• मुखपृष्ठ
  • अनहद के बारे में
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक नियम
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
अनहद
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध
No Result
View All Result
अनहद
No Result
View All Result
Home विविध

अबोली की डायरी – जुवि शर्मा

डायरी

by Anhadkolkata
August 29, 2026
in कला, विविध
A A
0
Share on FacebookShare on TwitterShare on Telegram

Related articles

मेरी ढाका डायरी – मधु कांकरिया

राष्ट्रवाद : प्रेमचंद

जुवि शर्मा

जुवि शर्मा की ‘अबोली की डायरी’ एक ऐसी स्त्री के अंतर्मन की यात्रा है, जो रिश्तों, उपेक्षा, अवसाद, प्रेम, आत्मसम्मान और लेखकीय अस्मिता के बीच लगातार संघर्ष करती दिखाई देती है। डायरी के पन्नों में अबोली का निजी जीवन धीरे-धीरे एक व्यापक स्त्री-अनुभव का रूप ले लेता है।

इस रचना की सबसे बड़ी शक्ति इसकी आत्मस्वीकृतिपूर्ण ईमानदारी है। अबोली अपने टूटने, भूलने, क्रोध, प्रेम और कमजोरियों को बिना किसी आवरण के सामने रखती है। परिवार से मिली उपेक्षा और काशी के प्रति एकतरफा प्रेम उसके भीतर के खालीपन को और गहरा करते हैं। दूसरी ओर, व्योमेश का प्रोत्साहन उसके भीतर सोई हुई लेखिका को फिर से जगाता है। इस तरह लेखन उसके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि धीरे-धीरे जीवित रहने का माध्यम बन जाता है।

डायरी की भाषा कहीं अत्यंत मार्मिक और काव्यात्मक है तो कहीं तीखी और आत्मसंवादी। “इतना खाली कभी नहीं रखना चाहिए अपने आप को कि कभी भर ही न पाओ” जैसी पंक्तियाँ पाठक के मन में देर तक ठहरती हैं। व्यक्तिगत पीड़ा के साथ सामाजिक और पारिवारिक विडंबनाओं पर की गई टिप्पणियाँ इस रचना को निजी डायरी से आगे ले जाती हैं।

तो आइए पढ़ते हैं सेतु प्रकाशन से प्रकाशित अबोली की डायरी के कुछ दिलचस्प अंश। आपकी राय का इंतजार तो रहेगा ही।

अबोली की डायरी 

जुवि शर्मा

 

27 मार्च 2015

शाम को वाक पर काशी प्रोविजन स्टोर तक जाती हूँ। सामने स्टोर के बाहर चलते पत्थर दिल इंसानों की थकान दूर करने के लिए पत्थर की बेंचे बिछी थीं, जिस पर मैं पत्थर सी उसी पत्थर पर अपना सिर टिकाने का कोई ठिकाना ढूँढ़ लेती। कुछ याद नहीं रहता, नाम याद नहीं रहता, विजय हँसी उड़ाते हैं कि गले में घर के पते की तख्ती लटका देते हैं। मेरा बहुत मन करता है कि चलते-चलते इतनी दूर निकल जाऊँ की वापसी नामुमकिन हो, लेकिन बच्चों का मोह खींच लाता है। खाना हजम नहीं होता, डॉक्टर ने शराब बिल्कुल मना की है।

मुझे भी कहाँ अच्छा लगता है पीना, हर बार एक आत्मग्लानि से भर उठती हूँ। मुझ पर तो मेरा प्रतिबिम्ब भी रोता होगा जिसने कभी चाय-कॉफी का स्वाद न चखा आज क्या दशा हो रही है। दो पेग तक तो कुछ मालूम ही नहीं पड़ता। विजय कहते हैं, तुम्हारी कैपेसिटी तो मुझसे भी अच्छी है। विजय कुछ नहीं जानते मुझे उनकी मूर्खता पर हँसी आती है।

कल बच्चों की आखिरी परीक्षा है, विजय बोल रहे हैं अम्बर के पास हो आओ मन बहल जाएगा। आराम से एक दो महीने रहकर आओ लेकिन मैं मम्मी-पापा का सामना नहीं करना चाहती। अम्बर की पत्नी अनामिका भी रोज फोन करती है दीदी आ जाओ, बच्चों को देखने का मन हो रहा है लेकिन मम्मी बोलती है हफ्ता दस दिन का प्रोग्राम बनाकर आना। अब विजय को क्या बताऊँ कि मैं जाना भी नहीं चाहती और ना ही कोई बुलाना चाहता है? लेकिन मैं क्या करूँ

