• मुखपृष्ठ
  • अनहद के बारे में
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक नियम
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
अनहद
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
No Result
View All Result
अनहद
No Result
View All Result
Home कविता

नवीन रांगियाल की कविताएँ

समकालीन कविताएँ

by Anhadkolkata
November 5, 2026
in कविता, लेखक, साहित्य
A A
0
Share on FacebookShare on TwitterShare on Telegram
नवीन रांगियाल

नवीन रांगियाल की इन कविताओं में प्रेम, विरह, स्मृति, अकेलेपन और मृत्यु के अनुभवों से गुजरते हुए जीवन की उन महीन संवेदनाओं को अभिव्यक्ति मिली है, जो अक्सर हमारी रोजमर्रा की व्यस्तताओं में अनकही रह जाती हैं। उनकी कविताओं में प्रेम किसी आदर्श या भावुक कल्पना की तरह नहीं, बल्कि अपनी तमाम विफलताओं, अधूरेपन, बेचैनियों और आत्मस्वीकृतियों के साथ उपस्थित है। ‘गलत जगह’ में प्रेम और मृत्यु के बीच का धुंधलका है, तो ‘आत्मीय समीपता’ में दूरी को आत्मीयता के एक नए अनुभव में बदल देने की संवेदनशील कोशिश। ‘सतही आदमी’, ‘कम प्यार’ और ‘माफ़ी और शुक्रिया’ जैसी कविताएँ प्रेम के भीतर उपस्थित विडंबनाओं, असुरक्षाओं और मनुष्य की भावनात्मक सीमाओं को बेहद आत्मीय ढंग से सामने लाती हैं। इन कविताओं में स्मृति केवल अतीत का पुनरावर्तन नहीं, बल्कि वर्तमान को अर्थ देने वाली एक जीवंत उपस्थिति है।

नवीन की कविता की विशेषता उसकी सहज, संवादधर्मी और आत्मस्वीकृतिपरक भाषा है, जिसमें साधारण वस्तुएँ, जगहें, आवाज़ें और दृश्य भी प्रेम तथा विरह के गहरे अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। ‘जगहें’ और ‘मैंने उन सब से प्रेम किया’ जैसी कविताएँ बताती हैं कि प्रेम किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके स्पर्श से पूरी दुनिया में फैल जाता है। वहीं ‘लड़के’ और ‘लैला-मजनू’ में अकेलेपन तथा मृत्यु की अनिवार्यता के बीच मनुष्य की असहायता और उसकी भावनात्मक दुनिया का विस्तार दिखाई देता है। इन कविताओं में एक ऐसा मनुष्य उपस्थित है जो प्रेम करना चाहता है, अपनी विफलताओं को स्वीकारता है और जीवन की क्षणभंगुरता के बावजूद स्मृतियों तथा संबंधों में अर्थ तलाशता रहता है। यही आत्मीयता, ईमानदारी और संवेदनात्मक गहराई नवीन रांगियाल की कविताओं को पाठक के भीतर देर तक जीवित रखती है।

 

गलत जगह

जो फूल उसे देने के लिए चुने थे
उन्‍हें देवताओं के सिर पर चढ़ा आया

Related articles

फ़िराक़ से आलोकधन्वा तक – ललन चतुर्वेदी

लोचन कोना-7 — प्रफुल्ल कोलख्यान

कुछ मोगरे अर्थि‍यों पर रख दिए मैंने
जि‍न्‍हें अपने जूड़े में लगाना चाहती थी वो

मैं प्रेम और मृत्‍यु में फर्क नहीं कर सका
मैंने हमेशा गलत जगहों पर फूल रखे.

