
इन कविताओं की प्रमुख विशेषता यह है कि कवि बड़े प्रश्नों को घोषणात्मक वैचारिकता के बजाय रोज़मर्रा के दृश्य, वस्तु और अनुभवों से जोड़कर सामने लाता है; उसकी भाषा सहज, पारदर्शी और संवादधर्मी है, जिसमें रूपक और प्रश्न कविता की वैचारिक ऊर्जा को बढ़ाते हैं। कहीं-कहीं कथ्य की प्रत्यक्षता कविता को वक्तव्य के निकट ले जाती है, लेकिन यही प्रत्यक्षता इन रचनाओं की सामाजिक बेचैनी और नैतिक आग्रह को भी प्रभावी बनाती है। समग्रतः ये कविताएँ इतिहास, हिंसा, विस्थापन, प्रेम, स्थापत्य और भविष्य की कल्पना के अलग-अलग प्रसंगों में मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता और बराबरी की तलाश करती हैं और इस तरह अनिल गंगल की दीर्घ लेखकीय यात्रा की सामाजिक सजगता तथा मानवीय प्रतिबद्धता को समकालीन संदर्भ में सामने लाती हैं।
तो पढ़ते हैं अनहद कोलकाता पर अनिल गंगल की कविताएँ। आपकी राय का इंतजार तो हमेशा है।
फ़ारसी की आँख
फ़ारसी की आँख में शहर कुछ और दिखाई देता है—
जैसे किसी पुराने शीशे में
आज का चेहरा अपनी ही शक्ल से मुकर रहा हो।
वह आँख जिसने बादशाहों के फ़रमान देखे,
महलों की छतों पर चाँद का उतरना देखा,
और देखा है कि तख़्त जितना ऊँचा होता है
आदमी की परछाईं उतनी ही छोटी।
उस आँख में हाफ़िज़ की शराब भी है
और ख़य्याम का सवाल भी—
प्याला उठाने से पहले वह पूछती है
कि प्यास किसकी है और जश्न किसका।
फ़ारसी की आँख
गुलाब को केवल गुलाब नहीं देखती,
उसकी ख़ुशबू में काँटों का हिसाब भी रखती है।
वह इश्क़ को सिर्फ़ महबूब का चेहरा नहीं मानती,
उसके पीछे खड़ी तन्हाई को भी पढ़ती है।
उसने देखा है
सल्तनतें आती हैं अपने साथ बहुत-सी भाषाएँ लेकर,
और जाती हैं
पीछे छोड़ जाती हैं कुछ टूटे हुए नाम,
कुछ मुहरें, कुछ अधूरे क़िस्से।
इसलिए फ़ारसी की आँख जब आज को देखती है
तो उसके भीतर कल की धूल भी चमकती है।
वह जानती है—
शब्द तलवार से ज़्यादा देर जीते हैं,
मगर शब्द भी अगर सत्ता की ज़बान बन जाएँ
तो ख़ामोशी को क़ब्र में उतार सकते हैं।
फ़ारसी की आँख इसलिए सिर्फ़ देखती नहीं,
तह में उतरती है।
वह पूछती है—
किसने इतिहास लिखा,
किसका नाम मिटाया गया,
किसकी रोटी पर किसका शेर लिखा था,
और किसके आँसू को दरबार ने शायरी कहकर टाल दिया।
आज भी जब कोई पुराना फ़ारसी शब्द
हमारी ज़बान पर आता है,
उसकी आँख हमारे भीतर खुलती है—
और अचानक हम पाते हैं
कि अतीत कोई बंद कमरा नहीं,
वह हमारे बोलने के ढंग में अब भी साँस ले रहा है।
फ़ारसी की आँख दूर से आई हुई आँख नहीं—
वह हमारी अपनी आँख है,
जिसमें सदियों से एक सवाल ठहरा है:
आदमी की ज़बान बदल सकती है,
मगर क्या उसकी तलब भी बदलती है?
जाने कितनी निर्भया
जाने कितनी निर्भया हर रोज़ घर से निकलती हैं—
अपने हिस्से की धूप लेकर,
अपने हिस्से का आसमान लेकर,
और लौटते हुए अपने साथ एक अनकहा डर लाती हैं।
शहर उन्हें रास्ते देता है,
मगर रास्तों के साथ कितनी निगाहें भी देता है—
कुछ पीछा करती हुई,
कुछ रास्ता रोकती हुई,
कुछ ऐसी जिनमें आदमी नहीं,
एक शिकारी छिपा होता है।
कितनी निर्भया अपने ही शहर में
अपने कदमों की आहट से डरती हैं।
बस-स्टॉप पर खड़ी लड़की बार-बार घड़ी देखती है,
पीछे मुड़कर देखती है,
फिर सामने देखती है—
जैसे उसकी आँखें सिर्फ रास्ता नहीं,
खतरे का नक्शा पढ़ रही हों।
एक लड़की देर से घर पहुँची
तो घर ने उससे पूछा—
“इतनी देर क्यों हुई?”
