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Home कविता

भग्न नीड़ के आर-पार – अभिज्ञात

by Anhadkolkata
June 25, 2022
in कविता, साहित्य
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अभिज्ञात का नया काव्य संग्रह आया है ‘बीसवीं सदी की आख़िरी दहाई’ इसमें एक लम्बी कविता तलाक समस्या पर है-‘भग्न नीड़ के आर–पार’। तलाक, आज इक्के–दुक्कों की समस्या नहीं है। पारिवारिक विघटन और तनाव नये बौद्धिक समाज की एक महत्त्वपूर्ण समस्या है। इसकी एक ऐसी सूक्ष्म–संवेद्य पड़ताल यहां सहज उपलब्ध है, जो आपके आस–पास या आप बीती लग सकती है। शिल्प का एक लगभग नया सा, लयात्मक प्रयोग आकृष्ट करता है और कथात्मकता भी। इस पर एक शार्ट फिल्म बनायी जा सकती है और इस कविता का चाक्षुस प्रयोग भी उसका आभास देगा।
प्रथम खण्ड – स्त्री
एक
जबसे तूने मुझे, मैंने तुझे, छोड़ा।
गली गली, घर घर, व्यक्ति व्यक्ति ने
बार–बार चर्चों में, तुझे मुझे जोड़ा।।
दो
अपना–अपना मत, अपना–अपना अभियोग
कौन किसके जीवन में बोया बबूल।
बस यहीं सहमत हैं–बच्चा है भूल।।
तीन
सहसा, अप्रत्याशित, यों ही हुए आत्मस्खलनों को
भले तुम मेरी तुष्ठि कह लो।
मगर, अब मैं मात्र ज़िस्म नहीं, कुछ देर मुझे सह लो।।
चार
नित्य ही
तुम्हारी स्मृतियों की लाश से लिपट कर सोना।
है मेरा, पवित्र होना।।
पांच
हे देवी मां, आज तुम्हारा व्रत टूट गया, कर दो क्षमा
हो गयी गुस्ताखी।
आज उनके जाने पर, प्याले की बची हुई, पी ली है
दो बूंद काफी।।
छः
जाने क्यों आज मैं पहन रही हूं
तुम्हारी पसंद की साड़ी।
इस समय तुम निश्चित ही बना रहे होगे–दाढ़ी।।
सात
तकिये पर पहले गी खुदी–शुभ रात्रि
देती हूं उलट।
नींद के नाम पर झेलती हूं करवट।।
आठ
सुना है तुम उसे अपने घर ले आने वाले हो
बुक रैक पर से मेरी हंसती हुई तस्वीर हटा देना
उसे खलेगा।
मैं, कभी कुछ तुम्हारी नाममात्र की ही थी
सोचकर जी जलेगा।।
नौ
रीते हुए ज़ख्मों को कुरेदना और फिर
सहलाना।
कितना जानलेवा है, मुन्ने को नहलाना।।
दस
मैंने तुम्हें कभी पूर्णतया नहीं पाया
मैं कभी तुमसे नहीं हुई पूरी।
फिर कैसे–मैं तुम बिन अधूरी?
ग्यारह
एक लाचारी ही है, जो ढो रही हूं
तुम्हारे कारण मिला सम्बोधन–श्रीमती।
वरन् मैं नहीं सावित्री।।
बारह
जाने क्यों लगता है मेरी यादें
अब भी उस घर में जड़ी होंगी।
वादा करके भी तुम नहीं आते थे
उन फ़िल्मों की टिकटें किसी मेज़ की दराज़ में पड़ी होंगी।।
तेरह
आफ़िस में प्रमोशन
तात्पर्य मैं फ़ाइलों में पूर्णतया डूब गयी।
क्या सचमुच ज़िन्दगी से ऊब गयी।।
चौदह
मैं तो थी ही तुम्हारे घर की निर्वासित
लाज।
