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Home कथा

भोर होने से पहले : राकेश कुमार सिंह

कहानी

by Anhadkolkata
September 24, 2026
in कथा, साहित्य
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वरिष्ठ एवं चर्चित कथाकार राकेश कुमार सिंह की यह कहानी पलामू के जंगल-पठार, आदिवासी जीवन और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की पृष्ठभूमि में आधुनिक चिकित्सा, अंधविश्वास और मानवीय संवेदना के जटिल द्वंद्व को सामने लाती है। एक चिकित्सक की दृष्टि से लिखी गई यह कथा सरकारी स्वास्थ्य-व्यवस्था की बदहाली, झोला-छाप चिकित्सा, मलेरिया की त्रासदी और खड़िया समाज में जड़ जमाए रूढ़ विश्वासों के बीच एक डॉक्टर की असहायता और बेचैनी को रेखांकित करती है। इसी निराशा के बीच उसका रंगकर्मी मित्र चंदर कला को सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाकर एक अनोखा प्रयोग करता है—अंधविश्वास को उसी की भाषा और प्रतीकों के भीतर से चुनौती देने का। कहानी जंगल को केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर और समाज के मानस में मौजूद अविश्वास, भय और रूढ़ियों के रूपक के रूप में भी देखती है। अंततः यह कथा बताती है कि चिकित्सा, कला और मानवीय करुणा जब अपने-अपने दायरों से बाहर निकलकर मनुष्य तक पहुंचती हैं, तो परिवर्तन की एक नई राह संभव हो सकती है।

  • अनहद कोलकाता

भोर होने से पहले

राकेश कुमार सिंह

 

राकेश कुमार सिंह

दोपहर वाली “रांची-चोपन एक्सप्रेस” से चंदर आ रहा था और मेरा मन खिन्न था…पिछले कई दिनों से!

अच्छा-भला लातेहार के सदर अस्पताल में कार्यरत था मैं। देहात में मलेरिया का भीषण प्रकोप हुआ और बिना सूचना दिए कार्यक्षेत्र से अनुपस्थिति के आरोप में हुटाप के चिकित्सा पदाधिकारी निलंबित कर दिए गए तो तत्कालिक व्यवस्था के अंतर्गत मुझे कुछ दिनों के लिए “प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र-हुटाप” का प्रभार ग्रहण करने का पत्र तामील करा दिया गया था लेकिन अब यह तात्कालिकता स्थायित्व में बदलती दिखने लगी थी तो मैं झल्ला उठा था।

मैं हुटाप पहुंचा था।

हुटाप में स्वास्थ्य केंद्र के नाम पर जो इमारत थी उसे देख कर समझना मुश्किल नहीं था कि वह सरकारी भ्रष्टाचार का तिलिस्म थी।

देहात की लचर स्वास्थ्य सुविधाओं को देख मन तिक्त हो गया था।तिस पर मेरा सामना गांव के बैगा (ओझा-गुणी) और झोला छाप डॉक्टरों से भी होने लगा था जिनके पास दुनिया के हर रोग की अक्सीर दवा होती है। साईकिल पर गांव-गांव फिरने वाले झोला छाप “डागडर साहेब/डागदर बाबू” लोगों के झोले में नीमोस्लाइड, क्रोसीन, विटामिन के कैप्स्यूल,खांसी-बुखार के सिरप रूई-गॉज-डेटॉल-बैंडेज आदि-आदि की चलंत दुकान भी होती थी।यह खतरे जान बिरादरी वक्त-जरूरत इंजेक्शन देने या ग्लूकोज- स्लाइन की ड्रिप लगाने से भी नहीं हिचकती थी,भले ही कभी शिरा-धमनी जैसी चिड़िया नहीं देखी थी।

“प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र -हुटाप” में मौसमी बीमारियों या सामान्य प्रसव हेतु कामचलाऊ व्यवस्था थी पर पैथोलॉजिकल जांच, एक्स-रे, शल्यक्रिया या असामान्य प्रसव के मामले में मरीज को डाल्टनगंज या बरवाडीह रेलवे-हस्पताल रेफर करना पड़ता था।

गांवों में आधुनिक चिकित्सा का आधारभूत ढांचा ही नहीं है लेकिन हम डॉक्टरों के बारे में झूठ यह फैलाया जाता है कि डॉक्टर गांवों में जाना ही नहीं चाहते। क्या करें हम गांवों में जा कर ? स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर स्थापित मकबरों में बैठ कर नीम-हकीमों की भांति हारी-बीमारी में गांव वालों को धोखा दे कर पैसे बनाते रहें?

मामूली चोट-मोच,हल्के छिले-कटे या मौसमी खांसी-जुकाम जैसी अलामतों का प्राथमिक उपचार या ईलाज तो झोला छाप डॉक्टर बेशक कर लेते थे परन्तु बिच्छू-डंक के ये नीम-हकीम सांप-काटे के मामलों में भी हाथ डाल बैठते थे और जब मरीज की बिगड़ती हालत अनियंत्रित होने लगती तो रोगी को खटिया पर लाद-लदवा कर,साईकिल पर लटका कर, कंधों पर उठा कर या फिर किसी खटारा बस में टूटी-फूटी सड़क पर पटकते-पटकाते बरवाडीह या डाल्टनगंज की ओर दौड़ने लगते थे जहां के नीजी अस्पतालों के लिए ये एजेंट झोला छाप डॉक्टर दलाली खाते थे।
वर्षों से पलामू मलेरिया के “सॉफ्ट टारगेट” के रूप में जाना-पहचाना जिला रहा है लिहाजा मलेरिया-रोधी दवाओं की कमी नहीं रहती।हुटाप और निकट के टोले-बस्तियों के निवासी “प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र-हुटाप” से दवाएं लेते रहे थे।संताल,मुंडा या कोल अपेक्षाकृत जागरूक और प्रगतिशील लोग थे पर खड़िया आदिवासी जन अंग्रेजी डॉक्टर,इलाज और दवाओं के सख्त विरोधी थे।
मलेरिया के दौरे में तेज कंपकंपी के साथ जाड़ा-बुखार चढ़ता और तीव्र ज्वर में दहकता मरीज प्रलाप करने लगता तो खड़िया लोगों के लिए यह भूत-प्रेत का मामला था। भूत-प्रेत-डायन-किच्चिन आदि-आदि बुरी छायाओं से आक्रांत प्राणी के लिए आगडर-डागडर व्यर्थ थे। खड़िया लोग ओझाई-मताई के कायल थे।रोगी जी-बच गया तो बैगा का सत्त,मर गया तो ठाकुर जी की इच्छा सर्वोपरि। ठाकुर याने इधर के लोगों के सर्वोच्च देवता… सूर्य!

