मेरी ढाका डायरी – मधु कांकरिया ( एक दिलचस्प अंश )

वरिष्ठ कथाकार मधु कांकरिया की ‘मेरी ढाका डायरी’ एक प्रबुद्ध व्यक्ति की आँख से एक देश और उसके समाज की ली गई थाह है। यह देश है पड़ोस का बांग्लादेश जिससे हम भारतीयों की हमेशा से साझेदारी रही है, कुछ इतनी गहरी कि वक़्त की करवटों की बदौलत बीच में खिंच गई नई सरहद के बावजूद, आज भी दोनों देशों के आम अवाम के दिल में बहुत कुछ एक-सा धड़कता है।
यह किताब वक़्त की उन करवटों और उस ‘एक-सी धड़कन’, दोनों का जायज़ा लेती है। लेखक की ख़ासियत यह है कि बांग्लादेश में प्रवास के दौरान वह न केवल वहाँ की परिस्थितियों को हिसाब में लेती हैं बल्कि उन परिस्थितियों से प्राप्त सूत्रों से उन कारणों की शिनाख़्त भी करती चलती हैं जिनसे ‘सोनार बांग्ला’ की श्यामल भूमि का सहज हास बाधित हो रहा है। ये कारण हैं ग़रीबी की गहरी जड़ें, बहुसंख्यक आबादी के बीच साम्प्रदायिकता की बढ़ती पैठ और अल्पसंख्यकों में बढ़ता असुरक्षाबोध आदि।
एक संवेदनशील लेखक के तौर पर मधु कांकरिया आज के बांग्लादेश के इन सभी पहलुओं को देखती हैं और ढाका के अभिजात इलाक़ों से लेकर ग़रीब-गुरबा की दैनिक जद्दोजहद तक को अपने दायरे में लेती हुईं वर्तमान बांग्लादेश से हमारा परिचय कराती हैं। कह सकते हैं कि यह पाठ एक देश ही नहीं, मानवीय जीवन की भी महागाथा है।
– राजकमल प्रकाशन से साभार
चिराग दिल के जलाओ कि ईद का दिन है
तराने झूम के गाओ कि ईद का दिन है
– क़तील शिफ़ाई
जिंदगी की खोज में और कतरा कतरा जीने की खवाहिश में मैं अक्सर बाहर निकल पड़ती। उन दिनों रमजान चल रहे थे। रमजान के महीने को बहुत पवित्र महीना माना जाता है। हदीस में लिखा है कि रमजान के महीने में शैतान कैद में रहते हैं। यह विश्वास किया जाता है कि इस पवित्र महीने में की गयी इबादत, नमाज और अल्लाह स्मरण का पुण्य कई गुणा बढ़कर मिलता है। इस कारण अधिकांश मुस्लिम रमजान के महीने में जितना संभव हो उतनी इबादत करते हैं। एक बार इफ्तार के समय सभ्यता और प्रगति के दृश्य देखते-देखते शाम सवा छह बजे के करीब पार्क में घूमने निकली तो मैं हैरान रह गयी, रोज की तुलना में सड़क खाली थी, आवाजों का सफर आरोही से अवरोही मोड़ ले चुका था। पार्क में मेरे सिवाय इक्का दुक्का ही कोई युवा था। जैसे ही मस्जिद से आयी अजान की आवाज़, जो जहाँ था वहीँ फ्रीज़ हो अल्लाह और इफ्तार की चादर से लिपट गया था। पूरा ढाका अल्लाहमय और इफ्तारमय था। फुटपाथ पर खड़े खोमचावाले, रेहड़ी वाले, फलवाले और डाभवाले सभी प्लास्टिक की बोतल से पानी पीकर झाल मुड़ी और खजूर खाकर रोजा खोलने लगे। भूख – गरीबी और हड्डी तोड़ थकावट से बेहाल लोगों को अल्लाह की रौशनी के दो पल नसीब हुए। ड्राइवर महमूद भाई ने भी गाड़ी किनारे पार्क की और रोजा खोला। कुछ देर बाद वे कहने लगे,
