बहुचर्चित और हंस कथा सम्मान से सम्मानित आनंद हर्षुल की कहानी “जेन जी का तोता ” को पढ़ते हुए यह विचार तो आता ही है कि पीढ़ियों का अंतर्द्वंद्व सदियों से चला आ रहा है। इसे एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। किन्तु जिस पीढ़ी को जेन जी कहा जा रहा है उसके साथ यह अंतर्क्रिया इतनी विस्फोटक हो सकती है,इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो। लेकिन यदि हम इतिहास के कुछ पन्ने पलटें तो फ्रांसीसी क्रांति से सामना होता है, जब वहां तख्ता पलट हुआ था।कहानी में संयत खिलंदड़ी भाषा में जेन जी पीढ़ी की मनोदशा का सजीव चित्रण सम्मोहित करता है। इसकी बुनाबट और गुत्थी पर विचार करते हुए कभी कभी यह भी लगता है कि हम कहानी के संकेतों की पहचान में कहीं राह से भटक न जाएं। ऐसे में मुल्ला नसरुद्दीन के उस प्रसंग की याद आती है, जब वह बाहर स्ट्रीट लाइट में चाभी ढूंढ़ रहा था।जब उससे पूछा गया कि क्या उसे पक्का यकीन है कि चाभी यहीं कहीं गुम हुई थी, इस पर उसने बताया कि चाभी तो घर के भीतर गुमी थी लेकिन वहां घुप्प अंधेरा है इसलिए वह बाहर उजाले में उसे ढूंढ़ रहा है।
कहानी का आरंभ एक सात साल की लड़की से होती है जो नहाकर अपने को आईने में देख रही है और उसे लगता है कि उसकी नाक सुंदर नहीं है। सत्रह की उम्र में भी उसे यही लगता रहा, जब तक कि तोते ने उसे सुंदर नहीं बता दिया।यह लड़की जेन जी पीढ़ी की है। कभी फ्रांसीसी दार्शनिक पास्कल ने कहा था कि यदि क्लियोपेट्रा की नाक थोड़ी छोटी होती तो पूरी दुनिया का चेहरा (इतिहास) दूसरा होता। उन्नत नाक जहां खूबसूरती का प्रतीक है, वहीं यह शक्ति का भी प्रतीक है। यह कहानी बहुआयामी और बहुअर्थी है और अपनी बात प्रतीकात्मक रूप में कहती है।
कहानी में जिक्र है कि इस लड़की ने अपनी बाईस साल की उम्र में तीन नौकरी कर ली थी। यह बात उस लड़की की कुव्वत को, उसकी कुशलता को प्रदर्शित करती है।पहली और दूसरी नौकरी छोड़ने के पीछे जो कारण हैं कि पहले में उसका बूढ़ा बास पाइप पीता था और उसकी केबिन पाइप के तंबाकू की गंध से भरी रहती थी। जहां उसे बार-बार आना पड़ता था। दूसरी नौकरी में उसकी बास एक अधेड़ औरत थी जिसकी बातों से उपजी कड़वाहट से उसके चेहरे के मुंहासे फूटने लगते थे जिसे देखना उस लड़की को पसंद नहीं था। इन दोनों प्रसंगों से पता चलता है कि दोनों ही बास आउटडेटेड पुरानी पीढ़ी के हैं जिन्हें अपने अधीनस्थों का कोई ख्याल नहीं है। उन्हें अपनी शक्ति पर नाज है कि उन्होंने अधीनस्थों को नौकरी देकर अहसान किया है और उनका जीवन उनकी दया पर आश्रित है। लेकिन यह जेन जी पीढ़ी है। उसे ऐसे सामंती मालिकों से चिढ़ है, जो अपनी ख्याली पुलाव की दुनिया में रहते हैं। उसे अपनी काबिलियत पर भरोसा है और वह किसी के रहमो करम की मोहताज नहीं है।वह जेन जी लड़की तीसरी नौकरी में थी और उसके माता-पिता यह भी जानते थे कि जो कभी पसंद न आए तो वह इसे भी छोड़ सकती है। उसमें काबिलियत की कमी नहीं,उसे नौकरी की कमी नहीं।
कहानी में एक महत्वपूर्ण घटना घटित होती है, जब वह लड़की पन्द्रह साल की थी और स्कूल के सामने तोता बेचते आदमी को देखती है। तोतों को देखते हुए पहले तो उसके मन में इच्छा जगती है कि सारे बच्चे मिलकर तोतों को उनके पिंजड़ों से आजाद कर दें और खुले आसमान में उड़ते हुए तोतों को देखें।ऐसी इच्छा आजादी पसंद मन में ही जग सकती है। यद्यपि उसकी यह इच्छा सीमित रूप में पूरी होती है। और अन्ततः वह एक जेन जी पीढ़ी के तोते को खरीद लाती है।
