
युवा कवि पल्लवी जयराम की ये कविताएँ समकालीन जीवन के अंतर्विरोधों, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक-सांस्कृतिक सत्ता संरचनाओं की गहरी पड़ताल करती हैं। प्रेम, परीक्षा, परिवर्तन, देवत्व, मातृत्व और आज़ादी जैसे विषयों के माध्यम से कवि मनुष्य की भीतरी बेचैनी, सामाजिक विडंबनाओं और स्वतंत्रता के नाम पर जारी दमनकारी प्रवृत्तियों को उजागर करती हैं। उनकी कविता में स्त्री-अनुभव की मार्मिकता, व्यवस्था के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि और मनुष्यता के पक्ष में दृढ़ नैतिक आग्रह एक साथ उपस्थित हैं। सहज भाषा, तीखे व्यंग्य और विचारोत्तेजक बिंबों से निर्मित ये कविताएँ पाठक को प्रचलित मान्यताओं, नैतिक आग्रहों और जीवन के स्थापित मानकों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।
अनहद कोलकाता पर पढ़ते हैं युवा कवि पल्लवी जयराम की कविताएँ। आपकी राय का इंतजार तो रहेगा ही।
पल्लवी जयराम की सात कविताएँ
प्रेमी की आहट
पानी गिर रहा है
किसान खुश हैं,
बच्चे भी खूब थपकियां लगा रहे हैं
गृहणियों ने गेहूं साफ कर लिए थे
इस बात से वो आश्वस्त हैं |
जिनको नशे से मोहब्बत है
वे उसकी तलाश में हैं
जिनको चाहिए संगी, गाने के लिए
वो निकल चुके हैं, जामुन के पेड़ की तरफ
आम के पत्ते ने नई सुगंध पाई है
मिट्ठू भी फुदक -फुदक फल खा रहा है
मैं उदास हूँ ,
नहीं जा सकी नदियों की ओर
नहीं रुक सकी तालाब के पास
नहीं सूंघ सकी भीगी मिट्टी
और नहीं सुन सकी केले के पत्ते में गिरते पानी का स्वर।
यह जानते हुए कि
मेरे प्रेमी की आहट, बारिश के मौसम में
यहीं होती है।
परीक्षा
जिनको भी देनी पड़ी परीक्षाएँ
उन सब को फल प्राप्ति के बाद
गहरा मोह – भंग हुआ।
दर’असल परीक्षाएँ
श्रेष्ठ सिद्ध होने की होड़ का
परिणाम हैं।
फिर उस श्रेष्ठता का
कोई चिरंतन महत्व नहीं
जो किसी मानक से निकली हो।
मानक समय के साथ
बदल भी सकते हैं;
फिर, मानकों से सिद्ध होने वाली
श्रेष्ठता का क्या हाल होगा ?
गौर करो, सीता सहृदयता से श्रेष्ठ हैं
हृदय का इतना विस्तार हुआ
सब स्वीकार कर गईं
लेकिन अग्नि – परीक्षा के बाद प्रेम नहीं बचता
सब व्याकुलताएं संतुलन पा जाती हैं।
परीक्षा सौंदर्य की शत्रु ही बनी रही,
गुम गए वो कवि
जिनको केवल
आलोचक दृष्टि से पढ़ा गया।
रो पड़े वो गायक जिनको
गायकी में नंबर दिया गया।
जो भी सुख है, सुंदर और
सानन्द है, मानकों को तोड़ेगा
परीक्षा के परे है।
भाषा भी सत्य नहीं
क्योंकि
ये द्वंद्व से निर्मित है।
अतः इस कविता को पढ़कर
तुम भूल जाना
और प्रयास करना मानक भूलने का।
दूसरा उपाय
जैसे अँधेरी रात में
जुगनू के पीछे भागता है बच्चा
और भूल जाता है – जोगा बाबा।
पथिक रेगिस्तान में
मारीचिका के लिए
भुलावा समझ पुरानी असफलता को।
कुत्ते बैठते हैं सिमट कर
अलाव के पास,
इस भय का शमन करते हुए कि
पड़ सकती है लाठी, कड़कती ठंड में।
मैं भी खिंचती हूँ उस ओर
जहाँ भी थोड़ी भी
परिवर्तन की आहट होती है।
विगत से आहत
और वर्तमान से असंतुष्ट मन
परिवर्तन को वरदान समझता है।
जबकि आश्वस्त हूँ,
सब बदलाव सार्थक नहीं हुए
फिर भी निराशा का दूसरा उपाय नहीं।
देवत्व की प्रतिक्रिया
प्रतिनिधि मत बनना
कभी उस मूल्य का जो
आदमी की लाश में भी
सफलता पाने को आतुर हो।
मूल्यों का आदमी से
ऊपर हो जाना
देवत्व की मनुष्यता पर
विजय का आह्वाहन है।
यदि तुम जानते हो
देवताओं को चापलूसों की आदत है
तुम कभी नहीं होने दोगे ऐसा।
यदि समझोगे देवताओं का इतिहास
जो करते रहे तपस्वियों का तप – भंग
और
युद्ध के लिए आमादा
तब तुम ज़रूर समझोगे
देवत्व की हिंसा।
फिर कविता पढ़ने वाले कभी
हिंसा नहीं कर सकते
