• मुखपृष्ठ
  • अनहद के बारे में
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक नियम
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
अनहद
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
No Result
View All Result
अनहद
No Result
View All Result
Home संस्मरण

बचपन के उजले – काले पख – 1

प्रज्ञा गुप्ता का स्थायी स्तंभ

by Anhadkolkata
October 23, 2026
in संस्मरण, साहित्य
A A
0
Share on FacebookShare on TwitterShare on Telegram

बचपन के उजले – काले पख – 1



आश्विन मास

आश्विन मास के आते ही धूप खिल उठती थी, हमारे स्कूल जाने के रास्ते के दोनों किनारे धान के खेत थे। धान की  बालियों पर सूरज की किरणें पड़ती, हवा में झूमतीं धान की बालियाँ हमारे मन के उत्साह को दोगुना करतीं। हम अपनी ताकत से थोड़ा ज्यादा ही जोर देकर साइकिल के पैडल मारते; कभी-कभी अति उत्साह में हमारा संतुलन बिगड़ता और हम यह जा… वहाँ जा धान के खेत में साइकिल सहित! ऐसा होता ही था कि एक के गिरने पर एक-दो सहेलियाँ और गिरतीं क्योंकि हम पथरीली सड़क से थोड़ा नीचे पाँव-पाँव चलने वाली जगह पर साइकिल चलातीं। आगे पीछे कम से कम दो-तीन सहेलियाँ साथ होती  और यह साइकिल हम कैंची चलाते थे यानी सीट पर बैठकर हमारे पाँव पैडल तक नहीं पहुँचते तो हमारा एक पैर साइकिल की डंडी के नीचे से दूसरी तरफ के पैडल पर होता। उस समय लगभग हर परिवार में 24 इंच या 22 इंच वाली (हीरो-जेट) साइकिल होती थी।

Related articles

एक कविता हमेशा दर्ज करेगी तुम्हारा होना – प्रज्ञा गुप्ता

लोचन कोना -5

इन दिनों स्कूल की दोपहरी का लंच ब्रेक हमारे लिए बड़ा समृद्ध होता था।स्कूल के आसपास दो-तीन खोमचे वाले थे जो कि चाट और फुचका बेचते थे लेकिन हमारा ताल्लुक उनसे कम ही था। स्कूल के पीछे सीरघाघ टोली और रिमझिम टोली की ओर हम रुख करते और सावन-भादो के बाद किसी-किसी की बारी के पेड़ पर बचे हुए अमरुद हमारी  झोली में होते। बारी के मालिक की आवाज हमारे कानों में पड़ती और हम धड़पड़ाकर पेड़ से गिलहरी की तरह उतरते, भागते।

उसी रास्ते में मूंगफली की खेती लगी होती। हाविल उरांव के  टाँड से चार-पाँच बुदा मूंगफली का पौधा हम उखाड़ते और दौड़ते-दौड़ते ही पहुंचते नदी किनारे। आसिन की भरी- पूरी नदी हमें थोड़ा डराती भी थी; लेकिन अपना इलाका था तो हमें पता था कि नदी कहाँ गहरी है कहाँ छिछली  है। जहाँ नदी थोड़ी छिछली थी, वहाँ बहुत सारे गुल्लू पत्थर बिछे होते, पानी स्वच्छ दिखता, उसमें हम मूंगफली धोते; वहीं किसी चट्टान पर बैठ मूंगफली खाते। हमारे पाँव पानी में डूबे होते, छोटी-छोटी मछलियाँ हमारे पाँव को छूती निकल जातीं, मानो हमसे मूँगफली माँग रही होतीं। हमारी एक साथिन थी सुलेखा। वह बार्ली की डिबिया में काला नमक और लाल मिर्च वाला नमक लाती थी। (बार्ली की डिबिया इसलिए होती कि पूरे सावन-भादो हर घर के एक-दो लोग मलेरिया के ज्वर से पीड़ित होते और मलेरिया के साथ-साथ टाइफाइड भी हो ही जाता। फिर ताकत के लिए हमें बार्ली पिलाई जाती ) नदी किनारे हम भरपेट अमरूद खाते और तब तक स्कूल की घंटी हमें सुनाई पड़ती और हम दौड़ते-दौड़ते स्कूल।