खड़िया लोगों को अंग्रेजी डॉक्टर-दवाओं पर तनिक भी विश्वास नहीं था। खड़िया समाज को अपने बैगा या देऊरी (पुजारी) पर अंधश्रद्धा थी। थोड़ा विश्वास था भी तो झोला छाप डॉक्टरों पर था जो कि स्थानीय लोग थे और स्वयं को “पी०एस०पी०ओ०” या “पी०एम०पी०ओ०” सर्टिफिकेट धारक चिकित्सक घोषित किए हुए थे।इन सर्टिफिकेटों के बारे में मैंने न कहीं पढ़ा था और न ही सुना था।

परिस्थितियां इतनी विपरीत थीं कि कोई ईमानदार चिकित्सक हताश हो सकता था या उस माहौल को आत्मसात करते-करते अच्छा चिकित्सक भी शनै: शनै: एक सनद प्राप्त नीम-हकीम (क्वालिफाएड क्वेक) बन कर रह जाने वाला था।

चर्च के फादर जेम्स स्मेट मुझे धर्य बंधाते रहते थे पर खड़िया लोगों को समझाने-बुझाने के मेरे सारे प्रयास निष्फल होते रहे थे। सफल तो तब होते जब खड़िया लोग पूर्वाग्रह छोड़ कर कुछ सुनने-समझने को राजी होते।

एक जंगल बाहर था।एक जंगल मेरे भीतर उगता जा रहा था।हताशा और निराशा का जंगल…

०००००

“छः सौ तेरह अप” सही समय पर प्लेटफार्म पर आ लगी थी। कंपार्टमेंट के दरवाजे पर ही खड़ा दिख गया था चंदर। ट्रेन से उतरते ही लपक कर मुझसे लिपट गया था।
-“कैसा है डॉक्टर?तू तो बदल गया एकदम!तोंद ग़ायब! क्लीनशेव्ड चेहरे पर मूंछ-दाढ़ी ?”
-“जंगल का प्रसाद है यह”-मैंने कहा था-“चल निकलें। अंधेरा हो गया तो जंगल में दिशा भटकने का खतरा है।”
-“दूर जाना है?” पीठ पर अपना पिट्टू बैग लादते चंदर ने पूछा था।
-“यही कोई आठ-दस किलोमीटर।”
-“रेवा भी यहीं है?”
-“नहीं। डाल्टनगंज में रहती है। इधर बच्चों के लिए स्कूल कहां है जो “-हम स्टेशन से बाहर निकल पड़े थे -“शनिवार की शाम मैं डाल्टनगंज चला जाता हूं। सोमवार की सुबह वापस यहां।इधर दो हफ्तों से नहीं जा सका… फुर्सत ही नहीं मिली।”

स्टेशन के बाहर, किराने की दुकान के सामने मेरी मोटरसाइकिल खड़ी थी। उसी दुकान में मैंने अपना सेलफोन रिचार्ज करने को दे रखा था।हुटाप में बिजली के खंभे तो पता नहीं कब से गड़े-खड़े थे पर खंभों पर तार लगने की मियाद अभी पूरी नहीं हुई थी।
मैंने मोबाइल फोन की बैटरी चार्ज करने के दस रूपए अदा किए थे और फिर हम मोटरसाइकिल पर सवार हुटाप की ओर निकल पड़े थे।
चंदर और मैं इंटरमीडिएट तक सहपाठी रहे थे।आगे मेरा मेडिकल कॉलेज में दाखिला हो गया था और कॉलेज के दिनों से ही साहित्य और सांस्कृतिक कला-रूपों के प्रति परम आसक्त चंदर स्नातक के बाद “राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय-दिल्ली” से जुड़ गया था।

अब क्रॉनिक बैचलर चंदर “राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम” में कार्यरत था। रंगकर्म चंदर का जुनून बन गया था।
चंदर का पलामू-ज्ञान बांग्ला किताबों के जंगल- रोमांस या सिनेमाई आदिवासी प्रस्तुतियों के अधकचरेपन तक सीमित था।उसकी समझ से पूरा पलामू घोर अरण्य ही था परन्तु अब…
_”यही जंगल है?”-वह द्वंद में था-“जंगल जैसा लगता ही नहीं।”
-“था कभी इधर सचमुच का जंगल।अब वह जंगल शहरों में इमारती लकड़ी या फर्नीचर बना पड़ा है।”
-“मतलब?”
-“जंगल के लोगों ने जंगल से उतना ही लिया जितना जीवन के लिए जरूरी था।जब से जंगल सरकारी हुए,आदमी ने जंगल को खोखला कर दिया है।अब तो इधर गैर-इमारती वृक्ष ही बच रहे हैं या फिर नाटे पलाश के ढाक-वन रह गए हैं।”

