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Home आलोचना

लोचन कोना – तीसरी किस्त – प्रफुल्ल कोलख्यान

(खास तौर पर अमरकांत की कहानियां)

by Anhadkolkata
October 7, 2026
in आलोचना, लेखक, साहित्य
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सब से कठिन और कंटीला सवाल —- हिंदी का अधिकतर लेखक हिंदी का पाठक क्यों नहीं रहा! यह तो चित्रगुप्त ही जानते हैं कि पहले कौन गया —- लेखक गया या पाठक!

अमरकांत हिंदी के अति-महत्वपूर्ण कहानीकार हैं। अपने जिन कहानीकारों पर हिंदी को गर्व है उन में अमरकांत का नाम बड़े सम्मान के साथ शामिल है। अमरकांत की कहानियां न प्रेमचंद की तरह से गंवई यथार्थ को पकड़ती हैं। जबकि राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर के स्वर्णिम त्रिभुज की कहानियां उच्च-मध्यवर्गीय नागर यथार्थ की कहानियां हैं। इस तरह से देखने पर फणीश्वरनाथ रेणु शेखर जोशी और अमरकांत की कहानियां यथार्थ की भिन्न जमीन पर खिले अनेरुआ फूल की तरह होती हैं।

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अमरकांत की कहानी की काया और फूल दोनों का सौंदर्यबोध पलाशी है। अमरकांत की पलाशी कहानियों का सौंदर्यबोध उन की कहानियों को भिन्न पहचान देती है। अमरकांत की कहानियां इस अर्थ में महत्वपूर्ण प्रगतिशील कहानियां हैं कि वह हिंदी साहित्य की प्रगतिशीलता को उस के आडंबर से नहीं भीतर के वास्तविक स्वरूप की पहचान अपने पाठकों को कराती चलती है, कुछ इस तरह से कि जैसे कोई बुजुर्ग किसी बच्चे के बस्ता में चुपके से कुछ महत्वपूर्ण रख दे।

हिंदी साहित्य की कर्म-कांडी प्रगतिशीलता को अमरकांत की कहानियों की पलाशी प्रगतिशीलता दिल से कभी पसंद नहीं आई। नतीजा, अमरकांत की कहानियों से कन्नी काटकर ठीक से निकल जाना हिंदी आलोचना की मुख्यधारा की प्रवृत्ति उजागर होती रही है। अमरकांत की कहानियां अ-चिह्नित न रहकर भी कभी ढंग से चिह्नित भी नहीं हो पाई।

अपनी प्रिय कहानियों पर गौर करते हुए अमरकांत ने ‘लिखने के कारणों’ पर बहुत गहराई से सोचा है। इसे पढ़ समझकर राजेंद्र यादव के ‘न लिखने के कारणों’ की याद जरूर आ जायेगी, यकीनन आयेगी। एक बात कहना जरूरी है कि अमरकांत की कहानियों को इस तरह से समझने के प्रयास का मतलब अन्य कहानीकारों के महत्व को नजर-अंदाज करना नहीं है। कुछ मतलब है तो इतना ही है कि अमरकांत की कहानियों के महत्व को अन्य कहानीकारों के महत्व के परिप्रेक्ष्य और प्रसंग में समझने का प्रस्ताव है।

हां, तो अमरकांत ने लिखने के कारणों की तलाश करने की भरपूर कोशिश की है। लिखने के कारण बताने में साहित्यकारों को होनेवाली कठिनाई पर अमरकांत गौर किया है। तुलसीदास ने लिखने के कारणों के रूप में स्वान्त:सुखाय, अर्थात अपने सुख के लिए लिखने की बात कही थी। हालांकि, स्वान्त:सुखाय को लिखने के प्रगतिशील कारण के रूप में स्वीकृत नहीं किया जा सकता है। अमरकांत इस स्वान्त:सुखाय को बहुत गहराई से समझने की कोशिश करते हैं। भगवतीचरण वर्मा ने पैसा के लिए लिखने की बात कही थी, अमरकांत न इस पर भी कभी यकीन नहीं किया। लिखकर समाज व्यवस्था को बदलने के लिए लिखने की बात पर यकीन रहा तो सही लेकिन लिखकर इस लक्ष्य को हासिल करने में सदैव संदेह रहा। क्या पता फिर कुछ और ही बात हो!

