लोकप्रियता और लोकशक्ति के दुश्चक्र में कविता उदास
प्रफुल्ल कोलख्यान
अभिव्यक्ति नहीं तो व्यक्ति नहीं! व्यक्ति अपने को अस्वीकार किया जाना बहुत मुश्किल से बर्दाश्त कर पाता है। हर हाल में अपनी स्वीकृति के लिए लगा रहता है। स्वीकृति और सम्मान के लिए व्यक्ति कुछ भी कर गुजरना चाहता है, कर गुजरने के लिए तैयार बैठा रहता है। कुछ भी करता है तो चाहता है कि लोग उसे देखें, सराहें वाह-वाह कर उठें! कुछ भी यानी कुछ भी! खेल, साहित्य सहित जीवन का कोई भी इलाका हो आदमी जो भी कहता है, सुनता है स्वीकृति और सम्मान के लिए। सीधा-सरल मामला है मान-सम्मान का एक पारस्परिक संदर्भ भी होता है। कुछ मामलों की दृश्यता जीवन के हर क्षेत्र और संदर्भ से जुड़ा होता है जैसे खेल, मनोरंजन आदि। कुछ मामलों की दृश्यता सिर्फ उस मामला से जुड़े लोगों तक सीमित रहती है; बाहरी लोगों के लिए उस क्षेत्र के उस्ताद लोगों की जानकारी जरूरत पड़ने पर ली और दी जाती है। साहित्य का इलाका क्या ह?
साहित्य का इलाका एक विशिष्ट इलाका है। इस से जुड़े हुए लोगों की दृश्यता इस विशिष्ट इलाका में ही बनती है। 14 सितंबर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है उस दिन हिंदी साहित्य से जुड़े लोगों की मांग में थोड़ा, बहुत थोड़ा इजाफा होता है —- थोड़ा, बहुत थोड़ा। प्रभवांतर एक सामान्य प्रक्रिया है। एक साधारण पृष्ठभूमि का साधारण आदमी अच्छी-अच्छी कविताएं लिखता है, चर्चा बहुत कम होती है, वह भी अपने ही मित्रों के बीच स्वीकृति तो वहां भी मुश्किल से ही मिलती है। लेकिन कोई बड़ा धनाढ्य, खिलाड़ी कुछ भी लिखता है और उसे कविता कहकर पेश करता है तो उस की दृश्यता बहुत बढ़ जाती है, चर्चा भी होती है। यह एक इलाके के प्रभावशाली लोगों के दूसरे क्षेत्र में प्रभवांतरण की प्रक्रिया के चलते होता है।
लोकप्रियता का दायरा बढ़ाने के लिए साहित्यकार कभी राजनीति से तो कभी धनाढ्यों की संस्थाओं से जुड़ता है। कभी इस से, कभी उस से जाने किस-किस से यानी जिस-तिस से जुड़ता रहता है; जुड़ने का जुगाड़ भिड़ाने में लगा रहता है। जुगाड़ भिड़ाने में लगे रहने के कारण अपने लिखने के कारणों को ही गंवा बैठता है।
लोकप्रियता और लोकशक्ति में गहरा रिश्ता होता है। दोनों एक-दूसरे से बल प्राप्त करते हैं। दोनों मिलकर एक तरह का दुश्चक्र बनाते हैं और साधारण लोगों या आम लोगों के लिए लोकप्रिय होने और लोकशक्ति से जुड़ने का रास्ता कठिन हो जाता है। लोकतंत्र में किसी एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का लोकप्रियता पर या लोकशक्ति पर कब्जा हो जाना और उनके अपने आप को बाकी लोगों से भिन्न समझना या अलग-अलग सामाजिक समूह बन जाना लोकतंत्र को बेहाल कर देता है।
लोकप्रियता और लोकशक्ति ऊपर से दो अलग-अलग चीजें लगती हैं, पर हैं जुड़वां बहनें। लोकशक्ति से लोकप्रियता आती है और लोकप्रियता से लोकशक्ति। एक आदमी को लोग पसंद करते हैं, तो उसे मंच मिलता है, माइक मिलता है, कैमरा मिलता है। मंच, माइक और कैमरे की दृश्यता मिलने से वह और लोकप्रिय हो जाता है। यह एक घूमता हुआ चक्र है। समस्या तब शुरू होती है जब यह चक्र दुश्चक्र बन जाता है। आज का मीडिया और सोशल मीडिया इस चक्र को ईंधन देता है —- विशेष विशेष संदर्भ के स्वयं प्रकाश का उपन्यास ईंधन को लिया जा सकता है। हां तो कह यह रहा हूं कि जिसके पास पहले से 10 लाख फॉलोअर हैं, एल्गोरिदम उसी को और दिखाता है। जिसके पास कुछ नहीं, उसे बहुत कम देखा जाता है। तो आम आदमी, जो सच में जमीन पर काम कर रहा है, जिसके पास विचार, भाव है, बहुत कुछ है पर प्रचार नहीं, वह इस दौड़ में पीछे छूट जाता है।