दोपहर के बाद हमें मेहर मास्टर संस्कृत पढ़ाने आते उन्हें कक्षा में पढ़ाकर, कक्षा कार्य देकर सोने की आदत थी। वह हमें शब्द-रूप, धातु-रूप डंडे मार-मार कर रटाते फिर ब्लैक बोर्ड पर किसी शब्द विशेष का धातु रूप लिखकर कॉपी में उतारने के लिए कहते और कुर्सी पर बैठ मैना की तरह झुपते रहते। उनकी आंखें आधी खुली, आधी बंद होतीं; हम चार-पाँच सहेलियां कक्षा कार्य उतार कर, चुपचाप से एक-एक कर कक्षा से बाहर निकल  भागतीं। नदी के किनारे के खेत -टाँड हाविल उराँव के थे जिनमें उन दिनों खीरा, बोदी, सतपुतिया, झींगी खूब फले होते।चूँकि जितिया का पर्व भी आसीन में होता, जिसमें नहाय-खाय के दिन सतपुतिया झिंगी की सब्जी बनना अनिवार्य होता तो आसपास के छोटे-छोटे किसान अपने-अपने टाँड़ में सतपुतिया झिंगी जरूर लगाते और यह उनकी आमदनी का एक मनलग्गू  जरिया भी था। हमारे गाँव में सब्जी की खेती बारिश पर ही टिकी थी। पर हमें सतपुतिया झींगी में कोई दिलचस्पी नहीं थी, न उसके प्रति कोई आकर्षण था। हमारा सारा ध्यान खीरे की उन छोटी-छोटी बातियों में रहता जिन्हें तोड़ने हम  मेहर मास्टर की कक्षा से बाहर भाग आतीं। सुलेखा के लाए हुए नमक के साथ खीरे का जो स्वाद आता था वह आज भी याद है। यह अलग बात है कि जिन हाथों से हम खीरा तोड़ते  उन्हीं पर मेहर मास्टर की छड़ी पड़ती  सटाक्-सटाक्। पर खीरे के स्वाद के आगे यह सटाक्- सटाक् हमें कतई भी याद नहीं रहता, और सप्ताह में तीन दिन तो हम खीरा खाने भागते ही थे।

हमारे स्कूल के दिन बड़े खूबसूरत थे। लकड़ा मास्टर हमें भूगोल पढ़ाते। मंगल और गुरु की पाँचवीं कक्षा भूगोल की होती और हमें सर क्या पढ़ाते थे यह वही जानते थे। क्योंकि जब वे पिछली बेंच पर बैठे छात्रों से जवाब-तलब करते, हम चुपचाप दरवाजे से बाहर खिसक जातीं और नदी के किनारे का भूगोल नापतीं। नदी के किनारे के काँस के सुंदर सफेद फूल हमें ऐसे मोहते कि हम यह भूल जातीं कि लकड़ा मास्टर हमें गुरगुट की ढेरी पर खुले पाँव घुटने पर बैठा कर दंडित करेंगे। काँस के फूलों के बीच हम छुआछुई खेलते।हमारे छुआछूई का खेल शुरू होता  ऐसे कि हम सभी एक दूसरे का हाथ पकड़ गोल घेरा बनातीं। एक कोई बीच में होती  और हम सब उसके चारों ओर घूमते जातीं और गातीं-

 “एक सहेली बाग में रो रही थी
उसका साथी कोई नहीं
उठो सहेली उठो
अपने आँसू पोंछ लो
चारों तरफ देख लो
आसमान से पूछ लो
धरती माँ को छू लो
अपना साथी चुन लो”

वह साथी बीच गोल में खड़ी होती और  जैसे ही धरती छूने के लिए नीचे झुकतीं, हम सभी सहेलियाँ इधर-उधर दौड़ पड़ती और वह किसी एक को छूने दौड़ती।  इस तरह हम छुआछुई  का खेल खेलते रहते।  लौटते वक्त बहुत सारे काँस के फूल तोड़ कर लाते जिसे घर के आँगन में रखते।काँस के फूलों से बरसाती मक्खियाँ दूर भाग जाती थीं।

