अवध के लोकजीवन को अपनी कविताओं में जीवंत रूप से चित्रित करनेवाले केशव तिवारी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे जीवन के विविध रंगों और रिश्तों की ऐसी संवेदनशील तस्वीरें सामने रखते हैं, जिनमें पाठक अपने अनुभवों का अक्स देखता है। केशव तिवारी समकालीन हिंदी कविता के उन विरल हस्ताक्षरों में से हैं, जिनके पास अपनी एक मुकम्मल ‘जमीन’ है। उनकी कविता महज शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि एक पूरे जनपद की धड़कन है।
‘इस मिट्टी से बना’ 2005 ई., ‘आसान नहीं विदा कहना’ 2010 ई., ‘तो काहे का मैं’ 2014 ई. कहने वाले कवि केशव तिवारी ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’ कहते हैं तो उनके लिए यह कहना- रचना आसान नहीं है। इन सारी बातों को कहने के लिए इस पूरे समय को जीना और विडंबनाओं को देखने का साक्षी भी होना है।
‘इस मिट्टी से बना’ संग्रह में देश के गांव की मिट्टी की सोंधी गंध और लोक संस्कृति जिस रूप में अभिव्यक्त है उसने निश्चित रूप से नई कविता के बाद की लोकवादी परंपरा को आगे बढ़ाया। केशव तिवारी ने लोक में लगे उस दर्द को सामने लाने की कोशिश की जिसने भारत के आमजन एवं किसान के जीवन को संकटमय बना दिया। जब वह पूछते हैं
“कीचड़ में धंसी बैलगाड़ी
अकेले ही झेल देते हो तुम
दिन भर खेतों में,
फरहा करते हो
और रात भर मड़ाई
तुम्हारा शरीर जैसे किसी
मूर्तिकार ने इस्पात में ढाल दिया हो
पर बातों की वह बेबाकी कहाँ चली गई”
कवि केशव तिवारी की दृष्टि एक खाँटी किसान की दृष्टि है। वह खेतों की हरियाली को केवल सौंदर्य के लिए नहीं देखते बल्कि फसल की सुरक्षा और मौसम की मार और किसान के संघर्ष को पूरी संजीदगी से चित्रित करते हैं। एक किसान के मन के बोझ को एक दर्शक नहीं समझ सकता। केशव उन कवियों में है जिनका जीवन लोक में बसा है। उनका मन किसानों के जीवन से जुड़ा है। आप गौर करें तो देखेंगे कि 1990 ई.के बाद उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण की शुरुआत से उत्पन्न हुई कई अनिश्चितताओं का सामना भारतीय जनमानस को करना पड़ा इस दौर में भारतीय किसान को कर्ज, अनियमित बारिश और कृषि उत्पादों की गिरती कीमतों से जूझना पड़ा। 1995 से 2018 के बीच देखे तो करीब 4 लाख किसानों ने आत्महत्या की। पुरानी पारंपरिक व्यवस्था के खत्म होने एवं नई आर्थिक नीतियों ने किसानों को तोड़ने का कार्य किया। यह सब कुछ बहुत सूक्ष्मता एवं संवेदना के साथ कवि केशव तिवारी की कविताओं में चित्रित है। किसानों का दुख उनकी कविता से बार-बार झांकता है। बाजार के बदलते रूप ने और बिचौलियों ने किसानों के जीवन को आज बदहाल कर दिया है। जब वह लिखते हैं-
“खेत सजे हैं
और लोग बेघर हो रहे हैं”
तो किसानों के जीवन की विडंबना का पूरा चित्र आँखों के सामने नाच खड़ा होता है। किसानी जीवन की विडंबना को चित्रित करते हुए, अपने समय के यथार्थ को अभिव्यंजित करती एक सशक्त कविता है “अब नहीं” आधुनिक विकास और बाजारीकरण के बीच पिसते हुए गाँव की कथा कहती, यह कविता एक पूरे युग के बदलाव और उससे उपजी रिक्तता को पकड़ती है।