- आंटी, इस्लाम में वक़्त की बहुत पाबंदी है। ठीक समय पर अजान के साथ साथ रोजा तोड़ने का आदेश है। मैं जब सऊदी में था तो वहां तो इफ्तार के समय लोग सड़क किनारे बोतल और खजूर लिए खड़े रहते हैं कि जो घर न जा सके वह सड़क पर रोजा खोल दे। आंटी वहां तो बहुत सख्ती थी, वहां तो नमाज के दौरान आपको दूकान भी बंद करनी होती है, लेकिन अब वह नियम हट गया है।
एक ट्रैफिक पुलिस वाले को देख मन करुणा से भर गया। वह एक हाथ से ट्रैफिक को नियंत्रित कर रहा था और दूसरे हाथ से रोजा खोलते हुए बोतल से पानी के घूँट भर रहा था। कुछ पुलिस वालों ने अपनी जीप किनारे लगाई और रोजा खोलने लगे। एक जगह देखा दो आदमी आते जाते लोगों को इफ्तार के पैकेट बाँट रहे थे। पास खड़ा एक रिक्शावाला निस्संग और निरपेक्ष भाव से यह सब देख रहा था, मुझे लगा शायद हिन्दू है, मैंने हिम्मत कर पूछ ही डाला – भैया आपने रोजा नहीं खोला, उसने उदास जवाब दिया – जब रोजा रखा ही नहीं तो खोलूँगा कैसे? पर क्यों नहीं रखा रोजा? भूखे पेट रिक्शा कैसे टानूंगा .. संक्षिप्त सा जवाब देकर वह घूम गया।
… सच, दुनिया कितनी बहुरंगी है। मुस्लिम सभ्यता में रमजान के दौरान दिन में खाना, यहाँ तक कि एक बूँद पानी तक पीना पाप माना जाता है जबकि हमारे यहाँ तपस्या के दौरान रात में खाना – पीना पूरी तरह निषिद्ध है। बहरहाल इसी महीने मैं बाजार गयी तो भी मुझे ताज्जुब हुआ, कुछ दुकानदार ने मुझसे अनाप सनाप पैसे नहीं मांगे क्योंकि रमजान का पवित्र महीना चल रहा था।
शेष। आज ईद है। अनूठा धर्म और कर्म का त्योंहार है ईद। इस्लामिक आस्थाओं वालों के यहाँ ईद के सप्ताह में धर्म बढ़ जाता है तो जो मुस्लिम नहीं हैं उनके यहाँ कर्म बढ़ जाता है। अछूता इससे कोई नहीं रह सकता। हमारे घर में भी घुस आयी थी थोड़ी सी ईद। किसी मुस्लिम देश में रमजान को महसूस करना अपने आप में एक विलक्षण अनुभव था। ढाका में ईद के दो तीन दिन पहले से ही छुट्टियां शुरू हो जाती हैं। काम काज ढ़प्प हो जाते हैं। गारमेंट फैक्ट्री पूरे दस दिनों के लिए बंद हो जाती है। दूध, सब्जियों और कई दूसरे खाने के सामानों की होम डेलिवरी तीन चार दिनों के लिए, और कहीं कहीं तो पांच छह दिनों तक के लिए ठप्प हो जाती है। बाजार इफ्तार के खाने के पैकेट से पटे रहते हैं। ड्राइवर, घर की सहायिका सब छुट्टी के मूड में। किसी का काम में दिल नहीं लगता। सब चाहते कि अधिक से अधिक समय तक इबादत की जाए। रमजान के दौरान सभी रेस्त्रां में इफ्तार मनाया जाता है। कई मुसलमानों ने हमें भी इफ्तार के लिए आमंत्रित किया। हमने भी अपने घर में दो बार इफ्तार रखा। पूरे दिन निराहार और निर्जल रहकर इफ्तार पार्टी में शाम को रोजा तोड़ते हुए देखना भी एक रोमांचक अनुभव होता है। फातिमा ने अपना रमजान हमारे यहाँ ही रहकर पूरा किया था। उसने कहा –
