नई कविताएँ : अदनान कफ़ील दरवेश

अदनान कफ़ील दरवेश की ये नई कविताएँ अपने समय, समाज और व्यक्ति के भीतर घट रही हलचलों को बेहद सहज लेकिन तीखी भाषा में दर्ज करती हैं। ‘सितम्बर का मिज़ाज’, ‘प्यास’, ‘अगस्त में ऊँट’, ‘बौछार’, ‘का कहिये’ और ‘शांति-प्रस्ताव’ में मौसम, स्वप्न, शहर, स्मृति, अकेलापन और राजनीतिक सत्ता के रूपक एक-दूसरे में घुलते दिखाई देते हैं। कवि मामूली और लगभग रोज़मर्रा के दृश्यों से असाधारण अर्थ पैदा करता है—कहीं महीना भविष्यफल बन जाता है, कहीं प्यास के साथ सरकार का गिरना एक चौंकाने वाला राजनीतिक व्यंग्य रचता है, तो कहीं ‘शांति-प्रस्ताव’ सत्ता की कूटनीतिक भाषा के भीतर छिपी ताक़त को बेनक़ाब करता है। इन कविताओं की खासियत उनका संयमित कथ्य, अप्रत्याशित बिंब और विडंबना से भरी संवेदना है; वे सीधे नारे नहीं लगातीं, बल्कि अपने पाठक के भीतर एक बेचैनी और सवाल छोड़ जाती हैं।
प्रस्तुत है अनहद कोलकाता पर युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश की नई कविताएँ। आपकी प्रतिक्रियाओं का तो इंतजार रहेगा ही।
सितम्बर का मिज़ाज
सितंबर
मौसम का मिज़ाज है
मौसम, जिसे तुम पढ़ते रहे हो शुरू से
यह दरअसल कोई महीना नहीं
बल्कि भविष्यफल है
इसे तीस दिनों तक बदलते देखो
गर्मियाँ आख़िर विदा ले रही हैं
बारिश के कटोरे में है
तुम्हारी आगामी परछाईं
बरसात तुम्हें सड़क पार करवा देगी,
जब तुम घुटनों तक भीगे,
लौट रहे होगे घर
यह उझकी हुई नींद की तरह है,
दोपहर की
जिसका स्वप्न धुंध में खुलेगा
तब तुम्हें पता चलेगा
जो बीत गया वह महीना नहीं
मिज़ाज था।
प्यास
कविता, स्वप्न में प्यास की तरह थी
प्यास जो पानी से नहीं बुझती थी
उसके लिए चाहिए थी प्याज़
जिसे ढूंढते-ढूंढते सुबह हो गयी
और सुबह, स्वप्न में पता चला
प्यास मर गयी
सरकार गिर गयी।
अगस्त में ऊँट
एक दिन जूते सुधरवाते हुए
देखा मैंने एक ऊँट को सड़क पार करते हुए
बहुत कम लोग थे जिन्होंने उसे देखा
ऊँट भी मस्त चला जा रहा था
अपनी गर्दन की सीध में
अपने गद्देदार पैरों पर…
मैंने देखा उसे पुल की तरफ़ जाते हुए
धीरे-धीरे वह पूरी तरह ओझल हो गया
बत्ती लाल से हरी हो गयी
सब अपने रास्ते चले गए
बादल में सूरज ने अपना कूबड़ छुपा लिया
शाम हुई…
मैंने भी मोची से जूते लिए,
उसकी उजरत अदा की
और घर की तरफ़ चल पड़ा…
बौछार
दिन एक ज़ख़्म की तरह खुला था
जब मैं सुबह अपने कमरे पर ताला मढ़ रहा था
बारिश की वजह से सड़कें तैर रही थीं
उनके अदृश्य पाँव उग आए थे
मुझ पर तुम्हारी यादों की बेतहाशा बौछार थी
मेरा दिल उछलते हुए पुश्किन के बुत तक चला गया
और सारी बसें गुम हो गईं कहीं
जिनसे चौक पर गहमागहमी-सी रहती थी
वहाँ एक ऐसा नूर था
जिसे मैं शब्दों में भर लेना चाहता था
क्योंकि मेरे पास और कोई कासा न था
मैं थककर वहीं बैठ गया
जब दिन,
एक ज़ख़्म की तरह खुला था…
का कहिये
कहने के लिए बहुत नहीं रहा कभी मेरे पास
बहुत थोड़ा-सा ही तो था कहना,
एक आध पँक्तियों में ढहना
‘मनहिं मन’ रहना
जानता था मैं
कितना अतिरिक्त कह चुका था
कितना बोर कर चुका था
जानता था कितना अवांछनीय था मैं
जानता था अपनी उपस्थिति का अँधेरापन
अपने दुहराव की शर्म
हर बार इसीलिए
ख़ुद की तरफ़ मुँह करके ही पढ़ी थी
कविता।
शांति-प्रस्ताव
जंग के निर्णायक क्षण में
वे कोशिश करेंगे एक आख़िरी बार
शांति-वार्ता की
वे बताएँगे—
लड़ने से कोई फ़ायदा नहीं होता
जो मिलेगा वह बातचीत से ही मिलेगा
और वे संवाद के महत्व पर
लगभग एक घंटा देंगे भाषण
वे बताएँगे विरोध की शास्त्र-सम्मत लोकतांत्रिक भाषा
प्रतिरोध की नैतिकता
और लोक-व्यवहार की औपचारिकता
वे एक सर्वज्ञ संत की तरह
अपनी संयत भाषा में गिनाएँगे
हमारी माँग और विरोध की जायज़ कमियाँ
उस तठस्थ राजनीतिक भाषा की,
अतिरिक्त मिठास को पहचानना !
जिसमें वे रखने आएँगे हर बार
ताक़तवर के पक्ष से
शांति-प्रस्ताव।
***
अदनान कफ़ील दरवेश
बलिया (उत्तर प्रदेश)
ठिठुरते लैम्प पोस्ट, नीली बयाज़ तथा ‘लानत का प्याला‘ कविता संग्रह राजकमल से प्रकाशित.
कविताओं के अंग्रेज़ी, स्पेनिश, मराठी, कन्नड़, बांग्ला तथा उड़िया अनुवाद प्रकाशित हुए हैं.
‘भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार’ (2018), ‘रविशंकर उपाध्याय स्मृति कविता पुरस्कार’ (2018), ‘वेणुगोपाल स्मृति कविता पुरस्कार’ (2019-2020), ‘केदारनाथ सिंह सम्मान’ से सम्मानित
thisadnan@gmail.com