“जल-स्रोत धीरे-धीरे
सूख रहे हैं
चढ़ता चैत है यह
पंडुक बकुल अभी टिके हैं
किसी सुबह तालाब की तरफ़ से आती
इनकी आवाज़ नहीं होगी
सुबह-सुबह
ये उड़-जा चुके होंगे
अन्य स्रोतों की ओर
लोग भी जा ही रहे हैं
धीमे-धीमे
परदेस कटाई के लिए
खेत में गेहूँ
खरे सोने-सा चमक रहा है
लोग मेंड़-मेंड़ सब देखते जा रहे हैं
इनके इंतजार में हैं-
सड़क पर ट्रक
ठेकेदार”
यानी फसल सोने सी चमक रही है लेकिन किसान के हिस्से में कुछ नहीं आया। यह पंक्ति हमें इस यथार्थ से अवगत कराती है कि जहाँ उत्पादन पर किसान का हक होना चाहिए, वहाँ आज बाजार का नियंत्रण है। सड़क पर खड़े ट्रक, ठेकेदार उस शोषणकारी तंत्र के प्रतीक हैं जो गाँव की श्रम शक्ति को बटोर कर ले जाने के लिए घात लगाए बैठे हैं। यह कविता बताती है कि आज के समय में श्रम पर एवं फसल पर बाजार का नियंत्रण है। आज के समय मेंं किसान आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि ग्राहक बन गए हैं। कॉरपोरेट और बिचौलिया तंत्र ने आज किसान को सस्ते मजदूर में तब्दील कर दिया है। केशव तिवारी की कविता आज के भारत के किसानों के जीवन की विडंबना को जिस मार्मिकता से चित्रित करती है कि आप बेचैन हो जायेंगे। ये कविताएँ बताती हैं कि विकास की परिभाषा में जब तक किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केंद्र में नहीं रखा जाएगा तब तक ‘नव -उदारवाद’ केवल विषमता की खाई को ही गहरा करेगा। केशव तिवारी की कविताएँ केवल विलाप नहीं हैं बल्कि वह व्यवस्था के विरुद्ध दस्तावेज हैं। भारतीय गाँवों के उजाड़ और किसानों की असहाय स्थिति का एक दृश्य देखिए-
‘रात मचान पर खेत ताकने गया एक शख्स
सुबह बबूल की डाल से लटका मिला
बोलती है मरचिरैया पहले पहर
दुपहर को डूबती आवाज़ में बोलता है महोख’
किसान की आत्महत्या का यह संकेत हमें सामूहिक विफलता का एहसास कराता है। केशव तिवारी की कविताओं में यथार्थ के सत्य को पकड़ने की दृष्टि है। महादेवी वर्मा अपने निबंध “यथार्थ और आदर्श” में लिखती हैं –“कोई भी जाति अपने देशकालगत यथार्थ के निरीक्षण और परीक्षण के बिना वर्तमान का मूल्यांकन नहीं कर पाती। और संभाव्य यथार्थ की कल्पना के बिना भविष्य की रूपरेखा निश्चित करने में असमर्थ रहती है। यह कार्य साहित्य कला के क्षेत्र में जितना सुंदर सहज और संप्रेषणीय रूप पा लेता है, उतना जीवन के अन्य क्षेत्र में संभव नहीं। सच्चा कलाकार व्यावसायिक कम, पर संवेदनशील अधिक होता है, अतः उसकी दृष्टि यथार्थ के संबंध में संतुलित और आदर्श के संबंध में व्यापक रहकर ही अपने लक्ष्य तक पहुंचती है”। कवि केशव तिवारी की कविताओं में जीवन का यथार्थ पूरी संजीदगी के साथ उभर कर सामने आता है। अपनी कविताओं में कवि केशव तिवारी उन छोटे किसानों के प्रति हमेशा एक सम्मान का भाव प्रकट करते हैं जो विस्थापित नहीं हुए। जिन्होंने गाँव की चुनौतियों को स्वीकार किया और अपनी स्मृति और माटी को थामे रखा है। छोटे-छोटे किसानों ने इस दुनिया को बचा रखा है उनकी खेती बारी ने जैव विविधता बचा रखी है। वे किसानों को असली रहवासी मानते हैं
