• मुखपृष्ठ
  • अनहद के बारे में
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक नियम
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
अनहद
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
No Result
View All Result
अनहद
No Result
View All Result
Home लेखक

मज्झिम प्रतिपदा -3- भरत प्रसाद

साहित्य का परिवर्तन काल

by Anhadkolkata
November 7, 2026
in लेखक, विविध, साहित्य
A A
0
Share on FacebookShare on TwitterShare on Telegram

मज्झिम प्रतिपदा -3- भरत प्रसाद


पिछले करीब 50 वर्षों से हिन्दी साहित्य “समकालीनता” की धारा में बहता चला जा रहा है। यह कोई आंदोलन या साहित्यिक वाद न होकर भी सर्वस्वीकृत और व्यापक शब्द बन चुका है। विश्वम्भर नाथ उपाध्याय से लेकर अन्य अनेक आलोचकों, विद्वानों ने इस शब्द की अर्थवत्ता, प्रासंगिकता और अनिवार्यता पर मुहर लगाई है। दो मत नहीं कि साहित्य की समकालीन धारा ने हिन्दी भाषा को अविस्मरणीय और स्थायी समृद्धि दी है। कविता, आलोचना, कहानी, उपन्यास तथा अन्य गद्य विधाओं में चेतना, हृदय, विवेक और कल्पना को उद्वेलित करने वाली कृतियाँ सामने आई हैं। यह समकालीनता, जिसे युग की केन्द्रीय प्रवृत्ति के तौर पर देखते हैं, लेखक सिद्ध होने की अनिवार्य शर्त है। आज पुनः परिभाषित करने की जरूरत नहीं कि समकालीन क्या है? परन्तु यह एहसास प्रगाढ़ होता जा रहा है कि समकालीनता अब पर्याप्त नहीं।

खासकर नई सदी के चढ़ते ही नई प्रवृत्तियों का तापमान बढ़ चला है। मनुष्य के नए गुणधर्म प्रकट होने लगे हैं। कल तक जिसे जीवन का निर्णायक मूल्य मानते थे, वे गैर-जरूरी हो चले हैं। जिन चंद विश्वासों के बूते व्यक्ति सारा जीवन काट लेता था, अब उनकी भूमिका ही समाप्त हो चली है। सूचना, तकनीकी, बाजार और अत्याधुनिक वस्तुओं का हस्तक्षेप इस कदर बढ़ गया है कि वे मानवीय रिश्तों, मूलभूत मूल्यों और आपसी संबंधों को संचालित और निर्देशित करने लगे हैं। जीवन की अनिश्चितता अब ठोस सच्चाई है। कल कौन अर्श से फर्श पर होगा और कौन जमीन से आसमान छू लेगा, कहा नहीं जा सकता। यह उत्तर पूँजीवाद का युग है, जिसे वृद्ध पूँजीवाद की जगह प्रौढ़ पूँजीवाद कहें तो अधिक बेहतर होगा।

प्रसाद

समकालीनता के कुछ सुनिश्चित मानक थे-जैसे प्रतिरोध, संघर्ष, जनपक्षधरता, राजनीतिक चेतना, प्रगतिशील वैचारिकी, धर्म के पाखंड की आलोचना, यथार्थप्रियता, तर्कवादी दृष्टिकोण और हाशियाई समाज के प्रति सजग समर्पण। समकालीनता के गुण इतने व्यापक और बहुआयामी हैं कि उन्हें एक साँस में नहीं समेटा जा सकता। ये आज भी उतने ही मूल्यवान हैं, जितने धूमिल जैसी अग्रधावक प्रतिभाओं के उभार के समय थे। राजनीतिक चेतना से सम्पन्न होना समकालीनता की सबसे खास विशेषता रही। यह बात और है कि हमारे कवि राजनीति-सजग होकर भी भारत की राजनीति को पॉलिटिकली करेक्ट नहीं कर पाए। इसीलिए प्रश्न मन में उठता है कि समकालीनता क्या आगे की साहित्यिक यात्रा के लिए भी पर्याप्त है? हमें समकालीनता से आगे सोचने की कहीं जरूरत तो नहीं? यह समकालीनता कहीं हमारे साहित्य की सीमा तो नहीं बन गई है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम 50 वर्ष की उम्र वाले औजार से नए, अप्रत्याशित युग के यथार्थ का सामना कर रहे हैं? “सृष्टि के यौवन का श्रृंगार, करेंगे कभी न बासी फूल।” यह लकीरी सत्य जयशंकर प्रसाद यूँ ही अचानक “कामायनी” में नहीं स्थापित कर रहे थे।

