बलजीत सिंह ‘बेनाम’ हरियाणा के हाँसी (जिला हिसार) के निवासी हैं। आप हिंदी-उर्दू ग़ज़ल के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी ग़ज़लें, कविताएँ, दोहे और आलेख देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, साहित्य रचना, भारत दर्शन, प्रतिंबिंब मीडिया सहित विभिन्न वेब पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। आप सामाजिक विसंगतियों, प्रेम, दर्शन और मानवीय संवेदनाओं को सहज अंदाज़ में ग़ज़ल में पिरोते हैं। आपकी रचनाएँ आकाशवाणी व कवि सम्मेलनों में सराही गई हैं। वर्तमान में आप स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।
बलजीत सिंह ‘बेनाम’ की दस ग़ज़लें
[1]
कभी जो आदमी दौलत पे नाज़ां हो नहीं सकता!
किसी भी हाल में ख़ुद से पशेमां हो नहीं सकता।
अगर दिल में हमारे है ख़ुदा तो ये कहीं मुमकिन!
ख़ुदा के घर में शैतां का भी इमकां हो नहीं सकता।
मोहब्बत छीन लेती है सुकूँ देती फ़कत आँसू!
सफ़र जन्मों का मुश्किल है ये आसां हो नहीं सकता।
कभी रोता नहीं ग़म में ख़ुशी में जो नहीं हँसता!
कोई उस शख़्स के मरने पे हैरां हो नहीं सकता।
वतन में रह के अपने ही वतन को बेचने वाला!
किसी सूरत में मेरे घर का मेहमां हो नहीं सकता।
[2]
जिसे तू फिर जगाना चाहता है!
वही तुझको सुलाना चाहता है।
कहीं ऐसा बशर भी है सफ़र मे!
समन्दर को बुलाना चाहता है।
जहां ने जिसको आँसू ही दिये हैं!
जहां को वो डुबाना चाहता है।
कभी देखो ज़रा सूरजमुखी को!
हमेशा मुस्कुराना चाहता है।
जिधर रहता नहीं दिन में घड़ी भर!
उधर रातें बिताना चाहता है।
[3]
प्यार का मतलब बताती इक कहानी दे गया!
इक पतंगा हँसते हँसते ज़िन्दगानी दे गया।
शख़्स जाने कौन था पर दर्द में मसरूर था!
अपने हिस्से की मुझे बाकी जवानी दे गया।
ज़िन्दगी के जब सभी अल्फ़ाज़ थे बिखरे पड़े!
तब खुदा सपने में लफ़्ज़ों को मआनी दे गया।
इस ज़मी से दूर शायद था कहीं उसका मकां!
प्यास से मरते परिंदो को जो पानी दे गया!
शे’र तो कहता हूँ लेकिन मीर सा लहज़ा कहाँ!
क्यों नहीं मुझको वो लहज़ा ख़ानदानी दे गया!
[4]
चाँद सा चेहरा था आया चाँद छुप जाने के बाद!
चैन से क्या सो सका वो मुझको तड़पाने के बाद।
तुम किसी भी बात पर टिक ही नहीं सकते हो क्या!
लौट आए फिर जहां मैं इसको ठुकराने के बाद।
अब शराफ़त की ज़ुबां कोई समझता ही नहीं!
हाथ मेरा उठ गया था उसको समझाने के बाद।
चल पड़े कितने मुसाफ़िर रोज़ ही घर से मगर!
मिल गई क्या सबको मंज़िल ठोकरें खाने के बाद।
चाहता हूँ आँख से मैं उम्र भर पीता रहूँ!
होश में गो मैं नहीं हूँ एक पैमाने के बाद।
[5]
दुःख का सागर मानी दुनिया लोगों में अपवाद हुए!
मन को पावन करके गौतम ख़ुद से ही आज़ाद हुए।
चाहत की ये धारा तो बहती आई है युग-युग से!
लैला मजनू सस्सी पुन्नू चाहत कर दिलशाद हुए।
शायर सुनते लिखते पढ़ते मिलते थे उस्तादों से!
कुछ चेलों ने गुर सीख वो आगे चल उस्ताद हुए।
रब की मरज़ी को ही सब कुछ मानेंगे ग़म के मारे!
