
केशव शरण की इन कविताओं में जीवन के साधारण अनुभवों, प्रकृति की सहज लय, प्रेम की आत्मीयता और मनुष्य की मुक्ति-कामना से निर्मित एक संवेदनशील काव्यलोक दिखाई देता है। उनकी कविता चुप्पी के चट्टानी बोझ को तोड़ते निर्झर की तरह फूटती है, तो कहीं एक छोटी-सी चिड़िया की क्षणिक उपस्थिति में जीवन की चंचलता और उसकी अनिश्चितता को पकड़ लेती है। ‘तुम्हारे इन्तज़ार में’ प्रेम की बेचैनी को प्रकृति के विभिन्न वृक्षों के नीचे बदलती प्रतीक्षा के माध्यम से व्यक्त करती है, जबकि ‘ख़ुशख़बरी’ दुख के झरने में भी भविष्य की संभावनाओं और नई कोंपलों के उगने का विश्वास जगाती है। ‘प्यार में पहचान’ सामाजिक विभाजनों से परे मनुष्यता की नई पहचान का स्वप्न देखती है, वहीं ‘तुम्हारा दिल’ और ‘चल दूँगा तुरंत’ मनुष्य के भीतरी अवसाद, बंधनों और नए जीवन की आकांक्षा को स्वर देती हैं। प्रकृति यहाँ केवल सौंदर्य का उपादान नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि और आत्मचिंतन का माध्यम है। इन कविताओं की सहज भाषा, बोलचाल की आत्मीयता, लयात्मकता और कथन की सादगी उन्हें पाठक के निकट ले आती है। केशव शरण छोटी-छोटी अनुभूतियों में जीवन के बड़े अर्थ खोजते हैं और बिना किसी अतिरिक्त वैचारिक बोझ के प्रेम, स्वतंत्रता, परिवर्तन तथा मानवीय गरिमा के पक्ष में अपनी कविता को खड़ा करते हैं।
एक निर्झर की तरह कविता
कितनी जगह
कितने मौकों पर
मुझे चुप रहना पड़ता है
चट्टान-सी उस चुप्पी का बोझ
दिल पर सहना पड़ता है
कि अचानक एक रोज़
उसे तोड़ती, धकेलती, बहाती
आती है
एक निर्झर की तरह कविता
और गूँज जाती है पूरी घाटी
उसके हर-हर नाद से!
वह चिड़िया
आधे बित्ते के बराबर
रही होगी वह चिड़िया सुन्दर
कुछ और फुदकती
कुछ और चहकती
मेरी बगिया के अन्दर
इतनी भी क्या जल्दी थी
कि लप्प से आई
और लुप्प से गई
चुस्त, चंगी
रंग-बिरंगी
पंखों वाली!
तुम्हारे इन्तज़ार में
आम के पेड़ के नीचे से
उठा तो
नीम के तले
नीम के तले से उठा तो
कदम्ब के नीचे
और कदम्ब के नीचे से उठा तो
पीपल के तले
तुम्हारे इन्तज़ार में
एक जगह
बैठा नहीं रहा जाता मुझसे
पीपल के तले से उठा हूँ
और चल पड़ा हूँ
गुलमोहर के पास
ख़ुशख़बरी
झाराझार
दुख झर रहा है
और झरता
दिखाई दे रहा है
दूर से
अधपके आख़िरी पत्ते बचे हैं
कल तक वे भी झर जाएँगे
बहरहाल
ख़ुशख़बरी यह कि
ख़ुशियों की कोंपलें
उस पर आने लगी हैं
प्यार में पहचान
प्यार में
पहचान मिट जाती है
इससे लोग
घबराते हैं
लेकिन प्यार करके
वे जान पाते हैं
कि मिटी पहचान से
किस तरह
एक नई पहचान उभरती है
किस तरह
जाति
धर्म
लिंग
रंग
ओहदा
प्यार में समा जाते हैं
और फिर उससे
कितने ख़ूबसूरत रूप उभरते हैं
इन्सानियत के
ख़ुशनुमा!