स्कूल से लौटने के बाद हम भरपेट भात खाते; दाल-भात बोदी या नेनुआ  की सब्जी, साथ में नेनुआ के फूलों का बचका। आसीन का मौसम ऐसा था कि हर किसी की बारी में या तो नेनुआ के फूल होते या कोहड़ा के फूल। कोहड़ा के फूल के भी बचके बहुत स्वादिष्ट लगते।  हमें कभी अलग से विटामिन की गोली निगलने की जरूरत नहीं पड़ी; बावजूद इसके कि हम लगभग हर साल मलेरिया से पीड़ित होते। भरपेट खाने के बाद हम गुल्ली-डंडा खेलने भाग जाते। माँ रुकने के लिए आवाज देतीं, पर हम कुछ ना सुनते, ना समझते।

सचमुच उन दिनों हमारा मन रूई के फाहे-सा हल्का था। काँस के फूलों सा मन झूमता रहता। पुटूस के फूलों सा खिला-खिला जीवन था। ज्यों सबके घर के ऊपर छप्पर पर नेनुआ के फूल खिले होते उसी तरह खुशी हमारे चेहरे पर दमकती। हम हर मौसम के मुरीद थे लेकिन आसीन  हमारे लिए थोड़ा ज्यादा ही विशेष था।एक तो  जितिया व्रत के कारण इस मौसम में माँ हमें कम डाँटती, नहीं तो गाँव घर परिवार की  आजी-दादी, काकी उन्हें उलाहना देती कि बस जिउतिया व्रत से कुछ हो नहीं होता है बच्चों पर ध्यान देना होता है; तो फिर ये पितृपक्ष के दिन ऐसे दिन थे जब  हमारे पितर हमें कुटाई-धुनाई से बचाते थे।जिसके यहाँ जिस दिन श्राद्ध होता, उस दिन तक उनके घर में बड़ा नियम-धर्म मनता।घर के लोग अपने-अपने व्यवहार में बड़ा संतुलन साध कर रहते थे; यह सब कुछ हम बच्चों के पक्ष में जाता था। हमारे दादाजी का देहावसान षष्ठी तिथि को हुआ था। पारिवारिक परंपरा के अनुसार हमारे यहाँ उनका श्राद्ध षष्ठी तिथि को संपन्न होता।  हम बच्चों को इन उपक्रमों से थोड़ा दूर ही रखा जाता लेकिन हाँ जब पंडित जी को नाश्ता कराना होता था तो माँ उन्हें खिलातीं। दीदी पूरियाँ तलती, आटे की लोई बनाने और बेलने का काम मेरा होता; तो श्राद्ध वाले पंडित जी कम से कम 32 पुरियाँ खाते,  हम बहनेंं जान-बूझ कर छोटी-छोटी पूरियाँ तलतीं और संकोच वश वे हमारे यहाँ कम ही खाते। ऐसे वे पिताजी के शिष्य थे भले ही हम उन्हें पंडित चाचा जी कहते।

सर्वपितृ अमावस्या (महालया) के दिन हम सभी अपने-अपने घर के मुख्य दरवाजे पर सीज का कांटा टांगते। सीज (सेहुंड) की डाली टांगने के पीछे की मान्यता थी कि आसिन मास की अमावस्या की रात को नकारात्मक शक्तियाँ बहुत सक्रिय होती हैं घर के दरवाजे पर सीज की कांटेदार डाली को काले धागे में बांधकर उल्टा लटकाने से बुरी नजर  अलाय-बलाय घर में प्रवेश नहीं करतीं अतः मुख्य दरवाजा तो क्या, हमारी माँ घर के चारों कोनों में, पीछे के दरवाजे में गोहार घर के दरवाजे में, हर जगह यह डाली टंगवाती। उस दिन हम बच्चे बड़े व्यस्त रहते, सुबह से ही दिमाग लगाया जाता कि सीज के पेड़ से डालियाँ लानी है। टाँगते वक्त काला धागा कम पड़ जाता, ऐसे में मुझे लेंदरा सीने वाला काला धागा लाने के लिए दुकान दौड़ाया जाता। शाम में एक और रस्म हम सब निभाते, नकारात्मक शक्तियों से घर को बचाने के लिए घर के दरवाजे पर शरीफा के पत्ते, सेमल के पत्ते, सिंदूर से टीका बनाते।दरवाजे के दोनों तरफ भीत पर 8-8 गोल बिंदी पत्तों के रस एवं सिंदूर से बनाने की कला में हम बहनें पारंगत थीं। ज्यादा ढकेला-ढकेली करने पर माँ हमें हमारी चोटी पकड़कर किनारे कर देतीं, और दरवाजे पर यह टीका खुद लगातीं।

