लोचन कोना-7 — प्रफुल्ल कोलख्यान
प्रेमचंद के विचार से — साहित्य अपने सर्वोत्तम रूप में जीवन की आलोचना है। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो,—जो हममें गति और संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं; क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है। (साहित्य का उद्देश्य – 1936)
कई बार लेखक अपनी खामख्यालियों में खोया-खोया हुआ-सा रचना के मजेदार सफर पर होता है। उसे लगता रहता है उस के अपने मन का सब कुछ पाठ में उतर रहा है। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा होता है। जो नहीं हो रहा होता है उसे पहचान लेना पाठक को पाठ के आनंद से जोड़ देता है — खोज के आनंद से। जिस तत्व का पाठ में उभर-उभरकर समाना संभव नहीं हो पाता है उस प्रच्छन्न, छिपे हुए तत्व को खोज लेने से पाठक अपने लिए कुछ-न-कुछ खास पा लेने, हासिल कर लेने के आनंद — उपार्जन के आनंद से अपने मन को भर लेता है मुफ्तखोरी के मजा को उपार्जन के आनंद से कुछ देर के लिए ही सही मगर विस्थापित कर देता है।
जब पलटकर देखता हूं! जो छीला उसे समेटा नहीं, जिसे समेटने के लिए लपकता रहा उसे कभी छीला ही नहीं — पुरखे कह गए हैं, छीलना काफी नहीं बेटा, समेटना भी जरूरी होता है। जब पलटकर देखता हूं! याद आता है पना वही तेवर — देश हो या दुनिया कानून से नहीं, कविता से चलती है। जब पलटकर देखता हूं! सभ्यता ने अपना सारा-का-सारा बोझ लाद दिया साहित्य पर, कविता पर घुमा-फिराकर, साहित्यकार पर कवियों पर!
आंख खोलते ही यह बात समझ में ला दी गई या फिर लादी गई कि समाज को बदलने की जरूरत है और उस बदलाव का बहुत बड़ा दायित्व साहित्य पर है। बदलाव का दारोमदार साहित्य पर है। प्रगतिशील साहित्य पर! जरा ठहर कर। प्रेमचंद के विचार से — प्रगतिशील लेखक संघ यह नाम मेरे विचार से दोषपूर्ण है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर यह उसका स्वभाव न होता तो शायद वह साहित्यकार ही न होता। हमारे लिए ‘प्रगतिशील’ वही है जो हममें पैदा करे।
हम प्रगतिशील साहित्य लिखते रहे कभी इस बात पर कोई गौर नहीं किया कि हमारा प्रगतिशील साहित्य हम में और हमारे समाज में कर्म की शक्ति के साथ कैसा व्यवहार कर रहा है, कर्म की शक्ति की कितनी परवाह करता है। हम लिखते रहे और प्रेमचंद के विचार से हम लगातार दूर बने रहे! कारण कई थे, सब से बड़ा कारण हम खुद थे।
जब पलटकर देखता हूं! कविगण के साथ और कविता के साथ का हर क्षण दुर्लभ लगता था। ऐसे दुर्लभ क्षण के छूट जाने का हाहाकार चेहरे पर अपनी जबर्दस्त इबारत लिख देता था। प्रतिबद्धता थी जिद! सब कुछ को पीछे छोड़कर समाज परिवर्तन में साहित्य की भूमिका और साहित्य की भूमिका में अपनी भूमिका! ऊफ्फ! भूमि इंच भर नहीं भूमिका सारी धरती, जमीन धुरकी भर नहीं और ओढ़ी हुई जिम्मेवारी? मुक्तिबोध, धूमिल आदि का संदर्भ आते प्रतिबद्धता की मजबूत पकड़ और मजबूत! दुनिया की सारी तकलीफों की जड़ में अपनी कविताओं के जन-जन तक नहीं पहुंचने को समझकर भीतर-ही-भीतर बेचैनियां बढ़ जाती थी। अपनी-अपनी बेचैनियों में कहां-से-कहां पहुंच गए हम!
