अधूरे प्रेम की पूरी दुनिया’ प्रेम, विरह, स्मृति, स्त्री-अनुभव और जीवन के उन अनकहे हिस्सों का काव्य-संसार है, जहाँ प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच का भाव नहीं रह जाता, बल्कि एक पूरी दुनिया, एक स्मृति और एक वैकल्पिक जीवन की आकांक्षा बन जाता है। संग्रह की कविताओं में अधूरा प्रेम बार-बार लौटता है—कभी पुराने प्रेमी की स्मृति बनकर, कभी प्रतीक्षा बनकर, तो कभी ऐसी काल्पनिक दुनिया के रूप में जहाँ प्रेम को सामाजिक, पारिवारिक और भौगोलिक सीमाओं से मुक्ति मिल सके।
संग्रह की केंद्रीय और सबसे प्रभावशाली कविता ‘सपनों का अधूरा इतिहास’ इस पूरे काव्य-संसार को व्यापक आयाम देती है। इसमें प्रेम निजी स्मृति से निकलकर जंगल, पहाड़, खेत, नदी, माँ, नौकरी, शहर और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ता है। प्रेमिका के लिए प्रिय की अनुपस्थिति एक खाली जगह नहीं, बल्कि ऐसी दूसरी दुनिया रचती है जिसमें वह बार-बार लौटती है। यही कारण है कि कविता में यथार्थ और स्वप्न, प्रेम और जीवन, मृत्यु और पुनरागमन लगातार एक-दूसरे में घुलते रहते हैं।
इन कविताओं की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रेम के साथ स्त्री की स्वतंत्र चेतना और उसका संघर्ष भी लगातार उपस्थित है। ‘साहस’ में श्रमशील, उपेक्षित स्त्री के शरीर और जीवन को प्रेम की कसौटी पर रखा गया है; ‘शोकाकुल’ और ‘तेरहवीं क्या है?’ में स्त्री के दुख को सामाजिक औपचारिकताओं के पीछे दबा दिए जाने की विडंबना सामने आती है।
भाषा की दृष्टि से संग्रह सहज, आत्मीय और बोलचाल के निकट है, लेकिन उसके भीतर गहरी काव्यात्मक बेचैनी मौजूद है। पहाड़, जंगल, खेत, चाँद, पानी, फूल, बारिश और पक्षियों जैसे प्राकृतिक बिंब प्रेम और स्मृति के जीवंत प्रतीक बन जाते हैं। ‘पुरानी टिहरी यादों में’ में डूबती हुई सभ्यता और बची हुई स्मृतियों का बिंब इसका सुंदर उदाहरण है।
कुल मिलाकर, ‘अधूरे प्रेम की पूरी दुनिया’ अधूरे प्रेम का शोकगीत भर नहीं है; यह उस अधूरेपन से निर्मित एक वैकल्पिक दुनिया का काव्यात्मक दस्तावेज है। यहाँ प्रेम समाप्त होकर भी समाप्त नहीं होता—वह स्मृति, स्वप्न, कविता, प्रकृति और प्रतीक्षा में जीवित रहता है। संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह निजी प्रेम की कहानी को स्त्री-अस्मिता, सामाजिक यथार्थ और जीवन की जटिलताओं से जोड़कर उसे व्यापक मानवीय अनुभव में बदल देता है। शीर्षक की सार्थकता भी इसी विरोधाभास में है—प्रेम अधूरा है, लेकिन उससे बनी दुनिया पूरी है।
तो आज पढ़ते हैं युवा कवि अंकिता रासुरी के पहले संग्रह अधूरे प्रेम की पूरी दुनिया’ से चुनी हुई कुछ कविताएँ। आपकी राय और सुझाव का इंतजार तो रहेगा ही।
तुमसे मिलना एक आखिरी बार
तीस की उम्र में मिलना
चालीस के हो चुके पहले प्रेमी से
बदल चुके हैं सारे समीकरण
सोलह और छब्बीस वाले रूमानी खयाल अब नहीं आते
आज यूं इतने वर्षों बाद मेरे सामने एक छब्बीस वर्षीय प्रेमी नहीं है
एक चालीस वर्षीय आदमी खड़ा है
कुछ पक चुके बालों से झाँक रहा है एक लंबा समय
जिसमें कि बहुत कुछ भुलाया जा चुका है
लकीरें कुछ और बढ़ चुकी हैं तुम्हारी हथेलियों की
शायद मेरी भी
ना तो अब तुम्हारे वो लकड़ी चीरते हाथ हैं
ना अब मेरे ओखल में धान कूटते हाथ हैं
ना ही इन हथेलियों से बुझती है प्यास
धारे के ठंडे पानी की जगह हाथ में बिसलेरी की बोतल है
ठेठ केमुंडाखाल से लेकर
इंडिया गेट की दूरी सिर्फ भौगोलिक दूरी भर नहीं रह गयी है
यहाँ तक पहुंचते पहुंचते हम तुम गंवा चुके हैं एक उम्र
एक वक्त प्रेम का जो कभी लौट ही नहीं सकता
एक सपना जो अब बहुत गहरी नींद सो चुका है
एक फासला जिसमें तुम्हारा एक घर है
एक फासला जिसमें
मैं मिटाती रही बने हुये घरों के नक्शों को
ओ मेरे चुके खो प्रेमी
तुम से मिलना आज मेरी देह की जरूरत नहीं
तुम से मिलना एक आखिरी बार
एक धूमिल पड़ चुकी छवि से आश्वस्त हो जाना है
कि अब कोई नहीं है खड़ा मेरे इंतजार में
बांज के उस सूख चुके वृक्ष के पीछे।
मंडी हाउस में एक शाम
1.