अमरकांत ने अपने लिखने के कारणों की तलाश गहराई में जाकर की है। अमरकांत कहते हैं कि स्वान्त:सुखाय लेखन एक बड़ी ज़िम्मेदारी है, एक संकल्प है, जब व्यक्ति किसी महान उद्देश्य के लिए भौतिक सुख को त्याग देता है। वे साफ-साफ तो नहीं कहते हैं लेकिन ऐसा माना जा सकता है कि अमरकांत अपने लिखने के कारणों को इसी स्वान्त:सुखाय के आसपास पहुंचकर आदर्शवादी और प्रगतिशील रूप में खोजते हैं।

इस लेख की अपनी सीमा है, उस से कहीं अधिक मेरी अपनी सीमाएं हैं अमरकांत की कहानियों पर कोई अंतिम बात कहने का कोई आग्रह भी नहीं है। इस अस्वीकरण के साथ अमरकांत की कुछ कहानियों का संदर्भ लेना जरूरी है।

रोजगार के अभाव को लेकर आजकल जिस प्रकार अफरातफरी मची हुई है उस के बारे में अलग से कुछ कहना जरूरी नहीं है, खासकर निम्न-मध्यवर्गीय कस्बाई घर परिवार के मद्देनजर। यह इसलिए कि उच्च-वर्ग घर परिवार के पास बेरोजगारी का कोई-न-कोई तोड़ जरूर होता है। वैसे भी उच्च-वर्ग घर परिवार के नौजवान जिस तरह के रोजगार की तलाश में रहा करते हैं, उस तरह के रोजगार किसी-न-किसी स्वरूप में उपलब्ध हो ही रहे हैं। उपलब्ध यदि न भी हों तो भी उन्हें उस तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है, जिस तरह की परेशानी निम्न-मध्यवर्गीय कस्बाई घर परिवार के नौजवानों को झेलनी पड़ती है। इस संदर्भ में अमरकांत की कहानी ‘इंटरव्यू’ को पढ़ा जाना चाहिए।
निम्न मध्यवर्गीय परिवार में ‘पिता’ की आमदनी का स्रोत जब साफ तौर सूखता हुआ दिखने लगता है, तब तक यदि ‘पुत्र’ के आमदनी का सोता ठीक तरीका से नहीं फूटता है तो कोहराम मचना शुरू हो जाता है। कहना न होगा कि निम्न मध्यवर्गीय कस्बाई परिवार में आमदनी का सोता रोजगार से ही फूटता है।
‘इंटरव्यू’ अमरकांत की एक ऐसी कहानी है। रोजगार की तलाश में व्यस्त युवा मानसिकता का बेहतर विवरण रखकर कहानी अपने कथ्य को आगे बढ़ाती है। निराशा में आशा की डोर पकड़े जिंदगी के साथ सलूक के युवा रवैया को ‘इंटरव्यू’ कहानी पेश करती है।

60 ₹ की क्लर्की की रिक्ति पर तीन साढ़े तीन सौ उम्मीदवार! सब का तो, इंटरव्यू भी हो नहीं पाता है! यह कहानी पाठक के खुले दिल-दिमाग में एक बात डाल देती है कि साहब का कुत्ता भी रोजगार के जरूरतमंद लोगों की नजर में शेर से अधिक ताकतवर होता है। लोक धारणा में इस तरह की मान्यताओं का घर बनाना खतरनाक नजरिया की तरफ इशारा करता है।

“भीड़ के बीच से कोई पतली तथा उत्तेजनापूर्ण आवाज़ में चिल्ला पड़ा, ‘‘इन्कलाब!’’ इन्कलाब तो कहा, लेकिन इस का शाश्वत जवाब जिंदाबाद कहीं सुनाई नहीं दिया। भारत की आजादी के आंदोलन के दौरान क्रांति का पर्याय बन गये इन्कलाब के शाश्वत जवाब का गुम हो जाना सभ्य और बेहतर सामाजिक और नागरिक जीवन की आकांक्षा के बिखरते जाने की संवेदनशील सूचना ‘इंटरव्यू’ में छिपी है। क्या हमारे समाज ने सूचना विस्फोट के इस युग में साहित्य की संवेदनशील सूचना का संज्ञान लिया! इस सवाल का जवाब कौन खोजे? हो सकता है लिया हो।