Related articles

 राहुल झा की कविताएँ

फ़िराक़ से आलोकधन्वा तक – ललन चतुर्वेदी

निराला

जिस तरह समकालीनता एक काल-सापेक्ष प्रवृत्ति है, वैसे ही परिवर्तनशीलता। यह परिवर्तन सतत प्रवाह है, जो सूक्ष्म, स्थूल, आंतरिक, बाहरी, दृश्य, अदृश्य हर स्तर पर जारी है। परिवर्तन का न आदि है, न अंत। सिर्फ परिवर्तन में कोई परिवर्तन नहीं होता। बाकी सबमें परिवर्तन होता है। परिवर्तन स्थानीय है और ब्रह्मांडीय भी। इतना बारीक कि अदृश्य से भी सूक्ष्म और इतना विशाल कि निगाहों में न समा सके। यह न नया है, न पुराना। जितना ही व्यक्तिगत, उतना ही सार्वजनिक, जितना ही निजी, उतना ही गैर-निजी। गौतम बुद्ध ने स्वयं अपने चिंतन में इस सार्वभौमिक परिवर्तन की अमर भूमिका को स्वीकार किया है, जो कि आगे चलकर बौद्ध दर्शन का एक आधार बना। यह परिवर्तन महज बदलाव न होकर ट्रांसफॉर्मेशन है। अंदर-बाहर से रूपांतरण, कायांतरण। समकालीन हिन्दी कविता उस मोड़ पर खड़ी है, जहाँ समकालीनता की सीमाएँ महसूस होने लगी हैं। जहाँ खड़े होकर लगता है, साहित्य को जितने भी विचार, मोर्चे, अभियान, वाद, विमर्श और स्वर ईजाद किए गए, वे कीमती होकर भी मुकम्मल नहीं, पर्याप्त नहीं, सशक्त नहीं। शायद नहीं, निश्चय ही, हमें समकालीनता के पार जाना होगा, हमें नई धारा की खोज करनी होगी, हमें तलाशना होगा सृजन के अभिनव देश को, हमें उपजाऊ बनाना होगा फिर से कलम की खेतीबारी को। नए अंदाज, नए शिल्प, नए शब्द-विन्यास, नई भंगिमा, मौलिक लयात्मकता और समृद्धि के आकर्षण से लबरेज नई दिशाओं का आह्वान करना होगा। समकालीनता जिसकी पृष्ठभूमि में हो, किन्तु ध्वनि का रेंज सदी की महत्तम संभावनाओं के पार चला जाए।

सवाल उठना चाहिए कि परिवर्तन किस दिशा में, किसलिए और क्यों? केवल बदलाहट के लिए परिवर्तन की पुकार लगाना एक फैशन से ज्यादा कुछ नहीं। जिसका हश्र लगभग वही होगा, जो नई कविता के बाद और समकालीन कविता के पहले अकविता जैसी अल्पजीवी काव्य-धाराओं का हुआ। हम न सिर्फ देख रहे हैं, बल्कि इस पीड़ा को भीतर जज्ब किए हुए महसूस भी कर रहे हैं कि गद्य कविता अंततः खाँटी वैचारिकी के उस मुकाम तक पहुँच गई है, जहाँ से उसका वापस लौटना संभव ही नहीं। गद्य कविताई में काँट-छाँट, सुधार लाकर भी उसे पाठकोन्मुख नहीं बनाया जा सकता। समकालीन कविता निरंतर बुद्धि-प्रधान और भाव-विरल होती चली गई, यह कठोर सच्चाई है। जबकि कविता की जड़ें अभिनव भावों की गहराई में जीवित रहती हैं। प्रबुद्ध, शिक्षित या अल्पशिक्षित पाठक भी साहित्य की ओर भावनावश आकर्षित होते हैं। उन्हें नए विचार बाद में, टटके भाव पहले चाहिए। सृजन में संवेदना की लहर उठना सीधे कवि-व्यक्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। गद्य कविता की शुरुआत छायावादी कवियों, विशेषकर निराला के हाथों आरंभ हो चली थी। बावजूद इसके महाकवि की कलम में गद्य कविता को ऊँचाई देने की नायाब काबिलियत थी। आंतरिक संगीत और प्रच्छन्न लयात्मकता छायावाद-कालीन गद्य कविताई की खूबसूरती रही। समकालीन कविता खालिस नैरेशन की सपाट राह पर चल पड़ी है। यहाँ तक कि उसके पास बासी बिम्ब हैं, पुराने प्रतीक हैं। सुने-सुनाए मुहावरे, शब्द और उपमान हैं। नवोन्मेष यदि है तो सिर्फ वैचारिकी में। सिर्फ विचारों के बूते कविता की उम्र लंबी नहीं होती, यह तथ्य हमारा समकालीन कवि भूल गया है।