रास्ते में मिलने वाले टोले-पुरवे निहारता चंदर सवाल करता रहा था। मैं उत्तर देता रहा था।हम हुटाप की ओर बढ़े जा रहे थे।

हुटाप गांव की आबादी मिश्रित थी।एक ओर गैर-आदिवासी तांती,अहीर, लुहार, कुम्हार,कोयरी,कुरमी जातियों के पास-पास खड़े मिट्टी के सुघड़ घर थे जिन पर खपरैल की छप्पर थी।दूसरे छोर पर अलग-अलग बेतरतीब बनी खड़िया आदिवासियों की बांस-काठ-फूस-पत्तों की झोपड़ियां थीं।

गांव का तीसरा कोण बनाता था ऊंचे टीले पर खड़ा “कैथोलिक मिशन स्कूल” जहां के बहुत पुराने चर्च की चोटी पर लगा चमकदार क्रॉस आस-पास के दस गांवों से देखा जा सकता था।
चौहद्दी का चौथा कोण था “प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र-हुटाप” जिसके पिछवाड़े सटे,बारिश में रिसते रहने वाली सीलिंग वाला मेरा दो कमरों का क्वार्टर था।

जबकि हमारा हिन्दुस्तान मंगल ग्रह की ओर कूच कर चुका; किसी शहर,कस्बे या रेलवे- स्टेशन से हुटाप पहुंचने वाली कोई पक्की सड़क नहीं थी। आवागमन करते दोपायों या चौपायों के पैरों-खुरों से धूल-धूल हुई जमीन ही गंवई रास्ते की पहचान थी। बारिश के दिनों में अरण्य-पथ कीचड़-पानी हो जाता तो दस-बारह किलोमीटर स्थित बरवाडीह भी काले कोसों दूर लगने लगता था।
चंदर के सवाल चुकने लगे थे या फिर वह पूछ-पूछ कर थक-ऊब चुका था।अब हम मौन थे। रास्ता कट रहा था। चर्च का क्रॉस ढलते सूर्य की रौशनी में दमकता दिखने लगा था।हम हुटाप के निकट थे।

खरीफ का मौसम था। खेतों में पकते धान की फसल होनी चाहिए थी… नहीं थी।

इस “रेन शैडो जोन”(वर्षा वंचित क्षेत्र) में बाजरे,सांवा,कोदो या मक्का जैसी मोटांजा (मोटे अनाज) फसलों का ही भरोसा था जिन्हें ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती। प्रायः हर दूसरे-तीसरे वर्ष अनावृष्टि का शिकार रहता है पलामू का आधा-पौना पठार।

खाली पड़े खेतों,मेंडों, और बंजर ढलानों पर हठीले वनवासियों की भांति जिद्दी वन्य वनस्पतियां लहलहा रही थीं।ढलती सांझ की नर्म धूप में नागफणी,बेहया, पुटुस, वनतुलसी,बनबेर की झाड़ियों से वाष्पित होती भीनी-भीनी महक हवा में घुल रही थी।

हुटाप पहुंचने तक सूरज डूब चुका था। सूर्यास्त के साथ ही वातावरण में हल्का कुहासा तिर उठा था।ढाल पर खड़े चर्च का क्रॉस कुहासे की परतों में छुपने लगा था।
ढलान की चढ़ाई के निकट दिख गए थे फादर जेम्स।
-“गुड इवनिंग फादर।” मैंने मोटरसाइकिल उनके निकट जा रोकी थी।
-“गुड इवनिंग डॉक्। कैसे हो?”
-“ठीक हूं फादर। धन्यवाद।मेरे मित्र से मिलिए। चंदर… चंद्रकिशोर चौधरी।”
मोटरसाइकिल से उतरते चंदर ने भी अभिवादन किया था। फादर जेम्स ने पूछा था,
-“तुम भी डॉक्टर?”
-“नहीं।यह रंगकर्मी… मतलब, ड्रामा आर्टिस्ट है। दिल्ली से है। ड्रामा-फेस्ट में रांची आया था। शुक्रवार की “गरीब रथ” में वापसी का टिकट है तो मुझसे मिलने आ गया।अब यहीं से ट्रेन पकड़ लेगा।”
-“गुड।याने तीन दिनों की जंगल सफारी?” फादर मुस्कुराए थे-“खैर,तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?”
-” आदिवासियों को छोड़ दें तो” मैंने बताया था,-“तो लगभग शत-प्रतिशत सफलता कह सकता हूं। मलेरिया को पूरी तरह खत्म करना तो मुश्किल है पर हां, स्थिति फिलहाल नियंत्रण में कह सकता हूं… लेकिन ये खड़िया लोग तो!ओह गॉड…दे आर एब्सोल्यूटली रेडिकुलस!”
-” बड़े जिद्दी हैं खड़िया।जब जयपाल सिंह की नहीं सुनी तो हमारी-तुम्हारी क्या मानेंगे डॉक्टर”-फादर के होंठों पर विषण्ण मुस्कान उभरी थी -” मानोगे चंदर कि मुझे इधर चार साल से उपर ही हुए होंगे लेकिन मैं किसी खड़िया बच्चे को अपने स्कूल में दाखिल नहीं करा सका। किताबें, फीस, यूनिफॉर्म,दोपहर का भोजन…हम चाहे कितनी भी सुविधाएं दें, खड़िया लोगों को मिशनरियों पर भरोसा ही नहीं।”

