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Home कविता

सत्य प्रकाश ध्रुव की कविताएँ

युवा कविता

by Anhadkolkata
October 29, 2026
in कविता, साहित्य
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सत्य प्रकाश ध्रुव

सत्य प्रकाश ध्रुव की कविताओं में स्मृति, प्रेम, विरह, घर और लौटने की आकांक्षा जैसे जीवन के आत्मीय अनुभव सहज संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। उनकी कविताएँ निजी भावनाओं को साधारण जीवन की वस्तुओं और स्थितियों के माध्यम से व्यापक मानवीय अनुभव में बदलने की क्षमता रखती हैं। ‘जो बचा रह गया’ में अनुपस्थिति की उपस्थिति, ‘लौटने का बुखार’ में गाँव और जड़ों से বিচ्छिन्न होने की पीड़ा तथा ‘मृत्यु के पहले तुम्हारा नाम’ में प्रेम की अंतिम आकांक्षा को जिस तरह व्यक्त किया गया है, वह कवि की संवेदनात्मक गहराई और बिंब रचने की सहज सामर्थ्य का परिचायक है। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादधर्मी है, जिसमें भावुकता के अतिरेक से बचते हुए मार्मिकता पैदा करने की कोशिश दिखाई देती है। हालाँकि कुछ स्थानों पर भावों और निष्कर्षों को अधिक सूक्ष्म बनाने की गुंजाइश है, फिर भी इन कविताओं में जीवन के अनकहे दुखों को पहचानने और उन्हें काव्यात्मक अभिव्यक्ति देने की उल्लेखनीय संभावना मौजूद है। कम उम्र में ही संवेदना और शिल्प के प्रति यह सजगता सत्य प्रकाश ध्रुव को एक संभावनाशील कवि के रूप में रेखांकित करती है।

 

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शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताएँ

जो बचा रह गया

तुम्हारे जाने के बाद
मैंने घर को बहुत बदल दिया।
परदे बदले,
किताबों की जगह बदली,
उस कुर्सी को भी हटा दिया
जिस पर बैठकर
तुम देर तक
खिड़की के बाहर देखती थीं।
मैंने सोचा—
चीज़ों के बदल जाने से
शायद स्मृतियाँ भी
अपना पता भूल जाएँगी।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
एक दिन
चाय बनाते हुए
अचानक तुम्हारी हँसी सुनाई दी।
रसोई में कोई नहीं था।
मैंने तब जाना—
कुछ लोग चले जाते हैं,
लेकिन उनकी आवाज़
घर की दीवारों में
धीरे-धीरे बस जाती है।
उन्हें निकालने के लिए
घर नहीं,
शायद पूरा जीवन बदलना पड़ता है।
और जीवन—
वह इतना आसान कहाँ होता है।

लौटने का बुखार

गाँव
अब एक जगह नहीं रहा
वह एक ताप है,
जो हर मौसम में
धीरे-धीरे चढ़ता है।
पुरखों की आवाज़ें
अब पेड़ों में नहीं मिलतीं,
और पत्तों की सरसराहट
अब नाम नहीं पुकारती।
शहर की खिड़की से
जो आसमान दिखता है,
वह बहुत बड़ा है
पर उसमें
अपनापन नहीं बसता।
गाँव में
समय रुकता नहीं,
बस अपनी चाल भूल जाता है
और हम
उसे पहचानने में देर कर देते हैं।
कुछ यादें
अब भी लौटती हैं
पर वे पूरी नहीं होतीं,
जैसे अधूरे सपनों की
टूटी हुई नींद।

लौटने के लिए

हर बार
जब तुम दूर जाती हो,
मैं तुम्हें रोकता नहीं।
क्योंकि
मैं जानता हूँ
कुछ यात्राएँ
अकेले ही पूरी करनी पड़ती हैं।
कुछ रास्तों पर
साथ चलने की इच्छा तो होती है,
लेकिन
साथ चलना संभव नहीं होता।
इसलिए
मैं तुम्हें जाने देता हूँ।
बस इतना चाहता हूँ—
जब कभी
तुम्हें लगे कि
बहुत दूर आ गई हो,
जब बहुत-से चेहरों के बीच
अपनापन कम पड़ने लगे,
जब लौटने के लिए
किसी एक जगह की तलाश हो—
तो याद रखना,
मेरे पास
तुम्हारे लिए
एक रास्ता
हमेशा खुला रहेगा।

मृत्यु के पहले तुम्हारा नाम

मैं चाहता हूँ
कि जब मेरी साँस
धीरे-धीरे कम हो रही हो,
तब कमरे में
तुम्हारा नाम मौजूद रहे।
जैसे किसी पुराने घर में
अंत तक बची रहती है
हल्दी और धूप की गंध।
लोग मेरे चारों ओर होंगे,
कंधों पर दुख लिए,
आँखों में औपचारिक आँसू लिए,
पर मैं
उन सबके बीच
सिर्फ तुम्हें खोज रहा होऊँगा।
तुम आना—
इतना चुपचाप
कि मृत्यु भी
तुम्हारे कदमों की आहट न सुन सके।
और मेरे माथे को
वैसे ही छू लेना
जैसे कभी
थक जाने पर छूती थीं।
उस समय
हमारे बीच
कोई समाज नहीं होगा,
कोई जाति नहीं,
कोई भय नहीं।
मृत्यु
मनुष्य को
उसकी सबसे सच्ची जगह पर छोड़ देती है।
और मेरी सबसे सच्ची जगह
शायद हमेशा
तुम्हारे पास थी।

♦♦♦

कवि परिचय

नाम: सत्य प्रकाश ध्रुव
जन्मतिथि: 21 फरवरी 2004
शैक्षणिक योग्यता: दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर
साहित्यिक परिचय:
देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन दूरदर्शन, आकाशवाणी, साहित्यतक तथा अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर काव्य-पाठ साहित्यिक ई-पत्रिका ‘वर्तनी’ के संपादक ।
प्रमुख सम्मान:
• बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा सम्मान।
• राजभाषा विभाग, बिहार सरकार द्वारा सम्मानित।
• चाणक्य फाउंडेशन द्वारा दिनकर सम्मान।
• विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
पता : HOUSE NO 47-B, BLOCK C-2,
GROUND FLOOR, BUDH VIHAR PHASE-1,
DELHI – 110086
मोबाइल : 9625797484

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