कार्ल मार्क्स

समकालीनता से आगे बढ़ने का एक जरूरी दायित्व यह होगा कि हमें सृजन के नए मानक निर्मित करने होंगे। यह इसलिए नहीं कि पुराने मानकों से छुट्टी लेनी है, बल्कि इसलिए कि नई प्रस्तावनाओं के बगैर साहित्य में ऊर्जा का संचार न हो पाएगा। इस दौर में ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों का स्पेशलाइजेशन हो रहा है। मुख्य विषय की शाखाएँ, दरशाखाएँ निर्मित हो रही हैं। ज्ञान की दिशा सूक्ष्म से सूक्ष्मतर की ओर अग्रसर है। नई-नई खोजों से वस्तुओं, पदार्थों के बारे में अनोखी सूचनाएँ निरंतर उपलब्ध हो रही हैं। यह दुर्लभ मौका है, जब साहित्य एक साथ विज्ञान, इतिहास, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, समकालीन दर्शन, जीवविज्ञान और राजनीतिशास्त्र से हाथ मिला सकता है। समकालीन हिन्दी साहित्य की रीढ़ है-वैज्ञानिक दृष्टि, प्रगतिशीलता और मार्क्सवाद। किन्तु अब इतने भर से बात न बनेगी। सृजन का भविष्य बिल्कुल नए वैचारिक मानक हासिल करने को व्याकुल है, जो मार्क्स की दृष्टि से सम्पन्न होकर भी, केवल मार्क्स तक सीमित नहीं रहेगा। यह उत्तर-मार्क्सवाद भी न होगा, बल्कि सर्वथा नया आधार होगा, मौलिक दार्शनिकता का। कहना मुश्किल है कि मार्क्सवाद के बाद अगली समर्थ विचारधारा क्या? परन्तु सीमाओं में बँधने की अंतर्पीड़ा शायद नए दर्शन की तलाश कर ले। विज्ञान की नई खोजें भी भौतिक विश्व के द्वंद्वात्मक विकास से आगे की प्रस्तावना पेश कर रही हैं। उसका एक उदाहरण है-क्वांटम भौतिकी और स्ट्रिंग थ्योरी।

हिन्दी आलोचना की मौजूदा दशा यह है कि नई सैद्धांतिकी दूर की कौड़ी बन चुकी है। रामचन्द्र शुक्ल के बाद मुक्तिबोध दूसरे ऐसे चिंतक हैं, जिन्होंने नितांत नई सैद्धांतिकी पेश करने का जोखिम उठाया। उनके द्वारा गढ़े गए अनेक शब्द, वाक्य, पद आज आलोचना में बड़े आदर से कोट किए जाते हैं। हिन्दी आलोचना में वैसी ही नवोन्मेषी कल्पनाशक्ति और नए प्रयोग का साहस करने की जरूरत है। मर्मसम्पन्न मौलिक शब्दों के निर्माण से सृजन का आकाश विस्तृत है। नए शब्द भाषा को लंबी उम्र देते हैं। माना कि नए मुहावरे गढ़ना आसान नहीं, किन्तु अप्रचलित मुहावरों का प्रस्ताव पेश करने में हर्ज क्या है? लकीर का फकीर बनने से तो अच्छा है, नई राह बनाई जाए। कभी न कभी तो कोई दीवाना उस पथ पर चल पड़ने की काबिलियत दिखाएगा न! निराला जब छंद के बंधन तोड़ने में लगे थे, तो उनके अनगढ़ काव्य को केंचुआ छंद कहकर उपहास उड़ाया गया। और आज वे ही कविताएँ हिन्दी कविता की धरोहर हैं।