परंपरा से हठी रहे हैं खड़िया। आदिवासी नेता “मरंग गोमके” (बड़े मालिक) जयपाल सिंह आजीवन खड़िया लोगों को जातीय नाम-गोत्र बदल कर समाज की मुख्यधारा में लाने के प्रयास करते रहे लेकिन अंग्रेजी सरकार के साथ जूझ मरने वाले छोटानागपुर के आदिवासी क्रांतिकारी तेलंगा खड़िया (1806-1880) के इन वंशधरों को उनकी परंपरा और संस्कृति से बिलगाया नहीं जा सका।

फादर जेम्स से विदा लेकर हम मेरे क्वार्टर की ओर बढ़े थे। चंदर उत्सुक था,
-“हैं कौन ये खड़िया?”
-” एक आदिवासी समाज।इधर डोली या पालकी को देशज बोली में खड़खड़िया या खुड़खुड़ी कहते हैं।तो राजाओं-जमींदारों की पालकी ढोने वाले आदिवासी खड़िया कहलाए।हुटाप के पहाड़ी खड़िया बड़े परंपराजीवी,जिद्दी और अंधविश्वासी हैं।मर जाएंगे लेकिन अंग्रेजी दवा नहीं खाएंगे…अंग्रेज विरोधी पुरखे के वंशज जो ठहरे।”
-” कुछ लोगों की ज़िद पूरे समाज पर क्यों थोपता है भाई! आदिवासी समाज ने भी कई बुद्धिजीवी,चिंतक, कलाकार और एक्टिविस्ट दिए हैं। देश-काल और परिस्थितियां आदमी के विचार,व्यवहार और संस्कृति निर्मित करते हैं।हुटाप के खड़िया लोगों को जो खाद-पानी मिला,वे वैसे ही बन गए…सिंपल।”
-“चार दिन यहां रह कर देख ले,सारी फिलासफी भूल जाएगा।” मैंने भिन्नाते हुए कहा था।

हम ठिकाने पर पहुंचे थे।

मेरा कम्पाऊंडर नंदलाल खरवार मेरी वापसी की प्रतीक्षा में अभी तक क्वार्टर पर मौजूद था जबकि शाम चार बजे तक वह अपने दूर स्थित गांव भेलवा के लिए निकल पड़ता था।
-“मैंने रोटी-तरकारी बना दी है सर। सरसों पत्ता की चटनी भी है।” गोबर की बारीक राख से शीशा साफ कर लालटेन जलाती पंचायत की “आशा बहन जी” उर्सुला मिंज ने बताया था।
-“धन्यवाद मिस मिंज।अब रात हो रही है,आप भी घर जाइए।हम खाना देर से खाएंगे।”
उर्सुला मिंज विदा हुई। मैं नंदलाल खरवार से संबोधित हुआ।
पलामू में कहावत है…धन तो राजपूत:निर्धन तो खरवार। लिहाजा मैं नंदलाल के जातीय स्वाभिमान को सम्मान देते हुए ही उसे संबोधित करता था।
_”क्यों नंदू बाबू, दिन में सब ठीक-ठाक रहा न ?”
-“जी डाक् साब।”
-“कोई नया मरीज?”
-“ना सर।मंगरू,बोधन और तेतर आए थे।आपसे भेंट करने।बोखार टूट गया था तो पथ पूछने आए थे।”
मैं पथ्य-कुपथ्य क्या बताता? जहां रोज मांड़-भात या रोटी-चटनी-प्याज जुटाना भी एक संघर्ष हो वहां विटामिन के चंद कैप्सूल अश्लील मजाक नहीं तो और क्या हैं?
-” तब तक तुम फ्रेश हो लो चंदू।चाहो तो बाहर हैंडपंप पर नहा भी सकते हो। मैं जरा बस्ती का एक चक्कर लगा कर आता हूं।” मैंने अपना डॉक्टरी बैग उठाया था-“… और नंदू बाबू, चंदर बाबू को घर-बाहर का इंतजाम दिखा-समझा कर आप भी निकल ही लीजिए।”
-“तू लौटेगा कब?”
-“जल्दी। मंगरू, बोधन और तेतर को दवाओं की खुराक देनी है बस।हप्ते भर के लिए टेबलेट्स दे दो तो रातोंरात स्वस्थ होने के लिए सारी दवाइयां भूंजे की तरह एक ही बार में फांक लेंगे ये लोग।”
-“ओऽऽन्नो…!” ठठा कर हंस पड़ा था चंदर।

मैं क्वार्टर से निकल पड़ा था।

दीपावली की अगली शाम थी।दिन में गोवर्धन पूजा हुई थी। आदिवासी समाज का सोहराई। गैर-आदिवासी लोगों का स्थानीय त्योहार…गाय डाढ़।

आज भी घरों-झोपड़ियों की देहरी-ड्योढ़ी पर एक दीपक जलाया गया था।घर के बाहर के टीकर (उंची कंकरीली भूमि जहां मवेशी बंधते हैं) या गोहाल की चौखट पर भी दिए जल रहे थे।
क्वार्टर पर लौटते-लौटते रात के नौ बजने लगे थे।कोहरा घना हो चुका था।हल्की खुन्नस भीगी ठंढ पड़ने लगी थी।जंगल-पठार पर शरद कुछ जल्दी आ धमकता है।

हमने रोटी खाई थी। इकलौती फोल्डिंग खाट पर दीवार से पीठ लगाए,गले तक कंबल ओढ़े हम गप्पें हांकने लगे थे।
चंदर के पास दिल्ली के अनुभव थे।हबीब तनवीर और गिरीश कर्नाड के साथ गुजरे समयों की यादें थीं। रांची के रंग-महोत्सव में मिथिलेश्वर के उपन्यास “युद्धस्थल” पर आधारित चंदर का

नाटक “डायन” खूब सराहा गया था लिहाजा संस्मरण साझा करता चंदर गद्-गद् था।
मेरे पास जंगल के ताजा अनुभव थे। अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ मलेरिया से जंग के कटु अनुभव थे।