अमरकांत की एक कहानी है, ‘गले की जंजीर’। ‘गले की जंजीर’ अमरकांत की ऐसी ही एक कहानी है। यह कहानी है जो समस्या-मुक्त लोगों के द्वारा समस्या-ग्रस्त लोगों को ‘मुफ्त की सलाह’ देने की प्रवृत्ति और प्रभाव को बड़ी गंभीरता से रेखांकित करती है। सलाह भी इस तरह की, कि व्यक्ति अपनी समस्या के लिए खुद ही जिम्मेवार ठहरा दिया जाता है। पीड़ित को ही दोषी ठहराने की यह प्रवृत्ति पीड़ित को बेवकूफ और पीड़क को चालाक समझती-समझाती है। निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति का यह आम अनुभव है।

असल में दुर्घटना के बाद दुर्घटना के कारणों की तलाश की जती है। तलाश में कुछ ऐसे कारणों को मुफ्त की सलाह को इस तरह से सामने ले आया जाता है, कि अगर उन सलाहों का ध्यान रखा जाता, वैसी अक्लमंदी से काम लिया गया होता तो निश्चित ही समस्या उत्पन्न ही नहीं होती। किसी के द्वारा पहले दी गई ऐसी ‘मुफ्त की सलाह’ को अपनाये जाने की बात कहने पर उसे सावधानी बरतने की दूसरी सलाह दी जाती है और अंततः उसी सलाह पर उतर आते हैं जिस सावधानी को समस्या-प्रभावित व्यक्ति ने वास्तव में अपनायी हुई होती है।

प्रसंगवश, यौन-पीड़िताओं के मामलों में दी जानेवाली सावधानीमूलक मुफ्त सलाह में इस प्रवृत्ति की अत्यधिक सक्रियता दिखती है, कभी-कभी तो बहुत ही निचले-से-निचले स्तर तक की सलाह दे दी जाती है।

यह ध्यान से समझने की जरूरत है कि ‘गले की जंजीर’ कहानी में गले की जंजीर क्या है? गले की जंजीर बेतुके सलाह देने की मध्यवर्गीय प्रवृत्ति है, जो हर पीड़ित के गले में पड़ी रहती है। किसी मुसीबत में फंस जाने पर, मौका मिलते ही ‘मुफ्त की सलाह’ व्यक्ति की निजता में नाना रूप धरकर घुस-पैठ करने लग जाती है। उस पीड़ित के ऊपर ‘ज्ञान की बारिश’ होने लग जाती है। जी, जंजीर! अमरकांत की कहानी ‘गले में जंजीर’ सवाल करती है कि क्या किसी समस्या-ग्रस्त आदमी के गले में ऐसी जंजीर डालने के पहले सोचा नहीं जाना चाहिए? जिस ने ‘गले की जंजीर’ की कहानी पढ़ी है वह ऐसे अनुभवों से सामना होते ही, अपने गले पर जंजीर को जरूर महसूस करता है।

जीवन का भोजन से गहरा रिश्ता है। भोजन में कमी जीवन के सभी प्रसंगों को निचले-से-निचले स्तर पर पहुंचा देती है। हमारे देश में अस्सी प्रतिशत लोगों की कमाई का नब्बे प्रतिशत हिस्सा भोजन सामग्री जुटाने में चला जाता है। जाहिर है कि देश के अधिकतर लोगों के जीवन में सभ्य और बेहतर सामाजिक और नागरिक जीवनयापन का जन्म-प्राप्त हक कभी हासिल नहीं हो पाता है। इस अर्थ में जीवन और भोजन एकमएक हैं। इस बात को दार्शनिक और नेतागण अपनी तरह और तरीके से समझते, कहते हैं। और साहित्य अपनी तरह और तरीके से समझता, कहता है।
अमरकांत की एक कहानी ‘दोपहर का भोजन’ है। अभाव से जूझ रहे परिवार में मनोमालिन्य बढ़ जाता है। मनमुटाव बढ़ जाता है। रिश्तों में गलतफहमियों का सिल-सिला शुरू हो जाता है। गृह-कलह का ऐसा दौर जिस में मन ऐसा उलझता है कि साधारण गृहस्थ खुद को चारों ओर से गहरे संकट में घिरा पाता है! गहरे संकट में फंसने पर आदमी जरूर यही सोचता, यही कहता है —- ‘समय आने पर सब ठीक हो जाएगा।’ फिर समय के आने का इंतजार! ‘अच्छे दिन’ के आने का इंतजार! कभी-कभी इंतजार बहुत लंबा और अकसर तो अधूरा ही रह जाता है। कभी समय आता है, तो कभी-कभी नहीं भी आता है!