उस तोते की नस्ल कभी सिकंदर महान के साथ यूरोप से हिंदुस्तान आई थी। इसी नस्ल का तोता उसने खरीद लिया था जो आगे चलकर उसे विभिन्न देशों के जेन जी पीढ़ी से जोड़ने का उपक्रम करने वाला है। कहते हैं कि सिकंदर महान अपनी जययात्रा का परचम लहराते भारत भी आया था और सीमावर्ती इलाकों को जीता भी। किन्तु उसे यहीं से लौटना पड़ा। सिकंदर की जययात्रा का दूरगामी परिणाम यह हुआ बताते हैं कि इससे वैश्विक व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिला और वैश्विक सभ्यता का विकास हुआ।
यद्यपि पहले उसकी मां को घर में तोता को लाना अच्छा नहीं लगा था। मां को लग रहा था कि लड़की तोता पाल कर घर में उसका काम बढ़ा रही है। किन्तु उसके पिता चुप रहे। क्योंकि उन्हें अपनी लड़की और उस तोते में ज्यादा अंतर नहीं दिखता। और आगे चलकर लड़की और तोता एक जैसे साबित होते हैं। धीरे-धीरे तोते को तीनों मिल जुल कर पालने में डूबते गए। एक दिन तोते ने लड़की को कह भी दिया कि तेरी नाक सुंदर है। यद्यपि तोते ने लड़की की बात को दोहराया था, पर लड़की ने मेरी को तेरी सुना था जो वो सुनना चाहती थी। अब उसे अपनी नाक सुंदर लगने लगी थी।
आनन्द हर्षुल
“जिस कहानी ‘जेन-ज़ी का तोता’ पर मैं पुरस्कृत हुआ हूँ—उस पर बहुत-सी सकारात्मक टिप्पणियों के साथ कुछ नकारात्मक टिप्पणियाँ भी हुई हैं। इस कहानी में ‘जेन-ज़ी’ शब्द कितनी बार आया है, एक समीक्षा में यह गिनने की कोशिश भी की गई है। यह समीक्षा इस कहानी के पुरस्कृत होने से पहले ही उसके प्रकाशित होते ही प्रसारित हुई थी। उस समीक्षा के इस वाक्य को पढ़ने के बाद मुझे उस समीक्षा की गंभीरता पर इतना संदेह हुआ कि मैं उसे फिर पूरा पढ़ ही नहीं पाया था। दूसरों से ही मुझे पता चला कि उस समीक्षा में ‘जेन-ज़ी का तोता’ को अच्छे से ‘निपटा’ दिया गया है। बाद में पता चला कि यह ‘हंस-पुरस्कार’ के लिए एक दूसरी कहानी को लाभ पहुँचाने का एक सायास प्रयास था। आलोचना का यह भी एक पक्ष है जो चौंकाने के लिए शब्दों को गिनने से लेकर, लाभ और हानि तक के गणित से जुड़ा हुआ है।”
-‘गोल चक्कर’ वेब पत्रिका में प्रकाशित आनन्द हर्षुल के लेखकीय वक्तव्य’ से उद्धृत
कहते हैं कि क्लियोपेट्रा के आत्मविश्वास में भी उसकी काबिलियत के साथ साथ उसकी खूबसूरती का भी योगदान था। यद्यपि आत्मविश्वास में खूबसूरती की भूमिका का महत्वपूर्ण बनना पितृसत्तात्मक सामाजिक अनुकूलन और संस्कार की देन है जो हर पीढ़ी को विरासत में मिलती है। यदि जेन जी पीढ़ी की चली तो इस विरासत के नाममात्र बनने की उम्मीद की जा सकती है।
कहानी अब उड़ान भरती है। लड़की को अपने माता-पिता के साथ मौसेरी बहन के विवाह में तीन दिनों के लिए दूसरे शहर जाना है। अब सवाल उनकी अनुपस्थिति में तोते की देखभाल की है। कई विकल्पों पर विचार करने के बाद उस दूकानदार के पास तीन दिनों के लिए तोता के रहने की बात बनी जो रिटायर्ड अधिकारी था और उसके यहां दो तोते थे। वहां से जाने के बाद दूसरे दिन लड़की ने वीडियोकाल पर बात भी की। लेकिन उसी दिन शाम के किसी समय पिंजड़े में लगी जाली के दरवाजे को अपनी चोंच से उठा कर तोता उड़ गया और घर छोड़ कर चला गया।उन दो तोतों ने भी पिंजड़े के दरवाजे पर चोंच मार कर वहां से उड़ने की कोशिश की किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली।