चल दूँगा तुरंत
यही रहूँगा
इसी बोसीदा कमरे में
जवानी की मधुर यादों के साथ
यहीं रहकर
जो करना है
करूँगा
यहाँ से नहीं टरूँगा
यहीं होगा मेरा अंत
इसी बोसीदा कमरे में
इसे छोडूँगा तभी
जब मुझे ऐसा कमरा मिलेगा
जहाँ से नया जीवन
नई दुनिया दिखाई देगी
उतारूँगा दीवार से तुम्हारी तस्वीर
और चल दूँगा तुरंत!
मुझे अच्छा लगता है
जहाँ पत्ता हिलते हैं
जहाँ फूल खिलते हैं
जहाँ धूप बिछी होती है पेड़ों से लेकर
मिट्टी, पानी, घास पर
जहाँ छायाएँ मुग्ध करती हैं नृत्य विलास कर
और चिड़ियां गाती हैं पल-पल
मुझे अच्छा लगता है वह
जन आबाद परिसर
या फिर निर्जन जंगल
तुम्हारा दिल
तुम्हारा दिल
एक तो ख़ुशहाल नहीं
दूसरे, बंधनों से बुरी तरह आहत है
इसलिए तुम चहकते नहीं हो
बहकते नहीं हो
बहसते नहीं हो
अकड़कर रहते नहीं हो
तुम्हारे दिल में
तहख़ाने नहीं हैं
तुम्हारे दिल में
आईनाख़ाने नहीं हैं
एकदम सादा है तुम्हारा दिल
तुम्हारा दिल
एक बहुत ही उदास दिल है
जो अपार रोना चाहता है
और साथ में
उन्मुक्त और ख़ुशगवार भी
होना चाहता है
विश्रांति
विशाल पेड़ों को उठाए
कठोर भूमि पर
नर्म छाँव का परिसर
शांतिदायक ही नहीं
मनमोहक भी है
पेड़ों की ख़ूबसूरती
भूमि का सौंदर्य
और छाँव का सुकून
ऐसा है कि
उठने नहीं देता है
थकान दूर होने के बाद भी
छाँँव के परिसर के बाहर
कड़ी धूप है
और लम्बी डगर
एक दिन भौंरा भी
भौंरा जीवन-भर
फूलों में घूमता है
कलियों को चूमता है
आनंद से जीता है
मधुर रस पीता है
लेकिन एक दिन
मरता वह भी है
और चींटियों को मिल जाता है
परम स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ
वे टूट पड़ती हैं उस पर
मरणासन्न अवस्था में ही
केशव शरण
जन्म 23-08-1960 , वाराणसी में।
प्रकाशित कृतियाँ
तालाब के पानी में लड़की (कविता संग्रह)
जिधर खुला व्योम होता है (कविता संग्रह)
दर्द के खेत में (ग़ज़ल संग्रह)
कड़ी धूप में (हाइकु संग्रह)
एक उत्तर-आधुनिक ऋचा (कवितासंग्रह)
दूरी मिट गयी (कविता संग्रह)
क़दम-क़दम (चुनी हुई कविताएं)
न संगीत न फूल (कविता संग्रह)
गगन नीला धरा धानी नहीं है (ग़ज़ल संग्रह)
कहाँ अच्छे हमारे दिन (ग़ज़ल संग्रह)
बात करते हैं (ग़ज़ल संग्रह)
गीत संगीत उजाले (ग़ज़ल संग्रह)
रास्ता कहाँ जाए (ग़ज़ल संग्रह)
नहीं आया तो आएगा (प्रतिनिधि ग़ज़लें)
फ़सल को रंग धानी कब मिलेगा (प्रतिरोधी ग़ज़लें)
केशव शरण की पचास श्रेष्ठ कविताएँ (कविता संग्रह)
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