
मृत्युंजय प्रभाकर की ये कविताएँ वर्तमान समाज, राजनीति और मनुष्य के अंतर्विरोधों की गहरी पड़ताल करती हैं। उनकी कविता में एक ओर कवि की सामाजिक प्रतिबद्धता, मनुष्यता के प्रति गहरी संवेदना और मुक्ति की आकांक्षा है, तो दूसरी ओर जातिवाद, सत्ता, पाखंड और आत्ममुग्धता के विरुद्ध तीखा प्रतिरोध भी है। ‘अगर मैं कवि हूँ’ में कवि की सामाजिक भूमिका और नैतिक दायित्वों का व्यापक संकल्प है, जबकि ‘कवि’ कविता साहित्यिक महत्वाकांक्षा और आत्ममुग्धता के बीच फँसे रचनाकार की विडंबना को उजागर करती है। ‘नए जातिवादी’ समकालीन ब्राह्मणवाद के बदलते रूपों को बेनकाब करती है, वहीं ‘मेरी खामोशी ही मेरा प्रतिरोध है’ शोर और अर्थहीन वक्तव्यबाजी के दौर में मौन की राजनीतिक सार्थकता को रेखांकित करती है। ‘जानवर’ मनुष्य के भीतर उपस्थित बहुरूपता और नैतिक पतन पर एक तीखा व्यंग्य है, जबकि ‘भ्रम’ जीवन की उन उम्मीदों और विश्वासों की पड़ताल करती है, जिनके सहारे मनुष्य अपनी तमाम विडंबनाओं के बीच जीता रहता है। इन कविताओं की सहज भाषा, व्यंग्यात्मक तेवर और स्पष्ट वैचारिक पक्षधरता इन्हें समकालीन सामाजिक यथार्थ का सशक्त काव्यात्मक दस्तावेज बनाते हैं।
अगर मैं कवि हूँ
अगर मैं कवि हूँ
तो लिखूं झूठ का सच
पकड़ूँ उसके ऑक्टोपस से
चारों ओर फैले पैरों को
आसमान में फैले डैनों को
और समेट कर रख दूं
उसका सारा वितान
सच के आईने के सामने
अगर मैं कवि हूँ
तो चढ़ता चलूं स्वर्ण रश्मियों पर
बादलों के रथ पर सवार
पृथ्वी और गगन
और दिग और दिगन्त के पार
उठायूँ अपने दोनों हाथों से सूरज
और दिखाऊँ अंधेरी दुनिया को
उसके ताप से भरी रोशनी
अगर मैं कवि हूँ
आखिरी आदमी तक पहुँचूँ
जरूरत पड़ने पर उसके लिए बन सकूं
आटा-चावल, यहां तक कि नमक भी
मिट्टी का गारा बनूँ ताकि वो
बना सके अपने लिए झोपड़ी
छुपा सके आंधी-पानी में अपना सर
बसा सके एक अदद प्यारा परिवार
अगर मैं कवि हूँ
देखूँ खारा न हो जाए पृथ्वी पर जल
गल न जाएं बड़े-बड़े ग्लेशियर
समंदर का वैभव बना रहे चिरकाल
बहती रहें नदियां अनवरत
सड़ न जाएं ताल-तलैया
निरंतर गिरतें रहें जलप्रपात
हर प्राणी को नसीब हो मीठा सोता
अगर मैं कवि हूँ
पोछ सकूं दुखितों के आंसू
रोक सकूं पृथ्वी पर प्रताड़ना
मरोड़ सकूं आतताइयों की बाहें
बदगुमान अधिकारियों को चटका सकूं
विकार से भरे हृदय के स्वामी
तानाशाहों के निर्लिप्त चेहरे पर
पोत सकूं गैलन भर कालिख
अगर मैं कवि हूँ
दर्ज करूँ मनुष्य का
मनुष्यता के लिए संघर्ष
दे सकूं थोड़ा आग या पानी