महालया के बाद कलश स्थापना के दिन हमें नदी जाने की जल्दी रहती। झाड़ू-बुहारू, घर-आँगन की सफाई, गोहाल घर की सफाई के बाद हम बहनेंं नदी के डहर पर दौड़तीं। नदी पहुंचने का एक शॉर्टकट रास्ता था जिसे हम फुसकी रास्ता कहतीं  जो खेत की आरी-आरी एवं टाँड की पगडंडियों से होकर गुजरती। रास्ते में एक छोटी पहाड़ी मिलती, नदी जाते वक्त हमें उस पहाड़ी में रहने वाली भूतनी से डर नहीं लगता। लेकिन जब हम नहा कर लौटतीं तो उस पहाड़ी के बगल की पगडंडी को दौड़कर पार करतीं।  सबकी जुबां पर बजरंगबली का नाम होता -जय जय जय बजरंगबली बुदबुदाते दौड़कर हम पहाड़ी के पास से गुजरती। पहाड़ी के ऊपर एक कुसुम, एक महुआ का पेड़ था जो इस मौसम में भरपूर हरा-भरा होता।पुटूस की घनी  झाड़ी थी, वहाँ  कई पक्षियों का बसेरा था। हम सभी पक्षियों से वाकिफ़ नहीं थे तो कोई ना कोई पक्षी अपने सुर में बोल ही देता और हम उसे पहाड़ी की भूतनी की आवाज समझ लेते। भूतनी को धत्ता बताकर हम पूरी गति से दौड़ते घर के आँगन में पहुंचकर तुलसी चौरा के पास बालू की टोकरी रखते।बाद में माँ उस बालू की राशि में जावा उठातीं और कलश स्थापित करतीं। हमारे नदी से लौटने से पहले ही पूजा वाली कोठरी गोबर से लीपकर,  नहा कर माँ तैयार रहतीं।

दुर्गा पूजा का पूरा समय ऐसा था कि गृहस्थ बड़े व्यस्त रहते। प्रथमा से विजयादशमी के बीच में ही जिनकी बारी में आलू की खेती के लिए क्यारियाँ बन जाती वह अपने को बड़भागी बूझते। बुझे भी क्यों नहीं? इस वक्त आलू रोपने पर माघ तक उनकी फसल तैयार हो जाती और अच्छे दाम निकल आते। घर की साफ- सफाई, रंग-रोगन का काम भी इसी बीच शुरू कर दिया जाता ताकि दिवाली तक सारे काम पूरे हो जायें। हम बहनों की भी बड़ी जिम्मेवारी थी  घर के सामने के टाँड में चाकोड के पौधे भरे पड़े थे, जिसकी पत्तियां हम सुरक-सुरक कर तोड़तीं। इन पत्तियों को सुखाकर, कूटकर, छानकर बारीक बनाकर रख लिया जाता जिसे बाद के दिनों में माँड में डबका कर खाने के उपयोग में लाया जाता। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह चाकोड गुड़ा बहुत फायदेमंद था। जिस दिन घर में दाल नहीं बनती यह गुड़ा टमाटर और माँड के साथ डबकाया जाता, उस पर लहसुन और मिर्च की छौंक पड़ती। आज  यह  चाकोड गुड़ा (चाकोड सूप)फाइव-स्टार होटलों की रेसिपी बन चुका है।

