समकालीन वैश्विक बहस में यह प्रश्न और जटिल हुआ है। यौन उत्पीड़न, नस्लवाद, स्त्री-विरोध, राजनीतिक दमन अथवा अन्य अनैतिक आचरण के आरोपों से घिरे लेखकों की रचनाओं का मूल्यांकन कैसे किया जाए? क्या किसी महान रचना का साहित्यिक महत्त्व उसके लेखक के नैतिक पतन के बावजूद बना रह सकता है? क्या लेखक के निजी जीवन की जानकारी रचना के अर्थ को बदल देती है? इस संदर्भ में Cancel Culture और Separate the Art from the Artist जैसी अवधारणाएँ भी चर्चा के केंद्र में हैं। महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि लेखक का निजी जीवन उसकी रचना से पूरी तरह अलग है या नहीं, बल्कि यह है कि हम लेखक के जीवन को उसकी रचना के अर्थ और मूल्यांकन में किस सीमा तक, किस विवेक और किस आलोचनात्मक दृष्टि से शामिल करते हैं। साहित्य की स्वायत्तता और लेखक की नैतिक जवाबदेही के बीच यही तनाव इस वैश्विक बहस का केंद्रीय बिंदु है।
फ़िराक़ से आलोकधन्वा तक – ललन चतुर्वेदी
पिछले कुछ दिनों से फ़िराक़ गोरखपुरी और आलोकधन्वा दोनों चर्चा में हैं। समालोचन पर अमिता शीरीं का लेख प्रकाशित हुआ और फ़िराक़ एक बार फिर सुर्ख़ियों में आ गए। इसी तरह आलोकधन्वा तो लंबे समय से चर्चा में थे ही, लेकिन इस बार निवेदिता झा के फ़ेसबुक पोस्ट से लेखक उनके बारे में सोशल मीडिया पर ज़ोरदार बहस में दिखने लगे। हिंदी के अनेक दुर्भाग्यों में से एक यह भी है कि यहाँ रचना के बदले रचनाकार केंद्र में रहते हैं। जीवन में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आवाज़ उठाने वाले अधिकांश साहित्यकारों के मन में एक तानाशाह बैठा रहता है, जो स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मुखर विरोध में उतर जाता है। लेखक कोई दिव्य लोक का देवता नहीं है कि उसमें सद्गुण ही सद्गुण हों। परंतु दुर्गुण भी इतने न हों कि उनसे सड़ांध पैदा होने लगे।
फ़िराक गोरखपुरी
विश्व के अनेक लेखकों के जीवन और लेखन में गहरी फाँक रही है। अपनी हिंदी, जो प्रेम की भाषा है, इसमें लबालब प्रेम दिखाई देता है, लेकिन वासना की उफनती बरसाती नदियों ने कितने तटबंध तोड़े हैं और इससे कितने घर तबाह हुए हैं, इसे कौन नहीं जानता? गहराई से विचार करें तो अधिकांश लेखकों की घर-गृहस्थी तबाह ही दिखती है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि लेखक हो या कलाकार, वह अपने लेखन और कला से सनकी की तरह प्यार करता है। कबीर तो आमंत्रित ही करते हैं कि जिसे अपना घर फूँककर तमाशा देखना हो, वह मेरे साथ चले। लेकिन कबीर की बात निराली है। वह केवल सूतों के बुनकर नहीं थे, अपितु रिश्तों के भी बुनकर थे। उनकी गृहस्थी उनके संत-चित्त के कारण अमल-धवल रही। वे हिंदी के ऐसे पुरखा हैं, जो ज्यों की त्यों चादर रखकर चलते बने। अब उनसे तुलना क्यों? वह समय संत कवियों का था। अब हर समय कवि संत रहे, यह आवश्यक तो नहीं। समय ने उन्हें भी सिखाया है कि कब तक संत बने रहोगे? सीकरी की यात्रा करो और समय मिलते ही महंत बन जाओ। गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाओ और गुरुकुलों में अपने शिष्यों को प्रतिष्ठित करते रहो। जब भी शुभ मुहूर्त आए, उन्हें पुरस्कृत करते रहो।