समय गुजरता रहा था। घड़ी देखने की न सुध थी,न जरूरत ही थी।

कभी पास…कभी दूर,ठंढ से जूझते सियारों की हुआं-हुआं की मद्धिम आवाजें,कभी किसी निशाचर पखेरू की तीखी चीख…धीमी होकर हम तक पहुंचती बस्ती के कुत्तों के झगड़ने की आवाजें..।हम बतियाते रहे थे। ध्यान तब भटका जब ढलती रात के थके सन्नाटे में अप्राकृतिक ध्वनियां जाग उठीं।ढक्-ढक्…ढक्ढक्…ढढढक्…ढाकढाक ढढढढाक्…!
चंदर की प्रश्नाकुल आंखें मेरी ओर ताकने लगी थीं। मैंने शंका समाधान किया था,
-“कुछ नहीं, गांव की औरतें दलिद्दर खेद रही हैं। इधर का गंवई टोटका है।घर से दैन्य-दारिद्र्य भगाने का पुराना विश्वास है।”
-“ये?ये आवाजें ?”
-“हां।ये आवाजें सूप-झाड़ू या सूप-हंसिए की जुगलबंदी हैं।”
-“क्यों… मतलब कि…”
-“भइए, सूप है कृषि-संस्कृति का प्रतीक और श्रम का प्रतीक है झाड़ू-हंसिया।आज की ढलती रात में गांव-समाज से दलिद्दर को भगा कर सुबह पुराने सूप-झाड़ू घूरे पर जला दिए जाएंगे।हंसिए पर नई सान चढ़ा ली जायगी।”
-“अजब-गजब के रीत-विश्वास हैं इधर!” चकित चंदर।
-“यह जंगल है चंदू” मैं हंस पड़ा था,-“कई संस्कृतियां,आदिम विश्वास,अंधी आस्थाएं! लक्ष्मी से भेंट नहीं:दारिद्र्य से मारामारी।”
-“छोड़ यार। इधर कुछ देखने-घुमने लायक हो तो बता।”
-“कुछ प्रपात हैं। पलामू टाइगर रिजर्व है लेकिन यहां से काफी दूर… नजदीक तो कुछ नहीं। मैं शायद इतना समय न निकाल सकूं… सॉरी चंदू।तू ऐसे समय में आया है कि जब मलेरिया का तांडव… खड़िया टोले में तो स्थिति बेहद विकट है।”
-“वह क्यों ?” जो उपलब्ध था, चंदर अब उसी में रूचि लेने लगा था।
-“एक खड़िया बच्चा बीमार है। वही… मलेरिया।तेज बुखार में कांपता बच्चा प्रलाप करता है। बार-बार बूढ़ी चरकी आजी का नाम लेता है।टोले में है एक बूढ़ी जिसे सफेद दाग है सो लोग उसे चरकी…माने सफेद बुढ़िया कहते हैं। खड़िया टोले में अंधविश्वास है कि चरकी बुढ़ी डायन है।उसी ने बच्चे पर कोई टोना कर दिया है।”
-“ओह…गॉड ! इन्क्रेडिबल!”
-“बच्चे को कुछ हो-हवा गया तो यकीन मान चंदू, बूढ़ी की खैर नहीं। लोग उसका सिर मुंडवा कर गांव में नंगी घुमाएंगे।तपते हंसिए से दाग देंगे।गोबर-पखाने का घोल पिलाने लगेंगे।डायन-हत्या तो इधर आम बात है।”
-“उस औरत की जान ले लेंगे।बच्चे को भी मरने को छोड़ देंगे लेकिन तेरा इलाज उन्हें मंजूर नहीं?”
-“कतई नहीं।”
-“इन्हें बैगा-ओझा पर पूरा विश्वास है?”
-“हां।”
-“देबू, मैं इस मामले में कुछ कर सकता हूं।अलाऊ मी।” चंदर की आंखें चमकने लगी थीं।
-“तू क्या कर लेगा? कभी पास से देखा भी है उन्हें?कभी मिला है किसी खड़िया से जो उन्हें कुछ कह-समझा सकेगा?”
-“यह भी अच्छा रहा देबू कि मुझे तेरे साथ यहां आते किसी ने नहीं देखा…सिवा तेरे स्टाफ के।”
-“तू चाहता क्या है।”
-“नाटक। मैं यहां एक नाटक खेलना चाहता हूं। मैं यहां अपना बेस्ट परफॉर्मेंस देना चाहता हूं… खड़िया टोले में।” चंदर को मानों कोई चुनौती मिल गई थी।वह उत्साह से भर उठा था।
-“तू करना क्या चाहता है भई।”
-“मैं दलिद्दर खेदूंगा।”
-“नुक्कड़ नाटक? खड़िया टोले में?” उसकी नाटकीय भंगिमा देख मेरी हंसी फूट पड़ी थी -“तू पगला है?”
-“हां। हूं।”
-“दो दिन के लिए तो आया है तू। मैं तुझे अपने झमेले नहीं ओढ़ने दूंगा।”
-“क्यों नहीं देगा?तेरा झमेला मेरा भी है। मैं तुझे यूं परेशान, यूं हताश नहीं देख सकता।तेरे होते कोई बच्चा सिर्फ मलेरिया या उल्टी-दस्त से तेरी आंखों के सामने मर जाय,यह मैं नहीं सह सकूंगा। मैं तुझे यूं असहाय छोड़ कर यहां से नहीं जा सकूंगा।”
-“…तो करेगा क्या तू?आ बैल मुझे मार कहेगा? खुद तो साले मरेगा ही,मुझे भी मरवाएगा।”
-“सुन…सुन देबू।मेरे उस्ताद हैं हबीब तनवीर” चंदर ने कान की लवें छूते हुए कहा था,-“उनकी योग्यता पर दुनिया को शक नहीं,तू कर रहा है? मैं उनके प्रिय छात्रों में से एक हूं।”
-“यह रंगमंच नहीं है चंदर बाबू। आदिवासी हिंसा पर भी उतर सकते हैं। तू बाहर वाला है…दीकू है।कहीं तेरा नाटक पकड़ा गया तो बस गजब हो जायगा।
-“गोया मैं तो एन०एस०डी० में बस घास छीलता रहा हूं। यकीन कर भाई,एक नंबर का हरामी हूं मैं।तिस पर दिल्ली रिटर्न।अब उठ भी जा मेरे शेर पुत्तर। मैं अंधेरे-अंधेरे ही चर्च पहुंचना चाहता हूं।”
-“चर्च! वहां क्या करना?” चंदर मुझे लगातार परेशान किए जा रहा था।
-“वहां फादर जेम्स स्मेट हैं। उन्हें विश्वास में लेना होगा क्योंकि यहां जो नाटक खेला जाएगा उसका ग्रीन रूम चर्च ही हो सकता है।”
-“आर यू सीरियस?” मामला गंभीर हो उठा था।क्या करने पर अमादा था चंदर?
-“बिल्कुल। मैं गंभीर भी हूं और खबरदार भी हूं। सुबह तेरे कंपाउंडर को यह जानना चाहिए कि मैं मुंह अंधेरे बरवाडीह निकल गया और…तेरी वह आशा बहन जी,उसका विश्वास किया जा सकता है?”
-“शायद।शी इज कन्वर्टेड क्रिश्चियन। फादर जेम्स की कृपा है उस पर।”
-“बस।बन गया काम।”चंदर का चेहरा खिल उठा था। आंखों में चिराग जल उठे थे।-“तू मलेरिया के टेबलेट्स का चूरन बना कर छोटी-छोटी पुड़िया में भभूत की तरह बांध डाल।बाकी सब मुझ पर छोड़ दे।”
-“…और उर्सुला की क्या बात है?’
-“कल सुबह उर्सुला मिंज को औघड़ महाराज के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा।”
-“याने… यानि कि “ओह गॉड!मुझे अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा था -“यह लोगों के विश्वास के साथ धोखा है!”
-“धोखा..?” मेरी भंगिमा की नकल उतारते चंदर ने कहा था -“यह आपद् धर्म है।”
मैं फीकी मुस्कान के साथ उसकी खिली बत्तीसी देखता रहा था।कहा था,
-“फिर सोच ले चंदू।कोरी भावुकता में पड़ कर तू किसी झमेले में न…”
-“अब उठ भी जा मेरे शरवन पुत्तर। सोचने का काम मुझ पर छोड़। सब ठीक होगा।मुझ पर भरोसा रख और अपने काम पर लग जा।”