जब पलटकर देखता हूं! वह दिन भी आया जब अपने कविता संकलन के छपने की संभावनाएं जग गई तब कुछ संतोष हुआ कि अब कुछ हो सकता है! हालांकि, तब तक एहसास गहरा गया था कि लोग कविता नहीं पढ़ते हैं। पढ़ते हैं तो कविता के पन्ने को नहीं कविता को ही पलट देते हैं। लोगों को कविता पढ़ने की फुरसत नहीं है! जाहिर है कि कविता संकलन को समर्पित किया — स्मृतिशेष पितामही इंद्रमाया की उस कलम की तलाश में, जो उनके हाथ से छिटकर इतनी दूर जा गिरी कि उन्हें फिर कभी नहीं मिली, ये कविताएं उन्हें समर्पित है जो गढ़ने में इतने व्यस्त हैं कि पढ़ने की फुर्सत नहीं! गढ़ने-पढ़ने के समीकरण में विषमीकरण की ताकत कहीं अधिक थी।
प्रेमचंद ने कहा है — साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है — उसका दरजा इतना न गिराइये। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सच्चाई है। प्रेमचंद ने कहा लेकिन क्या हम ने सुना? जब हम ने प्रेमचंद को नहीं सुना तो होरी हमें क्यों कर सुने —पाठ के आनंद में पाठकों की सुधि शामिल न हो तो पाठ का क्या करे पाठक! मैं अपने आप से पूछता हूं पिछली बार कब पढ़ी थी कोई कविता जिस की गूंज आज भी टटोली जा जा सकती है अपने अंदर! न पूछूं तो न आयेगी। पूछता हूं तो दूर कहीं दूर से आती है मरियल-सी आवाज। जिस दिन सिमट गया था, हो गया था गिरफ्तार अपने ही मनगढ़ंत स्याह-सफेद में, उसी दिन तय हो गया था कि ढलान पर चाहे जितनी दूर लुढ़कती चली अपनी कविताई। कविता का ईंधन पूरी तरह से फुक गया है। कविता का ईंधन? चाहें तो खोजा सकता है ईंधन का अर्थ स्वयं प्रकाश के इसी नाम के उपन्यास में। लेकिन इस खोज के पहले कर लेनी होगी, कर लेनी होगी और अंत में प्रार्थना! कहां मिलेंगे दूधनाथ सिंह! मिलेगा, खोजने पर मिल जाएगा आखिरी कलाम! लिखते रहे जोर-शोर से कमलेश्वर सुलगते शहर का सफरनामा और इधर शोर के जोर से देश बनता जा रहा अंगारों के बीच खिला हुआ अंधेरे का फूल। पूछ लीजिए विमलेश बता सकेंगे कि कब-कब कविता से लंबी होती है उदासी और कब-कब उदासी से भी लंबी हो जाती है कविता! क्या आप को पता है महाशय कविता में सदाशय का डिजीपिन – DIGIPIN? होते निर्मल वर्मा तो ठीक-ठीक बताते, कितनी ढलानों में कितनी दूर लुढ़कना है अभी और!
सभ्यता कोई हो आदमी इसलिए आदमी हुआ कि वह किए हुए को देखता है, दिखाता है। मोर के नाच और मनुष्य के नाच में कोई तो फर्क होगा! क्या सचमुच! मोर को पता है जंगल में कोई देखता नहीं उस का नाच लेकिन कोई कमी होती नहीं मोर के नाच में! मोर का नाच और कविता का उबलना दोनों जारी है। क्या सभी कवि मोरपंखी होते हैं! क्या कहते प्रेमचंद!
प्रफुल्ल कोलख्यान वरिष्ठ चिंतक-आलोचक-कवि एवं स्तंभकार हैं।