लोकप्रिय होने के लिए लोकशक्ति चाहिए, और लोकशक्ति पाने के लिए लोकप्रिय होना जरूरी है। आम आदमी इसी दरवाजे पर अटक जाता है। न उसके पास टिकट है, न पास। यह दुश्चक्र जीवन को और लोकतंत्र को भी दो तरह से बेहाल करता है। पहला, जब एक व्यक्ति या एक छोटा सा समूह इस पूरे चक्र पर कब्जा कर लेता है। वह खुद को ही ‘लोक’ समझने लगता है। “मैं ही जनता हूँ” – यह भावना आ जाती है। वह धीरे-धीरे बाकी समाज से कट जाता है। उसके चारों ओर चापलूसों, सलाहकारों, एक ही विचार के लोगों का एक जबर्दस्त, बहुत जबर्दस्त घेरा बन जाता है।
समाज में अलग-अलग द्वीप बन जाते हैं —- विशेष संदर्भ के लिए अज्ञेय। एक द्वीप में वे लोग जो सत्ता और लोकप्रियता के केंद्र में हैं, और दूसरे द्वीप में करोड़ों लोग जो सिर्फ दर्शक हैं, ताली बजाने वाले हैं। दूसरा खतरा ज्यादा गहरा है – जब यह समूह खुद को बाकियों से नैतिक रूप से श्रेष्ठ समझने लगता है। “हम खास हैं, बाकी आम हैं।” यहीं से सभ्य और बेहतर जीवन की आकांक्षाओं और लोकतंत्र में दरार पड़ जाती है।
लोकतंत्र का मूल मंत्र है —- सभी बराबर —- बराबर में से खास प्रयोजन के लिए कोई विशिष्ट हो जाता है और फिर बराबर होने की मौलिक स्थिति में लौट आता है। बराबरी की अपनी मौलिक स्थिति में जो जितनी सहजता है वह अपने व्यवहार में उतना ही लोकतांत्रिक होता है। एक के प्रति सभी और सभी के प्रति एक का जवाबदेह होना लोकतंत्र का आधार है। लोकप्रियतावाद और वीरपूजा के बीच भी गहरा रिश्ता होता है —- विशेष संदर्भ के लिए बाबासाहेब को जानें। मुझे ठीक-ठीक पता नहीं है क्या यह जवाहरलाल नेहरू की लोकप्रियता में वीरपूजा के लक्षण को देखकर कहा गया था कि लोकतंत्र के लिए वीरपूजा सब से ज्यादा खतरनाक होती है।
खतरनाक होता है लोकप्रिय व्यक्ति का अलग सामाजिक समूह बन जाना —- विशेष संदर्भ के लिए मुक्तिबोध। बड़े-बड़े साहित्यकार, बौद्धिकों और प्रभावशाली लोगों का अलग-अलग सामाजिक समूहों में बंट जाना। ऐसे साहित्यकारों का सामाजिक समूह का सदस्य साहित्यकार तो आलोचना सुनना बंद ही कर देता है। ऐसे राजनीतिक लोगों का सामाजिक समूह का सदस्य भी अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करता है। लोकशक्ति अब सेवा का साधन नहीं, धन बन जाती है।
जब शक्ति संपत्ति बनती है, तो उसे बचाने के लिए शक्तिशाली लोग लोक को ही बांटना शुरू कर देता है – जाति में, धर्म में, भाषा में। इस जाल से निकलने का एक ही रास्ता है – लोकप्रियता का विकेंद्रीकरण। सब कुछ में एक की तलाश करनेवाले केंद्रीकरण के उस्ताद हैं। जाहिर है कि उस्ताद को न विकेंद्रीकरण पसंद है न लोकतंत्र मनमाफिक —- कविगण उदास हैं, कविताएं उदास है! जी कुछ कविगण, कुछ कविताएं!