बिना विवादास्पद हुए, खारिज हुए, आलोचित हुए, मानक रचनाकार बन ही नहीं सकते। संदेह की तीखी आँच से गुजरे बगैर न कोई मनुष्य निखर पाया, न ही कोई विचार और न ही सिद्धांत। समकालीन साहित्य के इस दौर से आगे के सृजन का मानक क्या हो, यह तय करना भी एक जिद है, अवैज्ञानिक हठ और सिद्धांतवादी फैशन। पहले तो हमें उस मानस में स्वयं को ढालना है कि समकालीनता अपर्याप्त है, शेष सदी के सृजन के लिए। फिर समय स्वयं हमें मानक खोजने का आह्वान करेगा।

सृजन की एक अनिवार्य कसौटी नयापन है। किन्तु नयापन किस अर्थ में हो, कैसा हो और क्यों हो, यह नई बात हो सकती है। अभिनवता के प्रदर्शन के लिए नयापन लाना मात्र दिखावा है, साहित्यिक दिखावा, जो रोमांचित कर सकता है, मोहित कर सकता है, व्यामोह भी पैदा कर सकता है, किन्तु वह दूर तक और लंबे वक्त तक सृजन को सशक्त कर पाएगा, इसमें संदेह है। शब्द, प्रतीक, बिम्ब और विचार का टटकापन बेशक आकर्षण भरते हैं, सृजन में। किन्तु सबसे मूल्यवान है-मार्मिक भावनाओं की मौलिकता। अभिनव संवेदना की हरियाली, पारगामी वेदना की उद्दाम धारा। जिस भी कलम में भावनाओं की मौलिकता ज्वार लेती है, वह अधिक स्थायी मूल्य का साहित्य सिद्ध होता है। आलोचक, विद्वान, साहित्यिक प्रायः कल्पना, बिम्बधर्मिता, प्रतीकात्मकता, सूक्ष्म वैचारिकी, प्राणमय चित्रात्मकता और संगीतात्मकता जैसे निर्णायक गुणों को नयेपन की कसौटियाँ मान लेते हैं, जबकि है यह सृजन का पारम्परिक नयापन। आधुनिक यूरोपीय लेखकों, खासकर रोमांटिक काव्यधारा के कवियों, आलोचकों के द्वारा व्याख्यायित और स्थापित भी।

नई सदी के लिए सृजन में नयापन और क्या हो, यह विचार का विषय है। पहला नयापन तो यह कि बाहर से दीखता हुआ भेद एक भ्रम है, आकर्षक झूठ, बल्कि धोखा। जैसे जन्म और मृत्यु दो अलग-अलग घटनाएँ होकर भी मूलतः एक हैं। है और नहीं है, दो नहीं-एक हैं। अप्रकट होना, प्रकट होने पर निर्भर है, उसी तरह घृणा का जन्म लेना, प्रेम करने पर। रचनाकार जब असंख्य भेदों में आंतरिक एकता का साक्षात्कार करता है, तो सृजन की नायाब अंतर्दृष्टि जन्म लेती है।

दूसरा नयापन है, रहस्य का यथार्थ। हमने अभी तक रहस्य को सृजन के लिए नकारात्मक माना। स्वयं रामचंद्र शुक्ल ने रहस्यमयता को साहित्य के क्षेत्र में नकारा है। जबकि भौतिक जगत में रहस्य एक ठोस तथ्य है, मनुष्य का, पदार्थ का, वस्तुओं का, दृश्य का। किसी भी सत्ता के बारे में हम उतना ही जान पाए हैं, जितना बताया गया, पढ़ाया गया या बुद्धिपरस्त व्याख्या की गई। जबकि किसी भी वस्तु, पदार्थ, भौतिक सत्ता की उम्र हमसे लाखों गुना अधिक है। भूल करते हैं वे, जो एक वृक्ष की आयु 100, 200 या 400 वर्षों में बाँध देते हैं। एक बरगद की ऊँचाई आपके ज्ञान, अनुभव और कल्पना के दायरे से कहीं अधिक है। फसलें, जो आपको जीवन सौंपती हैं, बनती-मिटती हरियाली का रूपक मात्र नहीं हैं। उसकी मौजूदगी की जड़ें अतीत के अनंत काल में फैली हुई हैं। इसलिए जो कुछ वर्तमान में मौजूद है, वह अतीत में भी वर्तमान था और भविष्य में भी वर्तमान रहेगा। यह वर्तमान बीज है, अमृत समय का। वस्तुएँ, पदार्थ केवल रूप बदलते हैं, सत्ता उनकी अनंत काल से है। सृजन के लिए नयेपन की तीसरी कसौटी हर अस्तित्व को उल्टा करके देखना है।