श्रम करता गाता मनुष्य ही
इस धरा धाम का असली रह वासी है”
इन कविताओं से यह संकेत मिलता है कि यदि हमें इस धरा को सुंदर बनाना है इस जीवन को बचाना है तो हमारे जीवन में श्रम का महत्वपूर्ण स्थान होना चाहिए। और श्रम करने वाले को सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। ऐसी कविताओं के माध्यम से कवि जीवन के आदर्श को स्थापित करते नजर आते हैं जहाँ श्रम का महत्व है।
अवधी लोक चेतना के कवि
कवि केशव तिवारी अवधी लोक चेतना के कवि हैं और उनकी कविता भोगे हुए यथार्थ की गाढ़ी कमाई है। अपनी कविता अवधी में वे लिखते हैं-
“यह पहली बार मेरी जुबान पर
आई थी माई के दूध की तरह/
इसके इर्द गिर्द मंडराती है मेरी संवेदना” वे अपनी धरती के सजग पुत्र हैं जहाँ वे आज के समय मेंं बदल रही संवेदना और आज के दौर में संवेदनाओं को, और लोक चेतना को हथियार की तरह प्रयुक्त करने वालों पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हैं। अपना विरोध दर्ज करते हैं
“एक हत्यारे ने पूछा अवधी में-/ का हाल-चाल बा”।
केशव तिवारी की कविताएँ लोकजीवन की मिट्टी से जुड़ी हुई हैं, लेकिन उनका सरोकार केवल लोक तक सीमित नहीं है। वे लोक-संस्कृति, स्मृतियों और वर्तमान समय की विसंगतियों—सबको साथ लेकर चलते हैं। इसीलिए उनकी कविता एक साथ परंपरा और आधुनिकता का पुल बनती है।
प्रकृति का शोक गीत
“नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा” संग्रह के माध्यम से कवि केशव तिवारी लोक संवेदना और आधुनिकता के द्वन्द्व को चित्रित करते हैं। इस संग्रह की कविताओं के माध्यम से वह अपनी जड़ों को आधुनिक दुनिया के संकटों से जोड़ते हैं। विकास की अंधी दौड़ में हमने अपने उन साझी विरासतों को खो दिया जो हमारे जीवन का आधार रहीं हैं। उनकी कविताएँ पढ़ते हुए महसूस होता है कि मनुष्य भले ही अपनी क्रूरता या लापरवाही को भूल जाए लेकिन प्रकृति अपने विनाश का शोक खुद मनाती है। ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’ कहकर कवि केशव बताते हैं की नदी का सूखना या प्रदूषित होना केवल एक जल स्रोत का अंत नहीं बल्कि उस पूरी सभ्यता और संस्कृति का मर्सिया है जो उसके किनारे फली फूली। ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’ समकालीन हिंदी कविता में पारिस्थितिकी, स्मृतियों और सभ्यता के क्षरण को दर्ज करती है। नदी का अंत उस आत्मीयता के अंत की घोषणा करता है जो मनुष्य और प्रकृति के बीच कभी हुआ करती थी। –
लंगड़ाती- कलझती दम तोड़ती सई का दर्द
न तो बेल्हा माई के मंदिर की घंटियों में है
न साई की कुटी से उठती
चिलम की लपेट में दिखता है
उसका चेहरा”