हमारे गाँव के बाजार टाँड में एक सामूहिक दुर्गा मंडप था जहाँ माँ दुर्गा की पूजा होती। हालाँकि षष्ठी के दिन बेलवरण के बाद ही हम बच्चों की आकांक्षाएं साकार होती, हमारे सपने खिलखिलाते। लेकिन प्रथमा से ही हम सहेलियाँ मंडप का चक्कर काट आतीं  मूर्ति का चेहरा ढँका होता, हम सहेलियां माँ की मूर्ति को देखने पहुँचती। बाल मन में हजार सवाल थे, मूर्ति बनाने वाले बाबा कुछ ना कुछ रंग-रोगन का काम करते मिलते।हमारे प्रश्नों की बौछार उन्हीं पर पड़ती – ऐ मूर्तिकार बाबा तुम्हें माँ की सवारी से डर नहीं लगता? मूर्तिकार बाबा हमारी बात पर हो-हो कर हंसते।कहते “ज्यादा प्रोश्नो मत पूछो, नहीं तो शेर को तोमार पाछे लोगा दूंगा।हम कहती ‘माँ दुर्गा तुम्हेंं दंड देगी’।वह मूर्तिकार बाबा पुरुलिया से आते थे और उनका नाम युधिष्ठिर  सूत्रधर था और यह भी एक मजे की बात थी कि वह 6 फुट के लंबे चौड़े डील-डौल वाले थे, उन्हें देखकर कोई भी डर सकता था; और जब हम उन्हें प्रश्न पूछ-पूछकर बौखला देते तो वह अपने लंबे बाल खोल कर -खो -खो हंसते हुए हमें डराते कहते ‘ मैं महिषासुर हूँ तुम सोबको खा जाऊंगा’ हम उनका रौद्र रूप देख भाग खड़े होते। हम में से कुछ ऐसे भी थे जिन्हें माँ दुर्गा की उपासना के श्लोक याद थे। मूर्तिकार बाबा के असुर रूप को देखकर हम बुदबुदाने लगतीं” या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः’ और यहीं से हमारी माँ की उपासना शुरू हो जाती।

षष्ठी को बेलवरण के बाद ही दुर्गा मंडप में हो रहे दुर्गा पाठ लाउडस्पीकर के मार्फत पूरे गाँव में गूँजते। पूरे गाँव में ढोल, ढाक, नगाड़े की ध्वनि गूँजती।  ऐसे तो प्रथमा से ही दुर्गा मंडप में देवी उपासना चलती रहती, गाँव के पंडित जी वहीं पर अपना डेरा डालकर दुर्गा पाठ किया करते। लेकिन दुर्गा पूजा का एहसास बेलवरण से ही महसूस होता। हमें सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथि का विशेष इंतजार रहता क्योंकि इन तीनों रात्रि में दुर्गा मंडप के बगल वाले मैदान में पर्दे पर फिल्म दिखाने की व्यवस्था, दुर्गा पूजा समिति करती। हमें जितना उत्साह पूजा का था, उससे दुगना उत्साह फिल्मों के लिए होता। इन फिल्मों का उत्साह सिर्फ मुझे नहीं था बल्कि यासमीन, जास्मीन और ताहरीन को भी होता।

हमारे घर पर एक कुआं था जिसमें गर्मी के दिनों में भी पानी रहता। वह कुआं हमारा था लेकिन घर की चारदीवारी के बाहर था, जिसमें आसपास की महिलाएँ पानी भरतीं। खास तौर से मुस्लिम महिलाएँ। मेरे घर के ठीक बगल में एक यादव जी का परिवार था उसके बाद का पूरा मोहल्ला मुसलमानों का था। यासमीन, जास्मीन और  ताहरीन तीनों बहनें रोज ही पानी लेने आतीं। यास्मीन मेरी मंझली दीदी की सहेली थी और जास्मीन संझली की दोस्त। मेरे से ठीक बड़ी दीदी ताहरीन की सहेली थी।दशहरे में पानी  भरने वे आतीं तो  तीनों मुझे अपने पास बुलाती  और पूछतीं “शतरूपा इ तो बतावऽऽ कि कौन-कौन फिल्म देखाबयँ? ” मैं थोड़ा भाव खाती बोलती –‘मोके का पता? ’ मुझे अपने वश में करने के लिए वे मुझे ₹1 या अठन्नी देतीं। उस समय ₹1 में आधा खेजा  ( गाँव में सामान बेचने का एक पारंपरिक माप) शरीफा मिलता था जो मेरे लिए काफी था। यासमीन और ताहरीन से रिश्वत लेने के पीछे की वजह यह थी कि रात में यासमीन, जास्मीन, ताहरीन में कोई एक बहन फिल्म देखने जातीं तो हमारे साथ बैठती। क्योंकि उन्हें फिल्म देखने की सख्त मनाही थी। लेकिन  वे  छुपकर फिल्में देखतीं। दो बहनें घर पर होती एक फिल्म देखने जाती वे पहले से ही तय करती थी कि किस दिन यासमीन, जास्मीन या ताहरीन जायेगी।उसके दूसरे दिन उनके अब्बू जान यदि हमारे यहां पूछने आते कि क्या किसी ने उन्हें रात्रि में फिल्म देखते हुए देखा था? तो सबसे पहले मैं ना में सिर हिलाती। क्योंकि मेरी बहनें उनकी दोस्त थीं तो उन पर भरोसा कम किया जाता, और मैं बच्ची हूं तो मैं सही बोलूंगी ऐसा जानकर मुझसे प्रश्न किया जाता। लेकिन मैं फूफा जान को  कहती कि ‘माँ दुर्गा की कसम! फूफा जी मैंने आज तक इन तीनों में से कभी भी किसी को फिल्म देखते हुए नहीं देखा है’। और वह निश्चिंत होकर हमारे घर से विदा होते। ऐसे ही मैं और हमारी सहेलियों ने दुर्गा पूजा के कारण कई फिल्में देखी – वक्त, पाक़ीज़ा, दीवार, शोले, जय संतोषी मां, एक दूजे के लिए, थानेदार, राम तेरी गंगा मैली, मैंने प्यार किया आदि फिल्में हमने दुर्गा पूजा में ही परदे पर देखी।