 

मैं मरा दो बार

तुमने प्रेम किया
जीवन नहीं जिया
तुम ‘एक’ बार मरोगी

मैंने प्रेम किया—
और जीवन भी जिया
मैं मरूँगा ‘दो’ बार
एक बार प्रेम में
दूसरी बार जीवन में मरूँगा।

 

आत्मीय समीपता

तुम्हारी दूरियों में
मैंने सीखी आत्मीय समीपता

अकेलेपन का शोर नहीं मचाया
उदासियों में किए सबसे सुंदर काम

अधूरी रह गईं कविताओं के लिए रोया नहीं
मैंने उन्हें पवित्र प्रतीक्षा माना

मैंने विफलताओं का शोक नहीं मनाया
सबसे बुरे समय में
मैंने चाही सबसे नाज़ुक टहनियाँ

दुःख को ठेस नहीं पहुँचाई
उसे आने दिया

जीवन कुछ और नहीं
इस बात का सबक था
कि सुख और दुःख का संतुलन बना रहे

तुम्हारी दूरी में
मैंने बस इतना जाना—
किसी धुंधली बुझती हुई शाम में
तुम्हारी याद का एक टुकड़ा
तुम्हारी आवाज़ की एक किरिच
एक लंबी चुप्पी
और पसरने के लिए एक कुर्सी काफ़ी थी।

 

सतही आदमी

तुम्हारे साथ मैं कितना सतही आदमी था
प्यार, प्यार
और बस प्यार करता रहा

कॉफ़ी
रूमाल
चॉकलेट
और चाबी के छल्लों में गुजार दिए दिन

उस थोक बाज़ार में
कितने लोग पहचानने लगे हमें
जहाँ से तुम्हारे स्कार्फ़
आईलाइनर, सन कोट और धूप के चश्में ख़रीदे

कई शामें तुम्हारे लिए वो काजल ढूँढ़ने में गुज़ार दीं
जो देर तक टिका रहे तुम्हारी आँखों में

नहीं आने वाले उस अनजान सुख के लिए
कितना वक़्त गंवाया हमने साथ-साथ

इस ज़िंदगी में कितनी चीज़ें थीं आसपास
जिनसे नफ़रत कर सकता था मैं
जब तक तुम बिछड़ नहीं गई
यह जान ही नहीं पाया
कि घृणा और प्रतिशोध के भी मूल्य होते हैं

तुमसे अलग होकर ही जान सका
सबसे बुरे होते हैं फूल
बिन बात ही खिलते और हिलते हैं हवाओं में

अब जबकि मैं प्यार में नहीं हूँ
बादल क्यों बेवजह निकल आते हैं आसमान में?

धूप कितनी क्रूर है
जिस घर में कोई मर गया—
उसी के आँगन में खिल आती है

चाँद हर शाम पसर आता है छतों पर
मातम की तरह

सुख कितना ख़राब लगता है
तुम्हारे बगैर

दुःख समृद्ध है
कितना मज़ा देता है अकेले में

यह कविता भी एक सुख है
लिखकर मिटा दूँगा
बस, कुछ ही देर में।

 

कम प्यार

मुझे तुम्हारे प्यार से ज्यादा
तुम्हारी मौजूदगी चाहिए

मैं चाहता हूँ तुम मुझे कम प्यार करो
लेकिन ज्यादा से ज्यादा मेरे पास रहो

मैं चाहता हूँ
मुझे कम वक़्त में ज्यादा ज़िंदगी मिले

मुझे समय कम
और समय का अंतराल ज्यादा चाहिए

मैं चाहता हूँ
हम दोनों में इतना प्यार न हो
कि तुम मुझे छोड़कर चली जाओ

हम दोनों के बीच
कम से कम इतनी दूरी हो
कि हम प्यार की अतिरिक्तता में
एक दूसरे को मार न दें

प्यार की तमाम कमी के बावजूद
तुम मेरे साथ रहो

मुझे
बहुत कम प्यार की ज़रूरत है

मैं बस
तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ
कम प्यार
और
कम दुःख के साथ।

 