परिवार के लोगों के मन में गलतफहमियां स्थाई बसेरा न बना ले, इस के लिए गृहणियां, सकारात्मक झूठ की व्यवहार-कुशलता का सहारा लेकर एक के बारे में दूसरे की न कही गई अच्छी-अच्छी बातों को इस तरह से रखती हैं कि पूरा नहीं भी तो थोड़ा-बहुत मनोमालिन्य जरूर कट जाता है। गृहिणी-मनोविज्ञान की यह रणनीति परिवार के सदस्यों के बीच पारस्परिक अनुकूलता का मनोभाव बनाये रखने में काफी मददगार साबित होती है। जब तक भावनाओं में एक तरह का निर्मम टकराव होता रहता है। इस के बावजूद तब तक संबंधों में पारिवारिकता बनी और बची रहती है। हां यह जरूर है कि भावनाओं के टकरावों का हितों के टकराव में बदलने से परिवार में टूटन की शुरुआत हो जाने से इनकार भी तो नहीं किया जा सकता है। यह समझना बहुत मुश्किल नहीं रह जाता है कि आज परिवार क्यों? टूट रहा है। यह एक ऐसा प्रसंग है जो परिवार पर ही नहीं समाज और राज्य व्यवस्था पर भी लागू होता है।

हित-विभाजन का बोध अपने-पराये के निश्चित और सुपरिभाषित बोध की पहचान से उत्पन्न होता है। अपने-पराये के गणना बोध से कुटुंब टूट जाता है, वसुधैव कुटुंबकम की तो बात ही क्या! प्रेमचंद के साहित्य में इस गृहिणी-मनोविज्ञान का खूब इस्तेमाल हुआ है। आम की बात कहने पर इमली की बात उठाकर संवाद के संदर्भ को तोड़ देना बातचीत की पुरानी तिकड़मी शैली रही है। मोहन राकेश के साहित्य में इस शैली का भरपूर इस्तेमाल हुआ है।

बहरहाल बात अमरकांत की कहानी ‘दोपहर का भोजन’ पर हो रही है। अभाव से उत्पन्न संवाद-स्तब्धता को तोड़ने के लिए सिद्धेश्वरी बोली, “मालूम होता है, अब बारिश नहीं होगी।” मकान-किराया नियंत्रण विभाग के छटनी-ग्रस्त क्लर्क की पत्नी सिद्धेश्वरी के बारिश राग का मतलब सिर्फ संवाद-स्तब्धता को तोड़ना और पति यानी मुंशीजी के मन को ताड़ना था। लेकिन मुंशीजी ने एक क्षण के लिए इधर-उधर देखकर निर्विकार स्वर में राय दी, “मक्खियाँ बहुत हो गई हैं।”

मुंशीजी ने आम की बात कहने पर इमली की बात उठाकर संवाद के संदर्भ को तोड़ देने की शैली में अपनी राय दी। बिना कहे या प्रत्यक्ष हुए कहानी का अचेतन पाठक के अचेतन का हिस्सा बन जाता है। किसी अन्य प्राणी को उस तरह से निकाल फेंकने का मुहावरा नहीं है, जिस तरह से ‘मक्खी’ को निकाल फेंकने का मुहावरा है, दूध की मक्खी! छटनी-ग्रस्त मुंशीजी मक्खी की तरह व्यवस्था से निकाल दिये गये हैं। “मक्खियाँ बहुत हो गई हैं।” कहकर क्या मुंशीजी ने अपनी आत्म-हीनता में अपने निकाले जाने के औचित्य के अचेतन भाव को सिद्धेश्वरी के अचेतन में संस्थापित कर देना चाहते होंगे! क्या पता! लेकिन जाने-अनजाने ऐसा ही हुआ है। सचेत पाठक मुंशीजी की राय कि “मक्खियाँ बहुत हो गई हैं” को इस तरह से हासिल करते हैं तो निश्चित ही यह कथ्य और शैली के मामले में अद्भुत कहानी बन जाती है। पाठक यदि इस तरह से ‘दोपहर का भोजन’ कहानी को अपने अंदर हासिल नहीं कर पाते हैं तो भी एक कहानी तो वह है ही जिस का नाम है, ‘दोपहर का भोजन’!