कहने को साहित्य में रीतिकाल समाप्त हो गया। आधुनिक क्या, उत्तर-आधुनिक भी हो गए, लेकिन रीतिकालीन आचार्य तो बैठे ही हुए हैं। उनकी कुंठाएँ आज भी कनक छड़ी-सी कामिनी की क्षीण कटि पर मलीन दृष्टि डालने से कब चूकती हैं? कुछ अपने नयनों को समझाने की पुरज़ोर कोशिश करते हैं, लेकिन वे मुँहजोड़ तुरंग की तरह बेलगाम होकर चल देते हैं। ऐसे में प्रतिक्रियाओं का आना स्वाभाविक है। जो भी हो, इस देश के लोग बहुत जल्द जजमेंटल हो जाते हैं। यह मनुष्य-स्वभाव है कि हम स्वयं के लिए वकील और दूसरों के लिए जज बन जाते हैं। राजेश खन्ना पर फ़िल्माया गया गाना सही सवाल उठाता है—“यार, हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो जिसने पाप न किया हो?” यह किसी लेखक-कवि के कुकृत्य को जस्टिफ़ाई नहीं करता, बल्कि स्वयं से सवाल करने के लिए प्रेरित करता है।
आलोकधन्वा
पहले भी कहा है कि लेखक इसी दुनिया का श्वेत-श्याम प्राणी है, जो तमाम ऐहिक वासनाओं के साथ शब्दों की खेती करता है। हाँ, मेरा ऐसा मत है। इसके बावजूद सच्चा लेखक सृजन के क्षणों में पूरी तरह निरपेक्ष और विशिष्ट होता है। उस समय वह स्वयं को भूल जाता है कि वह क्या है—हिंदू या मुसलमान? पुरुष या स्त्री? जब तक यह आत्मविस्मृति नहीं आती, पाठकों के मन में आप अपनी कोई स्मृति नहीं बना सकते। यह निरपेक्षता प्राप्त होना बहुत कठिन होता है। यह बड़ी बात है और लंबी भी। तब सवाल यह उठता है कि यह आत्मपरिष्कृति टिकती क्यों नहीं? पूजा-स्थल से उठते ही चादर क्यों मैली हो जाती है? कुछ ही क्षण पहले जो विशिष्ट था, अशिष्ट कैसे हो उठा?
सवाल यह है कि क्या ऐसी दुर्घटनाएँ केवल साहित्य में ही हो रही हैं? जीवन के हर क्षेत्र में, चाहे वह कला, संस्कृति, धर्म, फ़िल्म, खेल कुछ भी हो, सब जगह कुदृष्टि वाले कैमरे लगे हुए हैं, जो हमारी आत्मा को निरंतर छील रहे हैं।
कोई इसका निश्चित समाधान नहीं है। हम कला-संस्कृति, साहित्य, अध्यात्म और धर्म से प्रेम करने से स्वयं को रोक नहीं सकते, लेकिन इनके आचार्यों से दूर रहना ही बेहतर है। वर्षों पहले एक किताब पढ़ी थी—‘भूले-बिसरे प्रसंग’। इसमें एक पाठक एक स्त्री शायर को पत्र लिखकर उससे मिलने की इच्छा प्रकट करता है। वह जवाब में लिखती है—“मुझसे मिलना है तो मेरी कविताओं से मिलो।”
सोशल मीडिया का समय है। जो अपनी दीवार गंदी करता है, उसकी रंगाई-पुताई के लिए आप अपना समय क्यों खर्च कर रहे हैं? अब कोई मूर्ख बनाने के लिए कह दे कि कौआ आपका कान लेकर उड़ गया, तो अपना कान देखिए। कौए के पीछे दौड़ लगाना ही चाहते हैं तो आपकी मर्ज़ी।
रही बात फ़िराक़ और आलोकधन्वा के निजी जीवन और उनसे जुड़े अशोभन प्रसंगों की, तो मैं समझता हूँ कि कब्र की खुदाई से कोई फ़ायदा नहीं। एक दिवंगत हो चुके हैं और दूसरे वयोवृद्ध हैं। मुझे आलोकधन्वा की स्थिति देखते हुए अपने गाँव के एक विद्वान नास्तिक संत की याद आती है, जो अपने मरने के कुछ दिन पूर्व वैष्णव महंत से मांस खिलाने का आग्रह करने लगे। मैं उन महान नास्तिक संत का आदर इसलिए करता था कि वे कभी पूजा-पाठ नहीं करते थे। चंदन-तिलक नहीं लगाते थे, लेकिन गरीब लोगों का लगभग मुफ़्त होम्योपैथिक इलाज करते थे। गरीब बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ाया करते थे। गाँव की स्त्री-पुरुष उनका चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेकर स्वयं को कृतार्थ समझते थे। महंत को ऐसा सम्मान कभी नहीं मिला।
हमारे यहाँ कहा जाता है कि बच्चे और बुजुर्ग एक तरह के हो जाते हैं। उन्हें मालूम नहीं होता कि क्या सुखद है और क्या घातक, क्या सही है और क्या गलत। यदि उन्हें पता होता कि इस तरह के पोस्ट आदि से उनकी छवि धूमिल हो रही है, तो वे क्यों ऐसा करते?
मैं उनका बचाव नहीं कर रहा हूँ। हिंदी जगत के सामने कुछ विनम्र सुझाव रख रहा हूँ।
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