पहाड़ी लोक परंपरा को आधुनिकता से जोड़ता हुआ कविता संग्रह
देवेश पथ सारिया
उत्तराखंड के वरिष्ठ कवि भूपेंद्र बिष्ट का कविता संग्रह ‘गोठ में बाघ’ पढ़ा। भूपेंद्र बिष्ट पहाड़ के आदमी हैं और उत्तराखंड की लोक संस्कृति को गहराई से समझते हैं। मैं उन्हें well informed कवि कहूंगा। उन्हें मौसमों, त्यौहारों, वनस्पतियों, फूलों आदि के बारे में विस्तृत जानकारी है। वह अपनी कविताओं में इसका कुशलतापूर्वक उपयोग करते हैं। ‘जाड़ों में पिता’ शीर्षक कविता इसी का उदाहरण है जिसमें दक्षिण-पश्चिम दिशा से बादलों का समुच्चय उभरता है और कालांतर में माँ भावर की गर्मी के प्रति चिंतित दिखती है। पहाड़ में बारिश का मौसम लंबे समय तक बना रहता है और बारिश कभी भी अचानक गिरने लगती है। कवि जानता है कि पहाड़ की हरीतिमा इसी बारिश के कारण है, वरना उसके यहाँ भी सूखे ठूंठ सदृश पहाड़ खड़े होते :
“सृष्टि भर की हरियाली से
बारिश का एक गहरा रिश्ता है
जैसे वसंत से बेला का रिश्ता है
और शरद से है हरसिंगार का”
‘पत्थर की दहाड़’ कविता मनुष्य का प्रकृतीकरण करती है और इस कविता के बिंब अद्भुत हैं। ‘आदि-अंतहीन बर्फ़’ कविता बताती है कि पर्यटक जिस तरह से पहाड़ की बर्फ को देखते हैं, उस तरह पहाड़ के निवासी नहीं देखते। उनका अपनी प्रकृति (जिसका हिस्सा बर्फ़ भी है) से अंतरंग संबंध है :
“पहली आवाज़ वृद्धा की
अरे एक थाली रख दो कोई बाहर
भर जाए वह ताज़ा बर्फ़ से तो ले आना भीतर
गुड़ है रखा प्रसाद खाओगे नहीं क्या?”
‘इज़्ज़त नगर बरेली : 1986’ शीर्षक कविता बच्चों के माध्यम से न केवल अमीर और गरीबों के बीच की खाई को दिखाती है बल्कि इस ओर भी इशारा करती है कि किस तरह आर्थिक विपन्नता और कुसंगति के कारण मासूम बचपन में ही अश्लीलता प्रवेश कर जाती है और बच्चे-किशोर चाची की उम्र की औरतों से भद्दा मज़ाक़ करने लगते हैं।
इस संग्रह की प्रेम कविताओं में किंचित हेकड़ी दिखाता एक युवा नज़र आता है जो आपको शायद अजीब लगे लेकिन नैनीताल में रहने के अनुभव से मैं जानता हूँ कि वहाँ इस तरह के लड़के होते हैं। इस लड़के के लिए अनिश्चित मौसम में पक जाने वाले मीठे फल एक लड़की लाया करती थी। देखा जाए तो यहाँ प्रेम के बहाने फलों के पकने के मौसम के बारे में भी बात की गई है, कुछ ऐसे अनोखे फल जिन पर वनस्पति विज्ञानियों को और भी शोध करने की आवश्यकता है। ‘ख़त’ शीर्षक से तीनों प्रेम कविताएँ अच्छी हैं, इनमें से पहली कविता विशेष तौर पर अच्छी है जो आपको उस पहाड़ में ले जाती हैं जिसे निर्मल वर्मा ने रचा था। इन तीनों कविताओं में प्रेम का ताप मद्धिम है। कवि माघ के महीने में वार्धक्य और नवयुवाओं के प्रेम का संधि बिंदु एक नदी के किनारे को बना देता है। वह स्त्रियों की सुंदरता का रहस्य जन्मजात अलंकारों को मानता है और कहता है कि :
“दरअसल स्त्रियों की बातचीत में
स्मित गुँथा होता है
उपसर्ग और प्रत्यय की तरह
हँसी स्त्रियों के लिए वसन सरीखा ही है
जिसे धो-सुखाकर वह उजला बनाए रखती हैं”