वह सोचता रहा, उसने तो कहा था
गिटार बजाते हुए लड़के
उसे आ जाया करते हैं पसंद अक्सर
झनझनाते रहे तार और वह गाता रहा
एक हसीना थी….
किसी गुजरी हुई शाम की याद में।
2
वह खींचती रही आड़ी तिरछी रेखाएं
फाइल के पन्नों में कुछ इधर उधर देखते हुए
ठंडी हो चुकी चाय के प्याले में अटका रह गया कोई
तस्वीर में उतरने से कुछ पहले ही
वह ताकती रह गयी दिशाओं को।
3
नाटक-करते करते वह
सच में ही रो पड़ा अभिनय की आड़ में
गूंजती रही तालियां
और वह सोचता रहा
य़ह अभिनय की जीत है या
उसकी हार।
4
और कविता करते हुए
वह कहती रही
बस लिखती रही यूं ही किसी के लिये
तुम्हें सुनाऊं
शब्दों का खयाल अच्छा है।
5
चाय और अंडे बनाती वो और उसका पति
परोसते हुए सोच रहे थे
कच्चे मकान और
ठिठुरती शामें कितनी लम्बी होंगी अब की बार।
6
मंडी हाउस के ऊपर लटका हुआ चाँद
और तुम
एक बार फिर ये शाम अच्छी है।
अबौद्धिक प्रेम
तुम कहते हो कि
इतना भावुकता भरा प्रेम ठीक नहीं
कुछ बौद्धिकता लानी होगी प्रेम में
प्रेम में वयस्क होना मुझे कभी नहीं आया
प्रेम की किशोरावस्था जीती रही सालों साल
और तमाम बौद्धिक प्रेम
अपनी बौद्धिकता के साथ डूब गए।
न तुम न मैं न समंदर
लैम्प पोस्ट की लाइट पड़ती है आंखों पर
बीड़ी का एक कश
उतरता है गले से
बिखरा हुआ कमरा और बिखर जाता है
कहीं कुछ भी तो नहीं, ना आंसू ना शब्द
बस एक कड़कड़ाती देह है
जो अकड़ती जा रही है
उफ्फ कितनी बड़ी बेवकूफी है
ना जाने के क्यों भगवान याद आता है अचानक
और उसी क्रम में एक गाली भी इस शब्द के लिए
उतनी ही गालियां इस लिजलिजे प्रेम के लिए
एक दो तीन
प्यार है या सर्कस का टिकट
मैंने प्रेम किया इसकी तमाम बेवकूफियों के साथ
मैंन सोचा क्या एक स्त्री वाकई में कर लेती है कुछ समझौते
एक चुप्पी जो टूट कर कह सकती थी बहुत कुछ
वह चुप्पी चुप्पी ही बनी रह जाती है
एक निर्मम खयाल आता है पूरी निर्ममता के साथ
दुनिया को कर दूं तब्दील एक पुरुष वैश्यालय में
एक ओर झनझनाता है हाथ
एक खयाल जो जूझता है खत्म हो जाने और फिर से बन जाने के बीच
एक खयाल जो जिंदगी को कह देना चाहता है अलविदा
है ही क्या रखा इन खाली हो चुकी हथेलियों में
ना चाँदनी रात
ना खुला आसमान
ना खेत ना जंगल ना पहाड़
ना तुम ना मैं ना समंदर
ना जिंदगी
बस पीछे छूट चुके घर के