अ-साधारण पाठक ही पाठ की साधारणता को अ-साधारण बनाकर हासिल करता है! भरोसा के लिए इतना काफी होगा क्या कि ‘समय आने पर सब ठीक हो जाएगा।’

‘जिंदगी और जोंक’ अमरकांत की ऐसी कहानी है जो व्यक्ति और उस की जिंदगी को न सिर्फ अलग-अलग करके समझने और समझाने का नजरिया पेश करती है, बल्कि दोनों को एक दूसरे के आमने-सामने कर देती है। जीवन के अखंड-प्रवाह में व्यक्ति का अस्तित्व जिंदगी के रूप में प्रकट होता है। जिंदगी के साथ व्यक्ति बुलबुले की तरह अभिव्यक्त होता है।
बुलबुलों का फूटना और बुलबुला का बनना जारी रहता है। लेकिन, आज मुश्किल यह है कि जीवन का प्रवाह लगातार खंडित हो रहा है। नदी का पानी ही सुख जाये तो प्रवाह अखंड रह भी कैसे सकता है! चाहे जैसी भी हो प्राणी की स्थिति, मौलिक रूप से जीने की इच्छा, उस में सदा बनी रहती है। जीवित रहना प्राणी-मात्र का मौलिक अधिकार और दूसरे के जीवित रहने की स्थिति बनाये रखना मौलिक कर्तव्य है।

जिजीविषा का ही एक लक्षण है कि हर हाल में आदमी जिंदगी के सुरक्षा घेरे से जोंक की तरह चिपका रहता है।

फालतू समझे जानेवाले आदमी में भी कुछ-न-कुछ गुण जरूर होता है। ‘काम’ के ‘हिसाब’ से आदमी पैदा नहीं होता है, आदमी के ‘हिसाब’ से काम करने का अवसर उपलब्ध कराना सभी आदमी का यानी समाज और राज्य व्यवस्था का दायित्व है। आदमी अपना यह दायित्व ‘अपने समाज’ के माध्यम से पूरा करे या ‘अपने राज्य’ के माध्यम से करे, यह कहानी से अलग का मसला है। कहानी से अलग का मसला भले हो, मगर मसला है, कहानी बताती है कि यह गंभीर मसला है।

पैर की माप का जूता बनना चाहिए, न कि जूता के माप के अनुसार पैर को तराशने की सिफारिश की जा सकती है।

‘लड़का-लड़की’ एक ऐसी कहानी है जिसे पढ़कर प्रेमचंद की नशा कहानी की याद स्वाभाविक रूप से आ जाती है। बल्कि यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अमरकांत की लड़का-लड़की कहानी प्रेमचंद की नशा कहानी से आगे की कहानी है। ऐसा इसलिए कि लड़का-लड़की कहानी में जेंडर जस्टिस का मामला अधिक संवेदनशील तरीका से उठाया गया है। इस कहानी का एक अंश रखना जरूरी लग रहा है ‒ ‘हाँ, वाहियात बक रही हूँ!’ तारा और भी तीखी आवाज में बोली ‒ ‘लेकिन आज आपको सब-कुछ सुनना पड़ेगा। मैं आपको कितना प्यार करती हूँ, यह नहीं बता सकती, लेकिन आज आपकी भी बातों को मैं बरदाश्त नहीं कर सकती। आपका भी ऐसा ही कहना है। आपके लिए तो मैं बड़ा-से-बड़ा त्याग करने को तैयार थी, लेकिन इधर मैंने यह महसूस करना शुरू किया है कि आप केवल अपनी ही बातों को महत्व देते हैं, दूसरों की भावनाओं की आपको कतई परवाह नहीं। कितनी बार मेरी इच्छा हुई कि आपसे अपने मन की बातें कहूँ.. अपने दुःख-सुख की, अपनी कल्पनाओं की, भविष्य की। कई बार मैं कोई अच्छी किताब पढ़कर आती थी और उसके बारे में आपसे बातें करना चाहती थी, लेकिन आप मेरी हर बात को काटकर अपनी बातें शुरू कर देते थे। वही उपदेश। वही छात्र-आंदोलन के अनुभव।