यह युवा थोड़ा परिपक्व होकर कवि बनता है, उस कवि की निर्मिति इन कविताओं में दिखाई देती है। पोस्ट ऑफिस और चिट्ठियाँ उस दौर के लेखकों के लिए बहुत सगी रही होंगी। लेकिन भूपेंद्र बिष्ट ने अपनी कविताओं को अति भावुकता से बचाया है। ‘दीदी की फोटो’ कविता में भी फोटोग्राफी की दुकानों के प्रति नॉस्टैल्जिया की जगह एक रोचक किस्सा है। यह उन्हें कई समवयस्क कवियों से अलग बनाता है। पुरानी यादों की कविताओं में से ‘तलघर’ सर्वाधिक उल्लेखनीय है। इसमें प्रवाह विचलित नहीं होता और पुराने संदूक से जो कुछ निकलता है, वह सब अपने आप में अलग-अलग कहानी समेटे हुए है। जैसे इष्ट देवता के नाम पर लिया हुआ संकल्प (उचैंण) :
‘सिलबट्टा’ विमर्श फेसबुक पर बहुत लोकप्रिय रहा था। इस सिलसिले की एक कविता इस किताब में भी है लेकिन वह इससे अधिक आगे नहीं बढ़ पाती कि हम कवि का इस विषय पर पक्ष जान पाते हैं। अलबत्ता आम आदमी की मजबूरी का बेचारगी भरा चित्रण ‘अत्याचारी’ शीर्षक कविता में देखने को मिलता है :
“मुझे ऐसा चाटुकार बनाया है
मेरे बच्चों के पेट ने
मेरा हाथ भरता है उनका पेट
अत्याचारी के पाँवों पर रहता है मेरा हाथ”
कोरोना काल पर हिंदी में बहुत-सी कविताएँ लिखी गईं जिनमें से अधिकांश औसत थीं। भूपेंद्र बिष्ट की कविता ‘बादशाह’ बिहार के मज़दूरों की स्थिति पर लिखी गई सशक्त कविता है। ‘पहाड़ की औरत’ पर लिखी कविताएँ बहुत शोर नहीं मचातीं बल्कि पहाड़ी स्त्री की दिनचर्या के छोटे-छोटे प्रसंगों पर प्रकाश डालती हैं। जंघई राम नामक निचले तबके के मुलाजिम की एकमात्र चिंता इतनी सी है कि उसकी बेटी ससुराल में सुख से है या नहीं। असल में यह इस देश के हर पिता की चिंता है जो अपने कलेजे के टुकड़े को किसी दूसरे घर में रहने के लिए भेज देता है, जिसे ससुराल कहते हैं। और चर्चित मान्यताओं और उदाहरणों के अनुसार ससुराल नामक जगह स्त्रियों के सपनों की क़ब्रगाह हो सकती है। कवि अपनी कविता के माध्यम से यह भी दिखता है कि शान से खड़े पहाड़ों में ‘स्त्री की बीमारी’ को कितने हल्के में लिया जाता है और पितृसत्ता उन्हें महज़ रोटी बनाने की मशीन के रूप में देखती है। ‘आते हैं पिता’ घर से भाग गई लड़की के पिता की चिंता को दिखाती है— दृश्य में उसके पिता का नित्य उभरना वास्तविक है या जादुई यथार्थवाद, यह पाठक की कल्पना पर निर्भर करता है।
शहरों पर लिखी कविताओं में इलाहाबाद पर लिखी कविता बेहतर है जबकि नैनीताल पर लिखी कविता से मुझे कुछ ज़्यादा उम्मीद थी। इस कविता में कवि अपनी क्षमता के साथ न्याय नहीं कर पाया है। शहरों पर लिखी कविताओं में से कवि की सबसे उत्तम कविता है नैनीताल के क़रीब स्थित क़स्बे भवाली पर। भवाली को कवि ने किसी चित्रकार की तरह देखा है :
“भवाली एक दृश्य था, है और रहेगा
बारिश में धुल-पुंछ जाता है
रहता है फिर कुछ देर आर्द्र
और सूर्य की रोशनी में चमकता है
जाड़ों में छिप जाता है
कच्ची उम्र के लड़कों की जलाई हुई
आग से उठते धुएँ के पीछे”
भूपेंद्र बिष्ट इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक दौर के पोस्टरबाज़ कवि नहीं हैं। वह सूक्तियों से दूर रहने वाले कवि हैं। उनकी कविताएँ संपूर्णता में ही अपना अर्थ भली भांति व्यक्त कर पाती हैं। ‘अफ़गान स्नो’ शीर्षक कविता इस बात का अच्छा उदाहरण है।