 

28 मार्च 2015

रात के आठ बजे रहे हैं विद्या और विशेष दोनों कार्टून देख रहे हैं, विजय अब तक आए नहीं। आजकल कुछ अधिक व्यस्त हैं। जब भी कुछ संभलने का प्रयास करती हूँ कोई न कोई घटना घट जाती है और मैं पुनः वहीं पहुँच जाती हूँ। शाम पाँच बजे मम्मी का फोन आया, मम्मी कभी घर से फोन नहीं करतीं, नीचे टहलने जाती हैं तभी करेंगी। पापा और मम्मी शाम की चाय के बाद टहलना साथ ही करते हैं।

औपचारिक बातचीत के बाद मम्मी मुद्दे पर आयीं कि अनामिका कह रही थी कि दीदी आने के लिए हाँ बोल रही हैं, सो आ ही जाती, कुछ दिन मन बदल जाता। मैंने कहा विजय से पूछकर बताती हूँ।

मम्मी को लगा कि फोन वो कट कर चुकी हैं और जब मैं फोन कट करने लगी तो पीछे से आवाज आ रही थी सो कान को वापस लगा लिया। कहते हैं दूसरों से अपने बारे में अगर सच जानना हो, तो उसके लिए मरना होगा लेकिन मुझे मरने की जरूरत नहीं थी।

वास्तव में दुनिया जो है केवल एक भ्रम है, सब झूठ है, फरेब है।
सर्दियों में काँच में जो धुन्ध जम जाती है वो धुन्ध ही दुनिया है। आँखों को तभी तक साफ दिखाई देगा जब तक वाइपर चलता रहेगा, कुछ देर बाद वही धुन्ध। सत्य धुन्ध का पयार्यवाची शब्द है। पापा बोल रहे थे, ‘क्यों बुला रही हो उसे बेकार में, कर दी ना शादी, सँभाले अपना घर, नाम तो सारा खराब कर दिया। ऐसी नालायक औलाद भगवान किसी को ना दे। उतने में मम्मी ने कहा कि मैं भी नहीं चाहती कि आए लेकिन फॉर्मेलिटी तो करनी ही पड़ती है।

उसके बाद मैंने ही फोन रख दिया आगे सुनने की हिम्मत नहीं थी। मरने के लिए जहर नहीं चाहिए बस सबका सत्य सुन लीजिए। इंसान सोच-सोचकर मर जाएगा। इसलिए सत्य प्रेम है, प्रेम मृत्यु है, मृत्यु सुन्दर है अन्ततः सुन्दर केवल शिव है।

आधे घण्टे बाद मम्मी को फोन किया, मम्मी ने इतने मीठे सुरों में मुझे आशीर्वाद दिया।

मम्मी कुछ कहना था।
हाँ अबोली, बोलो बेटा।
आप लोग फिक्र न करें, मैं नहीं आ रही हूँ।
अरे क्यों भला ?

– मम्मी एक घण्टे पहले जो अपनी बात हुई थी आपको लगा कि फोन कट गया है लेकिन फोन चालू था, आप फोन कट करना गलती से भूल गयीं। मैं सब सुन चुकी हूँ, फिक्र ना करें, मैं नहीं आऊँगी।

उसके बाद मम्मी ने ध्यान से फोन रख दिया। हमारे देश में बेटियों को बेटा बोलकर सम्बोधित करना अभिभावक और बेटियों के लिए गर्व का विषय है। दोनों अपने मन को पुष्ट करते हैं कि हमारे बेटी नहीं बेटा है, और बेटियाँ यह सोचकर खुश रहती हैं कि हमें समान अधिकार और प्रेम मिल रहा है। वास्तव में दोनों ही मन को मूर्ख बनाने के सुलभ उपाय हैं। फिर मैं तो ना अच्छा बेटा बन सकी ना अच्छी बेटी।

 

2 अप्रैल 2015

कुछ दिन पहले अखबार में एक खबर पढ़ी कि एक पण्डित जी ने एक पन्द्रह साल से बिस्तर पर पड़े बीमार पुरुष की ऐसी कुछ पूजा करवायी कि वो खुद ही परलोक सिधार गया। यही सोचकर हमारे पुराने परिचित ज्योतिषाचार्य श्री सुरेन्द्र भारद्वाज के पास गयी कि जितना चाहे पैसे ले लेवे लेकिन मेरी भी ऐसी पूजा करवा दें ताकि मैं भी अपने आप मर जाऊँ। मेरी बात सुनकर पण्डित जी ने मेरी कुण्डली देखी।