प्रतापगढ़ की जीवन रेखा कही जाने वाली सई नदी का काला पड़ जाना, विकास के उस भयावह चेहरे को उजागर करता है जिसने हमारी पवित्र नदियों को गंदे नाले में बदल दिया है। यह कविता इकोलॉजी और एस्थेटिक्स (पारिस्थितिकी और सौंदर्यबोध )का एक दुर्लभ मेल है। यह कविता हमें चेतावनी देता है कि यदि नदियाँ नहीं रहीं, तो हमारी स्मृतियाँ और हमारा अस्तित्व दोनों असुरक्षित होंगे। इस कविता को पढ़ते हुए मुझे ओडिशा के जंगल और आदिवासी बहुल इलाकों में औद्योगिक प्रदूषण, विशेषकर एल्यूमिनियम और खनन कंपनियों द्वारा नदियों को दूषित किया जाना याद आता रहा। औद्योगिक विकास के क्रम में मनुष्य भले विस्थापित हो सकता है लेकिन नदी विस्थापित होकर कहाँ जाएगी। एक नदी के दूषित होने से उस पर निर्भर मनुष्य, जीव -जंतु सभी का जीवन खतरे में पड़ जाता है।
केशव तिवारी की कविताओं में अवध की माटी की सोंधी महक है और उनकी चिंता वैश्विक है। इस संग्रह में नदी पर केंद्रित कई कविताएं हैं –‘बकुलाही’, ‘चंद्रावल’, ‘पहुज’, ‘क्वारी’, सिंध, ‘धसान’, ‘उर्मिल’, ‘चेलना’ ‘जेमनार’- इन सभी नदियों का दर्द, उसका नष्ट होना, वे कविताओं में दर्ज करते हैं और सिमटती नदियों के जलधारा के अक्षय होने की कामना भी करते हैं और यह सब दर्ज करते कवि अपना भी दुख साझा करते हैं-
“मेरा दुख समझो तुम सिंध
क्या कोई अभागा कवि
अपनी प्रिय नदी का
मर्सिया लिखना चाहेगा”
वे उन चतुर कवियों की महफिल से बाहर के कवि हैं जो केवल चाटुकारिता में गाल बजाते हैं ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’ कहता हुआ कवि यह बता रहा है कि नदी और मनुष्य का संबंध अटूट था। वह अब खत्म हो रहा है हम मनुष्यों में उस पीड़ा को समझने की, महसूस करने की शक्ति ही नहीं रही जिस पीड़ा को प्रकृति भोग रही है। अपने प्रिय नदी ‘बकुलाही’ को याद करते हुए वे यथार्थ लिखते हैं-
“ना हो पुराणों में तुम्हारा जिक्र
किसी धार्मिक युगपुरुष ने
ना किया हो तुम्हारा परस
एक कविता हमेशा दर्ज करेगी तुम्हारा होना”।
स्मृति और समय के अंतर्संबंधों की कविता
केशव तिवारी की कविताएँ प्रतीक्षा, स्मृति और समय के अंतर्संबंधों की कविता है। समय के क्रूर प्रवाह को वह अपनी कविताओं में दर्ज करते हैं। समय के साथ-साथ अपने मन की अवस्था भी दर्ज करते हैं –
“इन दिनों मन
जैसे कोई ढेलहा खेत”
यह एक मार्मिक बिंब है। ‘ढेलहा खेत’ वह खेत होता है जिसमें मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले हों, जो अभी जोता न गया हो, जिसमें नमी की कमी हो; मन का ऐसा होना रूखेपन, बिखराव और एक अनगढ़ पीड़ा का प्रतीक है। यह बिंब समय के गुजरने मात्र को प्रतिबिंबित नहीं करता बल्कि एक पूरे जीवन और संवेदना के रिस जाने को दर्ज करता है। “आधुनिक हिंदी कविता में बिंब विधान” पुस्तक में केदारनाथ सिंह लिखते हैं- “स्मृति सभी प्रकार के बिंबों का उद्गम स्रोत है”। “परंतु सभी प्रकार की स्मृतियां काव्य नहीं बन पातीं। उन्हें एक लंबी मानसिक प्रक्रिया से छनकर आना पड़ता है”। और इसके लिए कवि का संवेदनशील होना आवश्यक है। लेकिन इतना ही आवश्यक नहीं होता कवि के लिए यह भी जरूरी है कि वह उन तमाम स्मृतियों को विस्मृत कर सकने की क्षमता भी रखें और साथ ही यह धैर्य भी कि उनके पुनः लौट कर आने तक उनकी प्रतीक्षा कर सके। और तभी स्मृति यथार्थ के जीवित सूत्रों से संग्रथित होती है। कवि केशव तिवारी के पास स्मृति को यथार्थ से जोड़ने की अप्रतिम चेतना है।
