• मुखपृष्ठ
  • अनहद के बारे में
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक नियम
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
अनहद
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
No Result
View All Result
अनहद
No Result
View All Result
Home कथा

कथांश

by Anhadkolkata
June 25, 2022
in कथा, साहित्य
A A
5
Share on FacebookShare on TwitterShare on Telegram

जानने वाले जानते हैं कि इन दिनों मेरा लिखना-पढ़ना लगभग बंद ही रहा। कुणाल, निशांत, प्रफुल्ल कोलख्यान, नीलकमल जैसे मित्रों को हमेशा यह शिकायत रही कि मैं क्यों ऐसा कर रहा हूँ। कुणाल ने तो यहां तक कहा कि आपने खुद को बरबाद किया है। यह शायद इसलिए था कि मेरी शुरूआती कहानियों ने काशीनाथ सिंह, संजीव, उदयप्रकाश, रविन्द्र कालिया, कृष्णमोहन आदि वरिष्ठ लोगों का ध्यान खींचा था, और मित्रों को मेरे अंदर लेखन की भारी संभावना दिखती थी। लेकिन तब यह न हो सका था। क्यों, इसका कोई एक उत्तर नहीं हो सकता। बहरहाल, बहुत समय बाद ज्ञानोदय के जून अंक  में यानि कि अगले महीने ही मेरी एक कहानी आ रही है। शायद अब जाकर जड़ता टूटी है, जिसे मैं “कोमा से बाहर आना कहता हूँ। कहानी के कुछ अंश आपके लिए …।

Related articles

भोर होने से पहले : राकेश कुमार सिंह

पहाड़ी लोक परंपरा को आधुनिकता से जोड़ता हुआ कविता संग्रह – देवेश पथ सरिया

                                                                       चिन्दी-चिन्दी कथा

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि हमारे अपने घरों में कितनी घुटन थी। हमारे अनपढ़ और धर्मभीरु पिताओं के मजूरी करते घिस गए हाथ हर बार दुनिया के क्रोध मिटाने हमपर ही उठते थे – कि अभाव था वह जो शब्दों के जाले बुनता था, उनके मुंह से निकल कर हमें घेरने की हर एक कोशिश करता था, देखता था हमारे साथ को एक गहरे संशय की नजर से।

हमें सहज विश्वास ही नहीं होता था कि सदियाँ गुजर जाने के बाद भी उनकी सोच ऐन उसी जगह मौजूद थी, और वे सवाल जो कल पूछे गए थे, आज भी पूछे जाते थे उतनी ही शिद्दत के साथ हमसे। दुनिया बदल गई थी, समय चलता हुआ कहाँ का कहाँ पहुंच गया था, लेकिन वे सोच और सवाल वैसे ही साबुत थे, हमें चिढ़ाते हुए और अपने पूरे दम के साथ अपनी ओर खींचते हुए। लेकिन हम थे कि लोहा लेते रहे, लड़ते रहे। अपने संकल्पों को पुख्ता करने और स्वयं को सहेजे रखने की कवायद में अपनी ऊर्जा खर्च कर कभी थके नहीं।
हम बिशिष्ट थे अपनी और एक दूसरे की नजरों में।

जीत का जश्न साथ मिलकर मनाया था तो हार गए हर एक क्षणों में हमने एक दूसरे के आँसू पोछे थे। यूँ कि बहुत याराना लगता था।

कैसे जिएंगे हम तुम्हारे बगैर – वह कहता।
कैसे जिएंगे हम तुम्हारे बगैर – मैं कहता।
जीना छोड़ो – वह कहता।
मरना छोड़ो – मैं कहता।
बदलेगी यह दुनिया – चलते जाते थे हम।
अपन बदलेंगे — हंसते जाते थे हम।
बदलेगी यह दुनिया – दादा सूर पतली और महीन आवाज में कहते।

कपड़े का ठेला लगाते, मजूरी करते, मुहल्ले के लड़के लड़कियों को ट्यूशन देते हमने अपनी पढ़ाई जारी रखी थी। यह अजीब ही था कि जहाँ पूरी दुनिया एक मायावी आँधी में बेतहासा भागती जा रही थी, हमने अपने लिए कुछ और ही चुना था। चुना था कि हम चुन लिए गए थे किसी के द्वारा…. कि कविताएं चलती रहीं साथ.. कि हम चलते रहे कविताओं के साथ… गुलजार, सुदर्शन फ़ाकिर, फैज़ की गज़लों के साथ बैठने-उठने की वह आदत। और फिल्में जो सच को सच की तरह कहना सिखाती थीं – और सच के साथ जीने को कहती थीं। ऐसे ही थे हम – ऐसे ही बने थे हम।
वे सच्चे और बच्चे क्षण। वह वक्त और यह प्लेटफॉर्म जहाँ हम खड़े थे एक-दुसरे के आमने-सामने।

कैसे कहें अलविदा….।
अलविदा……..???

