लोचन कोना
(अनहद कोलकाता के साप्ताहिक कॉलम — लोचन कोना — की बुनियादी टिप्पणी)
लोचन जलु रह लोचन कोना, जैसे परम कृपण कर सोना।
यह तुलसीदास के रामचरितमानस के फुलवारी प्रसंग से संबंधित है। फुलवारी में गिरिजा-पूजन के लिए आई सीता, राम को पहली बार देखती है। नजर मिलते ही सीता स्वाभाविक शर्म और संकोच में गड़ जाती है। लज्जा और संकोच इतना जबरदस्त कि मुंह से बोल नहीं फूटे!
लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपण कर सोना॥
सीता की आंतरिक अवस्था सुंदर परिप्रेक्ष्यों में प्रस्तुत है — अभिव्यक्ति भौंरी और मुंह कमल!
जीवनयापन और जीवन की परिस्थिति में लोकतंत्र की रात की लाज में आज अभिव्यक्ति की भौंरी कमल में कैद होकर रह गई है — नागरिक मन के भीतर से अभिव्यक्ति अविकल रूप से निकल नहीं पाती है; उसी तरह तब की परिस्थिति में सीताजी के मुख से शब्द नहीं निकल पाये; यहां जनजीवन में जीवनयापन का प्रसंग है, वहां रामचरितमानस में प्रेम के प्रारंभ का प्रसंग!
अभिव्यक्ति जब शब्द बनकर अपने अवरोध को तोड़ नहीं पाती, आंसू बनकर आंख से निकलने का रास्ता खोजने लगती है। कभी आंसू भी निकल नहीं पाते, आंख की कोर में लटक कर रह जाते हैं; जैसे कंजूस की हथेली पर आकर भी दान के लिए धन हथेली की पकड़ से बाहर निकल नहीं पाता है।
सीताजी के प्रेम और विह्वलता के आंसू भी कंजूस के हाथ के सोने की तरह सिमटी-सिमटी रह जाती है, उसी तरह भीतर-ही-भीतर सिमटे रह जाते हैं।
सीता के स्वभाव की खासियत है — गहन प्रेम में संपूर्ण समर्पण की बढ़ती प्रेरणा और उससे भी प्रबल लज्जा और संयम का द्वंद्व।
प्रेम की प्रबल प्रेरणा के साथ नैतिक यथार्थ के संकोच एवं संयम के द्वंद्व से निकली मर्यादा ही राम के पुरुषोत्तम बनने की आधारशिला बनती है।
प्रेम की प्रबल प्रेरणा के साथ नैतिक यथार्थ के संकोच एवं संयम के द्वंद्व से निकली मर्यादा जब भी सोना के आकर्षण से टूटती है सीता की समता विकल हो उठती है! भारत बोध विकलांग हो जाता है।
भारत के जीवन, जनजीवन ने तब से अब तक सैकड़ों बार, न जाने कितनी बार सोना के आकर्षण से मर्यादा को टूटते और समता की मौलिक आकांक्षा को विकल होते देखा है।
सब से दुखद प्रसंग यह है कि आजाद भारत के संवैधानिक आश्वासनों की संदर्भ-विच्छिन्नताओं के चलते भारतीय मन में सन्निहित समता की मौलिक आकांक्षा सैकड़ों बार, न जाने कितनी बार छली जाती रही है।
यह सांस्कृतिक प्रसंग और नैतिक द्वंद्व भारतीय मन की संरचना की आंतरिक बुनावट और बनावट की लक्ष्मण रेखा, यानी गाइडिंग लाईन, रही है — आंतरिक लचीलापन और सार्वभौम स्वीकार्यता। भारतीय पद्धति के जीवनयापन और वैश्विक जीवनानुभूति को जिस किसी भी कोने से, जब कभी चुनौती मिले — मुकाबले की अभिव्यक्ति का होना-न-होना — लोचन कोना में दिख जाए तो सार्थक!
नजर बनाये और गड़ाये रखिए — अपने आस-पास के यथार्थ पर भी लोचन कोना पर भी।
- प्रफुल्ल कोलख्यान ….. जारी