और अब, मै चूज़ा, जग बाज।।
पंद्रह
एक तपती हुई दोपहर।
पहले तुम्हारा घर
अब सारा शहर।।
सोलह
हथेलियों पर चुभा–चुभा कर आलपिन।
जोड़ती हूं
उम्र के गुज़रे हुए दिन।।
सत्रह
बिना खेले हारी हुई बाजी का टीसता एहसास।
धर देता है सज़ाकर टी टेबल पर
ताश।।
अठारह
आज लाइन चली गयी।
रोशनी से लड़ना नहीं पड़ेगा
मुन्ना भी खुश है, उसे पढ़ना नहीं पड़ेगा।।
उन्नीस
कभी शराब में डूबी तुम्हारी काया को
अपने सौन्दर्य की भेंट तपस्या थी।
पत्नी होने का भ्रम पाले मैं एक वेश्या थी।।
बीस
सोचती हूं मुन्ने को किसी दूसरे शहर
बोर्डिंग स्कूल में भेज दूं
वैसे यह नहीं है उतना आसान।
यो ऐसा करना ही होगा. वरन उसे देख लोग
लगा लेते हैं कुछ–कुछ
मेरी उम्र का अनुमान।।
इक्कीस
ऐसा नही कि मैं नहीं समझती
तुम पुरुषों के आडम्बर।
लोग जानबूझकर करते हैं मुझे फ़ोन
और कहते हैं स्वारी रांग नम्बर।।
बाईस
उस घर में भला क्यों न उठे बवण्डर।
लोग तो ताड़ लेते हैं अपनी पत्नी की
चूडि़यों तक का नाप।
और तुम्हें, शायद याद नहीं
मेरी ब्रेसियर का नम्बर।।
तेईस
आफ़िस में सभी की घूरती नज़रें
इस बात की हिमायती हैं
कि मुझमें अब भी है–सेक्स अपील।
काश! ये कोई आकर मुंह पर कहता
और मैं डांटती कहकर–अश्लील।।
चौबीस
बरसते हुए पानी को, खुली खिड़की से
बाहर हाथ निकाल
चूल्लू में रोपना और पानी का अथक
प्रयास के बाद भी चूना।
काश कि कोई घर में होता जिससे
मैं लजाकर कहती, प्लीज मुझे मत छूना।।
द्वितीय खण्ड – पुरुष
एक
विवाह के पूर्व मेरे जीवन में वो थी
उसे स्थापित करने का तुम्हारा प्रयास अनूठा था।
क्या पति–पत्नी का रिश्ता झूठा था!!
दो
घर ऐसे ही चलता है
काश कि तुम एक परम्परागत पत्नी की तरह
मुझे ताने देती।
उसे कुलच्छिनी कह आड़े हाथों लेती।।
तीन
मुझे उससे प्यार है/था
जिस दिन से तुमने ये सिद्ध किया/कराया।
बस, मैं हो गया पराया।।
चार
जबकि यह स्पष्ट है, मेरा हृदय उसकी प्रीति में
विकल था।
तुम्हारी दृष्टि में
तुम्हारे साथ मेरा मोह, मात्र एक छल था।।
पांच
एक अनुबंध कि सामाजिक दृष्टि के परे तुम
मेरी कोई नहीं
मैं तुमसे भागता रहा।
कहीं तुम्हें चाहने न लगूं, नियति से मांगता रहा।।
छः
संधि विच्छेद पत्र पर हस्ताक्षर के पश्चात
तुमने दी मुझे बधाई।
और मैंने तुम्हारे तकिये के गिलाफ़ से निकाल
बाशबेसिंग में डाल दी, तुम्हारे सिरदर्द की दवाई।।
सात
मुन्ने को तुम ले गयी, उस पर है ही क्या मेरा अधिकार।
शायद तुम ठीक कहती हो, वह है
मेरे प्रवंचक प्रेम का विस्तार।।
आठ
जबसे तुम घर से गयी, वो मुझे बहुत खलती है।
तुम्हारी स्मृति साथ–साथ
घूमती टहलती है।।
नौ
हां अब भी, बिना नींद के, सुबह चढ़ी धूप तक