‘अबोली बिटिया तुम गहरे अवसाद में हो, आत्महत्या के, गृह त्याग के अनेक विचार आते होंगे लेकिन ऐसा करना मत क्योंकि तुम्हें यश की प्राप्ति लिखी है। उस सूर्योदय को देखने के लिए संघर्ष करो, कभी चींटी को देखा है? मरते दमतक कभी हार नहीं मानती। बिटिया तुम्हें सुख वाले दिन भी देखने हैं। तुम हिम्मत कैसे हार सकती हो, अपने बच्चों की तरफ देखो।’

पण्डित जी भी कुछ न कर सके मेरे लिए। कुण्डली में यश किस बाबत प्राप्त होगा ? नालायक सन्तानें अपयश ही भोगती हैं।

 

25 अप्रैल 2015

डॉक्टर व्योमेश पाठक को पढ़-पढ़कर लिखने का फिर मन होने लगा है। आजकल सब कुछ ऑनलाइन हो गया है; सुख, दुःख, रिश्ते, कला, कल्पनाएँ, कवि और कविताएँ भी। हर कोई एक-दूसरे का नाड़ा पकड़े हुए है। कवयित्रियाँ बलात्कार पर कविताएँ लिखती हैं और ऐसे सामाजिक दंश पर हँस-हँस मंगल स्तुतियाँ होती हैं। उन्हें ऐसी कल्पनाएँ प्रसन्न करती हैं। ये कैसी कविताएँ हैं? भगवान ने हाड-मांस का आदमी बनाया लेकिन भावनाओं के रंग भरने सर्वथा भूल गया। कभी किसी जानवर ने अपने साथी का बलात्कार नहीं किया, किसी पशु मादा ने अपने बच्चों का शोषण नहीं किया, कैसी मानवता है? मैं फिर भटक रही हूँ। हुआ यूँ कि आज एक वरिष्ठ लेखिका की कहानी पढ़ी, बड़ी साधारण सी कहानी को क्लिष्ट शब्दों का लबादा ओढ़ाया हुआ था। मैंने कहा सुन्दर कहानी लेकिन ऐसी कहानी तो मैं भी लिख सकती हूँ, लिखती भी थी लेकिन अब तो लेखन छूट गया। बड़ी आत्मीयता से उन्होंने कहा कि फिर लिखना शुरू करो, मैं कुछ प्रोत्साहित भी हुई। दूसरे ही दिन एक कहानी लिखी और उन्हें भेज दी, पढ़कर पहले तो बहुत हँसी फिर उन्होंने सेर भर बेइज्जती की। गलती मेरी थी सो अपमान का घूँट पीकर रह गयी फिर वही कहानी डॉक्टर व्योमेश को भेजी। परिणाम बिल्कुल विपरीत हुए उन्होंने कहा विशेषम !

मैं हतप्रभ, ये कैसे मुमकिन हुआ? उन्हें पूछा कि क्या अच्छा है? इस कहानी में कई गलतियाँ हैं आपको क्या विशेष लगा ?

उन्होंने कहा कहानी का प्लाट अच्छा है, भाव अच्छे हैं, गलतियाँ देखी नहीं अब देखूँगा। उस दिन के बाद जब भी व्योमेश जी से बात होती है, लिखने को प्रोत्साहित करते हैं। उन्हें बताया कि मैं कविताएँ लिखती थी, कुछ पुरानी स्वरचित कविताएँ भेजी तो कहते हैं फिर

लिखो। – अब नहीं लिख पाऊँगी।
क्यों?
– सब कुछ सिंक में बह चुका है, कुछ सूझता ही नहीं।

कविताएँ मन में बहकर पन्नों पर उतरती हैं, कल्पनाएँ कभी सिंक मैं नहीं बह सकतीं।
ऐसे भी पुरुष हैं धरती पर ? काशी का एक ही मैसेज आता है, गौरी कब आएगी ? डॉक्टर पाटकर की दवाइयाँ चल रही हैं।

 

17 अक्टूबर 2015

व्योमेश कहते हैं साहित्य पढ़ो, अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढ़ना जरूरी है। आप केवल आध्यात्मिक किताबों पर अटके हुए हो, अज्ञेय को पढ़ो, निराला को पढ़ो, बच्चन, प्रेमचन्द को पढ़ो। मैं कुछ टूटी-फूटी पंक्तियों की तुकबन्दी की कविता बनाकर भेजती और डॉक्टर साहब कहते; श्रेष्ठ भाव। एक बार उन्होंने पूछा कि आपकी पंक्तियों में इतनी वेदना क्यों है?

