से हमारी खबर! सांस्कृतिक दुस्साहसी राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल करते हुए सभ्यता को दबोच लेते हैं। दबोची हुई सभ्यता में हम कहां पहुंच जाते हैं! गालिबन वहां पहुंच जाते हैं, जहां से हम को हमारी खबर नहीं आती। जब हम को हमारी खबर नहीं आती तब कविता खबर बन जाती है। जहां खबर अपर्याप्त हो जाती है, कविता वहां पर्याप्त होती है।
बिहार नालंदा से निकलकर मुंबई पहुंचे धनंजय कुमार का पहला काव्य संग्रह — ‘सच को पढ़ना सीखें’ मेरे सामने है। मैं इसे पढ़ना सीख रहा हूं — इसे पढ़ते हुए सच को पढ़ना सीख रहा हूं। हम भारत के अधिकतर लोग आज की तारीख में अपने दोनों हाथ गंवा चुके हैं। संभाल कर रखे हुए – कटे हुए हाथ को देखता हूं और दोनों भुजा उठाकर कहता हूं — हमारे समय में सच अपठ्य हो गया।
नर आए, हरि आए और आए नरहरि, सभ्यता फिर भी रही बिगड़ी! दरकारी और दरकिनारी लोगों के बीच सच अपठ्य होता चला गया। पाठ्य-पुस्तकों में सच का समावेश मुश्किल होता चला गया। हजारों साल के पहले की लिपि को पढ़ना भी उतना मुश्किल नहीं रहा, जितना मुश्किल दर्द की समकालीन लिपि को पढ़ना होता चला गया। सच अपठ्य होता चला गया तो कविता ने सच को पढ़ने की गुहार लगाई! गरज यह कि ‘सच को पढ़ना सीखें’! सच सभ्यता का निर्दलीय उम्मीदवार है।
यकीनन मनुष्य को असली आजादी उस दिन से मिलनी शुरू हो गई थी, जिस दिन पैर ने हाथ को आजाद कर दिया था। यह भी यकीन के साथ कहा जा सकता है कि मनुष्य की गुलामी की पटकथा उस दिन से तैयार होने लगी जिस दिन से दिमाग ने दिल को गुलाम बना लिया। क्योंकि दिमाग तो खुद ही गुलाम होता है — ज्ञान का गुलाम, स्वार्थ का गुलाम, सुख और वासनाओं का गुलाम। और न-जाने किस-किस जाने-अनजाने का गुलाम!
भारत की बहुतलीय वर्णव्यवस्था में बहुपरतीय सामाजिक गुलाम सभ्यता का एक अनाथ सच है — अनाथ इसलिए कि कोई व्यक्ति, व्यवस्था, धर्म, ग्रंथ, पंथ इस बहुपरतीय सामाजिक गुलामी के होने और बने रहने में अपने योगदान को स्वीकार नहीं करता! बहुपरतीय सामाजिक गुलामी को जन्म-जन्मांतर का कर्म-फल बताकर प्राकृतिक बताया जाता है जब कि प्रकृति के अनुसार प्रकृति अपने आप में हर प्रकार की सामाजिक गुलामी का सिद्ध-निषेध है। वाद, विवाद, संवाद, संविधान, प्रावधान, चर्चा-चतुराई, जीत-हार, होली-दीवाली सब अपनी जगह लेकिन हां, आज के समय में भी जारी भेदभाव के व्यवहार और भाई-भतीजावाद के पसार का परपितामह वर्णवाद सामाजिक गुलामी का अनाथ सच है।
सच को पढ़ना सीखें तो देर-सबेर ज्ञान की गुलामी के रहस्य के खुलते देर नहीं लगती है; कहना न होगा कि खुला हुआ रहस्य सिर्फ हास्य और अधिकतर हास्यास्पद बनकर रह जाता है।
लेकिन यहां थोड़ा-सा रुकना होगा! ज्ञान की गुलामी की बात ऐसी नहीं जिसे, खा लिया खिचड़ी, उलटा दिया चूल्हा की शैली में उछालकर कोई पतली गली पकड़ निकल चले! ज्ञान को शक्ति का स्रोत किस ने कहा, किस-किस ने कहा — फिरदौसी ने, बाइबिल ने, बेकन ने कहा? कहा चाहे जिस ने भी, दुहराया बहुत सारे लोगों ने।
फिरदौसी ने भी कहा था कि ज्ञान ही वास्तविक शक्ति है! शक्ति तो लोगों को गुलाम बनाने के काम आती है। दूसरों को गुलाम बनाने की मंशा रखनेवालों के लिए शक्ति बहुत काम की होती है। शक्ति न सहमति की परवाह करती है न सच की! सभ्यता के विपुल प्रवाह में कई पुष्ट धाराएं निकलती हैं — शक्ति की और सत्य की। शक्ति को राजनीति अपनी पकड़ में लेती है और सत्य को संस्कृति अपना लेती है।
जीवन के जानकार बताते हैं जनजीवन के लिए शक्ति भी जरूरी है और सत्य भी जरूरी है। शक्ति के बिना जीवन चल ही नहीं पाता है और सत्य के बिना उसे यही पता नहीं होता कि जाना किधर है। शक्ति के बिना सत्य अपंग बनकर रह जाता है। सत्य के बिना शक्ति नीति विहीन होता है। महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन की राजनीति में सत्य का निवेश करते हुए सभ्यता के इस दोफांक को पहचाना! न सिर्फ पहचाना बल्कि उन्होंने सत्य को शक्ति से जोड़ने की जरूरत को दिल से महसूस किया। महसूस किया और दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से निपटने के लिए सबसे शक्तिशाली औजार का आविष्कार किया — सत्याग्रह!