ठीक सामने वाले पहाड़ पर
चढ़ने और उतरने की एक तीव्र इच्छा जागती है
एक ऐसी इच्छा जो खत्म हो जाएगी
अपनी पूरी क्रूरता के साथ।
शराब और नृत्य की दुनिया में जीवन की नयी परिभाषा
पर आधी रात गुजर जाने के बाद
उसके प्रेमियों के महल और झोपड़े बदल जाते हैं खंडहरों में
और सुबह होते ही फिर से
गुनगुनाने लगते हैं हिलांस उसकी मुंडेरों पर
लेकिन वह जानती है
इन तमाम घुटन भऱे रास्तों को वह अकेले नहीं जीती है
उसमें शामिल होते हैं चारो दिशाओं के साथ-साथ
तमाम रात्रि पक्षी भी
अपने तमाम संतापों के साथ।
सपनों का अधूरा इतिहास
(लंबी कविता)
मेरे खत्म होने से पहले तुम यहाँ नहीं हो
मैं मर जाना चाहती हूँ
एक बार फिर तुम चले गए
फिर कभी नहीं आओगे लौटकर जिंदगी में
और अब मैं भी इस दुनिया में लौटकर नहीं आना चाहती
उफ्फ पर मैं किसी के लिए मरना क्यों चाहती हूँ?
मैं तो बस हो जाना चाहती हूँ प्रेम कविता…
पर मैं अभी अपने जंगल में नहीं
शहरी बाग में हूँ
लोधी गार्डन की एक प्यारी शाम
नहीं, अभी शाम नहीं है
पर मेरे लिए तो शाम है
तुम मेरे ठीक बगल में हो, या हुआ करते थे, पता नहीं
देखो ना ये घुघूती आज भी यहाँ है
सामने गिरता हुआ फव्वारा देखती हूँ
अच्छा लगता है तुम्हारी काली देह की तरह
तुम याद आ रहे हो
तुम जी रहे हो, तुम मर रहे हो
एक ही साथ मेरे वजूद में
एक सूखा सा पत्ता फिर गिर आया है मेरे बालों के कोनों में
पर मेरे लंबे जुल्फ नुमा बाल तो नहीं
जो कोई इन्हीं में अटका रहना पसंद करे।
अभी एक देखी हुई फिल्म याद आ रही है
साथ-साथ याद आ रहा है और भी बहुत कुछ
तुम्हारे साथ प्रेम की एक लंबी दूरी
सिमटती क्यों नहीं?
देखो ना मैं जल रही हूँ
देखो ना मैं बुझ रही हूँ
देखो ना मेरी सांसे अटक रही हैं
फिर से एक बार मैं याद कर रही हूँ तुम्हें
तुम्हारे साथ गुजारे हुए एक-एक चुंबन मुझे जला रहे हैं
बच्चे आज भी खेल रहे हैं
छुट-पुट प्रेमी जोड़े बैठे हुए हैं
ये जी रहे हैं प्रेम
जो कभी नहीं होगा इतिहास में दर्ज
शायद ये नहीं जानते
कभी ये भी मेरी ही तरह बैठेंगे बिल्कुल अकेले
जो देख नहीं सकते एक बार भी मेरा बौरायापन
शायद मैं दो साल बाद लौटूँ
और फिर कब पता नहीं।
तुम-तुम्हारी अपनी दुनिया
घर.. परिवार… इज्जत.. उफ्फ.. उफ्फ
नहीं… नहीं… नहीं ….