अगले दिन लड़की का फिर फोन आया। वो तोते से बात करना चाहती थी। लेकिन दुकानदार ने बहाना बना दिया। लड़की को इस पर संदेह हुआ। उसने पिता से सख्त लहजे में कहा कि उसका वह दुकानदार दोस्त अब फोन नहीं उठा रहा। यदि उसके तोते को कुछ हुआ तो वह उसे छोड़ने वाली नहीं है।सुबह जब वे अपने घर लौटे तो पिता ने कहा कि वह उसका तोता लेने उसके पास जाएंगे। इधर उधर की बातें करने के बाद दुकानदार ने बताया कि सच तो यह है कि वह तोता दूसरे दिन ही अपनी चोंच से पिंजड़े का दरवाजा उठाकर उड़ चुका था। दूकानदार ने आश्वस्त किया कि वह अपने दो में एक तोता उसे दे देगा,या फिर उस लड़की के पसंद का नया तोता खरीद देगा। इस बीच वह लड़की भी वहां आ पहुंची और पिता से कहा कि वह तोता सिर्फ तोता नहीं था उसका भाई था। और तुम्हारे इस दोस्त ने जलन के मारे उसे मार डाला। क्योंकि उसका तोता इसके तोता से अच्छा था।वह लड़की लगातार अपने तोते को वापस मांगते हुए उग्र होती चली गई।गाली गलौज करती लड़की आपे से बाहर हो गई और उसके दूकान में रखे सामान को तोड़ना-मरोड़ना शुरू कर दिया और दुकान को कुछ ही मिनटों में तहस-नहस कर दिया।फिर उसने दुकानदार से कहा कि उसका वह तोता ले आए और दूकान के इन सामानों का पैसा उससे ले जाए।
वस्तुत: वह लड़की उस दूकानदार से बहुत गुस्से में इसलिए थी कि उसने तोते को लेकर उससे लगातार झूठ बोला था। फिर अपना तोता या नया तोता देने की बात की। उसके झूठ ने उसे संदेहास्पद बना दिया।वह जेन जी थी, झूठ और झुक कर समझौते से उसे नफरत थी।वह अपने परिवेश को देखती आ रही थी जहां जैसे तैसे जीवन जीने को भी लोग वरदान मानते आए थे। उसकी तो उस तोते में जान बसती थी। वो तोता उसके व्यक्तित्व का ही विस्तार था। इस घटना के करीब एक महीने बाद एक सुबह लड़की का तोता लड़की को अपनी खिड़की पर बैठा मिला। उसके पंख कहीं कहीं झुलस गए थे।वह बहुत थका हुआ और गंदा लग रहा था।
वो तोता उस लड़की की अनुपस्थिति में नेपाल तक जा आया। उस तोते ने अपने को वहां के जेन जी की विशाल भीड़ में पाया। वहां के जेन जी आंदोलित थे।वे बेरीकेडिंग,टियर गैस और सुरक्षा बलों की गोलियों की परवाह न करते हुए संसद भवन में घुस गए। वहां उन्हें तोड़ फोड़ करते देखा। उन्हें आग लगाते पूर्व प्रधानमंत्री के घर जलते हुए देखा। वो तोता भी उस युवाओं के आंदोलन में शामिल हो गया था।उस तोते को नेपाली भाषा में नारे लगाते सुन कर लड़की को अंदाजा हो गया कि वह उसे नेपाली जेन जी से सीख आया है।वह तोता आंदोलन की ध्वनियों को सुनकर वहां पहुंच जाता था। और उनमें शामिल हो जाता। मलेशिया, बंगलादेश आदि विभिन्न जगहों के लिए वह उड़ान भरता रहा और लड़की के घर से बार बार गायब होता रहा। लड़की को तोता मिल गया था। लड़की जान गई थी कि तोता उस देश के नारों को तब तक नहीं भूलेगा जब तक किसी और देश में चल रहे जेन जी आंदोलन में शामिल होने वह उड़ान नहीं भरता और वहां से उस देश की भाषा में नारे सीख कर नहीं आ जायेगा। लड़की ने अपने व्यवहार के लिए उस बूढ़े दूकानदार से से माफी नहीं मांगी थी। वो एक जेन जी लड़की थी। यह अहंकार व कृतज्ञता का संकोच है अथवा वरिष्ठ पीढ़ी से मोहभंग हो शायद! कहानी में यह बात सबसे ज्यादा खटकती है कि विभिन्न देशों में जेन जी के आंदोलनों की पृष्ठभूमि को लेकर कुछ भी संकेत या विवरण नहीं है। इसमें उनके बदलाव के प्रति जागरूकता और यथास्थितिवाद से विद्रोह का तो कुछ कुछ अंदाजा लगता है, लेकिन इससे उनके संघर्ष के और व्यवस्था से मोहभंग होने के कारणों का अनुमान पाठकों को लगाना पड़ता है।
यह कहानी हंस में अप्रैल 2026 के अंक में प्रकाशित हुई है। इसलिए यहां पर जून से जुलाई तक जेन जी आंदोलन की छाया इस कहानी में नहीं है। जेन जी के आंदोलन का स्वरूप क्या हो सकता है, वह अन्य जगहों की तुलना में यहां पर निश्चित रूप से कुछ गुणात्मक फर्क तो रहेगा ही। क्योंकि शासन व्यवस्था और विरासत के परिवेश में काफी भिन्नता जो है। फिर भी यह कहानी अपने समय से टकराती है और शिल्प तथा प्रस्तुति में टटकापन लिए है जो पाठकों को आकर्षित करती है, चिंतन मनन के लिए उकसाती है।
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