कल्पना कीजिए, यदि चाँद का अँधेरा हिस्सा आप देख पाते तो कैसा लगता? सूर्य यदि पश्चिम से पूरब की ओर यात्रा करता तो सुबह-शाम का नजारा कैसा होता? पृथ्वी यदि घूमने के बजाय स्थिर होती, तो सृष्टि का स्वरूप क्या बनता? बेशक ये असहज करने वाले अतार्किक प्रश्न हैं, परन्तु ऐसे प्रश्न नए सृजन का आगाज भी करते हैं। जिस कागज पर लिखते हैं, उसको पलटकर उसके पीछे का रंग बहुत कम देखते हैं। जिस कलम से लिखते हैं, उसको उल्टा करके देखने की अंतर्पीड़ा बहुत कम महसूस करते हैं। बँधी-बँधाई परिपाटी में जीने, सोचने और करने की लकीर भीतर-बाहर इतनी गहरी है कि उससे हटकर कुछ करना, सोचना मुमकिन ही नहीं होता। एक अर्थ में हमारी कल्पना भी बंधक होती है। विपरीत निगाह से देखने की एक शर्त है-विवेक-सम्पन्न इंकार, जो कि परिपक्व अंतर्दृष्टि से पैदा होता है।

मुक्तिबोध

विपरीत की एकता एक और सृजनात्मक नयापन है, यद्यपि यह बिल्कुल नया नहीं। इसी को कई बार “विरुद्धों का सामंजस्य” भी कहा गया है। सच तो यह है कि हमारा निर्माण विरुद्धों से हुआ है। यदि संदेह न करें, तो विश्वास करने का क्या अर्थ? यदि इंकार का साहस न हो, तो स्वीकार करने की क्या अहमियत? यदि निराशा की सत्ता स्वीकार न सकें, तो आशा की कितनी उम्र रह जाएगी? थकते हैं, इसीलिए विश्राम की कीमत जानते हैं। रोते हैं, जार-जार, इसीलिए हँसने की कीमत जिंदा है। जिस तरह हर कण का प्रतिकण सृष्टि के जन्म से मौजूद है, उसी तरह हर पक्ष का विपक्ष, हर पहलू का दूसरा पहलू, हर उपस्थिति की प्रतिउपस्थिति। कहना जरूरी है कि सृजन का नयापन खुद के व्यक्तित्व का रचनात्मक समर्पण भी है। मिट्टी के साथ कलमी न्याय करना है, तो मिट्टी बनना सीखना होगा। आकाश के नीलेपन पर कविता रचनी है, तो नीलाकाश में खुद को विलीन करना होगा। बेशक घोड़े पर लिखते हुए, भावात्मक घोड़ा बनना जरूरी है। याद आते हैं-मुक्तिबोध, जिन्होंने अनेकों बार “व्यक्तित्वांतरण” पर जोर दिया है। यह केवल मनुष्य ही है, जो सर्वगामी क्षमता का है। होगा कोई ईश्वर, जो मनुष्य में प्रवेश किए हुए है, हमने नहीं देखा। परन्तु यह तो कह सकते हैं कि मनुष्य ईश्वर में प्रवेश कर सकता है। पानी की स्वादातीत मिठास में, ध्वनियों की पीड़ा में, सन्नाटे के कम्पन में, शून्य की मिठास में, प्रत्यक्ष की मृत्यु में, अप्रत्यक्ष की अमरता में, रात की रागिनी, मौन की भाषा, पक्षियों की उड़ान और शब्द-शब्द के भीतर उमड़ते अर्थों की घाटी में प्रवेश कर सकता है। व्यक्तित्वांतरण के बूते बहुआयामी प्रवेश की इसी योग्यता ने दुनिया में कालजयी सृजन को संभव किया है। वरना नदी माँ न होकर, बस एक बहता हुआ जलस्रोत रह जाती। मनुष्य “नदी के द्वीप” या “यह दीप अकेला” न कहलाता, बस साढ़े तीन फीट का मांसल ढाँचा बनकर रह जाता।