ये 1992-93 ई. के आसपास  का समय था। दुर्गा पूजा की रात का इंतजार आसपास के गाँव वाले भी करते शाम 6: 30 बजते ही आसपास के 10-20 किलोमीटर के जो भी गाँव टोले थे वहाँ के लोग हम लोगों के गाँव की ओर रुख करते। रास्ते पर लोगों की चहलकदमी  घंटे-दो घंटे चलती।  8: 30 बजे फिल्म शुरू होती 11: 30 तक एक फिल्म पूरी होती; फिर दूसरी फिल्म लगा दी जाती। लेकिन हम सभी एक ही फिल्म देखकर घर लौट आतीं क्योंकि सुबह फिर पूजा की तैयारी करनी होती, सभी को सुबह मंडप जाना होता।यह भी एक आश्चर्य था कि उतने दूर-दूर के गाँव के लोग, स्त्रियाँ, लड़कियाँ, बच्चे फिल्म देखने आते रात के दो-ढाई बजते- बजते दूसरी फिल्म के खत्म होने के बाद में सभी अपने-अपने गाँव की ओर लौटते। लेकिन किसी भी स्त्री या लड़की के साथ किसी तरह का कोई दुर्व्यवहार नहीं होता था। लोग निडर थे एक दूसरे से। जो भय था वह साँप-बिच्छू या जंगली जानवरों या भालू या लकड़बग्घा का था। कभी-कभी हाथियों या भूत का भी भय होता। गाँव का गाँव एक दूसरे का सहयोगी था। व्यक्तिगत परिचय ना भी था तो उन्हें यह पता था कि यह लोग इस गाँव के हैं या उस गाँव के हैं। इन फिल्म देखने वालों में बस हिंदू नहीं होते उस आसपास के लगभग सभी गाँववासी भी होते थे। फिल्मों के दौर के बाद नागपुरी गीत- संगीत का कार्यक्रम मैदान में चलता रहता। नागपुरी गीत संगीत में प्रायः भिनसरिया गाया जाता क्योंकि वह रात्रि का चौथा पहर होता।

गाँव में दुर्गा पूजा समिति द्वारा दुर्गा मंडप में जो दुर्गा पूजा होती, उसमें सभी गाँव वालों की सहभागिता और भागीदारी होती। लेकिन यह हमारे गाँव  केरसई, पड़ोसी गाँव रूसू आदि गाँव के सभी निवासी बोलबा प्रखंड के मालसाडा गाँव में स्थित माँ बनदुर्गा के दर्शन के लिए जरूर जाते।उस समय सबके घर पर  मोटरसाइकिल नहीं होती। हाँ गाँव में दो-चार ट्रैक्टर थे तो हमारे टोले-मोहल्ले वाले सुबह 5: 00 बजे ही ट्रैक्टर पर एक साथ बनदुर्गा पहुंचते। बगल में ही नदी थी जहाँ सब नहाते। पुरुषों और स्त्रियों- बच्चों के लिए अलग-अलग घाट थे। हम सभी मंदिर पहुंचते। सखुआ के पेड़ के नीचे माँ की मूर्ति  मंदिर में  हमें खूब सुहाती।  सखुआ के पेड़ के नीचे ही गाँव की चाची, भाभी सभी मिलकर पीतल के बर्तन में ठेकुआ बनातीं, प्रसाद बनाते  हुए सभी गीत भी गाती थीं “कौन फुलवा फुलेला लहालही  माँऽऽऽऽ कौन फुलवा चढ़ेला चरनियाँ तोहारऽऽऽ ऐ मैया उड़हुल के फुलवा फुले लहालही माँऽऽ की उड़हुल के फूलवा चढ़ेला चरणिया तोहार ऽऽऽऽ हालाँकि माँ बनदुर्गा के प्रांगण में गुलैंची के कई पेड़ थे जिन पर फूल खिले होते। माँ पर गुलैंची के फूल ही चढ़ते। वहाँ पाहन बाबा पूजा कराते उनके कान में भी गुलैंची के फूल खुँसे होते।