माफ़ी और शुक्रिया

उन सभी रेल गाड़ियों का शुक्र है
जिन्होंने मुझे तुम तक पहुँचाने का भरम रचा

मैं उन सभी रास्तों का शुक्रगुज़ार हूँ
जिन पर मैं चला तो वे और लंबे होते गए

मैं उन सारी दूरियों को धन्यवाद देता हूँ
जिन्होंने मुझे तुमसे मिलने न दिया

तुम्हारे इरादे का भी शुक्रिया
जिसने मेरे भरम को तोड़ा

तमाम नस्ल के फूलों से माफ़ी माँगता हूँ
जिन्हें तुम्हें देने के लिए तोड़ा—
और किताबों में सुखा दिया

उन रातों को मुहब्बत
जिन्होंने भरी उदासी—
नाउम्मीदी में भी गहरी नींद सुलाया मुझे

तुम्हारी उस याद को गले लगाता हूँ
जिसमें सिसकते हुए मैं दफ़्तर जाता रहा

मुझे उस वक़्त को शुक्रिया कहना चाहिए
जिसने मुझे प्यार में पड़ने से रोका

अच्छा रहा कि इंतिज़ार कभी ख़त्म न हुए
मैं अब भी न आने वाले लोगों का रास्ता देख सकता हूँ

सबसे आख़िर में
मैं उन तमाम डरे हुए आलिंगनों—
सहमें हुए चुंबनों से माफ़ी माँगता हूँ
जिन्हें कुछ सालों के बाद ग़लत ठहराया जा सकता है।

 

आवाज़ों मुझे माफ़ करो

आवाज़ों मुझे माफ़ करो
मैं सुन रहा हूँ बहुत सारा शोर

मौन मुझे माफ़ करो
मुझे तोड़ना पड़ी नाजुक चुप्पियाँ

प्रतीक्षाओं मुझे माफ़ करो
मेरे पास समय नहीं है

आँखें, मुझे माफ़ कर दो
मैं स्थगित करता हूँ स्वप्न देखना

नीले आकाश, मुझे माफ़ कर दो
मैं सारे मौसमों से ऊब चुका हूँ

नींदों और आरामों
मुझे माफ़ कर दो, मैं नहीं लिख सका
तुम्हारे सिरहानों के लिए कोई कविता

भाषा में नहीं बरत सका आसानियाँ

तमाम माफ़ियों—
सहानुभूतियों को मेरी झोली में डाल दो
मैं प्रेम नहीं कर सका
मैं इस समय का सबसे ख़राब आदमी हूँ।

 

मुझे हैरत में डालो

ज़ालिमों मुझे गुस्से से भर दो
मैं किसी मजलूम के काम आऊँ

रिंदों मेरा जाम भर दो
मैं बेहोश होकर गिर जाऊँ

जानवरों मुझे अपनी मनुष्यता दो
मैं आदमियों के काम आ सकूँ

औरतों मुझे दो करुणा
मैं मैला न कर सकूँ किसी का मन

आशिकों मुझे पागलपन दो
मैं प्यार करूँ—और बदले में कुछ न चाहूँ

उदासियों मुझमें भर जाओ
मैं मुस्कराऊँ तो उसे अच्छा लगूँ

किताबों मुझे सवाल दो
थकानों झपकियाँ दो
समय मुझे याद दो

दुनिया के तमाम जादूगरों
मुझे हैरत में डालो

असानियों
मुझे मुश्किलें दो
मैं गिरूँ, उठूँ
मैं फिर से चलूँ

आत्माओं
मुझे आशीष दो कि
मैं प्रेम करूँ
और उसे भूल भी सकूँ।

 

जगहें

हमारे भूल जाने से कुछ नहीं होगा
जगह को याद है हमारा मिलना

जितना प्यार हम नहीं करते
उससे कहीं ज्यादा प्यार
जगहें करती हैं हम से

हम मिलते हैं
फिर बिछड़ जाते हैं
जगहें वहीं रहती हैं
अपनी जगहों पर

हमने कितनी जगहों को छोड़ा
किसी जगह ने कभी हमें नहीं छोड़ा

जगहें—कितनी सदियों से
एक ही जगह पर खड़ी हैं
उनकी प्रतीक्षाएँ—और धैर्य
कितने बड़े हैं—हमारे प्रेम से