एक नयापन तो यह भी है सृजन का कि मृत्यु सबसे बड़ा झूठ है। जैसे ऊर्जा कभी मिटती नहीं, रूपांतरित होती है, वैसे ही मृत्यु केवल दृश्यात्मक घटना मात्र है। दृश्य का परिवर्तन ही मृत्यु के रूप में प्रकट होता है। हम जन्मे जरूर हैं, परन्तु मिटेंगे नहीं। वृक्ष मरेगा जरूर, किन्तु मिटेगा नहीं। वह फिर सूक्ष्म हो जाएगा, बीज का आकार लेकर। साँस-दर-साँस इन सत्यों को साधना बेशक किसी लेखक के लिए, कवि, आलोचक के लिए आसान नहीं, क्योंकि पुरानी धारणाएँ हमारे चित्त को इतनी मजबूती से अपनी आगोश में लिए हुए हैं कि उससे बाहर निकलकर देखना, सोचना, कल्पना करना मुश्किल से मुश्किल हो गया है। कलम का अपना प्राणत्व है, बीज की अपनी भाषा, अपनी रौनक, अपनी स्वाधीनता है। माटी की अपनी माया, अपना मूल्य, अपनी सत्ता है। जड़ में भी प्राण है और हवा में भी प्राण। हाँ, वह हमारे प्राण जैसा प्राण बस नहीं है। यदि पत्थर क्षीण होता रहता है, तो बेप्राण कैसे हुआ? यदि पानी सूखता है, जलता है, बाढ़मय हो जाता है, तो प्राणहीन कैसे हुआ? यदि कली फूल बनकर एक दिन झड़ जाती है, तो जड़ कैसे हुई? विज्ञान की पहुँच केवल दृश्य तक है। अदृश्य सत्ता की माया में झाँक पाना विज्ञान के वश का नहीं।

साहित्य में मानक जहाँ रीढ़ की भूमिका निभाते हैं, वहीं उसके रेंज को बाधित भी करते हैं। इसलिए मानक रोशनी का काम करें, न कि शिखर के रूप में खड़े हो जाएँ। आज का साहित्यिक दौर सृजन के पुराने मानकों को सलाम करने, प्रचलित मानकों से परहेज करने और अभिनव मानकों को स्थापित करने का दौर है। नित नया परिवर्तन नए मानकों की पुकार कर रहा है। जबकि हमारे वर्तमान साहित्यकार अक्सर पुराने, बने-बनाए मानकों से काम चलाने के आदी हैं। भाषा, वाक्य-विन्यास, कहन-शैली, अभिव्यक्ति-कौशल, कल्पना-प्रवणता और नई सोच को स्थापित करने का साहस एक सिरे से गायब है। भौतिक जगत को देखने का नजरिया भी बेहद स्थूल, लीकप्रेमी और नवोन्मेषरहित है। कह दिया गया, भौतिक सत्ता जड़ है, तो मान बैठे कि हाँ, जड़ है। बताया गया कि हम सृष्टि के श्रेष्ठतम अस्तित्व हैं, तो गर्व से अकड़ गए कि हैं हम श्रेष्ठतम। लिखा गया कि जो दृश्य है, वही भौतिक है, तो दृश्य से बाहर हमने सोचना ही बंद कर दिया। जबकि भौतिकता कारण नहीं, परिणाम है। हाँ, वह हमारी मौजूदगी का अनिवार्य कारण जरूर है, परन्तु उसकी सत्ता का रहस्य अदृश्य में है। जब तक सर्जक की निगाह उस अदृश्य कारण पर नहीं टिकती, तब तक भौतिकता का असाधारण महत्व समझ में नहीं आएगा। दूसरे-भौतिकता की सत्ता अनेक आयामी है, जहाँ प्रतिक्षण परिवर्तन का चक्र घूम रहा है। परिवर्तन की प्रकृति अदृश्य है, किन्तु वह दृश्य में परिवर्तन का कारण है। एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदलाव ही परिवर्तन की खबर देता है। यह भौतिकता अमर है, कालजयी, अविनाशी, अनंत और आज तक अज्ञेय। किन्तु विज्ञान और दर्शन बार-बार उसके जान लेने के दावे पेश करते हैं। सच तो यह है, विज्ञान और दर्शन भौतिकता की यथातथ्य व्याख्या और मीमांसा करते हैं। मनुष्य, जीव, जन्तु और वनस्पतियों के निर्माण में उनकी किस हद तक अनिवार्य भूमिका रही और आगे तय होने वाली है, यह विज्ञान नहीं बता सकता। नीलाकाश हमारा चित्त ऊँचा क्यों कर देता है? पानी को देखते ही मन बहने क्यों लगता है? सूर्य को निहारते ही अंग-अंग में उद्दाम जोश क्यों उठने लगता है? रात हमारे हृदय को संकुचित क्यों कर देती है? ऐसे सैकड़ों प्रश्न हैं, जिनका सटीक उत्तर विज्ञान के पास नहीं है। इसका सम्यक् जवाब या तो साहित्य दे सकता है, या फिर चेतना-सम्पन्न दर्शन। यह भौतिकता रूप, रंग, आकारमय तो है ही, स्वादमय भी है, ध्वनिमय भी और काव्यात्मक अर्थों में मनुष्यतापूर्ण भी। यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि यदि हममें प्राण हैं, तो भौतिकता में महाप्राण। यदि हममें जीवन है, तो भौतिकता में महाजीवन। यदि हम श्रेष्ठतम हैं अब तक, तो भौतिकता सार्वकालिक श्रेष्ठतम। कहना जरूरी है, अब भौतिकता की सार्वकालिक सत्ता को घोषित करने का वक्त आ चुका है, जो “साहित्य के परिवर्तन काल” का मूलमंत्र होगा।