अपने समय के अंतर्विरोधों की पहचान
केशव तिवारी की कविताएँ अपने समय के अंतर्विरोधों को पहचानती हैं। कवि संचार क्रांति, उत्तर आधुनिकता और उत्तर -सत्य की विडंबनाओं के बीच मनुष्य की असल पहचान और संवेदना के क्षरण को रेखांकित करते हैं। विकास के चमकदार मुखौटे के पीछे छिपे सामाजिक, आर्थिक असंतुलन पर उनकी दृष्टि तीखी है। उनकी कविताएँ बार-बार यह प्रश्न उठाती हैं कि हमारे अतीत की जो मौलिकता थी वह आज कितनी बची है, लोकजीवन, ग्रामीण-संस्कार, प्रकृति और परंपरा इन सब के प्रति उनमें गहरी आत्मीयता दिखाई देती है। यह सब कुछ उनके यहाँ किसी नॉस्टैल्जिया की तरह नहीं बल्कि सांस्कृतिक जड़ों को बचाने की चेतना के रूप में है। उनकी कविताएँ प्रत्यक्ष घोषणाएँ कम करती हैं बल्कि सवाल उठाती हैं कि हम कहाँ जा रहे हैं? विकास के नाम पर हमने क्या खोया और क्या पाया? उनकी रचनाओं में आम आदमी, हाशिए के लोग, रोजमर्रा का संघर्ष बार-बार उपस्थित होता है। कवि केशव तिवारी करुणा को भावुकता नहीं बनने देते, बल्कि उसे सामाजिक संदर्भ से जोड़ते हैं। उनकी कविताएँ लोक और आधुनिकता के बीच संवाद रचती हैं, संवेदना और विचार को साथ लेकर चलती हैं। बल्कि कहा जा सकता है कि वह समय के विरुद्ध मनुष्य की स्मृति और संवेदना को बचाने का रचनात्मक संघर्ष करते हैं। उनकी कविताएँ समय के यथार्थ की आलोचना करती हुई, मनुष्य की संभावना को भी बचाए रखना चाहती है ‘उसकी कविता’ शीर्षक में वे लिखते हैं-
“व्यवस्था की रची कितनी कितनी तकलीफें हैं
जिसका इलाज प्रकृति के पास नहीं”
आज के समय मेंं मानव निर्मित व्यवस्था से कितनी समस्याएँ हैं, इसका आकलन करना मुश्किल है। सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं का समाधान केवल प्रकृति या भाग्य से संभव नहीं। बल्कि इसके लिए पूरी व्यवस्था को परिवर्तित करना ज़रूरी है और यह कोई आसान कार्य नहीं। आज की हिंदी कविता अपने बदलते समय के यथार्थ की साक्षी है। आज के समय मेंं विकास की विडंबना, व्यवस्था की निर्ममता, राजनीति की नाटकीयता एवं आम व्यक्ति और किसानी जीवन की त्रासदी के मद्देनजर कवि को अपनी भूमिका तय करनी है। कवि को यह तय करना होगा कि उसे इन विडंबनाओं के बीच कैसे सकारात्मक रचना है? अपने लोक को, प्रकृति को मनुष्यता को बचाना कवि का दायित्व होगा। उसे नाटकीय राजनीति से भी टकराना होगा, कविता को अपनी यात्रा पूरी करनी ही होगी-
“कविता को अपनी यात्रा करनी चाहिए
वह कहीं भी हो
संस्थानों, प्रतिष्ठानों, आलोचकों, संपादकों के बस्ते में
उसे निकलना चाहिए