मुझे यक़ीन है
जब हम वापस आएँगे
जगहें हमें वहीं मिलेंगी
अपनी जगहों पर।

 

लड़के

लड़के अकेले होते हैं
तब भी
जब वो प्यार में होते हैं
और तब भी
जब वो प्यार में नहीं होते हैं
उन्हें अकेलेपन में एक सिगरेट चाहिए
और एक माचिस

लड़के चाय के लिए
जेब में खुल्ले पैसे रखते हैं
और बटुए में रखते हैं कुछ रसीदें
सूखे गुलाब के फूल
और ज़िंदगी के लिए थोड़ी सी भस्म

लड़के साथ मिलने पर भी उतने ही अकेले हैं
जितना किसी का साथ छूट जाने पर होते हैं अकेले

लड़के, एक साथ कई जगह होते हैं
घर में भी—घर के बाहर भी
और बाहर के बाहर भी होते हैं लड़के

लड़के सब दूर जाते हैं
मंदिर भी और अहातों में भी जाते हैं लड़के

जो लड़के कहीं नहीं जा पाते
वो अपने दोस्तों के घर चले जाते हैं

लड़के भूल जाते हैं दिए गए धोखे
किसी का प्यार
किसी की याद नहीं भूल पाते
लड़के ख़ुशी में शराब पीते हैं
पान खाते हैं
दुःख में खा लेते हैं ज़हर

लड़के गिरते हैं दरियाओं में
नदियों में, खाइयों में
लड़के झूलते हैं पंखों पर
लड़के गिरते हैं ऊँची इमारतों से
पुल से गिरते हैं
लड़कों के आँसू नहीं गिरते किसी के रुमाल पर
उनकी आँखों से सिगरेट के गुल गिरते हैं।

 

मैंने उन सब से प्रेम किया

मैं उन सीढ़ि‍यों से भी प्रेम करता हूं
जिन पर चलकर उससे मिलने जाया करता था
और उस खिड़की से भी
जिसके बाहर देखती थी उसकी उदास आंखें
मुझे अब भी उस अंधेरे से प्रेम है
जिसके उजालों में चलकर पहुंचा था उसके पास

मैंने उन सारी चीजों से प्रेम किया
जो उसके हाथों से छूई गई थी
जैसे दीवार
काजल लगा आईना
कपड़े सुखाने की रस्‍सियां
रूम की चाबियां
और कमरे की सारी खूंटियां
जहां हमने अपनी प्रार्थनाएं लटकाई थीं कभी

मैंने अलमारी में लटके सारे हेंगर्स से भी प्रेम किया
जिनमें सफेद झाग वाले सर्फ की तरह महकते थे उसके हाथ

मैंने उन सारी चीजों से प्रेम किया
जिन्‍हें उसके तलवों ने छुआ था
जैसे ये फर्श
और ये पृथ्‍वी
जैसे ये संसार सारा

इस तरह मैंने दुनिया की हर एक चीज से प्रेम किया
उसके प्रेम में.

 

एडि‍टिंग

अच्‍छी एडि‍टिंग ‘भाषा’ को बचाती है,
अपनी प्रार्थनाओं में जब मैं यह कहता हूं
कि‍ ऊपर वाला ‘बचायेगा’
तो मैं ‘बचायेगा’ को ‘बचाएगा’ लिखता हूं
ऐसे मैंने ‘ए’ की मात्रा बचा ली

मैं उसका ‘इंतजार’ करने के बजाए ‘प्रतीक्षा’ करता हूं
‘प्रतीक्षा’ लिखकर मैं कुछ और उसके करीब चला जाता हूं