आपको दो ही बातों से मतलब है, एक मेरी देह से और दूसरा मुझे उपदेश देने से। मैं मेहनत करूँ, मैं कुर्बानी देने को तैयार हो जाऊँ।

आप क्या करेंगे? आप क्या मेहनत करते हैं? बात तो यह है कि आप सदा हवा में उड़ते रहना चाहते हैं और आज जब जमीन पर उतरने का मौका आया है, त्याग करने का समय आया है, तो आप जान बचाना चाहते हैं, इसीलिए आप नाराज हैं, अपने लिए मौजपूर्ण गैरजिम्मेदारी और दूसरों के लिए परिश्रम, कर्तव्य और जिम्मेदारी, यही आपका जीवन-दर्शन है। पर मैं आपसे यह पूछती हूँ कि आपने मेरा जीवन क्यों बरबाद किया? खैर, आप यह गाँठ बाँधकर रख लीजिए कि मैं किसी की दया पर निर्भर नहीं रहना चाहती!’

अमरकांत की सारी कहानियों की चर्चा तो यहां नहीं की जा सकती है लेकिन, ‘जनमार्गी’ का उल्लेख न करना अमरकांत की मूल कथा चेतना और विडंबना से कन्नी काटकर निकल जाने के अपराध से कम क्या होगा।

क्रांति और कविता को जोड़कर अपने जीवन लक्ष्य को निर्धारित करनेवाली पीढ़ी की दुर्गति की कहानी है ‒ ‘जनमार्गी’।

आज के ‘भोगो और भूलो’ की सिद्धांतकी के समय में ईमानदारी, परिश्रम एवं साहस की कोई कद्र बची नहीं है। समझना होगा कि क्यों अब निम्न-मध्यवर्गीय कस्बाई नौजवान देश में आर्थिक और सामाजिक क्रांति की बात नहीं करता है।
क्या सचमुच सपनों का खात्मा कर दिया गया है!

क्या आज मनुष्य सपनों की जगमग कब्रिस्तान में अपनी परछाई से हारकर अकेला, बिल्कुल अकेला रह गया है?

क्या सभ्यता विकास की शाश्वत चीख, इंकलाब का शाश्वत जवाब जिंदाबाद सभ्यता के किसी अन्य शाश्वतीकरण की प्रक्रिया के मातहत हो गया? साहित्य इतना ही कर सकता है, अमरकांत जैसे कहानीकार के लिखने का कारण भी इतना ही है कि समाज के सवाल को समाज की तलहत्थी पर रख दे!

अब यह तो समाज पर है कि वह सवाल को झटककर तलहत्थी को गरजती हुई मुट्ठी में बदल दे या गिड़गिड़ाती हुई पसर जाये! लेकिन, शाश्वत सवाल तो यही है कि क्या इंकलाब का शाश्वत जवाब —- जिंदाबाद —- अब निरर्थक जुमलेबाजी के दौर में कहीं खो गया है! खो गया है तो, कहां खो गया है! जो खो जाता है, वह कभी मिल भी जाता है।
सवाल यह है कि खोए हुए सामाजिक मूल्यों को पाने की सामाजिक कोशिश में साहित्यकार अपनी क्या भूमिका तलाश करता है —- कर पाता है।

लेखकों को बार-बार खुद से पूछना चाहिए कि वह क्यों लिखता है! समाज को भी बार-बार खुद से पूछना चाहिए कि वह अपने के समय के साहित्य से क्यों बिदक गया और इस तरह बिदककर आखिर वह कहां चला जा रहा है? और हां सब से कठिन और कंटीला सवाल —- हिंदी का अधिकतर लेखक हिंदी का पाठक क्यों नहीं रहा! यह तो चित्रगुप्त ही जानते हैं कि पहले कौन गया —- लेखक गया या पाठक गया!

***

लेखक वरिष्ठ चिंतक, कवि तथा आलोचक हैं।

Tags: अनहद कोलकाता Anhad Kolkata हिन्दी बेव पत्रिका Hindi Web Magzineअमरकांतअमरकांत की कहानियां)प्रफुल्ल कोलख्यानयथार्थ की जमीन पर पलाश फूललोचन कोनालोचन कोना - आनहद कोलकाता पर स्थायी संतंभलोचन कोना - प्रफुल्ल कोलख्यान
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