साहित्य का पहिया मनुष्य के मनोविज्ञान पर घूमता है। जहाँ हित का भाव, वहाँ साहित्य। हित की भावना जन्म कहाँ लेती है? हृदय में। हृदय निर्मित किससे है? संवेदनाओं से। संवेदनाओं का संचालक कौन है? बुद्धि और मन। बुद्धि और मन में कौन ज्यादा अहम है? उत्तर निकलेगा-मन। बुद्धि से जीवन चलता है और मन से आदमी का शरीर। सिग्मंड फ्रायड ने मन के तीन स्तर निर्धारित किए-चेतन, अवचेतन और अचेतन। किन्तु थमकर जरा सोचें। इन तीनों के भी कई उपस्तर हैं। जैसे प्रकाश के मुख्य रंगों के कई उपरंग। चेतन सतही होता है, अति सजग और अल्प सजग भी होता है। सभी मनुष्यों में चेतन का स्तर उसकी योग्यता के अनुसार अलग-अलग होता है। इसी तरह अचेतन, जिसे स्वयं फ्रायड ने भी एक अज्ञात समुद्र की तरह देखा है, अपने आप में अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण माया है। जाल भी है, परन्तु बहुत आकर्षक, सुंदर और सृजनात्मकता से लबरेज। शेक्सपीयर ने अपने नाटकों में असंख्य जटिल चरित्रों के बहाने क्या खूब अचेतन मन की गुत्थियों को सुलझाने की कालजयी चेष्टा की है।

रामचंद्र शुक्ल

आलोचना-पुरुष रामचंद्र शुक्ल ने लोभ, प्रीति, घृणा, ईर्ष्या, श्रद्धा, भक्ति जैसे निर्णायक मनोभावों की दार्शनिक मीमांसा की, जो आज भी प्रतिमान जैसे हैं, किन्तु ये ही मनोभाव मौजूदा सदी के बहुविध यथार्थ से टकराकर नई करवट बदलते हुए नई मीमांसा की माँग कर रहे हैं। जिस तरह भारत के गाँव अकेले प्रेमचंद और रेणु से पूरे नहीं होते, वैसे ही मूलभूत मनोभाव अकेले रामचंद्र शुक्ल से सम्पूर्ण नहीं होते। सिर्फ लोभ पर जरा ध्यानस्थ निगाह केन्द्रित कीजिए, आपको अनेक अनजानी लोभमय रश्मियाँ उठती हुई दिखाई देंगी, जो किसी भी मीमांसक के द्वारा नहीं प्रकट हो पाईं। एक मनोभाव का तालमेल कितने मनोभावों से ज्यादा बैठता है और कितने से बिल्कुल नहीं, इसकी तात्विक मीमांसा इतनी सरल नहीं। निस्संदेह शुक्ल जी ने आपस में सहयोग करने वाले और एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े मनोभावों की सूत्रात्मक व्याख्या की है, किन्तु उन्हें मुकम्मल करना अभी बहुत गहराई तक शेष है।

