
अनहद कोलकाता पर पढ़ते हैं आज संगीता घिल्डियाल की कविताएँ । इन कविताओं में संगीता घिल्डियाल प्रकृति, प्रेम, देह, स्मृति और जीवन के सूक्ष्म अनुभवों को एक विशिष्ट वन-परिवेश में रचती हैं। जंगल यहाँ केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि जीवन और संबंधों का सक्रिय रूपक है—जहाँ गिरगिट के रंग बदलने से लेकर पत्तियों, कीटों, फलों, वर्षा और पेड़ों तक में मनुष्य की इच्छाएँ, आशंकाएँ और स्मृतियाँ प्रतिबिंबित होती हैं। कविताओं की भाषा बिंबात्मक और संवेदनशील है, जिसमें लोक-ज्ञान, वनस्पति-जगत और स्त्री-अनुभव का सुंदर मेल दिखाई देता है। प्रेम इन कविताओं में केवल रूमानी भाव नहीं, बल्कि सहचर्य, प्रतीक्षा, गृहस्थी, देह, स्मृति और जीवन के बीत जाने की गहरी अनुभूति है। विशेष रूप से अंतिम कविताओं में साधारण घरेलू जीवन और भीतर छिपे प्रेम के बीच का तनाव मार्मिक बनकर उभरता है। प्रकृति और मनुष्य के बीच निरंतर संवाद तथा अनकहे को कहने की कोशिश इन कविताओं को उनकी विशिष्ट काव्यात्मक पहचान देती है।
आपकी राय का इंतजार तो रहेगा ही।
संगीता घिल्डियाल की कविताएँ
गिरगिट
अभी देखा उसे जो नव जल में रहता
कभी पीला, हरा ,कभी लाल ,नीला
सरक कर छुप गया कहीं तो
हो गया मिट्टी सा
इस परिधि में कम्पित तो कुछ भी नहीं था
मेरी हृदय गति के अतिरिक्त
तुम ताल से कमल जड़ तोड़ मुस्कराये भर थे
कैसे भाँप गया यह विरूपी
पहला भोग
धरती के इस छोर पर आ बसने को
वनस्पतियों का परिचय जरूरी है प्रिय
दूर्वा के आधे गज ऊँचे होने की कल्पना
उतना ही विशाल शाक पत्ता सोचो तो !
पहली पूर्णिमा कल पीछे जंगल से लाना भानुफल
मुड़ा मत लाना ,गोल भी नहीं ,लाना पीला-चित्तीदार
फ़लदायक होगा जीवन उसके पत्तों पर पाएंगे पहला भोग
एक ही तना उसका वहन करता सौ-सौ फल !
जब भादौं जंगल भी हो जायेगा जल,नम होगी धरती
आग देगा ,ताप देगा इसका तना राख देगा
उससे माँजूंगी हाथ-पैर के नाखून
धार जिनकी तुम्हें है स्वप्न में भी प्रिय ।
ये कौन सा पेय बनाया
इस घने वन से ढूढ़ लाये हो पत्तियां कौन सी ,फूल कौन से
असर यह कि भूलने लगे हो कहा कल का
याद करते हो वह सब जो अभी हुआ नहीं
तुम हर हरे ,अक्षीय त्रिपत्र को लाते हो तोड़
कल का पेय था तो स्वाद जैसे मिश्रित स्वर लहरें
जिव्या के आगे ,पीछे, दाएं, बाएं कहाँ से न उठती !
लेकिन जानते हो उठे नहीं तुम फिर दिन भर
नई भूमि ,नया साथ ,नया परिवेश है प्रिय
संशोधित कर पाक विधाओं को छूट नहीं ले सकते
देखा नहीं !कसमसाता कीट पत्तियों के बीच दोपहर ही
देखा नहीं! कीटभक्षी फूल मसलता बेचारे पतंगों को
क्या वैरागी हो जो पत्तियां चबाने भर से काट लोगे पूष ,माघ !
