मंदिर की घंटियों की आवाज के साथ
रात के चौथे पहर
जैसे पंछियों की नींद को चेतना आती है
किसी समय के बवडर में
खो गए
किसी बिसरे साथी के
जैसे दो अदृश्य हाथ
उठ आते हैं हार गए क्षणों में
हर रात सपने में
मृत्यु का एक मिथक जब टूटता है
और पत्नी के झुराए होंठो से छनकर
हर सुबह
जीवन में जीवन आता है पुनः जैसे
कई उदास दिनों के
फांके क्षणों के बाद
बासन की खड़खड़ाहट के साथ
जैसे अंतड़ी की घाटियों में
अन्न की सोंधी भाप आती है
जैसे लंबे इंतजार के बाद
सुरक्षित घर पहुँचा देने का
मधुर संगीत लिए
प्लेटफॉर्म पर पैसेंजर आती है
वैसे ही आऊँगा मैं…..
अनिल गंगल की नई कविताएँ
अनिल गंगल इन कविताओं की प्रमुख विशेषता यह है कि कवि बड़े प्रश्नों को घोषणात्मक वैचारिकता के बजाय रोज़मर्रा के दृश्य, वस्तु और अनुभवों से जोड़कर...






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