कैसे रह पाएंगे हम तुम्हारे बगैर – उसकी सूनी आँखों में पढ़ती हैं मेरी आँखें।
कैसे जिएंगे हम तुम्हारे बगैर – अन्दर बुदबुदाता है ध्वनिहीन कोई..।
मत जाओ, हमें मिलकर ये दुनिया बदलनी है – कहते- कहते रह जाती है ज़बान।
मेरा जाना भी इस दुनिया के बदलने में शामिल है – सुनते-सुनते रह जाते हैं मेरे कान।

और हमारे बीच जंगल के किसी रात की चुप्पी।

हमारे जीवन में भी यह मोड़ आना था जो हमें इतना शान्त कर दे कि हलक से आवाज तक का निकलना मुंकिन न हो ? अचानक जैसे एक आँधी आई थी हमारे अब तक के बने सब कुछ को ध्वस्त करती। और अली ने अपनी पूरी ताकत से साथ मुझे अपनी बाहों में भींच लिया। वह हिचकियाँ लेकर रो रहा था और मैं चुप। कोई आवाज नहीं बस दूर-दूर तक उसके गले की हिचकियाँ….अवसाद….

ShareTweetShare
Anhadkolkata

Anhadkolkata

अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें। प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।

Related Posts

भोर होने से पहले : राकेश कुमार सिंह

भोर होने से पहले : राकेश कुमार सिंह

by Anhadkolkata
September 24, 2026
0

वरिष्ठ एवं चर्चित कथाकार राकेश कुमार सिंह की यह कहानी पलामू के जंगल-पठार, आदिवासी जीवन और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की पृष्ठभूमि में आधुनिक चिकित्सा, अंधविश्वास और...

पहाड़ी लोक परंपरा को आधुनिकता से जोड़ता हुआ कविता संग्रह – देवेश पथ सरिया

पहाड़ी लोक परंपरा को आधुनिकता से जोड़ता हुआ कविता संग्रह – देवेश पथ सरिया

by Anhadkolkata
September 22, 2026
0

पहाड़ी लोक परंपरा को आधुनिकता से जोड़ता हुआ कविता संग्रह देवेश पथ सारिया  उत्तराखंड के वरिष्ठ कवि भूपेंद्र बिष्ट का कविता संग्रह ‘गोठ में बाघ’ पढ़ा।...

अनिल गंगल की नई कविताएँ

अनिल गंगल की नई कविताएँ

by Anhadkolkata
September 19, 2026
0

अनिल गंगल इन कविताओं की प्रमुख विशेषता यह है कि कवि बड़े प्रश्नों को घोषणात्मक वैचारिकता के बजाय रोज़मर्रा के दृश्य, वस्तु और अनुभवों से जोड़कर...

शिवानी ‘शांतिनिकेतन’ की कहानी – अधखुली खिड़की

शिवानी ‘शांतिनिकेतन’ की कहानी – अधखुली खिड़की

by Anhadkolkata
September 17, 2026
0

शिवानी शांतिनिकेतन शिवानी ‘शांतिनिकेतन’ की यह कहानी केवल एक बेटी के अपने मायके लौटने भर की कथा नहीं कहती, बल्कि रिश्तों में छिपे भय, संकोच, अपराधबोध...

एक कॉलम की ख़बर

एक कॉलम की ख़बर

by Anhadkolkata
August 27, 2026
0

विमल चन्द्र पाण्डेय विमल चन्द्र पाण्डेय ने कथा लेखन की एक लंबी यात्रा की है और हमें कई यादगार कहानियाँ और कई मानीखेज उपन्यास दिए हैं।...

Next Post

ज्ञानोदय में छपी कहानी "'चिन्दी चिन्दी कथा" पर वरिष्ठ साहित्यकार प्रताप सहगल की प्रतिक्रिया

नई कहानी के कुछ शुरूआती ड्राफ्ट

राकेश श्रीमाल की एक कविता

Comments 5

  1. मनोज कुमार says:
    16 years ago

    बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    Reply
  2. rahul Sing says:
    16 years ago

    kahani ka ansh padh ker kavita ka-sa anand aata hai…badhai

    Reply
  3. L.Goswami says:
    16 years ago

    काव्यात्मक प्रस्तुति.

    Reply
  4. addictionofcinema says:
    16 years ago

    bahut sunder ansh hain…kahani ka intezaar aur badh gaya hai
    badhai

    Reply
  5. Anonymous says:
    16 years ago

    विमलेश जी आपकी पहली कहानी "अधूरे अंत की शुरूआत" से ही मैं आपकी कहानियों का फैन रहा हूँ..सच कहूँ तो आपने पर कहानी में कथ्य और शिल्प के नए प्रयोग किए हैं..कहानी के रूप में हर बार एक नई ऊर्जा से लबरेज कहानियां आपकी कहानी के इंतजार के लिए बार-बार उकसाती हैं…खैर एक लंबे समय के बाद आपकी वापसी का स्वागत…अब आप कन्टिन्यू करेंगे..ऐसी आशा है…बधाई…पूरी कहानी ज्ञानोदय में पढ़कर आपको लिखता हूँ….
    — विनोद कुमार, म.प्र.

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.

No Result
View All Result
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.