उसे पता होना चाहिए
कि उसे कहाँ जाना है
कहाँ खटना
कहाँ सुस्ताना है
कहाँ मनसायन करना है
कहाँ गाना है”
लोक परंपरा और आधुनिकता का द्वंद पकड़ती कविताएँ
संचार क्रांति और उत्तर आधुनिकता ने भारतीय लोकजीवन को गहराई से प्रभावित किया है। लोक कलाओं और पारंपरिक माध्यमों का ह्रास हुआ है, लोकगीत, लोकनाटक, किस्सागोई जैसी विधाएँ, हाशिए पर चली गई हैं। लोक कलाकारों को गाँव में उचित मंच और पारिश्रमिक नहीं है। हमारा सामाजिक ताना-बाना कमजोर हुआ है। अब हम सामूहिक रूप से बहुत कम मिलते हैं। चौपाल हमारे जीवन से गायब है। संचार क्रांति और उत्तर आधुनिकता ने भारतीय लोकजीवन को ग्लोकल बनाने के साथ-साथ इसे अपनी जड़ों से काटने का काम किया है। इन सारी परिस्थितियों ने गाँव का मौसम बिगाड़ दिया है-
“हर बात में मिट्टी की क़सम खाने वाले किसान
आखिरकार मिट्टी में ही मिल रहे थे
भाँड थे मिरासी थे
सूअर थे भेड़िए थे
कवि थे कीर्तनिए थे
सबसे तेज़ गाड़ी में बैठने के
इंतजार में प्रेमिकाएँ थीं
हाँ, उनकी आँखों में अपने ठहरे सहमे
प्रेमियों का दर्द भी था
इसे कह सकते हैं
चैत की एक जंग लगी कटार
भीतर तक भुकी हुई”
यहाँ चैत अब नवता का उत्सव नहीं, बल्कि हिंसा और पीड़ा का संकेत देता है। अपने समय की हिंसा, विडंबना और टूटे मानवीय मूल्यों का अत्यंत सघन चित्र इस कविता में दर्ज है। किसान का दुख और समाज का विखंडन केशव तिवारी की कविताओं में बार-बार अभिव्यंजित होता है। समाज का बहुरंगी लेकिन विकृत दृश्य उनकी कविताओं में बार-बार आता है, हमारे समाज में ये सारी स्थितियाँ अपने बदलते समय की विडंबनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।
कालिंजर के बहाने जीवन दर्शन की अभिव्यक्ति
भारतीय इतिहास में कालिंजर अपनी अजेयता, सामरिक महत्व और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। सर्व विदित है कि यह चंदेल शासकों का मुख्य गढ़ था। यहीं पर भगवान शिव ने काल पर विजय प्राप्त की थी, कालिंजर का किला अपनी अजेयता के लिए मशहूर है। कालिंजर भारतीय इतिहास में शक्ति, भक्ति और अजेयता के प्रतीक रूप में जाना जाता है। कालिंजर पर इस संग्रह में पांच कविताएँ हैं जो कालिंजर के इतिहास के बहाने वर्तमान से संवाद करती हैं। पहली कविता कालिंजर के दुर्ग को एक मुख गवाह के रूप में चित्रित करती है जो युद्ध का साक्षी रहा है। कालिंजर कविता काल के बीतने और उसके अवशेषों में छिपी पीड़ा व गरिमा की व्याख्या करती है। दूसरी कविता ‘जेठ में कालिंजर’ उस रूप को सामने लाती है जो पर्यटकों के लिए दुर्गम है लेकिन अपनी असलियत में सबसे मुखर है। इस कविता में कवि ने प्रकृति की कठोरता और दुर्ग की अजेयता के बीच एक गहरा संबंध दिखाया है, जो कालिंजर जेठ में तप रहा था वही आषाढ़ में जीवन के उत्सव में लौट आता है। ‘शिशिर में कालिंजर’ आत्म साक्षात्कार की कविता है। ‘बसंत में कालिंजर’ वैभव और विषाद के सह अस्तित्व को चित्रित करती है। इतिहास के हाहाकार और कालिंजर की व्यथा को दर्ज करती हुए कविताएँ जीवन के यथार्थ से हमें परिचित कराती हैं-
