बँगला साहित्य के प्रमुख आधुनिक कवि शक्ति चट्टोपाध्याय (1933–1995) बीसवीं सदी की बँगला कविता के ऐसे विशिष्ट हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने अपनी कविता में जीवन की उदासी, प्रेम की विफलता, प्रकृति की रहस्यमय सुंदरता, अस्तित्व की बेचैनी और मनुष्य की आंतरिक स्वतंत्रता को एक नई काव्यभाषा प्रदान की। वे साठ के दशक में बँगला कविता में उभरे उस विद्रोही साहित्यिक आंदोलन से जुड़े थे, जिसने कविता को रूढ़ सौंदर्यबोध और स्थापित नैतिक मान्यताओं से मुक्त करने की कोशिश की। उनकी कविताओं में एक ओर प्रकृति और ग्रामीण बंगाल की सहज, लगभग स्वप्निल छवियाँ हैं, तो दूसरी ओर आधुनिक मनुष्य का अकेलापन, आत्मसंघर्ष और जीवन के प्रति गहरी अनास्था भी है। शक्ति की कविता का आकर्षण उसकी सहजता में छिपी जटिलता, उसकी गीतात्मकता में अंतर्निहित उदासी और उसके बिंबों की अप्रत्याशित चमक में है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘अवनी, बाड़ी आछो?’ (अवनी, घर पर हो?) बँगला कविता में स्मृति, अनुपस्थिति और एकाकी चेतना का अविस्मरणीय उदाहरण है। जीवन के अनगढ़ अनुभवों, व्यक्तिगत विद्रोह और गहरी संवेदनशीलता को कविता में रूपांतरित करने वाले शक्ति चट्टोपाध्याय ने बँगला कविता को ऐसी आवाज़ दी, जिसमें मनुष्य की मुक्ति की आकांक्षा और उसकी पराजित आत्मा का दुःख एक साथ सुनाई पड़ते हैं।
क्षमा करो
टेबिल-पहाड़ के माथे पर
खिल उठा है रंग का कलश
रोज़ ही खिलता है
रोज़ होती है बारिश लगातार,
टपटप टपटप बिखर जाते हैं शब्द
शब्दों के समुद्र में,
जहाँ शब्दों से बढ़कर है रंग
रंग से बढ़कर माधुर्य
वहाँ उठ आते हैं मूल शब्द
तट की रेत पर रखते हैं सीने के दाग़
लार से भर देते हैं मुँह
कंधे पर सिर रख कहते हैं:
क्षमा करो … हम और नहीं बज सकते!
नदी में बहुत बड़ा हो उठा है चाँद
नदी मानो सपना है,
उसके दोनों किनारे टूटते रहते हैं
बड़ी होती है नदी
फंदे बिछाती है
इन्सान सिर्फ़ अकेला रोता रहता है।
ध्यान से देखो
पेड़ के भीतर पत्ते आकर गिरते रहते हैं अविराम …
जंगल को झाड़ती चलती है हवा
जाना …. इसी तरह चले जाना
लौटना नहीं…।
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हूँ
अकसर लगता है
कि मैं बड़े मज़े में हूँ,
सोता हूँ बैठता हूँ
खाता हूँ खड़े रहता और दौड़ता भी हूँ,
बहुत-से लोग मेरी तरह ऐसा नहीं कर पाते।
बहुतों के यहाँ बेटियाँ नहीं होतीं
इसलिए वे पालते हैं पक्षी
गेहूँ देते हैं, धान देते हैं
कितना कुछ करते हैं
मेरे दुःख और सुख से परिपूर्ण है मेरा घर
कभी-कभी लगता है
कि मैं बड़े मज़े में हूँ।
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अँधेरा देता है उससे भी ज़्यादा
उजाला कितना दे पाता है
जो कुछ देता है …. अँधेरा
जो कुछ देता है अँधेरा देता है
पाप, कटे हुए सिर, नरक का धुआँ
उजाला दे सकता है यह सब?
दे सकता है क्या …?
धूप बहुत कुछ देती है
अँधेरा उससे भी ज़्यादा देता है
छिन्न-विच्छिन्न माँस को रख देता है ज़मीन के भीतर
इन्सान की मज्जा झुलसती है
श्रद्धामय अँधेरे के बुखार में,
धूप बहुत देती है
अँधेरा उससे भी ज़्यादा देता है।
प्रेम थोड़ा-सा देता है
लेकिन प्रेमविहीनता देती है बहुत कुछ
विरह, अगोचर मेघ, हिंस्र-झपट्टे, जीभ और यंत्रणाएँ
अभिभूत कर देती है मज़े-मज़े में सारा दिन
धूप बहुत देती है
अँधेरा उससे भी ज़्यादा देता है!!
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वे
थोड़े-से धान,
हमारे लिए ले आते हैं वे
फलों के बाग़, पोखर, रास्ते की छाया, हंस
हमारे लिए बारहों महीने
उनका यह कष्टबोध, सरल संपर्क, लगे रहना …
कौन हैं वे? कौन हैं वे?
पुकारते हैं इंद्रधनुष, पंछी, किंगफ़िशर …
मैं कहता हूँ
कुछ भी हो, नहीं बताऊँगा।
एक दिन थे वे
क्षुब्धमन बीवी के आसरे पर
एक दिन निर्जन बगीचे में किसने देखी थी स्वप्नों की मुक्ति
और दिन? ठीक से याद नहीं …
विदेशी पथिक ने ही शायद दिखाई थी राह!
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मंदिर के भीतर
मंदिर के भीतर ग़लत अँधेरा था।
बाहर सँकरा रास्ता, बिखरी-बिखरी-सी घास, छाया, पेड़
लोग-बाग़, सुनाई देती है कुल्हाड़ी की आवाज़
आसपास और दूर सुनाई देती है नदी और झरने की आवाज़
पुकारता है पक्षी
लगता है इसके पहले यह पुकार नहीं सुनी थी
किसे पुकारता है?
सूखी और पीली ध्वनि में से उभरती है तसवीर
उस तसवीर में उगता है चाँद … टूटे बर्तन-जैसा
खौलते कड़ाहे-सा
जिसमें शोभा नहीं, शांति नहीं, क्रम नहीं, आँसू नहीं …
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उत्पल बैनर्जी
मूल बँगला से अनुवाद: उत्पल बैनर्जी
डेली कॉलेज कैंपस, इंदौर, मध्यप्रदेश, भारत।
Email : banerjeeutpal1@gmail.com
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