बस एक बार फिर आउट ऑफ कण्ट्रोल हो गयी, आपे से बाहर क्या-क्या और कितना सुना दिया कि जिसका कोई अन्त नहीं, लेकिन उन्होंने एक अक्षर नहीं बोला और उसके बाद उन्होंने कभी नहीं पूछा कि ऐसा भाव क्यों और कैसे उत्पन्न हुआ? गुस्सा इस हद तक का आता है कि बस कोई सामने नहीं आना चाहिए फिर अचानक सब ठीक जैसे कभी कुछ था ही नहीं। ऐसा ही हँसने के साथ होता है, बिल्कुल निरर्थक फिर अचानक गम्भीर।
कविता लिखकर सबसे पहले काशी को भेजती, आखिरकार रचना का भाव ही काशी था, लेकिन काशी अपनी उलझनों में उलझा हुआ है। उसने मेरी उलझन कभी देखी ही नहीं। काशी पढ़कर खुश होता अगर मैं कभी लिख पाती प्रेम कविताएँ। काशी में वेदनाओं की गाथा अजीर्णता पैदा करने लगती। सुख के अभिलाषी दुःख की गगरी से अपनी प्यास कभी नहीं बुझाते।

 

16 नवम्बर 2015

काशी का जब मन करता है तब ही वो ठीक से बात करता है, उसकी आवाज सुनते ही जब मैं रो पड़ती तो जोर से हड़का देता यार दिन भर रोया मत करो। सारा रोना पी जाती, बाहर से रोना सेहत के लिए लाभकारी है लेकिन अन्दर ही अन्दर रोना अपनी आत्मा की आत्महत्या है। शरीर की हत्या ईश्वर माफ नहीं करते और आत्मा की हत्या हमें कई जन्मों के प्रारब्ध चुकाने पर विवश कर देती है।

मैं हमेशा अपने आपको खाली रखती कि कहीं मेरी व्यस्तता के चलते काशी ने मुझे फोन नहीं किया तो ? अगर कोई मेहमान आ जाता गेट ना खोलती क्योंकि फोन आ सकता है, किसी से मिलना-जुलना नहीं करती।

अपने आपको काशी के लिए खाली करती जा रही थी, इतना खाली कभी नहीं रखना चाहिए अपने आप को कि कभी भर ही न पाओ। और अधिक खाली होने की जगह मुझमें नहीं बची है।खोखला और खाली होने में ज्यादा अन्तर नहीं है। काशी ने बड़ी ही आसानी से कह दिया, यार फुर्सत ही नहीं मिली। मैं खाली उसकी प्रतीक्षा करती रही। प्रतीक्षा को प्रतीक्षा की तरह ही बने रहना चाहिए।

प्रतीक्षा करवाने वाले को जब अपने अहं के अलावा कुछ न दिखाई देता हो, आस्तिक को नास्तिक बनते समय नहीं लगाता। मन्दिर में। रखी मूर्ति का महत्त्व ये नहीं है कि वह ईश्वर है, महत्त्वपूर्ण भक्त की भक्ति है जो पाषाण में अपना ईश्वर खोजने नंगे पैर भटकता अपनी आस्था के समक्ष सर्वस्व न्योछावर कर देता है। अहंकार एकमात्र ऐसा दुर्गुण है जो क्षण में पर्वत को राई बनाकर दम लेता है। घमण्डी व्यक्ति हर जगह केवल स्तुति सुनना चाहता है। उसे न कुछ दिखाई देता है और न ही कुछ सुनाई। मेरी आस्था कब तक अडिग रहती है पता नहीं? मेरी काशी के प्रति आस्था, एकपक्षीय प्रेम और काशी का दम्भकब तक एक पैर पर खड़ा रहेगा ?