भूपेंद्र बिष्ट कई बार एक ही कविता में कई तकनीकों और भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। निजी तौर पर मुझे ऐसी कविताएँ पढ़ना ठीक लगता है। लेकिन इसमें दो दिक्कतें हैं—पहली यह कि कविता का प्रवाह बाधित होता है और दूसरी यह कि सामान्य पाठक ऐसी कविताओं को समझ नहीं पाते। उदाहरण के तौर पर ‘फुटकर ज़िंदगी’ कविता में कवि का मंतव्य पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पता है। यदि वह यह कहना चाह रहा था कि मकान मालिक के परिवार से आत्मीयता वहाँ टूट गई जब वह बूढ़ी सास के लिए दमा की दवाई ले आया और फिर उसने वह घर छोड़ दिया, तो इस निष्कर्ष तक पहुँचना पाठक के लिए दुर्गम है। ‘तंदुरुस्ती का छीजना’ कविता एक उठान पर शुरू होती है लेकिन अंतिम तीन पैराग्राफ में पथ से विचलित हो जाती है। भाषा के बारे में कवि की असावधानी का एक उदाहरण देता हूँ— एक कविता में ‘आउटस्कर्ट’ शब्द बहुत अखरता है क्योंकि वह कविता की मूल प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहा है। जबकि इसी कविता की अगली ही पंक्ति में ‘ज़ईफ़’ जैसा नायाब शब्द प्रयोग किया गया है। कब कौनसी तकनीक, कितना ज्ञान और कैसी भाषा इस्तेमाल करनी है और कब नहीं, यह संतुलन महीन कारीगरी का काम है। यदि इसे भूपेंद्र बिष्ट अपनी आने वाली कविताओं में साध लेते हैं तो हिंदी में उन्हें और ऊँचा मुकाम प्राप्त हो सकता है।
एक समृद्ध शब्दकोश वाले कवि को जिसके पास समाज को देखने की दृष्टि और विस्तृत अनुभव संसार है, अपने सही मुकाम तक पहुँचना चाहिए।
प्रसंगवश, इस कविता संग्रह को उत्तराखंड राज्य के भाषा संस्थान का महादेवी वर्मा पुरस्कार (2025) मिला है।
***
किताब : गोठ में बाघ
कवि : भूपेंद्र बिष्ट
प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन
वर्ष : 2023
पृष्ठ : 112
मूल्य : 350 रुपए (हार्डकवर)
***
देवेश पथ सारिया युवा कवि-कथाकार-अनुवादक एवं संपादक हैं।
पुरस्कार : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (2023), स्नेहमयी चौधरी सम्मान (2025)।

प्रकाशित पुस्तकें :
कविता संकलन : अदृश्य आत्मीय की टोह में (2025), नूह की नाव (2022)।
कहानी संग्रह : स्टिंकी टोफू (2025) ।
कथेतर गद्य : छोटी आँखों की पुतलियों में (ताइवान डायरी, 2022)।
अनुवाद : सपने बुनता फाॅरमोसा : ताइवानी कविताएँ (2026), यातना शिविर में साथिनें (2023)।
अन्य भाषाओं में पुस्तकें : A Toast to Winter Solstice (अंग्रेज़ी अनुवाद : शिवम तोमर, 2023) ।
अन्य भाषाओं मे अनुवाद : देवेश की रचनाओं के अनुवाद अंग्रेज़ी, मंदारिन (चीनी), स्पेनिश, रूसी, अरबी, ताइवानी, नेपाली, उर्दू, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, असमिया, भोजपुरी, राजस्थानी, हरियाणवी, गढ़वाली और कुमाऊँनी में हुए हैं।
विशेष :
ताइवान के संस्कृति मंत्रालय की योजना के अंतर्गत ‘फॉरमोसा टीवी’ पर कविता पाठ (2022)।
काओशोंग वर्ल्ड पोएट्री फेस्टिवल (2023), ताइवान में शिरकत।
रज़ा न्यास के ‘आज कविता’ कार्यक्रम में कविता पाठ (2025)।
सम्पादन : गोल चक्कर वेब पत्रिका (www.golchakkar.org)
ईमेल : deveshpath@gmail.com