किसी ने यह नहीं पूछा कि सड़क ने
उससे क्या-क्या कहा था।
किसी ने यह नहीं पूछा कि अँधेरे ने उसका कितना पीछा किया था।
जाने कितनी निर्भया हर दिन बच जाती हैं—
मगर क्या बच जाना जी लेना होता है?
वे बचती हैं और समाज अपने माथे पर
एक और दिन की सभ्यता लिख लेता है।
फिर किसी चौराहे पर मोमबत्तियाँ जलती हैं,
कुछ भाषण होते हैं,
कुछ आँकड़े पढ़े जाते हैं,
कुछ चेहरे कैमरे के सामने गंभीर हो जाते हैं।
और अगले दिन वही सड़क
फिर किसी लड़की से उसका साहस माँगती है।
हमने बेटियों को सिखाया—
सावधान रहना,
अँधेरे में मत निकलना,
अजनबी से बचना,
फोन साथ रखना,
किसी को बता देना।
मगर बेटों को कब सिखाएँगे
कि औरत कोई खुला रास्ता नहीं
जिस पर वे अपनी मनमानी दौड़ा सकें?
कब सिखाएँगे
कि सहमति खामोशी का दूसरा नाम नहीं,
कि देह किसी की जागीर नहीं,
कि ताक़त का अर्थ किसी को डराना नहीं?
निर्भया सिर्फ वह लड़की नहीं
जिसका नाम इतिहास में एक दर्दनाक पुकार बन गया।
निर्भया वह भी है
जो आज अपने भीतर एक चीख़ दबाकर
कक्षा में बैठी है।
वह भी
जो नौकरी से लौटते हुए चाबी को हथियार की तरह
हथेली में कस लेती है।
वह भी जो शादी के भीतर
हर दिन थोड़ा-थोड़ा अपने आप से दूर होती है।
वह भी जो शिकायत करना चाहती है
मगर उसे
“घर की इज़्ज़त” का अर्थ समझाया जाता है।
जाने कितनी निर्भया हैं
जिनके नाम किसी अख़बार में नहीं आए।
जिनकी आँखों में कोई कैमरा नहीं पहुँचा।
जिनकी रात किसी संसद में बहस नहीं बनी।
वे अपने-अपने कमरों में चुप बैठीं
और सुबह फिर सामान्य दिखाई दीं।
लेकिन सामान्य होना हमेशा सुरक्षित होना नहीं होता।
कभी-कभी सबसे शांत चेहरा
सबसे लंबी लड़ाई लड़ रहा होता है।
इसलिए
जब अगली बार किसी लड़की से कहो—
“डरना मत,”
तो पहले उस दुनिया को देखना
जिसने उसके भीतर डर पैदा किया है।
क्योंकि निर्भया पैदा नहीं होती—
उसे निर्भय होना पड़ता है।
और यह उसकी नहीं,
हमारी विफलता है
कि उसे अब तक अपने ही शहर में
अपने ही रास्ते पर निर्भय होकर चलने के लिए
लड़ना पड़ता है।
जाने कितनी निर्भया अब भी चल रही हैं—
और हमउनके साथ चलने के बजाय
बस यह गिन रहे हैं कि कितनी हुईं।
पुरबिये
शहर की भाषा में अचानक एक दिन
‘बाहर से आए आदमी’ एक गाली में बदल गया।
जिसने कल तक इमारत की ऊँचाई नापी थी,
आज उससे उसका पता पूछा जा रहा था—
इतनी सख़्ती से
जैसे सड़क पर चलते हुए उसने कोई सीमा लाँघ ली हो।
पुरबिये चुप थे।
उनके पास अपनी तरफ़ से कहने को बहुत कुछ था,
पर रोज़ी की तलाश में निकली जीभ
अक्सर डर से पहले सूख जाती है।
किसी की दुकान का शटर गिरा,
किसी का ठेला उलटा,
किसी के गाल पर ‘अपना’ होने का तमाचा पड़ा।
और शहर देखता रहा—
कुछ खिड़कियों से,
कुछ मोबाइलों से,
कुछ उस चुप्पी से जिसे कानून की आवाज़ होना था।
कहा गया—
यह शहर हमारा है।
लेकिन ‘हमारा’ किसका था?
उसका जिसने यहाँ जन्म लिया था,
या उसका भी जिसने अपनी जवानी
इस शहर की सड़कों, कारखानों,
निर्माणाधीन इमारतों और होटलों में छोड़ दी थी?