 

7 अप्रैल 2016

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।

अब किन्तु प्रेम हाट में मिलने वाला ही भाव है। काशी कहता है, यह तुम्हारा पागलपन है। तुम अति कर देती हो। सुख की कभी अति नहीं होती और दुःख हमेशा ही अपने अधिक लगते हैं। मैं कविताएँ लिखती, काशी को भेजती, कभी मन होता तो तारीफ कर देता वरना कुछ नहीं। व्योमेश मुझे कविताओं की बारीकियाँ सिखाते, निराला और प्रेमचन्द के किस्से सुनाते। एक बात का सुकून था कि इतनी बड़ी दुनिया में एक मित्र मेरा भी है। व्योमेश और मैं कई बार घण्टों फोन पर आध्यात्मिक, साहित्यिक, सामाजिक चर्चा करते लेकिन मेरे साथ जो दिक्कत थी मैं व्योमेश को बता नहीं सकती। मुझे हमेशा से ही अपनी बौद्धिक सम्पदा बढ़ाने का पागलपन रहा। मैंने किताब मँगवायी बच्चन की क्या भूलूँ क्या याद करूँ लेकिन पहला पन्ना पढ़ने के बाद जैसे दूसरा पन्ना बिल्कुल भूल जाती। फिर से पढ़ना शुरू करती, इस तरह आधी किताब कई बार खत्म होती और फिर शुरू होती। लेकिन हार नहीं मानी, कितनी ही किताबें पूरी पढ़ने के बाद पढ़ी हुई सारी स्मृतियाँ दिमाग से तुरन्त क्षीण हो जाया करतीं किन्तु मैं फिर से पढ़ती। पेन से नोट्स बनाती जाती कि दूसरे पन्ने तक किताब याद रहे। कविताएँ मन में उपजती लेकिन शब्द लिखते कैसे हैं वो बिल्कुल दिमाग से गायब। कई बार अबोली का अबोलि हो जाता।

इतनी मात्रा की अशुद्धियाँ कि प्राइमरी क्लास के हिन्दी के शब्द भी गलत हो जाया करते। शर्मिन्दा हो जाती तो कह देती टाइपो एरर हुआ है, व्योमेश कुछ नहीं बोलते। अब दिन भर दिमाग में कविताएँ और किताबें चल रही थीं। फ्रिज में अनार कब के रखे थे दिमाग से बिल्कुल निकल गया था। विजय ने कल रात पानी पीने के लिए फ्रिज खोला और सारे अनार उठाकर बाहर के कमरे में फेंक दिये। सफेद फर्श अपमान के लहू से लाल हो गया था, रात ग्यारह बजे तक रोती रही और फर्श पोंछते-पोंछते निश्चय किया कि अब कभी नहीं लिखूँगी।

‘पैसे मिलेंगे कविता लिखने के ? दिन भर किताब लेकर घूम रही हो, बड़ी आयी साहित्यकार।’ विजय एक-एक अनार फर्श पर फोड़ रहे थे, ‘आज के बाद तुम लोगों को अब कभी अनार के दर्शन नहीं होंगे।’

कविताओं से पेट भरता है क्या ?
आभासी दुनिया में जी रही हो
कल्पनाओं में कलम घसीटते
केवल स्वयं की स्तुति हेतु
समाज के मनोचित्त को
छल रहे हो
अपनी सम्मोहित
लेखन प्रक्रिया से
साहित्य के परिरक्षण से
देश की मौद्रिक मूल्य की वृद्धि होगी ?
नहीं…
मैं सड़क पर पड़ा लावारिस आवंछित पशु नहीं
आप उदर पूर्ति करते हैं
मैं मानस पूर्ति

अब यही होता है, मैं रो नहीं पाती और ना ही जबाब देती हूँ।अब केवल लिख सकती हूँ।

 

9 फरवरी 2017

विजय कुछ बदले बदले से नजर आ रहे थे। शक मुझे हो रहा था लेकिन विजय के मन में क्या चल रहा है जानना असम्भव होता है। अभी रात के जब साढ़े ग्यारह बज रहे हैं तब लिख पा रही हूँ कि विजय क्यों बदले बदले नजर आ रहे थे। पिछले तीन दिनों से मेरा फोन अपने पास रख हुआ था, ये समझ आ रहा था कि फिर कुछ करेंगे। विजय ने मेरी सहेली नीना शिन्दे को फोन किया कि अबोली की मृत्यु हो गयी है, काशी को तुरन्त इन्फॉर्म कर दीजिए।

मुझे पता ही नहीं कि नीना हर जगह फोन करके मेरी मृत्यु का समाचार पुख्ता कर रही है, थक-हारकर उसने काशी को भी इन्फॉर्म किया कि अबोली अब नहीं रही। काशी ने नीना को मेरे घर आने को कहा। दोपहर साढ़े तीन बजे नीना जब बिल्डिंग के नीचे पहुँची, उसने वॉचमैन को पूछा क्या आपके बिल्डिंग में किसी की मृत्यु हुई है?