आगामी साहित्यिक दौर का सबसे निर्णायक क्षेत्र होगा, भावनाओं का विश्व। जो मन और बुद्धि के साथ-साथ अंतरात्मा से अभिन्नतः जुड़ा हुआ है। प्रायः हम भावना के विकास में कल्पना की भूमिका को उपेक्षित कर देते हैं, किन्तु स्वस्थ और परिपक्व कल्पनाशीलता के बगैर कीमती भावनाओं का निर्माण हो ही नहीं सकता। भावनाएँ मन में जन्म लेती हैं, इसीलिए उन्हें मनोभाव कहा गया। जबकि अनुभूति, स्मृति, कल्पना, बुद्धि, चेतना और प्रेम से मिलकर निर्मित होती हैं-भावनाएँ। 9 स्थायी भावों और 33 संचारी भावों के बूते मानवीय भावनाओं का भवन खड़ा किया गया है। ये भावनाएँ या मनोविकार (शुक्ल जी के अनुसार) इतने तरल, परिवर्तनशील और अप्रत्याशित प्रकृति के होते हैं कि उनको एक परिभाषा में बाँध ही नहीं सकते। वे समय के सापेक्ष भी होते हैं, निरपेक्ष भी। समयाधीन होते हैं और समय की सीमा से बाहर भी। जीवनपोषक भी होते हैं, जीवनघातक भी। असीम कद के होते हैं और मामूली आकार-प्रकार के भी। सतही भी होते हैं और गहनतम भी। मनुष्य की प्रज्ञा का मानक बुद्धि की तीक्ष्णता नहीं, बल्कि ये मनोभाव हैं।

यदि समकालीन हिन्दी साहित्य अपने 50 वर्षों की अर्द्धशतकी पारी खेलने के बाद किसी निर्णायक दिशा की ओर मुड़ना चाहता है, तो संभवतः उसे परिवर्तनवादी होना होगा। परिवर्तन की केन्द्रीय भूमिका को स्वीकार करना पड़ेगा। एक बार साहित्य के परिवर्तन काल की घोषणा करनी होगी।


[मज्झिम प्रतिपदा भरत प्रसाद का स्थायी स्तंभ है जिसे हर महीने के पहले शनिवार को पढ़ सकते हैं।]

●●●●

भरत प्रसाद

भरत प्रसाद
हिंदी विभाग
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय
शिलांग – 793022
मेघालय।
अक्टूबर – 2026

Tags: अनहद कोलकाता Anhad Kolkata हिन्दी बेव पत्रिका Hindi Web Magzineभरत प्रसादमज्झिम प्रतिपदा - आनहद कोलकाता पर स्थायी संतंभमज्झिम प्रतिपदा -3- भरत प्रसादसाहित्य का परिवर्तन कालस्थायी स्तंभ
ShareTweetShare
Anhadkolkata

Anhadkolkata

अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें। प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।

Related Posts

 राहुल झा की कविताएँ

 राहुल झा की कविताएँ

by Anhadkolkata
November 6, 2026
1

राहुल झा राहुल झा की इन कविताओं में स्मृति, अनुपस्थिति, स्पर्श और दृश्य के भीतर छिपी मनुष्यता की एक बेहद कोमल और आत्मीय दुनिया आकार लेती...

फ़िराक़ से आलोकधन्वा तक –  ललन चतुर्वेदी

फ़िराक़ से आलोकधन्वा तक – ललन चतुर्वेदी

by Anhadkolkata
November 5, 2026
2

समकालीन वैश्विक बहस में यह प्रश्न और जटिल हुआ है। यौन उत्पीड़न, नस्लवाद, स्त्री-विरोध, राजनीतिक दमन अथवा अन्य अनैतिक आचरण के आरोपों से घिरे लेखकों की...

नवीन रांगियाल की कविताएँ

नवीन रांगियाल की कविताएँ

by Anhadkolkata
November 5, 2026
0

नवीन रांगियाल नवीन रांगियाल की इन कविताओं में प्रेम, विरह, स्मृति, अकेलेपन और मृत्यु के अनुभवों से गुजरते हुए जीवन की उन महीन संवेदनाओं को अभिव्यक्ति...

लोचन कोना-7 — प्रफुल्ल कोलख्यान

लोचन कोना-7 — प्रफुल्ल कोलख्यान

by Anhadkolkata
November 4, 2026
0

लोचन कोना-7 — प्रफुल्ल कोलख्यान प्रेमचंद के विचार से — साहित्य अपने सर्वोत्तम रूप में जीवन की आलोचना है। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा,...

मृत्युंजय प्रभाकर की कविताएँ

मृत्युंजय प्रभाकर की कविताएँ

by Anhadkolkata
November 3, 2026
2

मृत्युंजय प्रभाकर मृत्युंजय प्रभाकर की ये कविताएँ वर्तमान समाज, राजनीति और मनुष्य के अंतर्विरोधों की गहरी पड़ताल करती हैं। उनकी कविता में एक ओर कवि की...

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.

No Result
View All Result
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.