वह कंबल फेंक कर खाट से नीचे कूदा था। जूते पहने थे। अपना पिट्ठू पीठ पर लादे मानो किसी अभियान पर कूच करने को तैयार था।
एक जंगल बाहर था और एक जंगल खड़िया समाज के भीतर था। अशिक्षा और अंधविश्वास का जंगल जिसमें कूदने को अमादा था चंदर।

०००००

-” अलख निरंजन..!जाग मछिंदर गोरख आया…अलऽऽख !”
भोर की ठंड में शरीर पर मात्र लंगोट बांधे,देह पर राख लपेटे, कूल्हे तक झूलती जटाएं और नाभी तक लटकती दाढ़ी..! रक्तिम आंखें और हाथ में अंगारों भरा धुंआता खप्पर..!
गगनभेदी अट्ठहास करता एक औघड़ हुटाप के सिवान पर प्रकट हो गया था।

चंदर…?

सूचना मिली।मैं सिहर उठा था।चंदर…!तो यह था चंदर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन ?
यह नाटक नहीं एक खतरनाक खेल था।सर्कस के नट-बाजीगर की भांति। देह में आग लगा कर मौत के कुएं में कूदने जैसा करतब।
अब कुछ नहीं हो सकता था।चंदर तो ऊंचे मचान से मौत के कुएं में छलांग लगा चुका था जिसे बीच में रोकना असंभव था।
रात चढ़ने तक हुटाप के घर-घर में गांव में उतरे अगियाबैताल बाबा के चर्चे थे।
लहकते खप्पर में आग लेकर चलने वाला औघड़।
फूंक मारकर आग का रंग बदलने वाला बाबा।
हथेली पर आग नचाने वाला सिद्ध।

मंत्रविद्ध जल से घर के चारों ओर सीमा रेखा खींच कर बुरी आत्माओं को कील देने वाला अघोरी।कभी जटाओं में से,कभी दाढ़ी में से,कभी हवा से भभूत की पुड़िया निकाल कर प्रसाद बांटने वाला बाबा…बाबा अगियाबैताल!