“जिनकी जिंदगी ख़ुद जंग हो चुकी है
वे क्या करें सुनकर तुम्हारी जंगों का इतिहास
तुमसे बेहतर कौन पढ़ सकता है
इस वसंत का मन”
परंपरा और आधुनिकता का जीवंत सेतु-
केशव तिवारी की कविताएँ जायसी, तुलसी और ईसुरी से लेकर त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल जैसे दिग्गजों की विरासत को केवल सहेजती नहीं, बल्कि उन्हें एक नई चेतना के साथ वर्तमान में पुनर्स्थापित करती है। उनकी काव्य- साधना में महान कवियों की संवेदना रची बची है। केशव तिवारी की लेखनी में ग़ालिब की नफ़ासत और त्रिलोचन का गँवई -धरातल एक साथ घुले- मिले हैं। वह केवल अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों के अनुभव -यथार्थ की संवाहक हैं। उनकी कविताएँ उस ग्राम्य परिवेश की पुकार हैं जो आधुनिकता की आँधी में अपनी मौलिकता बचाए रखने के लिए संघर्षरत हैं-
“इस अनंत धरती पर
कितनी यात्राएँ ठहरी पड़ी हैं
कविता को फिर शुरू करना चाहिए उन्हें
इस यात्रा में शामिल हों
पेड़-नदी-पहाड़
और जागते-ऊँघते लोग
एक नदी तो हमेशा साथ रखनी होगी उसे
कहावत है कि थके के लिए
नदी से बड़ा संगी नहीं
और हारे के लिए
कविता से बड़ा संगाती”।
कविता की भाषा
केशव तिवारी भाषा को इस तरह बरतते हैं कि वह जीवन से संवाद करती नजर आती है। सियाराम शर्मा इनकी भाषा पर लिखते हैं-“केशव लोकभाषाओं की शक्ति और उसके स्रोतों को अच्छी तरह पहचानते है। जनता के सुख-दुःख, स्वप्न और संघर्ष से जुड़ी, जनजीवन में गहरे तक धँसी और जातीय जीवन के अनुभवों की आँच में पकी इस भाषा की जीवंतता से कवि का आवयविक रिश्ता है। इसमें नकली गढ़ाऊ और जड़ाऊ भाषा के ठंडेपन और सर्द अहसासों की अपेक्षा संघर्षमय जीवन की ऊर्जा का आवेग है। बोलियों को हिंदी के विरुद्ध खड़ा करने की साज़िश के खिलाफ केशव उसकी ताजगी, टटकेपन और मुहावरों से हिंदी को ज्यादा सुंदर, समृद्ध और अर्थगर्भ बनाते हैं”। कवि की भाषिक भंगिमा प्रसंगानुकूल परिवर्तित होती रहती है। शृंगारिक अभिव्यक्ति में जहाँ हिंदी का निखरा हुआ रूप मुखरित होता है, वहीं जन-जीवन से जुड़ी कविताओं में लोक-रंग की प्रधानता रहती है। खड़ी बोली के प्रवाह में अवधी और बुंदेली के शब्द इस प्रकार जड़े हुए हैं मानो स्वर्ण में रत्न। इन क्षेत्रीय बोलियों की गूँज और व्यंजना से काव्य-भाषा में एक अनूठा संगीतमय माधुर्य उत्पन्न होता है।
किसी भी युग के राजनीतिक पराजयों, सामाजिक विशृंखलता और सांस्कृतिक विध्वंस का जो कुहरा है उसे भेद कर यथार्थ को पाठकों तक पहुंचाना कवि का असल कर्तव्य है। केशव तिवारी अपने समय के यथार्थ को जिस संवेदना से पाठकों में प्रेषित करते हैं वह उनकी कविता की मूल शक्ति है कविता के कहन का ढंग इतना प्रभावशाली होता है कि वह हमारी चेतना में भाषा की समझ भी विकसित करती है
“ये चारों ओर से बंद दरवाजों का गाँव है
उफ़ ये सन्नाटा
ये उजाड़!