माँ के दर्शन करते वहीं हमें 9-10 बज जाते। पूजा के बाद वनभोज होता। उस बनभोज में जो भोजन मिलता था उसका स्वाद अद्भुत लगता।क्योंकि बहुत देर से हमें भूख लगी होती  और हम बच्चों को सूखे पत्ते चुनने की जिम्मेवारी दी जाती। ईंट के चूल्हे पर सूखी लकड़ियों-झुरियों और पत्ते से खाना बनता।  स्त्रियाँ मिलकर सब्जियां काटतीं, पुरुष खाना बनाने का काम करते।तो एक सामूहिकता का भाव हम सब में था। आज की तरह अपनी-अपनी सुविधा अनुसार हम पूजा करने नहीं जाते थे एक दूसरे का हमें पूरा ध्यान होता।

दुर्गा पूजा का मौसम गेंदा के फूलों का मौसम था। हमारे घर की बगिया में क्यारियों में खूब सारे गेंदे के फूल खिले होते, कसैली के फूल भी इस मौसम में इतराते। इकहरा लाल अड़हुल खिला हुआ इतना सुंदर लगता कि पूजा के लिए फूल तोड़ने का मन ना करता था।पिताजी को बागवानी का शौक था। हमारी बगिया में कई फूलों के पौधे और लतरें  थीं। घर के सामने चमेली की लताओं ने झुड़ बना लिया था जिसे बाद में सांप के भय से काट दिया गया।घर में अपराजिता की खूब सारी लताएँ थी।गाँव घर की स्त्रियाँ फूल तोड़ कर ले जातीं इसके बावजूद बहुत से फूल लताओं में खिले होते। अष्टमी के दिन एक डलिया फूल पिताजी मुख्य पंडित जी मदन मिश्र जी को देते माँ की पूजा के लिए। विजयादशमी के दिन वे चढ़ाए फूल पिताजी लेकर आते जिसे तांबे की ताबीज में डालकर हम सभी भाई-बहनों को पहनाया जाता। विजयादशमी का दिन ऐसा था कि गाँव में किसी के घर खूब उत्साह होता तो किसी के यहाँ थोड़ी उदासी छाई होती। जो बेटियाँ अपने ससुराल से करमा परब में आतीं वे विजयादशमी को विदा कर दी जातीं, उनके यहाँ उस दिन  माँए और बहनों का  मनझान होता।कई बेटियाँ विजयादशमी के दिन ससुराल से गाँव अपने-अपने घर आतीं। विजयादशमी के दिन पूरा का पूरा गाँव दुर्गा मंडप में होता। आखिरी हवन के पश्चात कलश का जल पंडित जी सभी पर छींटते जिनके सर पर जल का छींटा पड़ता उन्हें लगता मानो माँ का आशीर्वाद उन पर झर रहा है।जब माँ दुर्गा और उनके परिवार (लक्ष्मी, गणेश, कार्तिकेय, सरस्वती) सभी की मूर्तियों को विदा करने का समय होता तो विसर्जन के लिए गाँव में जितने भी ट्रैक्टर थे वह दुर्गा मंडप के सामने लगा दिए जाते।हम बच्चों को विशेष उत्साह रहता। विसर्जन से पहले ट्रैक्टर पूरे गाँव में घूमता। हर घर की माँ या बहुएं अपने-अपने दरवाजे पर ट्रैक्टर रुकवातीं। माँ को आरती दिखाकर, परिछतीं और विदा करतीं; हर घर में  एक दोना बुंदिया और एक दोना लावा प्रसाद के तौर पर दिया जाता।ट्रैक्टर लगभग हर दरवाजे पर 2 मिनट के लिए रुकता और माँ की जय-जयकार होती -बोलो -बोलो दुर्गा महारानी की जय! संग संग गणेश, कार्तिकेय लक्ष्मी, सरस्वती सभी के जयकारे लगते।