मैं ‘प्‍यार’ को ‘प्रेम’ लि‍खता हूं
क्‍योंकि ‘प्रेम’ थोड़ी कम जगह घेरता है

दु:ख में से ‘कॉलन’ हटाकर मैंने उसे छोटा कर दि‍या

‘जिन्‍दगी’ को ‘जिंदगी’ लिखकर आधा ‘न’ हटा देता हूं
मैं हमेशा से जिंदगी को थोड़ी- सी और छोटी कर लेना चाहता था

 

कबूतर

सारे धूसर भूरे कबूतर
मुझे अपनी गुटर- गुं में याद करेंगे

इस शहर की बहुत सी ऊंची इमारतों के बीच
एक गैरमामूली छत पर
कुछ धूसर भूरे कबूतर पीछे छूट जाएंगे

उनके घट के अंतिम नोट से आती
दुनिया की सबसे घुटी हुई आवाज़ पर
हर शाम को मैं बुरी तरह चौंक जाऊँगा

चार सौ पचास किलो मीटर की दूरी पर
अजगर की तरह पसरते
एक दूसरे शहर के शोर में
जब मैं गुम होने लगूंगा धीमे- धीमे
सारे धूसर भूरे कबूतर
मुझे अपनी गुटर-गुं में याद करेंगे.

 

लैला-मजनू

लैला भी मरेगी, मजनू भी मरेगा
उनके बाप भी मरेंगे,
जहां वो रहते हैं वो शहर और सरकार भी मरेगी

जो औरतें गोल गोल रोटियां बनाती हैं वो भी
और जो नर्म मिज़ाज शायर हैं वो भी दुनिया छोड़कर जाएंगे

जिन्होंने बहुत सुंदर फूल- मालाएं तैयार कीं
वो क्यूंकर रुकेंगे दुनिया में

लकड़ी के पलंग, झूले और दरवाजें बनाने वाले अच्छे से अच्छा कारीगर भी जाता ही एक दिन

हमनें उन्हें भी जाते हुए देखा
जिनके हाथ बहुत नर्म और मुलायम थे
जिनकी गर्म हथेलियों में बहुत महफ़ूज़ थी दुनिया हमारी

दुनिया का सबसे अच्छा गोश्त
और शिरखुरमा बनाने वाले उस्ताद को भी खा जाएगी मौत

जो पेटभर खाते हैं
और जो उपवास रखते हैं अपने देवताओं के लिए
उन्हें भी जाना पड़ेगा भगवान के घर

बहुत सुंदर क़सीदे गढ़ने वाले
पतंग और कबूतर उड़ाने वाले आवारा भी जाएंगे

ग़ालिब ग़ालिब चिल्लाने वाले
मीर तकी को रोने वाले

सारे किस्सागोई
और कमाल की बातें करने वाले कवि

साड़ियों को रंगने वाले रंगरेज़
और चाकू की धार तेज़ करने वाले

प्रेम में इतराते बेख़ुद आशिक़
दुनिया के तमाम शराबखानों में बैठे रद्द करदा लोग

होशमंद, बेहोश और रिंद सारे
आज़ाद, गुलाम, गूंगे और बेहरे सब

जो चूड़ियां पहनाते हैं गलियों में घूमकर
जो घर- घर मांगते हैं भीख

जिनके हाथ कमंडल, जिनके गले में नाग
ऐसे योगी और औघड़ भी जाएंगे परदेस

गला फाड़कर अज़ान देने वाले
और मंदिरों में घी जलाने वाले पंडितों को भी दुनिया अपने पास नहीं टिकने देती

क्योंकि ख़ाली करना पड़ती हैं जगहें
क्योंकि जगहों का अर्थ ही होता हैं ख़ाली करना.

