बहुत दिनों से कथा के लिए एक कहानी भेजने का अपना वादा बार-बार याद करता रहा। कोई कहानी पूरी हुई ही नहीं, भेजता कैसे। बहरहाल एक एसएमएस के जरिए मैंने भाई संतोष के मोबाईल पर एक श्रद्धांजली संदेश भेज दिया।
मार्कण्डेय अकेले ऐसे कथाकार थे, जिनकी कथा में आजादी के बाद का गाँव अपने पूरे यथार्थ के साथ प्रकट हुआ है। आज जब कि गाँव गाँव की तरह नहीं रह गए हैं, ऐसे समय में मार्कण्डेय का जाना नि:शब्द कर गया है हमें।
मज्झिम प्रतिपदा -3- भरत प्रसाद
मज्झिम प्रतिपदा -3- भरत प्रसाद पिछले करीब 50 वर्षों से हिन्दी साहित्य "समकालीनता" की धारा में बहता चला जा रहा है। यह कोई आंदोलन या साहित्यिक...