भाषा को जब रोज़गार का पहरेदार बनाया गया,
तब बेरोज़गारी पीछे खड़ी मुस्कराती रही।
राजनीति ने मज़दूर की जेब नहीं देखी,
उसकी बोली देखी;
उसकी मेहनत नहीं देखी,
उसका जिला देखा।
एक पुरबिया अपने बच्चे की फीस के लिए
शहर में था,
दूसरा अपनी बूढ़ी माँ की दवा के लिए,
तीसरा इसलिए कि गाँव में खेत दो पेटों से बड़े नहीं थे।
इन सबके बीच एक सवाल पड़ा रहा—
जिस शहर की समृद्धि में तुम्हारा श्रम लगा है,
क्या उसमें रहने का अधिकार तुम्हारी जन्मभूमि तय करेगी?
और यदि कल हर शहर अपने दरवाज़े पर
अपनी-अपनी भाषा का पहरा बैठा दे,
तो बताओ—
जो आदमी शहर बनाता है,
क्या उसे उस शहर में रहने के लिए भी
किसी का प्रमाणपत्र चाहिए?
पारमिता, मैं तुम्हारे साहचर्य का आकांक्षी हूँ
पारमिता,
मैं तुम्हारे साहचर्य का आकांक्षी हूँ—
लेकिन उस तरह नहीं
जैसे कोई अकेला आदमी भीड़ में अपना नाम पुकारे
और किसी चेहरे के मुड़ने की प्रतीक्षा करे।
मैं चाहता हूँ तुम मेरे पास रहो
तो मेरे भीतर का वह आदमी भी कुछ देर मेरे साथ रहे
जो बरसों से
मुझसे ही बचकर चलता आया है।
तुम्हारे साथ होना मेरे लिए दो देहों का
एक ही छत के नीचे होना नहीं,
बल्कि उन कमरों का खुलना है
जिनकी चाबियाँ मैंने अपने ही डर को सौंप रखी हैं।
पारमिता,
तुम्हारे साहचर्य में
मैं अपनी चुप्पियों को भाषा देना चाहता हूँ,
पर ऐसी भाषा नहीं
जो प्रेम का प्रमाण बने—
बल्कि ऐसी जिसमें हम दोनों
एक-दूसरे से असहमत होकर भी
एक-दूसरे के पास रह सकें।
मैं यह भी नहीं चाहता कि तुम मेरी रिक्तता भर दो;
रिक्तता को भर देना
कभी-कभी उसे और स्थायी बना देता है।
तुम बस इतनी जगह देना कि जब मैं टूटूँ
तो मेरे टूटने की आवाज़ तुम्हारे लिए बोझ न हो,
और जब तुम थको
तो तुम्हारी थकान को मैं अपनी उपलब्धि न समझूँ।
पारमिता,
साहचर्य शायद यही है—
एक-दूसरे को पाना नहीं,
एक-दूसरे के भीतर बचे हुए अजनबी को
बिना बेदखल किए उसके साथ चलना।
इसलिए मैं तुम्हारा आकांक्षी हूँ—
तुम्हारे होने का नहीं,
तुम्हारे साथ अपने होने की संभावना का।
और यदि कभी हमारे बीच कुछ भी न बचे,
तो कम-से-कम इतना बचा रहे
कि हम एक-दूसरे को
अपनी अधूरी ज़िंदगी का कारण न मानें।
क्योंकि प्रेम की सबसे कठिन परीक्षा
शायद यही है—
किसी के साथ रहकर भी उसे अपना न बना लेना।
दूसरा जीवन
इस बदरंग जीवन के बाद एक और जीवन होगा—
ऐसा नहीं कि कोई अदृश्य द्वार खुलेगा
और हम अपनी सारी हार वहीं बाहर छोड़ आएँगे।
शायद वही गली होगी,
वही धूल, वही जल्दी में चलते लोग,
वही दुकान पर टँगा हुआ ‘सब ठीक है’ का चमकीला बोर्ड;
लेकिन उस जीवन में
हम चीज़ों को उनके नाम से पुकार सकेंगे।
रोटी को रोटी,
डर को डर,
अन्याय को अन्याय
और चुप्पी को सहमति कहने से इंकार कर सकेंगे।
उस जीवन में हम अपने चेहरों की भीड़ से
एक चेहरा चुनेंगे
और उसे आईने के हवाले करने से पहले
उसकी आँखों में देखेंगे।
बच्चा जब पूछेगा—
“आदमी आदमी से छोटा क्यों है?”