जरूरत के हिसाब से
बिल्कुल बीच में खड़ा हो
निश्चिंत-निर्द्वंद क्रांतिकारियों के
खुले गले से गाऊं मुक्ति के गीत।
कवि
कवि सोचता है
एक दिन उसके जीवन में आएगा
जिस दिन रच देगा वो एक कालजयी कविता
जिसे पढ़कर पाठक आलोड़ित हो जाएंगे
आलोचक दंग और रक़ीब बगलें झाकेंगे
उसकी चर्चा अपनी भाषा
समाज और संस्कृति की दीवारें लांघ
फ़ैल जाएँगी दिग-दिगंत तक
हर तरफ़ सिर्फ उसकी गूंज होगी
दुनिया के सारे फ़ोन उसका नंबर लगाएंगे
सारे मेल उसका इनबॉक्स खटखटाएंगे
सारे सोशल साईट उसकी प्रशंसा से भरे होंगे
टीवी डिबेट में सिर्फ वही छाया होगा
इस एक आस में वह फिर जाया करता है कुछ शब्द
व्याकरण फिर छोड़ देते हैं उसका साथ
चिंताएं फिर हो जाती हैं नकली
जिनके साथ नत्थी हैं खोखली भावनाएं
कवि बहुत सोचता है
पर तय नहीं कर पाता
वह एक कड़ी जो जोड़ दे
दुनिया के सारे मनुष्यों को
तब तक अभिशप्त है वह
बनावटी चिंताओं और
नकली भावनाओं से लस्त-पस्त
एक और कविता लिखने के लिए।
नए जातिवादी
वे मिलते ही सूंघने लगेंगे आपकी जाति
आप से पूछकर हार भी गए तो गम नहीं
आदतन पता कर ही लेंगे कहीं से भी
फिर आएंगे वो अपने मिजाज में
पर आपको वो भी नहीं दिखाएंगे
अपनों के बीच उड़ाएंगे आपकी खिल्ली
जहाँ-जहाँ संभव होगा काटना
वहां-वहां से वह काट देंगे आपका नाम
दूसरों को भी लगाएंगे इस महान काम पर
आपसे मिलेंगे वैसे ही चहककर
पिलाएंगे चाय, खाएंगे समोसे
जलाएंगे साथ ही सिगरेट की बत्ती
बार-बार जतलाएँगे खुद को जाति से परे
दे देंगे गालियां भी अपने पुरखों को
इतिहास में बरती गई नीचताओं के लिए
अपने पुरखों की तरह नहीं बनाएंगे दूरी
नहीं उठने पर मजबूर करेंगे बैठे होने पर
खान-पान का धरम भी नहीं मानेंगे
यह नए और बिल्कुल अपडेट ब्राह्मणवादी हैं
अपने पुरखों की तरह ही समय की मांग देखकर
आचार-विचार और यम-नियम बदलने में माहिर
वो रहेंगे आपके साथ घुल-मिलकर
पिस्सुओं की तरह आपकी ही मिट्टी में
फिर धीरे-धीरे घुन की तरह खा जाएंगे।
मेरी खामोशी ही मेरा प्रतिरोध है
मैं अब चुप ही रहूंगा
अब यही मेरी भाषा है
मेरी खामोशी ही मेरा प्रतिरोध है
जब सब बोल रहे हों
गर्जनाद कर रहे हों
हर दिशा में शोर हो
सामूहिक अट्टहास हो
भीड़ का गणराज्य हो
तब ठहर जाना ही श्रेयकर है
स्वर, व्यंजन, वर्ण, शब्द, अर्थ से
आकार लेती भाषा
जब चुकने लगे अपना ही मूल
जब बोले जाने में कुछ भी
कहा जाना शामिल न हो
तब चुप हो जाना ही बेहतर है
जब जो नहीं होना था
उसी का उत्सव मनाया जा रहा हो
और जो होना था