हमारे यहाँ एक ढोलकिया बाबा थे वह कहते बोलो- सब बचवन की जय! ढोलकिया बाबा की जय! हम बच्चे खिलखिलाते और ट्रैक्टर नदी की ओर आगे सरकता जाता।जिस घर में माँ की विदा आरती होती उस समय उनके घर का कोई बच्चा होता या बालिका होती तो उसे ट्रैक्टर से उतार लिया जाता क्योंकि नदी का रास्ता बड़ा पथरीला था।बच्चों के गिरने या डूबने का खतरा होता, हमारी मंजिल यहीं तक होती। हमारे यहाँ रावण दहन की परंपरा नहीं थी। विजयादशमी की रात लगभग सबके घर में ओल की सब्जी  चड़ुवा रोटी और खीर बनती। जो मांसाहारी थे उनके यहाँ उनकी सुविधा अनुसार।

दुर्गा पूजा में कलश स्थापना से लेकर विजयादशमी तक गाँव में इतना नगाड़ा और ढोल बजता कि आसपास के  धनखेतों में, धान की बाली  खिल जाती। और माँ दुर्गा सब का घर भरकर विदा लेतीं।

जारी…….

°°°°

प्रज्ञा गुप्ता, विभागाध्यक्ष हिंदी,  
राँची वीमेंस कॉलेज, राँची
झारखंड पिन -834001
[ई-मेल-prajnagupta2019@gmail.com]

Tags: अनहद कोलकाता Anhad Kolkata हिन्दी बेव पत्रिका Hindi Web Magzineआश्विन मासप्रज्ञा गुप्ताबचपन के उजले - काले पख - 1स्थायी स्तंभ
ShareTweetShare
Anhadkolkata

Anhadkolkata

अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें। प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।

Related Posts

एक कविता हमेशा दर्ज करेगी तुम्हारा होना – प्रज्ञा गुप्ता

एक कविता हमेशा दर्ज करेगी तुम्हारा होना – प्रज्ञा गुप्ता

by Anhadkolkata
October 22, 2026
0

एक कविता हमेशा दर्ज करेगी तुम्हारा होना (नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा-केशव तिवारी) प्रज्ञा गुप्ता अवध के लोकजीवन को अपनी कविताओं में जीवंत रूप...

लोचन कोना -5

लोचन कोना -5

by Anhadkolkata
October 21, 2026
0

लोचन कोना -5 रचना का प्रतीत्यसमुत्पाद प्रफुल्ल कोलख्यान जैसे जोति से जोति वैसे रचना से रचना यानी प्रतीत्यसमुत्पाद बात उन दिनों की है जब बूढ़े लेखकों...

बलजीत सिंह ‘बेनाम’ की दस ग़ज़लें

बलजीत सिंह ‘बेनाम’ की दस ग़ज़लें

by Anhadkolkata
October 20, 2026
0

बलजीत सिंह ‘बेनाम’ बलजीत सिंह ‘बेनाम’ हरियाणा के हाँसी (जिला हिसार) के निवासी हैं। आप हिंदी-उर्दू ग़ज़ल के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी ग़ज़लें, कविताएँ, दोहे और...

मोतीलाल दास की कविताएँ

मोतीलाल दास की कविताएँ

by Anhadkolkata
October 19, 2026
0

मोतीलाल दास मोतीलाल दास की इन कविताओं में भाषा की सहजता, शिल्प की सादगी और विचार की वैचारिक दृढ़ता मिलकर एक ऐसी काव्यभूमि का निर्माण करती...

अमिता नीरव की कहानी – लाल चाय

अमिता नीरव की कहानी – लाल चाय

by Anhadkolkata
October 18, 2026
0

अमिता नीरव अमिता नीरव की कहानी ‘लाल चाय’ अपरिचित परिवेश में स्त्री की असुरक्षा, अंतर्बोध और भय की मनोवैज्ञानिक पड़ताल करते हुए समकालीन जीवन के उस...

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.

No Result
View All Result
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.