तो हम उसके हाथ में कोई पुरानी कथा नहीं थमाएँगे,
बल्कि उसके साथ उस जगह तक जाएँगे
जहाँ यह छोटापन बनाया जाता है।
उस जीवन में
प्रेम कोई निजी सुरक्षित कमरा नहीं होगा—
वह सड़क पर भी दिखाई देगा,
उस औरत की आवाज़ में
जिसे वर्षों से बीच वाक्य में रोक दिया गया,
उस मज़दूर की हथेली में
जिससे शहर ने अपनी ऊँचाई खरीदी।
और यदि फिर भी सत्ता अपने पुराने ढंग से बोलेगी,
हम उसके शब्दों में छिपा हुआ आदेश पहचान लेंगे।
यदि इतिहास फिर विजेताओं की तरफ़ झुकेगा,
हम हारे हुए आदमी की जेब में
बचा हुआ एक छोटा-सा सच पढ़ेंगे।
कौन जाने,
उस जीवन में भी बहुत कुछ बदरंग हो।
मगर एक फर्क होगा—
हम रंगों की कमी को किस्मत नहीं मानेंगे।
हम अपनी उँगलियों से
दीवार पर एक छोटा-सा निशान बनाएँगे
और कहेंगे—
यहाँ से दूसरा जीवन शुरू नहीं होता;
यहीं से पहले जीवन को
बदलने की ज़िद शुरू होती है।
स्थापत्य
मैंने एक शहर को बनते हुए देखा है—
पहले नक़्शे पर,
फिर ईंटों में,
फिर लोगों की आँखों में।
मिस्त्री ने दीवार उठाई
तो किसी ने उसमें अपना घर देखा,
किसी ने दफ़्तर,
किसी ने जेल,
और किसी ने वह जगह
जहाँ उसे कभी प्रवेश नहीं मिलेगा।
स्थापत्य शायद पत्थर को खड़ा करने की कला नहीं,
बल्कि यह तय करने की कला है
कि किसके लिए दरवाज़ा होगा
और किसके लिए सिर्फ़ दीवार।
शहर के बीचोंबीच एक बहुत ऊँची इमारत है—
उसकी खिड़कियों से नीचे लोग छोटे दिखाई देते हैं।
ऊपर बैठे आदमी को नीचे की भीड़ दिखाई देती है,
लेकिन भीड़ में खड़े आदमी को ऊपर की मंज़िलें
सिर्फ़ आसमान का हिस्सा लगती हैं।
मैं सोचता हूँ—
क्या हर इमारत अपने साथ एक अदृश्य सीढ़ी भी बनाती है
जिस पर चढ़ने की इजाज़त सबको नहीं होती?
पुराने मकान की छत पर दादी की आवाज़ बची है,
नए मकान की लिफ़्ट में पड़ोसी एक-दूसरे से बचते हैं।
एक ही शहर में इतने घर हैं
कि आदमी के पास रहने को जगह है,
लेकिन एक-दूसरे के भीतर
ठहरने की जगह कम होती जा रही है।
कभी-कभी लगता है
हम अपने घर नहीं बनाते,
घर हमें बनाते हैं—
हमारी चाल, हमारी आदतें,
हमारे डर,हमारी ऊँचाइयाँ
और हमारी सीमाएँ।
इसीलिए
सबसे ख़तरनाक इमारत वह नहीं
जो भूकम्प में गिर जाए;
सबसे ख़तरनाक वह है
जो आदमी के भीतर इतनी पक्की बन जाए
कि वह उम्र भर उसे अपना स्वभाव समझता रहे।
शायद स्थापत्य का अगला पाठ
ईंट और सीमेंट से बाहर लिखा जाएगा—
जहाँ शहर की असली ख़ूबसूरती उसकी ऊँचाई में नहीं,
इस बात में होगी कि उसकी छाया में
कितने लोग बराबर खड़े हो सकते हैं।
अनिल गंगल
जन्म : 1954, खुर्जा [उत्तर प्रदेश]
लेखन-प्रकाशन : 1972 से लेखन व प्रकाशन आरम्भ।
विभिन्न प्रतिष्ठित व अव्यावसायिक पत्रिकाओं में कविताओं का निरंतर प्रकाशन।
अभी तक छह कविता-संग्रह प्रकाशित। कविता-संग्रह ‘स्वाद’ पर राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘सुधींद्र पुरस्कार’ तथा राजस्थान जनवादी लेखक संघ का ‘अंतरीप सम्मान’ प्राप्त।
अनेक विदेशी कविताओं, कहानियों व निबंधों के अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रकाशित।
कुछ पस्तकों के अनुवाद भी प्रकाशित।
संपर्क :
बी-104 ,गाला सेलेस्टिया
वैष्णवदेवी सर्कल के पास
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