शक्ति को सत्य से संयुक्त करने के अहिंसक साहस की प्रक्रिया का नाम है सत्याग्रह। सत्याग्रह के आविष्कार ने राजनीति में बहिष्कार की ताकत का एहसास दुनिया के सब से शक्तिशाली साम्राज्य को करवा दिया। पूरी दुनिया में लोकतंत्र और हक की मांग मनवाने के लिए सत्याग्रह औजार और हथियार दोनों बन गया — खास बात यह कि सत्याग्रह के पीछे कविता और साहित्य की समझ थी — सत्य हरिश्चंद्र नाटक और लियो टॉल्स्टॉय के प्रसंग अपनी जगह। समझ के साथ-साथ साहचर्य था उन प्रार्थनाओं का जो भक्ति आंदोलन के बेहतरीन गीत थे! प्रार्थना और पीटिशन की राजनीति करनेवाली कांग्रेस की प्रार्थनाओं और पीटिशनों का अर्थ महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का अचूक इस्तेमाल कर पूरी तरह से बदल दिया था।
धनंजय कुमार पत्रकार हैं। धनंजय कुमार साहित्यकार हैं। सिने जगत के पदातिक हैं। कवि हैं। इंसान बने रहने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे, बेहतर इंसान हैं। खबर में कविता और कविता में खबर और दोनों में सिनेजगत! यहां से वहां, न जाने कहां-कहां हुआ भाव-परागण!
धनंजय कुमार की कविता के मन में प्रश्नों की आकुलता जितनी है, उत्तर की आतुरता नहीं है। जाहिर है कि धनंजय कुमार की कविताओं में व्याकुल व्याकुलता नहीं है उतनी। जी चीखती है मां — मातृ-वंदना के नाम पर जब चीखती है राजनीति तो असल में चीखती है मां। जब चाहे पढ़ सकता है कोई भी व्यक्ति सारी कविताएं काव्य संग्रह हासिल कर लेकिन मेरे चारों तरफ सुनाई दे रही है — मां की चीख:
मां की चीखें हमेशा कलेजे को चीर देती हैं
बच्चा चाहे सरहद पर मारा जाए
या अस्पताल में बिना इलाज दम तोड़ दे
भूख से तड़प तड़प कर मौत की आगोश में सो जाए
या किसी अमीर की गाड़ी के नीचे कुचल जाए
मां की चीखें हमेशा कलेजे को चीर देती हैं
भारत बहुभाषी देश है — महानगर बहुभाषिकता के मस्तूल हैं। 24-25 अक्तूबर 2026 को मुंबई महानगर में बहुभाषी कवि सम्मेलन हुआ। बताया गया है कि विभिन्न भाषाओं के लगभग 80 कवि शामिल हुए। निश्चित रूप से कवि और कविता का यह माहौल काफी उत्साहवर्धक लगता है! श्रोता! श्रोता न पूछो कवि की!
कविता सभ्यता की निर्दलीय उम्मीदवार है और सच! सच का पता नहीं, पता नहीं कि सच किस का उम्मीदवार है? कभी मैं भी कविता का उम्मीदवार था, उस दौर की एक कविता —
चलती गाड़ी की ओर पत्थर उछाल देता है बच्चा!
बच्चा! क्या सोचता है बच्चा?
चलती गाड़ी की खिड़कियां बंद कर लेता है मुसाफिर!
मुसाफिर! मुसाफिर क्या सोचता है?
अखबार को एक झटके से किनारे कर देता है बुजुर्ग!
बुजुर्ग! बुजुर्ग क्या सोचता है?
अधूरी पढ़कर कविता को पलट देते हैं आप!
आप! आप क्या सोचते हैं।
सोचिए! सोचिए कि सोचना जरूरी है! जरूरी है सोचना! लेकिन पर्याप्त नहीं है सोचना! और कविता! कविता अंततोगत्वा एक आग्रह है — कभी-कभी सत्याग्रह भी! कविता प्रेम का ढाई आखर है! कविता कुरूप के स्वरूप का सौंदर्य है! कविता एक तसल्ली है! कविता प्रेम की तल्ली का ब्रह्म निवास है! कविता है तो धरती मां है और चांद मामा है। हां, तो कविता है — जो है वह भी, जो नहीं है वह भी!
प्रफुल्ल कोलख्यान वरिष्ठ चिंतक-आलोचक-कवि एवं स्तंभकार हैं।