मेरे रागी हो पहले जानों तो जंगल के इस तल का अनुकूलन।
अब तक लिखा नहीं वह नाम
उस नाम का पहला अक्षर है – ह्रस्व स्वर
उच्चारण में लगता इतना कम समय
सोचने भर से बन जाता ह्रदय
एक नदी का उद्गम
स्वयं उद्गम उस स्वर का कंठ
जहाँ वह तरंग सा फूटता
जैसे ॐ में “अ “ रचता सकल संसार
इस संसार में लिखना चाहती हूं वह नाम
जिसका आख़री वर्ण है स्पर्श व्यंजन
उच्चारण पर जिव्हा छूती दन्त पंक्तियाँ
जैसे अरावली-शृखलाओँ को हवा छू रही अरबों सालोँ से
उससे पहले हवा ने किस पर्वत को छुआ होगा
कहाँ टकराई
कैसे बादल बने
कैसे बरसे
इस ह्रदय , कंठ , जिव्हा के बीच
ऐसे ही टकराता वह नाम
बादल बनाता
धरती को भीगते देख भी
क्यूँ कहती फिर
अब तक लिखा नहीं वह नाम !
बिना शीर्षक के छः कविताएँ
1)
प्रेम देता है आश्वासन
दुनिया की लय में बने रहने का
वक्ष से पहले रखता है पीठ पर हाथ
सहलाता है पंख
हो जाती हैं जब ख़त्म बातें
नीम के पेड़ से बचपन…..किताबों तक
प्रेम कथाओं से …मसान तक
आने देता है
मीठी लम्बी नींद।
2)
कोई जंगल में मरे साँप, गिलहरियों, छौनों के ऊपर मिट्टी डालता
और रखता कुछ फूल
उसका प्रेम अलग-अलग धातुओं सा होगा
और स्पर्श औषधीय
वह बिनता गिरे हुए पत्ते, बीज
व्यवस्थित करता
यह जानते ,
कि रात भर तूफान उठायेंगे गुबरैले वहाँ
3)
यहाँ जंगल में पत्ते हैं गोल ,धारीदार
लिपि जो बनेगी
क्या होगी गोल
या धारदार होंगे वर्ण
तुम अपने जंगलों की बात बताओ
कैसे हैं पत्ते
कितने घूम बढ़ गए हैं उन पर
लिपि कितनी मुश्किल होगी समझनी
बताओ ?
परिणय को बचे हैं बस मास चार ।
4)
रंगों की कूची छुआने से
फटने लगी पानी की छाती
जीवन चिटक कर खुल गया
क्रोशिया की आखिरी गाँठ लगी
दादी- नानी ने ख़त्म किया बुनना
माँ ने इत्मीनान से बक्से में रखा
बेटी की शादी का तोहफ़ा
इस तरह जीवन
गाँठ दर गाँठ बीत गया
भाषा में इसे कहना,
गणित के सबसे कठिन प्रश्न को
बैकबेंचर से पूछना है
हम जीवन की एब्सट्रेक्ट धुनों पर
नाचते हैं रंगों की कूची लिए l
5)
शोरगुल के बीच उसका बसंत है
दुनियादारी में शिशिर ठहरा हुआ
जेठ भर तपती हरी-भरी गृहस्थी
रोटी बनाती , दौड़ती स्कूल
माँ -बाप की दवा,अस्पताल का खर्चा
कमाना- लगाना , पसीने – धूल के बीच
मैली, झुलसी हुई वह..
कोई कभी नहीं जान पायेगा
वह प्रेम में थी ।
6)
मैं उसके पास बैठ सोचती
एक जर्जर काया के सिवाय
क्या है मनुष्य
वह मुँह खोलता खखारता
हलक से एक शब्द निकल
होठों के बीच अटक जाता
उसकी पनीली आँखें
टटोलती बीता समय
जंगल पर पड़ रही बरसात के दिन
पेड़ की फुनगियों पर बैठी धूप
जमीन पर पसरी छाँव
उसके भी आगे पसरा मन
और किसी से राग का आवेग..
वह सोच ही रहा होता
चढ़ जाती गुलाबी रंगत
एक दुपट्टा लहराता
एक पीठ किसी पेड़ पर टिकी इंतज़ार करती
और एक आधा-अधूरा प्रेम ..
पहली बार चूम सकने की चाह
धीमे से आकार लेती
सीपी में बन ने लगता मोती ..
मैं उसके पास बैठ सोचती
किए जा चुके प्रेम और यादों के सिवाय
क्या है मनुष्य के पास !
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संगीता घिल्डियाल
मूल निवास श्रीनगर गढ़वाल
हाल निवास पुणे महाराष्ट्र
8956255924