आपके घर में मैं जो रमजान कर रही हूँ न देखिएगा कि इसका लाभ आपको भी मिलेगा। मुझे याद आए अपने मामा जी जो बड़े संतुष्ट रहते थे मामीजी के व्रत, उपवास, भजन और कीर्तन करने से। उनका भी यही मत था कि मामीजी के धर्म कीर्तन से परिवार सुरक्षित था। कभी मामीजी व्रत उपवास नहीं रख पाती तो मामाजी बेचैन हो जाते। मेरी एक मौसेरी बहन थी उसके पति की दोनों किडनी खराब थी। शुरू में पति की सेहत के लिए उसने ढेरों व्रत उपवास, पूजा पाठ और मन्नत की लेकिन बाद में पति की बढ़ती बीमारी, बढ़ती भाग दौड़ और बढ़ते खर्चे के चलते जब वह व्रत उपवास नहीं रख पाती थी तो उसकी सास ने ताने मार-मार उसका जीना दुश्वार कर दिया था।
हर धर्म के रंग एक जैसे। रमजान हो या जैनियों की तपस्या या वैष्णवों के व्रत उपवास, किसी का भी आत्मा के सत्य, सौंदर्य और मन की शुद्धता से कुछ लेना देना नहीं था। बस एक तयशुदा कार्यक्रम की खानापूर्ति भर थी। इसका फिर शिद्दत से अहसास हुआ जब मेरी सहेली शकीना से मैंने कहा चलो कल स्विमिंग के लिए चलते हैं, इंटेरनेशनल क्लब में मेरे बेटे की मेम्बरशिप है और मैं एक अतिथि सदस्य की हैसियत से तुम्हें भी ले जा सकती हूँ। दोपहर के समय वहां सिर्फ महिलाएं ही रहती हैं, हमें कोई असुविधा नहीं होगी। इतनी गर्मी में उसका मन भी मचल गया – उसने कहा , कल पक्का चलते हैं। लेकिन तभी उसे ख़याल आया कि कल से तो रमजान शुरू हो रहे हैं। उसने कहा – रुक, एक बार मैं इमाम को फोन कर पता करती हूँ कि रमजान में मैं तैर सकती हूँ या नहीं।
- तैरने में क्या बुराई है ? मैं हैरान थी। रमजान में ताश, चौपड़, कैरम सब वर्जित है उसने कहा और फोन लगाया। इमाम ने कहा
- तैर सकते हो पर मुंह में पानी नहीं जाना चाहिए। शकीना ने फिर तैरने के ख्याल को ही तिलांजलि दे दी।
मेरे यहाँ काम करने वाली बाई की बहन हापशा के नाक में तकलीफ एकाएक बढ़ गयी थी। नाक से खून भी बहने लगा था। मैंने कहा – तुरंत डॉक्टर को दिखाओ। उसने कहा – रमजान निकल जाए तो दिखाऊंगी। मैंने कहा – ऐसा क्यों ? उसने जवाब दिया,
- आंटी, डॉक्टर नाक में डालने वाली दवाई देगा।
- तो, नाक में ही तो डालना है, मुंह में तो नहीं न !
- आंटी, कई बार दवाई नाक से गले में चली जाती है, ऐसा होने से रोजा टूट जाएगा, फिर उसके ससुर हाजी हैं, उनके सामने वह इतनी हिम्मत नहीं कर पाएगी।
मैं अवाक थी।
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मधु कांकरिया वरिष्ठ कथाकार एवं एक्टिविस्ट हैं।
उनकी यह किताब मेरी ढाका डायरी राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित हुई है और खासी चर्चित हो रही है।