सोता हूं।
घर में
तुम्हारे होने का भ्रम जो पाले होता हूं।।
दस
तुम्हारा पसंदीदा गॉगल यहीं रह गया
शायद कड़ी धूप भी यहीं रह गयी।
तुम्हें जो कुछ कहना था–सब यों कह गयी।।
ग्यारह
अरसे बाद, ज्यों का त्यों देखकर भरमा जाती।
अच्छा है, तुम क्षण भर को भी
अपने घर नहीं आती।।
बारह
उस कमरे में जहां टूटी पड़ी होती थीं,
मेरी प्रतीक्षा में
करवटें बदलते बदलते तुम्हारी चूड़ियां।
आजकल हैं सिगरेट के जले–बुझे टुकड़े
माचिस की कलमुंही तीलियां।।
तेरह
अख़बार, चादरें, कलेण्डर, सब पर लिख बैठा हूं
हर चीज़ देगी बता।
तुम्हारा वर्तमान फ़ोन नम्बर, तुम्हारे घर का पता।।
चौदह
मैंने–तूने, सिर्फ़ मैंने या सिर्फ़ तूने, जो कुछ किया
भोगा।
मगर मेरे–तेरे नाम खुदे विवाह के दौरान मिले
बर्तनों का क्या होगा!!
पंद्रह
चूंकि में उसका हूं, इसलिए तुम्हारा नहीं हो सकता
तुमने माना, मनवाया।
किन्तु तुमने, उसने, मैंने आख़िर क्या पाया?
सोलह
मुन्ना तो अब पढ़ता होगा।
दुलारयुक्त पापा की छवि
क्या अपने लिए ही गढ़ता होगा।।
सत्रह
अब तुम्हारी कामना।
भीड़ग्रस्त शहर में
कटी पतंग थामना।।
अठारह
अब मिसअण्डरस्टैंडिंग नहीं होगी
कि तुम भूले से पढ़ने लगोगी अपने बदले
मेरी आधी पढ़ी हुई नॉवेल।
और मैं बाथरूम में घुस जाऊंगा
लेकर तुम्हारा टॉवेल।।
उन्नीस
इसे तुम पहली शापिंग में ख़रीद लायी थी
अब तुम्हारे अभाव में दीवारघड़ी का पेण्डुलम
नहीं हिलता।
लोग जब टोकते हैं तो मैं व्यस्तता ओढ़कर कहता हूं
क्या करूं, समय नहीं मिलता।।
बीस
सोचता हूं कि आओगी तो कैसे कर पाऊंगा
तुम्हारा सामना।
यों
आज पुनः निरस्त तुम्हारी आगमन संभावना।।
एक्कीस
भाभी मज़े में तो है, जब कोई समवयस्क
औपचारिकतावश पूछता है
मैं मुस्कुरा भर देता हूं, सच एकबारगी
कुछ नहीं सूझता है।।
बाईस
तुम्हारे प्यार का भागी नहीं ही हो पाय
किन्तु पायी है कुछ कुछ हमदर्दी।
वरन् नौकर तो नौकर हैं
तुम्हारी तरह बेरूखी से भी कभी नहीं कहते
कि कुछ पहन ओढ़ लो–वरना हो जायेगी सर्दी।।
तेईस
काश ऐसा होता कि मैं रिक्शे में काटता
मौका पा चिकोटी।
तुम यों हतप्रभ रह जाती जैसे
संयुक्त परिवार वाली नयी नवेली दुल्हन से
दाल में नमक ज़्याद पड़ गया हो
अथवा जल गयी हो रोटी।।
चौबीस
स्पप्न सा देखता हूं
कि हम आवश्यक महसूस करने लगे हैं
एक दूसरे की राय।
जब मैं ले आता हूं तुम्हारे पसंद की साड़ी
और तुम बनाती हो चाय।।
000
डॉ.अभिज्ञात
दो उपन्यास, दो कहानी संग्रह एवं आठ कविता संग्रह प्रकाशित।
मोबाइल-09830277656

 

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

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