गैरों पर ममता वारेंगे क्या गर बेऔलाद हुए।
दिल से दिल की भाषा को खामोशी की दरकार बहुत!
होंठों को सिल ही जाने दो नैनों में संवाद हुए।
[6]
बुझ चुकी आग फिर जलाने को!
लौट आये शराबखाने को।
दर्द शायर के साथ जाता है!
कोई मिलता नहीं सुनाने को।
उम्र सारी लगे मुझे कम है!
इल्म की दौलतें कमाने को।
खेल समझा किया सदा उसने!
आँधियों से नज़र मिलाने को!
ज़लज़ला कह दिया ज़माने ने!
हाथ से जाम छूट जाने को!
[7]
कभी आ जाओ उल्फ़त की कहानी देखते जाओ!
कहाँ गुज़री थी मेरी ज़िंदगानी देखते जाओ!
वचन ये देते हैं तुमको नहीं शिकवा करेंगे अब!
सुकूँ आ जाएगा अंतिम निशानी देखते जाओ!
न जाने मेरी साँसों की रवानी को हुआ क्या है!
कि ये रुक रुक के चलती क्यों रवानी देखते जाओ!
ख़ुदा तो उनकी आँखों में नज़र आए अभी शायद!
मगर उन आँखों में वहशत पुरानी देखते जाओ!
ज़ुबां तो कटनी थी मेरी बहुत ही बदज़ुबां था मैं!
कफ़न सरकाओ मेरी बेज़ुबानी देखते जाओ।
[8]
ज़ियादा न मुश्किल का इम्कान रख!
नज़र में नए रोज़ सौपान रख!
सदा तूने औरों की धड़कन सुनी!
कभी मेरी धड़कन का भी ध्यान रख।
वो तेरा सनम या कोई गैर है!
मोहब्बत में इतनी तो पहचान रख।
वफ़ाओ के रोशन सदा दीप कर!
कभी दिल की राहें न सुनसान रख!
अभी रस ज़माने में बिखरा कहाँ!
कहा किसने उपनाम रसखान रख!
[9]
बाम पर आपने जुल्फ़ों को खुला रखा है!
क्यों सनम चैन ज़माने का उड़ा रखा है।
आग दिल की कभी बुझ जाए अगर तो क्या हो!
बेसबब ही नहीं ज़ख्मो को हरा रखा है!
दाँत से जाल सभी काट कहाँ पाऊँगा!
जाल हर मोड़ पर दुश्मन ने बिछा रखा है!
एक सूरज की तमना थी मुझे बरसों से!
किसने सूरज मेरे हिस्से का छुपा रखा है!
जेल में बैठ के टी.वी. का मज़ा लेता है!
एक मज़लूम का खूं जिसने बहा रखा है।
[10]
चाहत की फ़सलें कटने में वक़्त तो लगता है!
नफ़रत की ज्वाला बुझने में वक़्त तो लगता है!
जन्मो की दूरी तय की इस धरती पर उसने!
मोहन की मीरा बनने में वक़्त तो लगता है!
शमशानो में फिरने वाले अक्सर कहते हैं!
भूतो से बातें करने में वक़्त तो लगता है!
इन्सां के हस्ताक्षर उसके मन का दर्पण हैं!
मन की भाषा को पढ़ने में वक़्त तो लगता है।
जुल्फ़ों में दिल मेरा कस कर बांधा दिलबर ने!
जुल्फ़ों की गाँठें खुलने में वक़्त तो लगता है।
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बलजीत सिंह ‘बेनाम’ हरियाणा के हाँसी (जिला हिसार) के निवासी हैं। आप हिंदी-उर्दू ग़ज़ल के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी ग़ज़लें, कविताएँ, दोहे और आलेख देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, साहित्य रचना, भारत दर्शन, प्रतिंबिंब मीडिया सहित विभिन्न वेब पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। आप सामाजिक विसंगतियों, प्रेम, दर्शन और मानवीय संवेदनाओं को सहज अंदाज़ में ग़ज़ल में पिरोते हैं। आपकी रचनाएँ आकाशवाणी व कवि सम्मेलनों में सराही गई हैं। वर्तमान में आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।
बलजीत सिंह ‘बेनाम’
पता: हाँसी, जिला हिसार, हरियाणा – 125033
मोबाइल: 9812214462