उसकी विरुदावली गाई जा रही हो
तब समझ लेना चाहिए
थोड़ा थम जाना ही हितकर है
कहने में जोखिम है
कहने का जोखिम उठाकर भी
हम कहते हैं कि कोई सुने
पर शोर से बहरे कानों में
जब कहना शोकगीत बन उतरे
तब कुछ न कहना ही प्रियकर है
इसलिए
मैं अब चुप ही रहूंगा
अब यही मेरी भाषा है
मेरी खामोशी ही मेरा प्रतिरोध है।
जानवर
जानवर जानवर होते हैं
अपनी प्रजाति का मान रखते हैं
आप उनको जानने का दावा कर सकते हैं
उनके बारे में एक समझ बना सकते हैं
मसलन शेर शेर होता है
हिरण होते हैं हिरण
भेड़िये भेड़िये होते है
भेड़ होते हैं भेड़
आप उड़ने वाले पक्षियों को
रेंगने वाले जीवों से अलग कर सकते हैं
तैरने वाले जीवों को भी
चलने वालों से अलग किआ जा सकता है
सांप और नेवले, कुत्ते और बिल्लियाँ
चूहे और छिपकलियां एक नहीं होते
उड़ने वाले सभी तितलियाँ नहीं होतीं
सारे चौपाए बैल नहीं होते
सबका अपना अलग अलहदा
स्वभाव, पहचान और वजूद होता है
सिवा आदमी के क्योंकि वह
एक साथ यह सभी हो सकता है।
भ्रम
मैं चाहता हूँ
बना रहे भ्रम
हमारे जीवन में
चुटकी भर नमक जैसा
यथार्थ से टकराकर
चूर हो जाने तक
बना रहे भ्रम
स्वप्न के पूरा होने का
सपनों पूरे हों
फिर भी
बना रहे भ्रम
उनके पूरे होने पर
बना रहे भ्रम
गरीबों में कि
अमीरों का जीवन
उनसे भी कष्टकर है
बना रहे भ्रम
उन रिश्तों में
जो अपनी उम्र
पूरी कर चुके हैं
बना रहे भ्रम
दोस्ती में
जिसकी मियाद
पूरी हो चुकी है
बना रहे भ्रम
बच्चों में कि
पापा आज ले आएंगे
उनकी किताबें और खिलौने
बना रहे भ्रम
माता-पिता का
कि बच्चे जान दे दें उनके लिए
अगर हालात से मजबूर न हों
बना रहे भ्रम
प्रेमिकाओं का
कि उनका प्रेमी
सबसे अच्छा है
बना रहे भ्रम
प्रेमियों का भी
कि उनकी प्रेमिकाएं
उनके अलावा कुछ नहीं चाहतीं
बना रहे भ्रम
बहनों का कि
भाई हैं उनके साथ
दुःख-सुख में
बना रहे भ्रम
मरीजों का
वे लौट जाएंगे घर सकुशल
अस्पताल से ठीक होकर
बना रहे भ्रम
उम्मीदवारों का
उनके और नौकरी के बीच
कोई भी बाधा नहीं है
बना रहे भ्रम
कुटिलों का
कि उनसे चालाक
नहीं है कोई
समझदारों का भी
बना रहे भ्रम
कि उनसे समझदार
दूसरा कहाँ मिलेगा
मूर्खों का भी
बना रहे भ्रम
कि वो जो कहें
वही अक्ल की बात है
झूठों का भी
बना रहे भ्रम
कि उनकी बात है
दुनिया में सबसे सच्ची
अफसरों का
बना रहे भ्रम
कि वही हैं
तो दुनिया है
नेताओं का भी
बना रहे भ्रम
कि उनसे बड़े अभिनेता
फिल्म स्टार भी नहीं
बना रहे भ्रम
जनता का भी
कभी तो आएंगे
अच्छे दिन!
लेखक कवि, नाटककार और निर्देशक हैं.