दुनियाएँ यूँ खत्म नहीं हो सकती
घसियारिनों के गीतों से जब भी होगा कोई कंपन
कोई झरना बह रहा होगा मेरे घर की ओर
और वो घर, घर नहीं होगा
पूरा जंगल होगा मेरे लिए
जहाँ झाडियों में ठहरी हुई बर्फ होगी
एक फूल रहेगा फ्यूँली का
जिसमें एक प्यारी सी लड़की रहेगी जिंदा हमेशा
अपने अनगढ़ प्रेम के साथ
खेतों में मैं रोपा करूंगी धान
इस दुनिया के लिए
बहुत कोलाहल है यहाँ जिंदगी का
हर ओर होगे सिर्फ तुम
मेरी उलझनें घटने-बढ़ने लगेंगी
तुम पास होते हो
तो सिर्फ पास होते हो
और मैं मरती चली जाती हूँ इस दुनिया के लिए
क्योंकि मैं जी रही होती हूँ तुम्हारे लिए
फूलों की फसलें लह-लहा रही हैं
दूर से आता बसों का शोर छनता जा रहा है
मेरे कानों में वो डोखरों का पानी सनसना रहा है
तुम जानते हो ना
इन आवाजों से आजकल
मैं डरने लगी हूँ
मेरी दुनिया खत्म होने की कगार पर है
और मैं फिर से करने लगती हूँ प्रेम
मैं लौट रही हूँ
तुम मेरे बगल में हो
मैं तुम्हारे आलिंगन में
ठीक सामने के पेड़ के पीछे
फिर से है हमारा एक जोड़ी प्रेम
तुम आते हो
और फिर से चले जाते हो मुझे छोड़कर
अपनी दुनिया में
तुम्हारी यथार्थ की दुनिया
पर मेरी दुनिया का क्या
जो हो चुकी है यूटोपिया तुम्हारी ही तरह
मैं होती हूँ
तुम भी हर जगह होते हो
मेरी दुनिया फिर से लुटती-पिटती चली है कोसों दूर।
साँझ होते ही कंपकंपाने लगती हैं उँगलियां
मैं एक आकाश देखने लगती हूँ
उस आकाश के नीचे मेरे घर की छत है
फिर मैं देखती हूँ एक पहाड़ी चाँद
उसी चाँद के नीचे तुम भी कहीं होते हो
मैं दौड़ती हुई पकड़ लेना चाहती हूँ तुम्हें
डाँडों को पार करते हुए
चढ़ने-उतरने लगती हूँ खेत पहाड़
खेतों के पानी में उतर आता है वही चाँद
और मैं डूबने लगती हूँ, मैं धँसने लगती हूँ
मेरा रोपा हुआ धान नष्ट होने लगता है
और देखती हूँ चाँद तो वहीं हैं, पहाड़ी के ऊपर
चीड़ पर लड़खड़ाता हुआ
मैं चढ रही हूँ चढाइयाँ
चीड़ आने लगता है पास
और चाँद दूर-दूर-दूर..
खेतों की मेड़ों पर उग आई है घास
फिर होने लगी है शाम
इस शाम के होने तक कुछ भी नहीं है पास
तुम आओ ना जिंदगी,
इतनी दूर क्यों हो ?
क्यों तुम्हारे सपने मेरे जागते ही आते हैं ?
मेरे सोने के बाद मरने लगती है नींद
बहुत से पंछी लौटने लगे हैं आकाश के विस्तार में
एक दुनिया फिर होने लगी है खत्म….
मैं होना चाहती हूँ जिंदगी, प्रेम
मैं होने लगी हूँ नौकरी…..
मैं तुम्हारे इंतजार में हूँ
तुम्हारे भी, और तुम्हारे भी
न जाने क्यों कौवे भी अच्छे लग रहे हैं
घास में लिपटी मेरी देह पर
उग आया है एक फूल
इन फूलों में जंगल है
तितलियां हैं
सूखी पत्तियों की नुकीली धूप
फाल्गुन का महीना है और हल्की ठंड है।
तुम कहाँ हो
देखो ना वो फोटोग्राफर ले रहा है हमारी तस्वीर
अरे हाँ, तुम तो हो ही नहीं
तुम्हारी खाली जगह को मैं भर रही हूँ अपने ही सपनों से
तुम कोई बेनाम से पत्ते हो
और उसके फूल उग रहे हैं झाडियों में
उन झाड़ियों से कोई माँग रहा है तुम्हारे आंखों का स्पर्श…
नहीं… नहीं… वो चाहता है तुमसे और भी बहुत कुछ
उस बहुत कुछ में तुम भी शामिल हो
और तुम्हारे शब्द भी।
याद कर रही हूँ एक कवि के शब्द
और उन शब्दों से उतरता जीवन
जो गोल गोल घूमते हैं तुम्हारी ओर
तुम्हारी साँसे हर ओर जागती हैं
और फिर पानी गुजरता है मेरे कदमों को पार करते हुए
नदी तुम से बस कुछ कदम दूर रुक जाती है
तुम मुझ में होते हो
मुझमें घुलने लगती है तुम्हारी भिन्नता…
मुझे फिर इंतजार है शाम का
उस शाम को फिर पिघलने लगेगी आग
और उस आग से उगने लगता है फिर से एक जंगल
उस जंगल में आने लगती हैं हिलाँसों की छाँव
उस छाँव में फिर से होता चला जाता है विस्तार प्रेम का।
जिंदगी के साथ है माँ की जिंदगी भी
फिर भी मैं हौले से बिठा लेती हूँ
मौत को ठीक बगल में
और माँ छज्जे पर बैठकर कर रही होती है इंतजार
मेरा सपना लेता जा रहा है विस्तार
घर से भागी हुई मैं कर रही हूँ इंतजार
उस प्रेम का
जो कभी लौट ही नहीं सकता
क्यों नहीं आ सकते तुम ?