संयोगवश उसी दिन दसवें माले पर वर्मा जी के पिता जी का स्वर्गवास हो चुका था, उसने घबराहट में नाम नहीं पूछा और बेतहाशा रोती-बिलखती डोर बेल बजायी और जब मैंने दरवाजा खोला तो नीना जमीन पर गिर पड़ी। हर वाकये से अनजान नीना से अपनी ही मृत्यु का सारा समाचार सुन रही थी। कुछ करने को नहीं था, अपने ना मर पाने पर घण्टों रोती रही।

मुझे मेरे लगातार जिये जाने से हमेशा पीड़ा रही किन्तु उस दिन जितना अफसोस अपने जिन्दा रहने पर था, जिसे लिखना असम्भव है। विजय घर लौटे और जब पता चला कि अब सच सबके सामने है तो निर्लज्ज की भाँति हँस रहे थे। एक बार सॉरी भी बोला फिर वही शाम को अच्छे रेस्तराँ में डिनर। सब सो चुके हैं और मैं जाग रही हूँ, सोच रही हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए?

***

लेखक परिचय

जुवि शर्मा

जन्म- 21 मई
पता-बी-1,602, माधव संसार, खडकपाड़ा, कल्याण पश्चिम, जिला ठाणे, महाराष्ट्र,
421301
मोबाइल नं. : 8976475293
ईमेल: juvisharma2105@yahoo.com

> वर्ष 2020 में काव्य संग्रह ‘कोरी चुनरिया आत्मा मोरी’ बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित ।

➤ वर्ष 2024 में काव्य संग्रह ‘ओसारे की छाँव’ अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज से प्रकाशित ।

➤ वर्ष 2025 में कथेतर साहित्य ‘अबोली की डायरी’, सेतु प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित ।

Tags: अनहद कोलकाता Anhad Kolkata हिन्दी बेव पत्रिका Hindi Web Magzineजुवि शर्माजुवि शर्मा की ‘अबोली की डायरी’डायरी
ShareTweetShare
Anhadkolkata

Anhadkolkata

अनहद कोलकाता में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें। प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं। अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे।

Related Posts

मेरी ढाका डायरी – मधु कांकरिया

मेरी ढाका डायरी – मधु कांकरिया

by Anhadkolkata
August 11, 2025
0

मेरी ढाका डायरी – मधु कांकरिया ( एक दिलचस्प अंश ) मधु कांकरिया वरिष्ठ कथाकार मधु कांकरिया की 'मेरी ढाका डायरी' एक प्रबुद्ध व्यक्ति की आँख...

प्रेमचंद की जयंती पर उनकी एक प्रासंगिक कहानी – जिहाद

राष्ट्रवाद : प्रेमचंद

by Anhadkolkata
July 30, 2023
0

राष्ट्रवाद : प्रेमचंद हम पहले भी जानते थे और अब भी जानते हैं कि साधारण भारतवासी राष्ट्रीयता का अर्थ नहीं समझता और यह भावना जिस जागृति...

विभावरी का चित्र-कविता कोलाज़

विभावरी का चित्र-कविता कोलाज़

by Anhadkolkata
August 20, 2022
0

  विभावरी विभावरी की समझ और  संवेदनशीलता से बहुत पुराना परिचय रहा है उन्होंने समय-समय पर अपने लेखन से हिन्दी की दुनिया को सार्थक-समृद्ध किया है।...

कला दीर्घा – ख्यात भारतीय चित्रकार रामकुमार पर पंकज तिवारी का आलेख

by Anhadkolkata
June 25, 2022
12

Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमारपंकज तिवारीभारतीय चित्रकला यहाँ की मिट्टी और जनजीवन की उपज है। इसमें...

कविता संवाद – 2

by Anhadkolkata
June 25, 2022
0

कविता जीवन-विवेक है  -  अच्युतानंद मिश्र Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI (1) नई सदी में युवाओं की कविता को आप किस दृष्टि से...

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अनहद कोलकाता साहित्य और कलाओं की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है। डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘अनहद कोलकाता’ का प्रकाशन 2009 से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है। यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है। यह पूर्णतः अव्यवसायिक है। इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले 12 वर्षों से लागातार प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक इसके 500 से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.

No Result
View All Result
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • समीक्षा
    • संस्मरण
    • विविध
  • कला
    • सिनेमा
    • पेंटिंग
    • नाटक
    • नृत्य और संगीत
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विविध

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2009-2022 अनहद कोलकाता by मेराज.