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Home कविता

 राहुल झा की कविताएँ

समकालीन कविताई

by Anhadkolkata
November 6, 2026
in कविता, लेखक, साहित्य
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1
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राहुल झा
राहुल झा की इन कविताओं में स्मृति, अनुपस्थिति, स्पर्श और दृश्य के भीतर छिपी मनुष्यता की एक बेहद कोमल और आत्मीय दुनिया आकार लेती है। कवि उन लोगों, आवाज़ों और अनुभवों तक पहुँचने की कोशिश करता है जिनसे उसका प्रत्यक्ष मिलना नहीं हुआ, लेकिन जो भीतर किसी अनकही उपस्थिति की तरह बसे हुए हैं।
मंगलेश डबराल की स्मृति में लिखी कविता में अनुपस्थिति का अपना एक भूगोल है, तो रफ़ी साहब की आवाज़ में ईश्वर की संभावित ध्वनि सुनाई देती है। ‘मैं पृथ्वी छूता हूँ’ में स्पर्श महज़ एक भौतिक अनुभूति नहीं रह जाता, बल्कि फूल के रंग, चराग़ की लौ, मनुष्य की आदिम जिजीविषा और जीवन की बची हुई नमी को छूने का एक गहरा दार्शनिक अनुभव बन जाता है। ‘दृश्य में विलाप है’ अपने समय की सामूहिक पीड़ा और त्रासदी को कुछ मार्मिक बिंबों में समेटती है। वहीं असरानी पर लिखी कविताओं में एक कलाकार की उपस्थिति किस तरह अकेलेपन की नीरवता में हँसी, दिलासा और जीवन की हरारत लौटा सकती है, इसका सुंदर काव्यात्मक आख्यान मिलता है।
इन कविताओं की विशेषता यह है कि वे बड़े भावों को ऊँची आवाज़ में व्यक्त नहीं करतीं, बल्कि स्मृति की धुँध, रोशनी की मद्धिम आभा और आत्मा की भीतरी नमी से एक ऐसी संवेदनात्मक भाषा रचती हैं, जहाँ कविता दृश्य से आगे जाकर मनुष्य के भीतर घटित होती है।


जिनसे मिलना नहीं हुआ कभी

[कवि मंगलेश डबराल को याद करते हुए ]

जिनसे मिलना नहीं हुआ कभी
उन्हें अलविदा कहने से बचा रहा…

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जिनके दरवाज़ों पर दस्तक नहीं दिया कभी
उनके घर की याद बनी रही…

जिन अजनबी गलियों की आहों को सुना नहीं कभी
उन आवाज़ों की रूह भटकती रही भीतर…!

 

रफ़ी साहब को याद करते हुए

मैंने ईश्‍वर की आवाज़ नहीं सुनी…

चिड़ियों की भाषा
और पँखुड़ियों पर बैठी ओस से
गुजरकर

तुम्हारी आवाज़
जब
बूँदों-सी बजने लगी भीतर….

तो लगा
ईश्‍वर की आवाज़ तुम्हारी ही जैसी होगी …!

 

मैं पृथ्वी छूता हूँ

मैं फूल छूता हूँ
तो उस रंग को भी छूता हूँ…

जो दम तोड़ चुकी इच्छाओं के बाद भी
बचा था

वसंत की तरह …!

मैं चराग़ छूता हूँ
तो उस लौ को भी छूता हूँ

जो हज़ारों बुझ चुकी आत्माओं के बीच
उठ रही थी
अभी भी

धुन की तरह…!

मैं पृथ्वी छूता हूँ
तो उस मनुष्य को भी छूता हूँ…

जो एक ख़त्म हो रही सभ्यता के मुहाने पर
खड़ा था आज भी

एक आदिम ज़िद की तरह…!

मैं तुम्हें छूता हूँ
तो उस साँस को भी छूता हूँ.

 

दृश्य में विलाप है

दृश्य में विलाप है…

इतना विलाप
कि जैसे कोई अंतिम साँस हो…!

दृश्य में चीख़ है…

इतनी चीख़
कि जैसे कोई आख़िरी आवाज़ हो…!

दृश्य में पीड़ा है…

इतनी पीड़ा
कि जैसे पलक मूँद लेने का विक्षत अँधकार हो…!

 

असरानी: कुछ कविताएँ

1.

‘जैसे प्रार्थना के शब्दों की शुद्धता में ईश्वर’
जैसे खिली धूप में
कामनाओं की उड़ती तितलियाँ…

वैसे ही
खुशी और हरारत की
एक पूरी हरी महिमा के साथ

दृश्य में असरानी का आना था…!

 

2.

दृश्य में
असरानी का होना

किसी परिचित…दिलासा भर चेहरे का होना था

इतना…
बस इतना ही काफी था

किसी का अपना होना…!

3.

हँसी लौट आती है
अकेलेपन की नीरव प्रार्थना में…

पहली बार मैं देखता हूँ :
क़िरदारों की विहँसती ख़ामोशी में

रंग और रौशनी के बीच जगमग
ज़िंदगी को

जिसके दृश्य में

लोबान की गंध की तरह फैल जाते हैं असरानी…!

 

4.

दृश्य की गंदुमी धुँध में
आकर…

खिलखिलाकर
एक पूरी हँसी हँसते हैं …असरानी

जिसके साथ-

समय और कामना की
गहन लाल आँखों में छूटकर…

एक मद्धिम पीली रोशनी में लगातार विहँसता है नायक…!

5.

दृश्य में
असरानी का होना दरअसल

अपने भीतर की एक नमी
और बची-खुची उस हँसी के वैभव को
छूना था

जिसके बग़ैर
न जीने में गुरुर आ पाता था

न क़िरदार में लिहाज़….!


राहुल झा कवि, चित्रकार एवं घनघोर पाठक हैं। इस पोस्ट की सारी तस्वीरें राहुल झा की ही बनाई हुई हैं।

राहुल झा

जन्म: 12/012/1980

शिक्षाः स्नातक

सृजन- हिंदवी, वागर्थ, समालोचन, सदानीरा. असुविधा, विपाशा, विश्वरंग, कृत्या, आजकल, समकालीन जनमत, सेतु, आकंठ, जनपथ, समावर्तन, पहली बार, अनहद, इरावती, हिमतरु, समकालीन भारतीय साहित्य, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण आदि पत्रिकाओं, ब्लॉग्स एवं समाचार पत्रों में कविताएँ प्रकाशित।

कुछ रेखाचित्र प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में शामिल…सिनेमा पर गहरी दिलचस्पी के कारण निरंतर लेखन…।
सम्प्रति : लिमिटेड कंपनी में एडमिन के तौर पर कार्यरत ।

संपर्क : 9582433444

ईमेल: rahuljhamunger @gmail.com

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Comments 1

  1. ललन चतुर्वेदी says:
    5 hours ago

    शानदार कविताएं हैं।
    मुलायम घास पर चलने से जैसी सुखद अनुभूति होती है, वैसी ही इन कविताओं को पढ़कर हुई।

    Reply

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अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

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