दो दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए खड़िया टोले में पाकड़ वृक्ष के नीचे डेरा डाले रहा था बाबा अगियाबैताल।रात-बिरात चिल्लाता-बतियाता रहता था बाबा,-“जल तू जलाल तू…बच्चे पर जोर दिखाता है रे…भाग जा नहीं तो भस्म कर दूंगा। फागुन आने दे…तुम सब को अकवन के रूए में नाथ कर जलाऊंगा। राख कर दूंगा…”
किसी ने कंबल किसी ने गुदड़ी डाल दी थी। गांव रात को औघड़ की ललकार सुन रहा था और मैं परेशान। मैं फिक्रमंद और बाबा…?
-“ओं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै…भाग…जा भाग।जाग मछिंदर जाग…जाग। गांव में दिखा तो भस्म कर दूंगा।जो मेरा भस्मी प्रसाद खाएगा उसके भीतर समाया भूत,प्रेत, पिशाच,जिन्न,किच्चिन,नासान बोंगा…जल मरेगा। मरेगा रे मरेगा…”

दो दिनों तक बाजरिया नंदलाल खरवार और कुछ मरीज,अगियाबैताल बाबा के बेरियम-गंधक-फासफोरस-तेजाब की बाजीगरी के किस्से मुझ तक पहुंचते रहे थे।
-” बाबा बोला,बकरी के दूध के साथ भभूत खा लेना।मकई का घाठा (दलिया) खाने को बोलता है बाबा। पानी-भात खाया तो देह का सारा खून पानी कर देगा बाबा का प्रसाद।”
-“बैगा ढोंढ़ाई भगत औघड़ से बतरस करने लगा तो औघड़वा ने बैगा का डाढ़ी छू दिया…ले मजा,बैगा की डाढ़ी में आग…!”
प्रायः मेरे क्वार्टर में ही उपस्थित रहने वाली उर्सुला मिंज के कान बतरस पर ही लगे रहते थे। भेद भरी आंखें मेरी ओर। होंठों के कोरों से रहस्यमयी मुस्कान झांकती रहती।
औघड़ का भभूत सचमुच चमत्कारी था। भभूत का प्रसाद ग्रहण करने वालों पर अपना प्रभाव दिखा रहा था।ताप तो चढ़ता ही नहीं था।बाबा अगियाबैताल तीन दिनों में ही खड़िया टोले में प्रतिष्ठित हो गया था।किसी भोग,बलि या चढ़ावे से दूर रहने वाला…वीतरागी औघड़।बाबा अगियाबैताल।

अगली सुबह बाबा ने घोषणा की कि रमता जोगी, बहता पानी। गांव की हवा-बयार में जितनी भी बुरी छायाएं थीं,भाग चुकी हैं। गांव के रूख-बिरीख-छान्हीं-छप्पर में बसी दुष्ट आत्माओं का नाश हो चुका है।अब बाबा किसी दूसरे गांव जाएगा।

गांव छोड़ने से पहले बाबा किसी अनब्याही छौंड़ी को अपनी चेली बना जाएगा।उसके कान में भभूत बनाने का मंतर फूंक जाएगा।अब वही मंतर पढ़ कर भभूत देगी।
प्रेतबाधा ग्रस्त लोगों की प्रेतमुक्ति होते ही, गांव के स्वस्थ होते ही बाबा की चेली भभूति-मंतर भूल जाएगी। भभूत की बेंच-खरीद नहीं होती।
बाबा का मंतर गोपनीय रखना था। क्लिष्ट और अबूझ मंत्र कौन याद रखता।बाबा को शिक्षित और सुपात्र शिष्या चाहिए थी जो मंत्र को जबानी याद रख सके।
सर्वसम्मति से बाबा की शिष्या चुनी गई थी; अपेक्षाकृत पढ़ी-लिखी, गांव की ‘आशा बहन जी’ उर्सुला मिंज।याने मुझे भभूत वाली पुड़िया की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित रखनी थी… मलेरिया उन्मूलन तक।

इन दो दिनों तक मैं न तो खड़िया टोले के आसपास फटका था,न ही चर्च की ओर गया था। चंदर को औघड़ वेश में देखने की तीव्र ललक को दबाए मैंने यह समय पल-पल गिन कर काटे थे। सशंकित। उत्कंठित।

एक जंगल बाहर था।एक जंगल खड़िया लोगों के जीवन में था अविश्वास और रूढ़िवादिता का जंगल जिसे चंदर भेद चुका था।

०००००

पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार हम शुक्रवार को ही मिले थे…चर्च में।

हालांकि चंदर की ट्रेन शाम के सात बजे थी परन्तु चंदर बिना किसी की नजर में आए भोर होने से पहले,मुंह अंधेरे ही बरवाडीह निकल लेना चाहता था।
चंदर को विदा करते फादर जेम्स भावुक हो उठे थे।
-“तुम आए चंदर।बस दो-तीन दिनों के लिए और हमें एक मार्ग सुझा कर जा रहे हो।बता कर जा रहे हो कि कलाओं का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन नहीं होता।कला की जनधर्मिता भी होती है…होनी चाहिए। दिखाया तुमने हमें कि कला के सरोकार समाज से कैसे जोड़े जाते हैं।वेलडन माई सन।”
चंदर ने मेरी ओर विजेता के भाव से देखा था।स्कूली बच्चे की भांति फादर जेम्स से मेरी शिकायत जैसा किया था,
-“…लेकिन फादर देबू तो मानता है कि मैंने जो किया वह भोले गांव के लोगों के अंधविश्वास को बढ़ाने वाली बात है।यह उनके विश्वास के साथ धोखा है।”
-“धोखा नहीं… नाटक”-फादर गंभीर थे-” एक सुंदर और सफल नाटक जिसका उपसंहार भी कितना सार्थक है।काश हम मिशनरियों ने भी सीखा होता कि धर्मांतरण हर समस्या का समाधान नहीं है। किसी समाज की संस्कृति,आदिम आस्थाओं और धार्मिक विश्वासों को बिना छेड़े भी उनके मानस को जीता जा सकता है। उन्हीं को औजारों से उनकी मानसिकता और सोच को बदल कर अपने साथ जोड़ा जा सकता है।”
-“यानी मैंने कुछ भी गलत नहीं किया न फादर?” मेरी ओर देखते चंदर ने पूछा था…या कि मुझे बता रहा था?
-“नो सन।इन फेवर ऑफ ह्यूमनिटी,इट्स अ सिन विद अ सेक्रेड हार्ट,-फादर मुस्कुराए थे-“रादर इट वाज अ सेक्रेड सिन!”
चंदर भी भावुक हो गया था जब मैंने छोटी-सी पुड़िया उसकी जेब में डालते हुए कहा था,
-“रख ले। उर्सुला ने दिया है।”
-” है क्या यह?”
-“भाई दूज के चने हैं। उसने कहा है कि नेग तो चंदर भईया के हाथ से ही लूंगी जब वे फिर हुटाप आएंगे।”
-“नेग ? नेग क्या?”
-“भाई दूज को इधर गोधन कूटना कहते हैं। लड़कियां अपने भाईयों के स्वस्थ लंबे जीवन की कामना में यह व्रत करती हैं।गोबर के लोंदे को भाई का शत्रु मान कर उसे डंडों से कूटती हैं।तुझे गोधन के चने दिए न?इसे प्रसाद समझ ले।बदले में भाई बहन की रक्षा का वचन देते हैं। मुंहमांगी मुराद पूरी करते हैं। कपड़े,गहने, रूपए…देने को चवन्नी भी बहुत है वर्ना दुनिया भी कम।बहन जो चाहे मांग सकती है।”
नेह के रिश्ते यूं भी बन जाते हैं जंगल में…?
चंदर की आंखें भर आई थीं। भींगे -भरे गले से कांपते-थरथराते दो शब्द…,
-“थैंक्स उर्सुला।”