तुम्हारे वो विचार और तुम सच में कितने दूर हो मुझसे ?
और एक वो आदमी है
जो बेच रहा है चना मसाला
वो भी पहुंच जाना चाहता होगा शायद अपनी प्रेमिका के पास
या इसी तरह कहीं काम करती हुई पत्नी के पास
मिट्टी की नमी
फिर से देह को सोख रही है
मैं यहाँ बैठी तुम में भर रही हूँ रँग
और मेरा सपना फैलता जा रहा है
मैं डर रही हूँ जितने रँग बचे हैं कूचियों में
उतने तक ही ना सिमट जाए जिंदगी…
और तुम हो कि टहलते हुए करने लगे हो प्रवेश मेरे भीतर
खुद के लिए कोना तलाशने वाले
आज हम तलाशने लगे हैं जीवन।
तुम्हारी देह का स्पर्श आज भी यहीं है
यहीं है दुनिया और अनंत
प्रेम लेने लगता है आकार
और फिर आता है नौकरी का ख्याल
ठीक इसी वक्त था इंटरव्यू
और जेब में बचे हुए चंद नोट
मैं कुछ भी नहीं करना चाहती याद
पर माँ का इंतजार भरा चेहरा
भूला ही नहीं जा सकता…
लेकिन अभी मैं एक और दुनिया में हूँ
जो किसी भी वक्त हो सकती है खत्म
मैं बना रही हूँ धरती-आसमाँ
और दो चार चाँद
जिसमें हम सो सकेंगे पलकों के बंद होने तक
और उन सपनों का एक अधूरा इतिहास है
जैसे कि युद्धों के बाद के दुखों से होता है पूरा
लेकिन उस इतिहास में क्यों दर्ज नहीं है कि
गिलहरियां भी इस सन् में
दौड़ती हुई प्रेम में मर चुकी हैं
इस इतिहास में सिर्फ राजा है
उसका जीना-मरना, हंसना-रोना
कुछ नहीं तो कम से कम सेक्स करना
और उन स्त्रियों का क्या?
इस तरह मुर्दा लोगों से कब तक जिंदा रह पाएगा इतिहास ?
ओह मैं तो भूल ही गई
मेरे पाँव के नीचे दबी जा रही है गिलहरी
और उस गिलहरी के पाँव में काँटा है
उस कांटे मैं है कोई पौधा
सब कुछ गडमडाता जा रहा है
दूर छप्पर पर लटक रहे हैं गुलदाउदी के फूल
और तुम बढ़ा रहे हो कदम उस से दूर
मैं तुम में हूँ और इन घुघूतियों में भी हूँ
मैं हूँ कि सिर्फ तुम्हें देख रही हूँ
कहीं कोई आवाज भी नहीं
पेड़ लौट रहा है
और उड़ रही है बारिश
और मैं जी रही हूँ
मैं सपने देख रही हूँ
सपनों की एक लंबी किस्त
सिकुड़ती जा रही है
तुम सब से आखिर में खड़े हो
दो कदम की दूरी पर ही..
मेरे कदम तुम तक नहीं हैं
तुम मुस्कुराते हो एक मीठी सी हँसी
एक लंबी साँस बन जाती है हवा
और तुम मुझे बेसाख्ता दौड़ाते हो
अब कुछ भी नहीं
इन परतों की दुनिया का भ्रमजाल है
ना तुम हो पाते हो मेरे एहसास
और ना मेरा एहसास ले पाता है साँस तुम में अब
पर तुम हो
अब तुम्हारी आँखें दौड़ रही हैं
मुस्कुरा रहीं हैं
एक लंबी उम्मीद जी रही हैं…
मैं हूँ कि, फिर भी तुम हो
और खूब बातें कर रही हूँ।
यहाँ बची हैं प्रेमियों की आहटें
और मैं तुम्हारे शब्दों को याद कर रही हूँ
मिट्टी से सने मेरे हाथों में उर्वरता की नई जमीन खड़ी है
और इसमें खूब टपकते हैं आंसू…
तुम आ चुके होगे नई दिल्ली स्टेशन
और मैं यहाँ बैठी हूँ…
फिर कोई आता है याद
मंडी हाउस में हाथ हिलाते हुए,
बेंच, डस्टबीन, फूल और लोग
क्या मैं यहाँ भी हूँ?