इसीलिए मुझे तुमसे ज्यादा उम्मीदें हैं
अतः साथी,
मनुष्य बनना
देवत्व की प्रतिक्रिया में।
मजबूती का नाम माँ
मेरी माँ का नाम मजबूती था ।
इतना नहीं
कि पिता जी की मर्यादा का
प्रतिकार कर सकें या
बाबा जी के नियम को तोड़ने की शक्ति हो
या किसी आग्रह से फर्क न पड़े ।
वो मजबूत थीं क्योंकि
उन्हें सब परिभाषाओं में कसा जा सकता था।
उन्हें बहलाया जा सकता था
यह कहकर कि
“तुम्हारे आने से भाग्य खुल गए।”
मैं आज भी समझ नहीं पाती
इस वाक्य के जादू को
जिसकी व्यंजना में
मम्मी के भाग्य -लोप का संकेत था
वही हथौड़े नुमा वाक्य
उसकी मुस्कुराहट की वजह बनता रहा ।
इसीलिए मुझे वो मजबूती की
मिसाल लगीं।
हम आज़ाद हैं
हम आज़ाद हैं।
शिक्षक होते हुए भी,
शैक्षणिक कार्य से दूरी के लिए,
पत्रकार होकर भी
आँख, कान बंद करने के लिए,
प्रेमी होने के दावा करते हुए
प्रेम -पात्र को नोचने के लिए।
हम आज़ाद हैं।
हम आज़ाद हैं कि किताब
केवल तीन घंटे की परीक्षा के लिए पढ़ें।
हम आज़ाद हैं कि फुटपाथ पर कीचड़ मलें
जबकि जानते हैं
वहां एक लड़की सोती है
जिसका उसी के बिरादरी के लोग
(यानी भिखारी भी)
रेप किया करते हैं।
हमारे पड़ोस में
एक लड़की ने आत्महत्या की
एक युवक करना चाहा था लेकिन कर न सका
केवल पैर टूटा, सर फटा,
अस्पताल में उसकी मृत्यु पक्की है।
हम आज़ाद हैं,
इस घुटन को कुंठा कहने के लिए।
हम आज़ाद हैं,
ऐसे ही जिंदा रहने के लिए।
आलोचना में छिपी हुई आग्रह की हिंसा
उपदेश में छिपा – भय
जो कुछ बचाने के लिए व्यक्ति बलि चाहता है ।
हम आज़ाद हैं रोज़ – रोज़
ऐसी ही बलि चढ़ने के लिए।
आओ कायरता को
जिम्मेदारी का नाम दें
तुम सुबह गिरवी रखो
ताकि वापस वो शाम दें
तुम ज़मीर बेंचो और
वो हँसकर ईनाम दें ।
हम आज़ाद हैं फूहड़ता में
आकंठ धँसने के लिए
और वो कुछ शब्द छोड़
गालियाँ बकने के लिए
हम आज़ाद हैं, सब गलियाँ
चुपचाप सुनने के लिए
और अपनी पीड़ा को दर्ज़ करने के लिए।
हम आज़ाद हैं
आज़ाद हैं
आज़ाद हैं…
सत्ता के निर्देश
जिस तरह एक पृथ्वी में हैं
सैकड़ों देश
और उन देशों में हैं; सत्ताधीश,
राष्ट्र – नायक।
ठीक उसी तरह
एक जीवन के हैं, सैकड़ों आयाम
उन आयामों से मिलते हैं – निर्देश
जहाँ स्थापित हैं,
अदृश्य सत्ताएं।
फिर सत्ता कैसी भी हो
हमले…
अवश्य करती है।
कभी – कभी सत्ता का एक रूप
प्रेम का मुखौटा पहनकर आता है।
वो शुचिता के उपदेश नहीं देता
बल्कि कहता है –
तुम हमेशा पास रहो,
कभी न हो आँखों से ओझल।
फिर,
इंसान की बनावट भी अजीब है
जिसे अकेलापन काटता हो
वो किसी की अनंत – उपस्थिति से
बेचैन हो जाता है।
वो पूर्वाग्रह नहीं रखता
लेकिन सूँघ लेना चाहता है
समस्त रहस्य, घटनाएं और बीते हुए कल
जिनसे किसी के व्यक्तित्व का
पोर – पोर खुलता है।
जिससे,
पहुंच सके पात्र के अवचेतन में भी ।
सत्ता जितनी हमलावर होती है
उतनी ही हवसी ।
सब कुछ जान लेने चाह
मानसिक जगत में
सब कुछ छीन – लेने की है।
जो कुछ नहीं जानता
वो कुछ नहीं कर सकता
जो सब जानता है,
वो सबसे खतरनाक होता है।
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परिचय –
डॉ. पल्लवी जयराम
पिता : श्री जयराम, माता – श्रीमती राजकुमारी देवी
शिक्षा : वीर बहादुर सिंह, पूर्वांचल विश्वविद्यालय से स्नातक, स्नातकोत्तर (हिंदी साहित्य) और स्त्री -विमर्श में पीएच.डी (इक्कावीं सदी की महिला कथाकारों के कथा -साहित्य में नारीवादी चिंतन का विश्लेष्णात्मक अध्ययन)
सतत् लेखन पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित |
पता : दोहरीघाट, जिला -मऊ, आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश, 275303
संपर्क : drpallavi.dohrighat@gmail.com