कभी कंधे पर बाज़ बैठाए
एक फ़क़ीर आता था
गाता था
अब नहीं आता”
यह पंक्तियां आधुनिक जीवन की उस विडंबना और अकेलेपन को चित्रित करती हैं जहाँ भौतिक विकास तो हुआ है लेकिन मानवीय संवेदनाएं और जीवंतता कहीं खो गए हैं। इन पंक्तियों में गहरा दर्द और बीते समय के प्रति एक टीस छिपी है। गाँव कभी अपनी खुली संस्कृति और भाईचारे के लिए जाने जाते थे लेकिन अब वहाँ भी शहरी प्राइवेट कल्चर और अविश्वास ने जगह बना ली है। लोग साथ होकर भी एक दूसरे से कटे हुए हैं। बाज वाला फकीर उस लोक संस्कृति का प्रतीक है जो कभी हमारे जीवन का हिस्सा था। कविता की पंक्तियाँ सांस्कृतिक बदलाव को अभिव्यक्ति देती हैं। केशव तिवारी की दृष्टि गाँव घर के उन हर जीवंत दृश्यों को चित्रित करती है, जिनका बदलना, आज के समय की विडंबना है। और यह कवि की कहन की भाषा का कमाल है कि जिस बात को वह कहना चाह रहे है उसका अर्थ हम तक प्रभावी ढंग से और पूरी संवेदना के साथ पहुंचने में समर्थ है।
बिंब और प्रतीकों की मौलिकता
उनके संग्रह का शीर्षक “नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा” ही इस बात का प्रमाण है कि वे प्रतीकों और बिंबोंं के माध्यम से व्यापक अर्थ जगाते हैं। एक साधारण-सी पंक्ति जीवन, प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते पर गहरी टिप्पणी बन जाती है।
कवि केशव तिवारी की कविताओं में प्रयुक्त बिंब और प्रतीक अतीत के सांस्कृतिक वातावरण एवं तत्कालीन सांस्कृतिक वातावरण की एक तुलनात्मक छवि प्रस्तुत करने में समर्थ हैं, जहाँ पाठक एक चिंतक की भूमिका में तब्दील हो जाता है और उसके पास अपने समय के यथार्थ को देखने की एक दृष्टि बनती है।
केशव तिवारी
“व्यापक रूप से संस्कृति के अंतर्गत कला, धर्म, राजनीति तथा मनोविनोद की पद्धतियां सभी कुछ आ जाती हैं। पर कविता में किसी काल विशेष की संस्कृति की पहचान का अर्थ होता है उस विशेष सौंदर्य दृष्टि को पहचानना जिससे कवि अपने समय के यथार्थ को देखता है। क्योंकि यथार्थ कोई अमूर्त वस्तु नहीं है अतः प्रायः हर युग की कविता मानव और प्रकृति के द्वंद्वात्मक संबंध के भीतर से ही उस यथार्थ विशेष को पकड़ने का प्रयास करती है मानव और प्रकृति का संबंध भी उस काल की सामाजिक स्थिति के द्वारा निर्मित निर्धारित होता है”। –(केदारनाथ सिंह) जब हम पढ़ते हैं “ नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा” तब मानव और प्रकृति का वह संबंध सहज स्पष्ट हो जाता है जिसे हमने स्वयं निर्मित किया है और प्रकृति को कष्ट देते हुए स्वयं के जीवन को भी खतरे में डाला है, और यह सब कुछ अनायास नहीं हुआ। ‘अब नहीं’ कविता में केशव तिवारी लिख रहे हैं “जल-स्रोत/ धीरे-धीरे सूख रहे हैं/ चढ़ता चैत है यह” तो यह पंक्तियां हमारी उस सामाजिक स्थिति को भी स्पष्ट करती है जहाँ हमने चैत के महीने में ही अपने जल स्रोतों के सूखने की दिशा तय की। साधारण सी लगने वाले यह पंक्तियाँ हमें स्मृति के उस लोक में भी ले जाती हैं जहाँ हमारे गांव-घर, आसपास के जल स्रोत चैत के महीने में जल से पूर्ण रहते थे। यह केशव तिवारी की कविताओं की विशेषता है कि वे हमें अतीत से वर्तमान की ओर लाते हुए रास्ते का सिंहावलोकन कराती हैं और उन विषयों और दृश्यों को दिखाने की चेष्टा करती हैं जिसे देखना, समझना इस सृष्टि को बचाने के लिए, मानवता को बचाने के लिए, श्रम और सौंदर्य दोनों को बचाने के लिए जरूरी है।
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