तुम कहाँ हो ?
लौट आओ ना
जिंदगी कह रही है अलविदा
पर अभी फ्यूंलियाँ भी कहाँ जी पाईं जी भर
मेरा दिल-मन सब कुछ बचे हैं थोड़ा-थोड़ा।
यहाँ कोई भी अकेला नहीं है
मैं भी नहीं
ये हवा-पानी अब कहाँ मुझे छोड़ते हैं अकेले
एक मन फिर से है परेशान
एक दुनिया पटरी पर लौट रही है
सिर चकरा रहा है
किसी की हँसती हुई आवाज
और बेतरतीब से तुम्हारे शब्द
कहाँ हो तुम
कह क्यों नहीं देते?
तुम यहाँ नहीं हो
मैं पागल होती जा रही हूँ
और तुम
तुम क्या हो बताओ ना ?
तुम्हारे काले चेहरे पर से चमकते दांतो की हँसी याद आ रही है
याद आ रहे हैं चढ़ते-उतरते खेत
और इन खेतों में बची है मेरी दुनिया
मैं रो सकती हूँ बेतहाशा, पर अब नहीं
माँग सकती हूँ प्यार इन आंखों के लिए
पर दिल पर कोई स्पर्श नहीं।
पीले गुलाबों का रँग उड़ने लगा है
मैं इस पर से उड़ा लेना चाहती हूँ शब्द
डरती हूँ मेरी जिंदगी तो नहीं हो जाएगी खत्म….
सपना गहराते-गहराते लोट-पोट हो जाएगा
मेरे शब्द बिखरने लगेंगे
और मैं शब्द भर ही तो रह गई हूँ
जो फिर गायब होकर रह जाएगी बस एक आवाज
जो खत्म नहीं होती
पर बचती भी तो नहीं
कि पहचान सके कोई एक लंबे होश में…
चीलें मंडरा रही हैं
और इन गाड़ियों की आवाज बादल बनकर उभर रही है
सपनों की दुनिया कहीं भीड़ हो चुकी है…
मैं लौट रही हूँ अपनी दुनिया में
इन पेड़ों पर प्रेमियों के नाम अब भी बचे हैं साथ-साथ
जो अब ना जाने हो चुके होंगे कितनी ही दूर
मैं परेशान हूँ उतनी ही
जितने कि तुम
तुम्हारे साथ गुजारा हुआ वक्त
साथ-साथ चलता चला जाता है
एक लंबी कतार में प्रेमियों की
और मैं इन सब से अलग हूँ
धूप-छाँव सब कुछ हैं यहाँ
और तुम भी
मेरा सिर भन्ना रहा है
सब कुछ चलता चला जा रहा है
मैं खत्म हो रही हूँ
हमारी दुनिया खत्म हो रही है
एक पूरी दुनिया, एक आधी दुनिया ।
तुम्हारे सपने, प्रेम, जिंदगी और कविता
सच में कैसे जिंदा हैं मेरे बगैर?
तुम्हारे साथ इस पत्थर पर गुजारा हुआ एक-एक दिन आता है याद
पर अब तुम खुद दरख्त बन चुके हो
एक सूख चुके दरख्त…
मैं भी अब इस पत्थर से उठकर जाने लगी हूँ
पर अब मैं रो नहीं रही
बस उदास हूँ।
***
अंकिता रासुरी
उत्तराखंड, टिहरी गढ़वाल के भरपुरिया गाँव में जन्म। कविता, कहानी, लेख एवं संस्मरण कई पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग एवं वेबसाइट में प्रकाशित। ‘पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर एवं एम. फिल.। प्रभात खब़र, हरिभूमि और स्वराज एक्सप्रेस (समाचार संस्थानों) में पत्रकारिता का अनुभव। ‘देहात’ एग्री टेक कंपनी’ में ‘ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग’ विभाग में कार्य अनुभव।
ईमेल – ankitarasuri@gmail.com