चर्च से विदा लेकर हम मोटरसाइकिल पर सवार बरवाडीह की ओर निकल पड़े थे।ढलती रात के घने कोहरे में बला की कनकनी घुल रही थी।

रास्ते में मैं चंदर को उलाहने देने लगा था कि उसे मेरी फिक्र कम थी,अपने परफॉर्मेंस की ज्यादा… कि अपनी औघड़-लीला के मजे लेते चंदर ने मुझे तो समय ही नहीं दिया था। हालांकि ये उलाहने महज औपचारिकता थे।सच तो यही था कि चंदर ने हुटाप का अपना हरेक क्षण मेरे लिए ही खर्च किया था…कि चंदर ने बीते दो दिनों का अपना सारा समय सिर्फ मुझे ही दिया था।

मेरे मजाकिया उलाहने के उत्तर में चंदर पुनः हुटाप आने के (पता नहीं कितने दिनों-महीनों-वर्षों बाद पूरा होने/न हो पाने वाले) वायदे करता रहा था।

ठंढ से सिहरती सुरमीली भोर विदा हो रही थी।पूरब का क्षितिज नारंगी-गुलाबी हो रहा था।हम अपने लक्ष्य के बेहद करीब थे।

कोहरे को चीरता नया सूरज बस उगने-उगने को था।

++++++++++++++

 

 

परिचय
राकेश कुमार सिंह

जन्म – 20 फरवरी 1960, जिला पलामू ( झारखंड) के गुरहा गांव में।
शिक्षा – स्नातकोत्तर रसायन विज्ञान (पी०एच०डी०) एवं विधि स्नातक।

राकेश कुमार सिंह

कृतियां – पठार पर कोहरा, जहां खिले है रक्तपलाश, जो इतिहास में नहीं है, साधो यह मुर्दों का गांव, हुल पहाड़िया,महाअरण्य में गिद्ध,ऑपरेशन महिषासुर,मिशन होलोकॉस्ट,महासमर की सांझ,जाना कहॉं (उपन्यास)।
हांका तथा अन्य कहानियां,ओह पलामू…!, जोड़ा हारिल की रूपकथा, महुआ मांदल और अंधेरा, कहानी खत्म नहीं होती, तमस कोहरा और…!, रूपनगर की रूपकथा, जोहार झारखंड, भोर होने से पहले,DRUMMER’S DILEMMA:THE DHOLKI (कथा-संग्रह)।
केशरीगढ़ की काली रात, वैरागी वन के प्रेत,नीलगढ़ी का खजाना (किशोर उपन्यास)।
लो आज गुल्लक तोड़ता हूं, आज गुल्लक तोड़ता हूं (कथेतर पुस्तक)।
कहानियां ज्ञान की विज्ञान की,आदिपर्व, उलगुलान, अग्निपुरूष,अरण्य कथाएं, अवशेष कथा (बालोपयोगी पुस्तकें)।

सम्मान – झारखंड का प्रतिष्ठित “राधाकृष्ण सम्मान” (2004),”पाखी” पत्रिका का “शब्द साधक जनप्रिय सम्मान”(2015), आनंद सागर स्मृति “कथाक्रम सम्मान” (2016),
डॉ सिद्धनाथ कुमार स्मृति “स्पेनिन साहित्य गौरव सम्मान” (2022), फणीश्वरनाथ रेणु स्मृति उपन्यास सम्मान (2022)
कथाक्रम कहानी प्रतियोगिता (2001तथा 2002) में प्रथम पुरस्कार,कथाबिंब कहानी प्रतियोगिता (2002) में प्रथम पुरस्कार, कमलेश्वर स्मृति कथा सम्मान (2008) में प्रथम पुरस्कार।

अन्यान्य – कहानी “ठहरिए…!आगे जंगल है”
पर दूरदर्शन द्वारा इसी नाम से टेलीफिल्म निर्मित-प्रदर्शित।कुछ कहानियां पंजाबी, ओड़िया तथा अंग्रेजी में अनूदित।

संपर्क – डॉ राकेश कुमार सिंह, 101-गंगासागर अपार्टमेंट, स्प्रिंगडेल्स स्कूल के निकट, किलबर्न कॉलोनी, हीनू-834002,
रांची ( झारखंड)।
दूरभाष – 09431852844/09798638844

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