 

तुम्हारी बाँहें और नर्क

मैंने तुम्हें जाना
इसलिए तुम मेरी हो
तुम बहुत प्यार के लिए बनी हो
बहुत सारे सुख के लिए

तुम्हें दुनिया की सबसे बेख़ौफ़
और आरामतलब नींद मिलना चाहिए
तुम जागो तो सिर्फ़ मेरे लिए

यह जो वक़्त मिला है थोड़ा-सा
यह काफ़ी नहीं है
मुझे तुम्हारे साथ एक पूरी ज़िंदगी चाहिए
तुम्हारी सनक और तुम्हारी ख़ब्त को झेलने के लिए

और तुम्हारा पागलपन!
उसे सहन करने के लिए चाहिए
चाँद के उजाले की तरह बहुत ठंडा मन
नरमाई लिए एक जिगर

तुम्हारी आँखों को बर्दाश्त करने के लिए
मुझे बहुत सारी आँखें चाहिए

तुम्हारी ख़ूबसूरती को सहने के लिए
मुझे नज़रों का एक पूरा समंदर चाहिए

मुझे बहुत सारे दिल चाहिए
तुम्हारी अनजान हँसी
और तुम्हारे रंग बदलते मिज़ाज को
दुरुस्त रखने के लिए

तुम्हारे बालों को सहन करने के लिए
मुझे बहुत गहरा अंधेरा—कुछ आँधियाँ चाहिए

ओह!
तुम्हारी ख़ूबसूरती और तुम्हारा ये पागलपन
इन दोनों के बीच घुटकर मर जाना कितना हैरतअंगेज है!

क्या यह कम बड़ी त्रासदी नहीं है
कि तुम अब जाकर मिली हो मुझे?
क्या यह कम बड़ी बात है
तुम्हारे आने से पहले की ज़िंदगी
तुम्हारे बगैर गुज़र गई?
क्या यह बड़ा दुःख नहीं है
कि तुम साथ रहोगी या नहीं—
यह हम दोनों नहीं जानते?

क्या मैं तुम्हें उतना भी न चाहूँ
जितना अभी—इस वक़्त मिली हो मुझे?

क्या दुनिया को आदमी के साथ होने वाली
इस त्रासदी को चुपचाप बर्दाश्त कर लेना चाहिए?
क्या मैं ख़राब आदमी हूँ?
मुझे प्यार नहीं मिलना चाहिए?
और कविताओं से छुपा लेना चाहिए सारे दुःख!

अगर यह बर्दाश्त करने लायक बात है तो मुझे बताओ—
तुम्हारी बाहों में और नर्क में क्या फ़र्क है?

___________________________
परिचय
नवीन रांगियाल

जन्म: 12 नवम्बर, इंदौर।
नवीन रांगियाल मध्यप्रदेश के इंदौर से हैं। पेशे से पत्रकार हैं। नई दुनिया, लोकमत समाचार, प्रजातंत्र और दैनिक भास्कर जैसे राष्ट्रीय अख़बारों में सेवाएँ दे चुके हैं। फ़िलहाल दुनिया के सबसे पहले हिन्दी पोर्टल वेबदुनिया डॉटकॉम इंदौर में असिस्टेंट एडिटर हैं।

कविता और गद्य में विशेष रुचि। उनके आलेख, कविताएँ और नियमित कॉलम ‘भारत भवन’ भोपाल से प्रकाशित पत्रिका ‘पूर्व ग्रह’, छत्तीसगढ के रायपुर से प्रकाशित बहुमत, उस्ताद अलाउद्दीन ख़ाँ संगीत एवं कला अकादमी की पत्रिका ‘कलावार्ता’, ‘कविता कोश’, ‘जानकी पुल’ ‘सदानीरा’ समेत ‘रेख़्ता’ के साहित्यिक उपक्रम ‘हिन्दवी’ में प्रकाशित हो चुके हैं।
युवा भारत भवन भोपाल और सैयद हैदर रज़ा फाउंडेशन दिल्ली आदि प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों पर उनकी चयनित भागीदारी रही है।

राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर नियमित लेखन। अपने ब्लॉग ‘औघट घाट’ पर इंडियन क्लासिकल और वेस्टर्न म्यूजिक पर भी नियमित लेखन। पत्रकारिता के साथ ही साहित्य में विशेष योगदान के लिए उन्हें मध्यप्रदेश के स्टेट प्रेस क्लब के ‘शब्द ऋषि’ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। साल 2022 में उन्हें श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए ‘गोपीकृष्ण गुप्ता सम्मान मिला। साल 2023 में उनका पहला चर्चित कविता संग्रह ‘इंतज़ार में ‘आ’ की मात्रा’ सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। ‘मैं मरा दो बार’ उनका दूसरा कविता संग्रह है। ये कविताएं उनके दोनों कविता संग्रह में से ली गई है।

नवीन रांगियाल
संपर्क: 68, रजत जयंती कॉम्पलेक्स,
स्कीम नंबर- 54, विजय नगर, इंदौर, मप्र
ईमेल: navin.rangiyal@gmail.com

 

Tags: अनहद कोलकाता Anhad Kolkata हिन्दी बेव पत्रिका Hindi Web Magzineनवीन रांगियालनवीन रांगियाल की कविताएँसमकालीन कविताहिन्दी कविताएँ
ShareTweetShare
Anhadkolkata

Anhadkolkata

अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें। प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।

Related Posts

फ़िराक़ से आलोकधन्वा तक –  ललन चतुर्वेदी

फ़िराक़ से आलोकधन्वा तक – ललन चतुर्वेदी

by Anhadkolkata
November 5, 2026
1

समकालीन वैश्विक बहस में यह प्रश्न और जटिल हुआ है। यौन उत्पीड़न, नस्लवाद, स्त्री-विरोध, राजनीतिक दमन अथवा अन्य अनैतिक आचरण के आरोपों से घिरे लेखकों की...

लोचन कोना-7 — प्रफुल्ल कोलख्यान

लोचन कोना-7 — प्रफुल्ल कोलख्यान

by Anhadkolkata
November 4, 2026
0

लोचन कोना-7 — प्रफुल्ल कोलख्यान प्रेमचंद के विचार से — साहित्य अपने सर्वोत्तम रूप में जीवन की आलोचना है। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा,...

मृत्युंजय प्रभाकर की कविताएँ

मृत्युंजय प्रभाकर की कविताएँ

by Anhadkolkata
November 3, 2026
2

मृत्युंजय प्रभाकर मृत्युंजय प्रभाकर की ये कविताएँ वर्तमान समाज, राजनीति और मनुष्य के अंतर्विरोधों की गहरी पड़ताल करती हैं। उनकी कविता में एक ओर कवि की...

अखंड भारत से खंडित समाज तक : वर्णव्यवस्था की भूमिका

अखंड भारत से खंडित समाज तक : वर्णव्यवस्था की भूमिका

by Anhadkolkata
November 2, 2026
0

अखंड भारत से खंडित समाज तक : वर्णव्यवस्था की भूमिका — नन्दलाल भारती नन्दलाल भारती सभ्यता का गौरव और समाज का अंतर्विरोध भारत की सभ्यता का...

ब्रॉउन कुमार – सत्यनारायण पटेल

ब्रॉउन कुमार – सत्यनारायण पटेल

by Anhadkolkata
November 1, 2026
1

सत्यनारायण पटेल सत्यनारायण पटेल की कहानी ‘ब्रॉउन कुमार’ समकालीन भारतीय समाज, राजनीति और व्यवस्था के अंतर्विरोधों को तीखे व्यंग्य के माध्यम से उजागर करती है। ब्रॉउन...

Next Post
फ़िराक़ से आलोकधन्वा तक –  ललन चतुर्वेदी

फ़िराक़ से आलोकधन्वा तक - ललन चतुर्वेदी

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.

No Result
View All Result
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.